नागरिक अधिकारों की रक्षापंक्ति में चीन

हमारे पडौसी राष्ट्र चीन ने अपने देश के नागरिकों के लिए प्रशासनिक प्रक्रिया कानून बनाया है जो दिनांक 01.10.90 से लागू है। उक्त कानून के अनुच्छेद 1 में प्रावधान है कि प्रशासनिक मामलों के समयबद्ध और सही परीक्षण और नागरिकों, कानूनी व्यक्तियों व अन्य संगठनों के वैधपूर्ण अधिकारों व हितों की रक्षा के लिए और यह सुनिश्चित करने के लिए कि प्रशासनिक अंगों द्वारा प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग कानून के अनुसार किया जाता है यह कानून अधिनियमित किया जता है। किसी ठोस प्रशासनिक आदेश, जिससे नागरिकों के हित या अधिकार का उल्लंघन हुआ हो, के विरुद्ध वे न्यायालय में कार्यवाही कर सकते हैं। प्रशासनिक मामलों पर न्यायालय स्वतंत्र शक्तियों का प्रयोग करेंगे जिनमें किसी का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। न्यायालय प्रशासनिक मामलों के लिए प्रशासनिक खंड बनायेंगे। न्यायालय के समक्ष पक्षकार एक समान होंगे। सभी राष्ट्रीयताओं के लोगों को प्रशासनिक कार्यवाही में अपनी देशी भाषा का प्रयोग करने का अधिकार होगा। जो लोग स्थानीय लोगों द्वारा प्रयुक्त भाषा को नहीं समझते हों उन्हें अनुवाद सुविधा उपलब्ध करवाई जायेगी। जबकि तथा कथित गणतांत्रिक भारत में तो इसके विपरीत न्यायालय की भाषा में कार्यवाही संस्थित करनी पड़ती है और प्रलेख न्यायालय की भाषा में अनुवाद कर प्रस्तुत करने पड़ते हैं। प्रशासनिक अत्याचारों के मामलों में भारत में सामान्य उपाय रिट याचिका में ही उपलब्ध हैं जोकि समय, व्यय व श्रम साध्य प्रक्रिया है। यद्यपि संविधान के अनुच्छेद 32(3) में जिला न्यायालयों को रिट क्षेत्राधिकार देने का प्रावधान है किन्तु देश की शिथिल व संवेदनहीन संसद खुले व आक्रामक जन-आंदोलन द्वारा विवस नहीं किये जाने तक किसी भी न्यायोचित मांग पर ध्यान देने की कोई आवश्यकता नहीं समझती है। प्रशासनिक बंदी बनाया जाना, जुर्माना, व्यापार लाइसेंस निरस्त करना, उत्पादन या व्यापार बंद करने या सम्पति जब्ती के आदेश को आवेदक द्वारा अस्वीकार करना, व्यक्ति की स्वतंत्रता को अनिवार्य प्रशासनिक कार्यवाही द्वारा प्रतिबंधित करना, या सम्पति को कब्जे में लेने के आदेश को अस्वीकार करना, यह समझते हुए कि किसी व्यापारिक लाइसेंस का आवेदन कानून सम्मत है किन्तु प्रशासन ने मना कर दिया है अथवा जवाब देने से मना कर दिया है। नागरिकों की सम्पति और शरीर की रक्षा के लिए कानून सम्मत आवेदन के बाद भी अपने कर्तव्यों का प्रशासनिक अंग ने निर्वाह नहीं किया हो या जवाब नहीं दिया हो। जब प्रशासनिक अंग ने कानून के अनुसार पेंशन नहीं दी हो। प्रशासनिक अंग ने किसी कर्तव्य निर्वाह की उपेक्षा की हो। प्रशासनिक अंग ने जब व्यक्ति और सम्पति के अन्य अधिकारों का अतिक्रमण किया हो।
