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भारतीय संस्कृति

अध्ययन से ज्ञान प्राप्ति की तरह ही सुख प्राप्त होता है

ओ३म्

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मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि इसे सुख से राग है तथा दुःखों से द्वेष है। सब मनुष्य सुख चाहते हैं। अतः यह आवश्यक होता है कि मनुष्य को सुख प्राप्ति के साधनों का भी ज्ञान हो। सुख का साधन शुभ कर्म होते हैं। ऐसा वैदिक साहित्य का अध्ययन करने सहित देश व समाज में सुखी मनुष्यों को देखकर प्रतीत होता है। सुखी मनुष्य प्रायः वह होता है जो स्वस्थ हो, विद्यावान हो तथा जिसके पास अपने परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये बहुत अधिक न सही, परन्तु आवश्कता के अनुसार धन भी हो। यह भी आवश्यक है कि सुख तभी होगा जब वह सम्मानित हो अर्थात् उसका समाज में नाम व यश हो। जिस व्यक्ति का यश नहीं होता उस कारण से भी वह दुःखी हो सकता है। मनुष्य यदि अपने किन्हीं दुष्कर्मों के कारण कभी अपयश से ग्रस्त हो जाता है तो वह उससे मुक्त होने के लिये भी अशुभ आचरण करता है। इसके इस कृत्य का प्रचार व दूसरों को इसका ज्ञान होने से उसका अपयश समाप्त होने के स्थान पर वृद्धि को प्राप्त है जिससे इसका दुःख और अधिक बढ़ जाता है। अतः मनुष्य को सुख प्राप्ति के लिये दुष्कर्मों से बचना चाहिये क्योंकि ऐसा होने पर ही उसका अपयश होता है जिसका परिणाम दुःख होता है। यह ध्यान रखना चाहिये कि दुष्कर्मों व निन्दित कर्मों से कभी किसी का उत्कर्ष नहीं होता।

सुख का प्रथम आधार मनुष्य के शरीर का स्वस्थ रहना है। हमारा स्वास्थ्य हमारे भोजन की गुणवत्ता सहित हमारे सात्विक व तामसिक चिन्तन सहित शारीरिक श्रम वा आसन, व्यायाम व प्राणायाम आदि पर निर्भर करता है। जिन व्यक्तियों के जीवन में इनका सन्तुलन व सामंजस्य होता है वह व्यक्ति स्वस्थ रहते हंै। इसमें असन्तुलन होने से मनुष्य का स्वास्थ्य बिगड़ सकता है और अस्वस्थ होना सभी के लिये दुःखदायक होता है। अतः भोजन पर विचार कर वैदिक विद्वानों एवं आयुर्वेदाचार्यों से अपने भोजन के विषय में जानकारी प्राप्त करनी चाहिये। मनुष्य को क्या पदार्थ हितकार व हानिरहित होते हैं, इसकी जानकारी भी होनी चाहिये। भोजन का समय पर और अल्प मात्रा में किया जाना आवश्यक होने सहित शरीर को स्फूर्ति व उत्साह से विभोर रखता है। अधिक मात्रा में भोजन करने से अनेक प्रकार की व्याधियां व हानियां होती हैं जिनका प्रभाव काफी समय बाद प्रकट होता है। भोजन का अपना आचार शास्त्र है। इसे हम विद्वानों की शरण में जाकर ही जान सकते हैं। ऐसा करने से लाभ होगा और हम भविष्य में होने वाली हानियों से बच सकते हैं। किसी भी पशु के मांस का सेवन धार्मिक, नैतिक एवं शरीर शास्त्र की दृष्टि से सदैव हानिप्रद ही होता है। जिन पशुओं का मांस खाने के लिये वध किया जाता है, वह मरते समय अपनी मृत्यु की चिन्ता व दुःख में अपनी मानसिक स्थिति के कारण शरीर में कुछ हानिकारक व रोगकारक रसों व द्रवों का निकास करते हैं जो अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं। शरीर का हृष्ट-पुष्ट अर्थात् मोटा-ताजा होना ही स्वस्थ होने का चिन्ह नहीं होता अपितु शरीर का रोगरहित तथा शक्ति व सामथ्र्य में भरपूर होना ही स्वस्थ कहा जा सकता है। अतः हमें शरीर को स्वस्थ रखने के लिये शुभ कर्मों सहित अपने भोजन पर भी उचित ध्यान देना चाहिये और मांस एवं तामसिक पदार्थों का सेवन कदापि नहीं करना चाहिये।