चीन में साक्ष्य में प्रलेखीय, भौतिक, ऑडियो-वीडियो, गवाहों का परीक्षण, पक्षकारों के कथन, विशेषज्ञ की राय, घटना स्थल का दृश्य और मौक़ा रिपोर्ट शामिल हैं। जबकि भारत में साक्ष्य अधिनियम की धारा 3 में दी गयी साक्ष्य की परिभाषा इतनी व्यापक नहीं होने से नागरिकों को हमेशा न्यायालय के विवेक व दया पर निर्भर रहना पड़ता है। चीन में प्रशासनिक कार्यवाही के प्रमाण का भार बचाव पक्ष पर होगा और वह वे सब साक्ष्य व प्रलेख उपलब्ध करवाएगा जिन पर कार्यवाही आधारित है। जबकि अनुच्छेद 33 के अनुसार वह कानूनी कार्यवाही में प्रार्थी पक्ष और गवाहों से अपनी प्रेरणा पर साक्ष्य संग्रहित नहीं कर सकेगा। दूसरी ओर भारत में तो अपना दावा साबित करने का सम्पूर्ण भार आवेदक पर रहता है और यह अस्वस्थ परिपाटी बन चुका है। सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 19 (5) में यद्यपि सूचना न प्रदानगी के औचित्य को स्थापित करने का भार सरकारी पक्ष पर डाला गया है किन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं हो रहा है।
यदि आवेदक किसी प्रशासनिक अंग को किसी प्रकरण में पुनर्विचार करने का निवेदन करता है तो प्रशासनिक अंग आवेदन प्राप्ति के दो माह के भीतर निर्णय लेगा। यदि आवेदक ऐसे निर्णय से संतुष्ट नहीं हो या निर्धारित अवधि में निर्णय प्राप्त न हो तो न्यायालय में वाद कर सकता है। यदि आवेदक सीधे ही न्यायालय में कार्यवाही करना चाहे तो वह तीन माह के भीतर कर सकता है। अनुच्छेद 43 के अनुसार न्यायालय को शिकायत प्राप्त होने पर सात दिन के भीतर मामला दर्ज करेगा या अस्वीकार करने का निर्णय करेगा। भारत में किसी भी स्तर के न्यायालयों द्वारा मामला दर्ज करने के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है और संयोग से यदि ऐसी कोई सीमा कहीं निर्धारित हो तो उसका निर्भय और निस्संकोच होकर उपहास किया जाता है। राजस्थान में सामान्य दाण्डिक नियमों में प्रावधान है कि आपराधिक प्रकरण में रिपोर्टिंग बिना समय गंवाए तुरंत की जायेगी किन्तु व्यवहार में यह महीने तक का समय लेती देखी जा सकती है व न्याय-प्रशासन इसे मूक-दर्शक बने देख रहा है। भारत में प्रणाली व प्रक्रिया सम्बंधित कानून तो सामन्तवादी विचारधारा वाले अडिय़ल व हठधर्मी तथा वास्तव में नियंत्रणहीन लोक सेवकों द्वारा और अपनी सुविधा, संरक्षण, पोषण व सहायता और मनमानेपन, तथा जनता का दोहन-शोषण संभव बनाने के लिए ही बनाए जाते हैं। इन नियमों के निर्माण में जन सुविधा कोई स्थान नहीं रखती। भारत में अधिकाँश प्रक्रियागत कानून जनविरोधी हैं अत: ये मौलिक कानून के प्रयोग होने से पहले ही पक्षकारों को थकाकर न्याय से वंचित करने के लिए पर्याप्त हैं। प्रक्रियागत नियमों के माध्यम से न्याय के रास्ते में इतने गढे और अवरोध बना दिए जाते हैं कि एक न्यायार्थी इनमें लडखडाकर गिर जाता है और अंतत: अन्याय के आगे घुटने टेकने को विवश हो जाता है। भारत के मौलिक कानून भी खोखले ही हैं। सूचना के अधिकार अधिनियम की उद्देशिका में यद्यपि जवाबदेही जैसा लुभावना उद्देश्य बताया गया है किन्तु मूल कानून में जवाबदेही निर्धारित करने का कोई उल्लेख तक नहीं है। अत: अन्य कानूनों की तरह उक्त कानून भी एक परिणामहीन व मनोरंजक कानून मात्र रह गया है।
चीनी कानून के अनुसार आवेदक ऐसे निर्णय से असंतुष्ट होने पर उच्च स्तरीय न्यायालय में अपील कर सकेगा। मामला दर्ज करने पर न्यायालय बचाव पक्ष को पांच दिन में शिकायत की प्रति भेजेगा। प्रतिपक्षी शिकायत की प्रति प्राप्त होने के दस दिन के भीतर न्यायालय को अपना बचाव कथन मय प्रलेखों के उपलब्ध करवाएगा। न्यायालय पांच दिन के भीतर शिकायत के जवाब की प्रति आवेदक को भेजेगा। भारत में न्यायालय किसी पक्षकार को कोई प्रति उपलब्ध नहीं करवाते हैं वे लोक सेवक न्यायालय की बजाय राजा की श्रेष्ठ भूमिका निभाना अधिक पसंद करते हैं। यहाँ तक कि उच्चतम न्यायालय भी वादी से अपेक्षा करता है कि वह प्रतिवादी को समन स्वयम ही भेजे। समय सीमा और उसकी अनुपालना तो भारतवर्ष में एक दिवा स्वप्न मात्र कहा जा सकता है। उपभोक्ता संरक्षण कानून में 90 दिन में निर्णय घोषित करने का प्रावधान है किन्तु वास्तव में इनमें वर्षों लगते देखे जा सकते हैं। भारत में नागरिकों के लिए तो याचिका प्रस्तुत करने की समय सीमा है किन्तु न्यायालयों के लिए निपटान हेतु कोई समय सीमा नहीं है।चीन में प्रारंभिक स्तर से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सभी जन न्यायालय हैं और वे सभी गर्व से अपने नाम के साथ जन न्यायालय शब्द लिखते हैं जबकि भारत में तो न्यायाधीश निर्णय देते समय न्यायालय श्री न्यायाधीश जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं। जाहिर है भारतीय न्यायालय न्यायाधीशों, वकीलों और पुलिस के न्यायालय हैं और व्यक्तिश: उपस्थित होने वाले पक्षकारों को यहाँ प्रतिकूल दृष्टि से देखा जाता है।
चीन में बचाव पक्ष द्वारा बचाव कथन न प्रस्तुत करने से मामले की सुनवाई पर कोई प्रभाव नहीं पडेगा। न्यायालयों में प्रशासनिक कार्यवाही की सुनवाई के लिए न्यायाधीशों का विषम संख्या में समूह होगा। असंतुष्ट पक्षकार मामले के पुनर्विचारण हेतु निवेदन कर सकेगा। अनुच्छेद 50 के अनुसार न्यायालय प्रशासनिक मामले की सुनवाई करते समय सुलह करवाने का प्रयास नहीं करेगा जबकि भारत में सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 27 नियम 5 ख में न्यायाधीशों पर यह दबाव और दायित्व भी डाला गया कि वे ऐसे मुकदमे में जिनमें सरकार पक्षकार हो सुलह का प्रयास करेंगे। ऐसा प्रावधान न्यायालयों की निष्पक्षता पर अपने आप में एक प्रश्न चिन्ह है। अनुच्छेद 54 के अनुसार जो प्रशासनिक कार्य सही कानून को लागू कर व कानूनी प्रक्रिया को अपनाकर किया गया हो और अकाट्य साक्ष्य पक्ष में हों तो उसे न्यायालय उचित ठहरा सकता है। पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव, गलत कानून लागू किये जाने, कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन करने, अधिकार क्षेत्र से बाहर कार्य करने या शक्ति का दुरूपयोग करने पर प्रशासनिक कार्य को न्यायालय द्वारा पूर्णत: या अंशत: निरस्त किया जा सकता है। यदि बचाव पक्ष अपने कानूनी कर्तव्यों के निर्वहन में विलम्ब करता है या असफल रहता है तो उसे संपन्न करने के लिए समय निश्चित किया जायेगा। यदि कोई प्रशासनिक जुर्माना अनुचित हो तो उसे संशोधित करने के लिए आदेश दिया जा सकता है। अनुच्छेद 56 के अनुसार यदि किसी प्रशासनिक कार्य से न्यायालय यह समझता है कि इससे प्रशासनिक अनुशासन का उल्लंघन किया गया है तो न्यायालय आपराधिक कार्य पाए जाने पर सम्बंधित मामला अभियोजन के लिए भेजेगा। किन्तु भारत में तो सभी मामले पक्षकार स्वयम को ही लडऩे पड़ते हैं और न्यायालय, विशेषकर राज्याधिकारियों के मामले में, पक्षकार के निवेदन पर भी आपराधिक कार्यवाही से परहेज करते हैं। एक ही समान प्रकृति के मामलों में बारबार सरकार के विरुद्ध होने वाले मामले एवं रिट याचिकाएं इसे प्रमाणित करती हैं। भारत में पुलिस द्वारा निराधार आरोप-पत्र प्रस्तुत करने और अभियुक्त के दोषमुक्त होने, तथा इसके विपरीत पुलिस द्वारा अंतिम (बंद) रिपोर्ट देने व अभियुक्त के आरोपित होने पर भी पुलिस के विरुद्ध कोई कार्यवाही प्रारम्भ तक नहीं होती है। यद्यपि कानून के संरक्षण की आवश्यकता कमजोर पक्षकार को होती है किन्तु भारत में शक्तिसंपन्न लोक सेवकों को अभियोजन स्वीकृति की आवश्यकता का अतिरिक्त सुरक्षा कवच उपलब्ध करवाया गया है।