भोजन के अतिरिक्त हमारे विचार भी शुद्ध होने चाहिये। हमें अच्छा धार्मिक, वैदिक एवं ज्ञानवर्धक साहित्य ही पढ़ना चाहिये। अन्धविश्वासों व पाखण्डों के पोषक ग्रन्थ नहीं पढ़ने चाहिये। ऐसा करने से हम सत्य व ज्ञान विज्ञान से दूर हो जाते हैं। इससे हमें सुख नहीं मिलता अपितु अन्धविश्वासों से मनुष्य का पतन होता है। हिन्दू समाज के पतन का कारण भी अन्धविश्वास तथा अविद्या ही है। ऐसे मनुष्य को दुष्ट व चालाक-चतुर लोग ठगते, लूटते व इनसे अपनी स्वार्थ सिद्धि करते हैं। इसके लिये सबसे अच्छा यह है कि हम सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अध्ययन करें। यदि हम प्रतिदिन एक या दो घण्टे सत्यार्थप्रकाश और उच्च कोटि के वैदिक विद्वानों के ग्रन्थों के अध्ययन में व्यतीत करने लगें तो कुछ महीनों में ही हम एक अच्छे विद्वान बन सकते हैं। मत-मतान्तरों के लोग अपने अनुयायियों को जिस तरह से मूर्ख बनाकर उनका आर्थिक व मानसिक शोषण व दोहन करते हैं, उसका ज्ञान भी सद्ग्रन्थों के स्वाध्याय करने वालें बन्धुओं को हो जाता है। सत्यार्थप्रकाश के अध्ययन सहित ईश्वर भक्ति एव उपासना करने, अग्निहोत्र करने एवं ज्ञानवर्धन हेतु अन्य विषयों के ग्रन्थों का अध्ययन भी किया जाना चाहिये। ऐसा करने से मनुष्य की आत्मा व शरीर दोनों की ही उन्नति होती है।

यजुर्वेद के एक मन्त्र में परमात्मा ने मनुष्यों को त्याग पूर्वक पदार्थों का भोग करने की सलाह दी है। संसार का समस्त धन परमात्मा का है। मनुष्य का अपना कुछ नहीं है। यह खाली हाथ संसार में आता है और खाली हाथ ही जाता है। हमें इस संसार से अपनी आवश्यकता के अनुसार ही धन व पदार्थों का संग्रह करना चाहिये। अधिक परिग्रह करने से अन्य लोगों के हितों को हानि पहुंचती है। इससे हम उनके अधिकारों में बाधक होने के कारण संसार के स्वामी परमात्मा दोषी बनते हैं। परमात्मा अतार्किक परिग्रही होने पर हमें इसका दण्ड दे सकते हैं। अतः हमें इस विषय में भी सावधान व सतर्क रहने की आवश्यकता है। यह लिखने का अभिप्राय यह नहीं है कि मनुष्य संग्रह ही न करे। आवश्यकता के अनुसार संग्रह करना चाहिये। धन व पदार्थ अधिक हों तो उन्हें पात्र व्यक्तियों को दान भी करना चाहिये। इस दान रूपी शुभकर्म को करने से मनुष्य का निश्चय ही कल्याण होगा। यह कल्याण हमें ईश्वर से कर्म-फल विधान के अन्तर्गत मिलता है। ईश्वर ने ही हम व हमारे समान जीवात्माओं को सुख व कल्याण प्रदान करने के लिये इस सृष्टि व इसके सभी पदार्थों को बनाया है। वही हमें जन्म देता व हमारे शरीर बनाता है। हमें माता-पिता, भाई-बन्धु, परिवार, देश, बुद्धि, ज्ञान व शक्ति सहित धन आदि सब कुछ उसी का दिया हुआ है। इन सबका स्वामी वही एकमात्र सच्चिदानन्दस्वरूप परमेश्वर है। अतः हमें इस रहस्य को समझना चाहिये और अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिये।