चीनी न्यायालय मामला दर्ज होने के तीन माह के भीतर निर्णय देगा। यदि मामले में विशेष परिस्थितियों में समय सीमा बढ़ाया जाना अवश्यक समझा जाये तो ऐसा उच्च स्तरीय न्यायालय से अनुमोदित किया जाएगा। जबकि भारत में तो न्यायालय के मंत्रालयिक कर्मचारियों की कृपा से ही बारबार स्थगन लेकर मामले को द्रोपदी के चीर की भांति अंतहीन किया जा सकता है। चीन में निर्णय से असंतुष्ट पक्षकार निर्णय प्राप्त होने के 15 दिन के भीतर अगले उच्च स्तर पर अपील कर सकेगा। अनुच्छेद 60 के अनुसार अपील पर अंतिम निर्णय दो माह के भीतर देगा और यदि मामले में विशेष परिस्थितियों में समय सीमा बढ़ाया जाना अवश्यक समझा जाये तो ऐसा अगले उच्च स्तरीय न्यायालय से अनुमोदित किया जाएगा। भारत में तो अनुचित रूप से समय अनुमत करने की असीमित शक्तियां न्यायालयों के पास न होते हुए भी प्रयुक्त की जाती हैं। भारत में मूल वाद जिसमें साक्ष्य होना हो व अन्य मामले (रिट, अपील, निगरानी आदि सारांशिक कार्यवाहियां), जिनमें साक्ष्य नहीं होना हो, में समान विलंब होता है और मामले के परीक्षण में न्यायालय का लगने वाला वास्तविक समय व श्रम गौण है। वस्तुत: भारतीय न्यायिक प्रक्रिया एक मनमानी, उत्पीडनकारी व अतर्कसंगत प्रक्रिया है जिसमें पक्षकार की नियति न्यायालय की दया पर निर्भर रहती है और अंतत: उसे हानि ही होती है चाहे वह मामले में वह जीत ही क्यों न जाये।
चीन में यदि प्रशासनिक अंग निर्णय की अनुपालना करने से मना करता है तो न्यायालय प्रशासनिक अंग के बैंक खाते से रकम पीडि़त पक्षकार के खाते में ट्रांसफर के लिए आदेश दे सकता है, प्रति दिन के लिए 50 से 100 यान जुर्माना लगाने और यदि प्रशासनिक अंग द्वारा निर्णय की अनुपालना न करना अपराध कारित करता हो तो जिम्मेदार अधिकारी के विरुद्ध कानून के अनुसार आपराधिक कार्यवाही की जायेगी। प्रचलित प्रथा के अनुसार भारत में तो डिक्री की इजराय लगाई जायेगी और प्रतिपक्षी से उसका पक्ष व आपतियाँ सुनी जायेगी तथा लंबा समय लेने के बाद ही आम आदमी के विरुद्ध किसी न्यायिक निर्णय की अनुपालना संभव है और सरकारी अधिकारी के विरुद्ध किसी निर्णय की अनुपालना तो एक टेढ़ी खीर है जिसमें कई दांवपेंच हैं।
कानून के अनुच्छेद 67 के अनुसार आवेदक के अधिकारों के अतिक्रमण से हुई हानि के लिए क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी होगा। ऐसा आवेदन प्रथमत: विभाग के समक्ष प्रस्तुत किया जायेगा और विभाग द्वारा मनाही पर न्यायालय में कार्यवाही की जा सकेगी। ऐसी क्षतिपूर्ति का दायित्व सम्बंधित विभाग का होगा और विभाग ऐसे दायित्व के लिए दोषी कार्मिकों से पूर्णत: या अंशत: वसूली के आदेश देगा। अनुच्छेद 69 के अनुसार क्षतिपूर्ति की लागत विभिन्न स्तर पर सरकारी बजट में शामिल की जायेगी। भारत में विभाग ऐसे दावों से बजट की कमी के बहाने से प्राय: मना करते रहते हैं।
प्रशासनिक मामलों की सुनवाई करने वाला न्यायालय मुक़दमे की फीस लेगा और यह फीस हारनेवाले पक्षकार द्वारा या दोनों पक्षकार जिम्मेदार हों तो दोनों द्वारा वहन की जायेगी। भारत में अधिकांश मामलों में वादी को मुकदमे का खर्चा नहीं दिलवाया जाता और अपवादस्वरूप यदि दिलवाया जाये तो यह नाम मात्र का होता है। सरकारी विभाग से तो यह और भी कठिन है। चीन के कानून में न्यायालयों को बहुत कम विवेकाधिकार दिया गया है और न्यायालय के साथ कर सकेगा की बजाय अधिकाँश जगह करेगा शब्द का प्रयोग किया गया है व कानूनों को निदेशात्मक की बजाय आदेशात्मक रूप दिया गया है । उक्त से यह बड़ा स्पष्ट है कि हमारे यहाँ कानून निर्माण और लागू करने की स्थिति दोनों ही कमजोर हैं और यह नागरिकों की सहिष्णुता और धैर्य की परीक्षा लेती है व अमेरिका, इंग्लॅण्ड ही नहीं बल्कि हमारे पडौसी राष्ट्रों से भी कमजोर दिखाई देती है। मात्र इतना ही नहीं राज्य के अनुचित कृत्यों से हुई हानि के लिए चीन के संविधान के अनुच्छेद 41 के अंतर्गत क्षतिपूर्ति पाना संवैधानिक अधिकार है। भारतीय न्यायप्रणाली में एक रूपता, सुसंगतता, समानता, निष्पक्षता व जन विश्वास की कमी के कारण ही खाप या स्थानीय पंचायतें और कब्जा खाली करवाने वाले दल पनपते हैं। जहां बम्बई उच्च न्यायालय ने एक दिन की अवैध हिरासत के लिए वीणा सिप्पी को, स्वयं पैरवी करने पर, 275000 रूपये क्षतिपूर्ति दिलवाई वहीं उस न्यायालय के उसी न्यायाधीश वाली बेंच ने कादर सत्तार सोलंकी को एक दिन की अवैध हिरासत के लिए, वकील नियुक्त करने पर भी, मात्र 15000 रुपये की क्षतिपूर्ति दिलवाई है। समानांतर न्यायालयों की कार्य प्रणाली में विश्वास ही लोगों को उनकी ओर आकर्षित करता है और लोग न्यायप्रणाली की बजाय इस समानांतर प्रणाली का सहारा लेते हैं।
न्याय न होने का एक अर्थ यह भी निकलता है कि न्याय करने वाले लोग विद्वान तो हो सकते हैं किन्तु हृदय से सज्जन व्यक्ति नहीं हैं। एक विद्वान के पास शब्द भण्डार और शब्द कोष बड़ा होता है जिसके उपयोग से वह शब्द जाल के माध्यम से सही को गलत और गलत को सही ठहराने का प्रयास कर सकता है किन्तु वास्तव में सही व न्यायोचित क्या है यह तो एक सामान्य बुद्धिवाला व्यक्ति भी जानता है, विद्वान के लिए तो यह मुश्किल नहीं है। वैसे भी भारत में न्यायाधीश पद के लिए आयोजित होने परीक्षाओं में बुद्धिमता परीक्षण का कोई प्रश्न-पत्र नहीं होता है – मात्र कानूनी ज्ञान के ही प्रश्नपत्र होते हैं अर्थात हमें न्यायाधीश पद हेतु बुद्धिमान लोगों की आवश्यकता नहीं है। दूसरी ओर अमेरिका में न्यायाधीशों के लिए मात्र ज्ञान की ही नहीं चरित्र और मनोवृति की भी सार्वजनिक जांच की जाती है जबकि भारत के न्यायालय न्यायाधीश नियुक्ति प्रक्रिया को गोपनीय एवं अपना विशेषाधिकार मानते हैं और सूचना के अधिकार में ऐसी कोई सूचना नहीं देते हैं। जब लगभग हमारे ही समान आबादी वाला चीन ऐसे कानून बनाकर राज्य मशीनरी की लगाम कस सकता है तो भारत के जन प्रतिनिधि अपने कानूनों के सरलीकरण कर न्यायपालिका सहित नौकरशाही के मनमानेपन, दांव पेंचों और पैंतरों से जनता को मुक्ति देने में क्यों घबराते हैं, समझ से बाहर है।

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