सुखी रहने के लिए अच्छे स्वास्थ्य सहित मनुष्य का ज्ञानवान होना भी आवश्यक है। इसके लिये उसे एक या एक से अधिक भाषायें बोलनी, पढ़नी व लिखनी आनी चाहियें। उसे स्कूली शिक्षा तो प्राप्त करनी ही है इसके साथ उसे अपने धार्मिक ग्रन्थों जो अन्धविश्वासों तथा पाखण्डों से सर्वथा रहित हों, उनका अध्ययन भी करना चाहिये। इसके लिये सत्यार्थप्रकाश के अतिरिक्त, उपनिषद, दर्शन, विशुद्ध मनुस्मृति, चार वेदों के भाष्य, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय, संस्कारविधि, बाल्मीकि रामायण, महाभारत तथा ऋषि दयानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज, पं. युधिष्ठिर मीमांसक आदि विद्वानों के जीवन चरित्र भी पढ़ने चाहिये। इन ग्रन्थों का स्वाध्याय करने से मनुष्य को सन्मार्ग मिल जाता है। वह विद्यावान् भी बन जाता है। उसकी आत्मा की उन्नति होती है। उसका जीवन एक बुद्धिमान तथा पुरुषार्थी व्यक्ति का सा जीवन होता है। ऐसा व्यक्ति अभावों के निवारण करने में सफल होता है एवं सुखी व समृद्ध हो सकता है। अतः मनुष्य को विद्या प्राप्ति में प्रमाद नहीं करना चाहिये और विद्या प्राप्ति के सभी उपलब्ध साधनों का सदुपयोग कर विद्वता में यथासम्भव उच्च स्थिति प्राप्त करनी चाहिये। यदि सम्भव हो तो गुरुकुल व अन्य किसी संस्कृत के आचार्य से संस्कृत का अध्ययन भी करना चाहिये। संस्कृत संसार की सभी भाषाओं की जननी है। इस भाषा को पढ़ने से मनुष्य को वह आनन्द प्राप्त होता है जो संसार की अन्य भाषाओं को पढ़ने से प्राप्त नहीं होता। यह मत हमारे ऋषियों व विद्वानों का है। हम भी अपने ज्ञान व अनुभव के आधार पर इसे उचित एवं प्रामाणित समझते हैं।

स्वस्थ व शिक्षित मनुष्य पुरुषार्थ करके अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में समर्थ होता है। अतः अपने जीवन, चरित्र व व्यवहार को वेदानुकूल बनाकर उसे तपस्वी व पुरुषार्थमय बनाना चाहिये। ऐसा करने पर एक सफल मनुष्य का उदय व निर्माण होता है। संसार में सफल व्यक्तियों के जीवन चरितों का अध्ययन भी लाभप्रद होता है। वह कैसे सम्पन्नता व समृद्धि के शिखर पर पहुंचे, इसे जानकर उनके जीवन की अच्छी बातों से प्रेरणा लेनी चाहिये। परमात्मा ने वेद द्वारा हमें शुभ कर्मों की प्रेरणा की है। यदि हम शुभ कर्मों का आचरण करेंगे, ईश्वर की उपासना व अग्निहोत्र करेंगे तो हमारा जीवन उत्तम, सफल व यशस्वी हो सकता है। यदि हम किसी कारण से शुभ कर्मों को करने से भटक गये तो हम जो दुष्ट कर्म व दुराचार करेंगे उसका दण्ड हमें सांसारिक व्यवस्था व ईश्वर से जन्म व जन्मान्तर में अवश्य ही प्राप्त होगा। हम नहीं चाहते कि हमें वर्तमान व भविष्य में किसी प्रकार का दुःख प्राप्त हो। इसके लिये वेदों की यही सलाह है कि सब दुष्कर्मों व वेदविरुद्ध कर्मों का त्याग तथा वेदविहित कर्मों का आचरण करें। सत्यार्थप्रकाश सहित समस्त वैदिक साहित्य हमें अज्ञान, आलस्य, अनैतिकता, अभक्ष्य पदार्थों के सेवन आदि से दूर ले जाता है और हमें एक साधु के समान सच्चा जीवन व्यतीत करने का अवसर देता है। इससे हमारा सौभाग्य उदित होता है। हम स्वस्थ, धनी व यशस्वी बनते हैं। दुष्कर्मों से बचते हैं और दान व परोपकार भी करते हैं। अतः यही मार्ग श्रेष्ठ व उत्तम है। इसी का सभी भारतवासियों व विश्ववासियों को अनुसरण करना चाहिये। जिस प्रकार बिना अध्ययन के कोई ज्ञानी नहीं बन सकता उसी प्रकार बिना शुभकर्मरूपी पुरुषार्थ किये कोई सुखी नहीं हो सकता। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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