मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार से लड़ता लोकायुक्त

प्रमोद भार्गव
भ्रष्टाचार से कारगर ढंग से निपटने के लिए यह जरुरी है कि निगरानी और
जांच का तंत्र मजबूत हो, जिससे राज्यों में लोकायुक्तों की भूमिका जमीनी धरातल पर और मजबूती से पेश आ सके। हालांकि वर्तमान में जिन राज्यों में, जितने भी कानूनी अधिकारों के साथ लोकायुक्त काम कर रहे हैं, उनके नतीजे अभी पर्याप्त संतोषजनक नहीं हैं। राज्य सरकार से इजाजत की बंदिश के चलते वे आला नेताओं और नौकरशाहों के विरुद्ध अनुपातहीन संपत्ति की जांच नहीं कर सकते। यही वजह है मध्यप्रदेश में 12 मंत्रियों के खिलाफ साक्ष्यों के साथ शिकायतें मिलने के बावजूद लोकायुक्त के हाथ बंधे हैं। बावजूद
लोकायुक्त ने इस साल 80 भ्रष्टाचारियों के यहां छापामार कार्रवाई करके करोड़ों की काली-कमाई जब्त की है। छापामार कार्रवाई को भेदरहित बनाने की भी जरुरत है, जिससे हर विभाग के अधिकारी-कर्मचारियों के यहां छापे डाले जा सकें। लोकायुक्त पुलिस और राजस्व अधिकारियों का बचाव करके चलता है। फिलहाल देश के 17 राज्यों में लोकायुक्त हैं, जिनमें कुछ की ही प्रभावी भूमिका सामने आ रही है। कर्नाटक को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर राज्यों में लोकायुक्त के अधिकार और संसाधन बेहद सीमित हैं। लाचारी की इस स्थिति में उनकी भूमिका महज सिफारिषी होकर रह जाती है। यही कारण है कि मध्यप्रदेश के 12 मंत्रियों के खिलाफ शिकायतें मिलने के बावजूद लोकायुक्त पुलिस कुछ कर नहीं पा रही है। सबसे नया मामला प्रदेश की शिक्षा मंत्री अर्चना चिटनीश से जुड़ा है। उनके खिलाफ अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर राष्ट्रीय स्वयं संघ से जुड़ी मासिक बाल पत्रिका ‘देवपुत्र के प्रकाशन के लिए बड़ी मात्रा में धनराशि देने का आरोप है। विपक्ष इस मामले को विधानसभा में भी उठा चुका है। इसके अलावा चिटनीस के विरुद्ध विधालयों में ब्लैक बोर्ड को ग्रीन बोर्ड में तब्दील करने के सिलसिले में भी भ्रष्टाचार की शिकायतें मिली हैं। लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मंत्रियों के विरुद्ध जांच की इजाजत नहीं दे रहे हैं। चुनाव निकट होने के कारण वे अपनी सरकार की छवि खराब करना नही चाहते। बीते तीन साल में लोकायुक्त ने मध्यप्रदेश में रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़े जाने के 361 मामलों, पद का दुरुपयोग करने के 66 और अनुपातहीन संपत्ति के 114 मामलों में कार्यवाही की है। रंगे हाथों पकड़े जाने के मामलों में 38,20150 रुपये और अनुपातहीन संपत्ति के मामलों में 205 करोड़ रुपये की नकद राशि जब्त की है। इसके अलावा बड़ी संख्या में सड़कों के निर्माण में गड़बड़ी, सरकारी इमारतों और भूमि से नाजायज कब्लाधारियों को हटाया है। लोकायुक्त ने अब तक लगभग 663 करोड़ रुपए की बकाया राशि भी वसूल की है। प्रदेश की लोकायुक्त पुलिस अब अपने कार्यक्षेत्र में भी विस्तार कर रही है। इस दिशा में उसने नगर निगमों की बकाया वसूली की दिशा में कदम उठाया है। 14 नगर निगम आयुक्तों की बैठक बुलाकर लोकायुक्त पुलिस ने निर्देष दिए हैं कि बकायादारों की संपत्ति कुर्की की कार्यवाही की जाए। इसे आगे नगर पालिकाओं तक भी पहुंचाया जाएगा।
वाकई यदि लोकायुक्त कारगर हो तो उसके महत्व प्रदेश सरकारों के लिए
फलदायी भी साबित हो सकता है। मध्यप्रदेश की जो संपत्ति राज्य के बाहर थी, उसका सही-सही पता प्रदेश सरकार को भी नहीं था। क्योंकि प्रदेश सरकार के पास ऐसा कोई महकमा नहीं है, जो राज्य की सीमा से बाहर सिथत संपत्ति की जानकारी रखे। किंतु अब लोकायुक्त ने पता किया है कि प्रदेश की संपत्ति केरल और महाराष्ट्र में फैली हुई है। केरल में प्रदेश सरकार की 300 एकड़ जमीन है। इस पर अवैध कब्जाधारी चाय के बागान लगाए हुए हैं। इसी तरह मुंबई में 500 एकड़ जमीन है। इसे कब्जाधारियों से मुक्त कराने के लिए अदालती कार्रवाई विचाराधीन है। लोकायुक्त यदि उन सामंतों की जमीनों की भी पड़ताल करे, जिनको मध्यभारत में विलय करते वक्त गुजारे के लिए कुछ निशिचत परिसंपत्तियां दी गईं थीं,बाद में उन्होंने राजस्व दस्तावेजों में हेराफेरी कराकर तमाम अराजियां फिर से हड़प लीं। इनमें से ज्यादातर अचल संपत्तियां नगरीय क्षेत्रों में हैं और उनका बाजार मूल्य अरबों में है। ये संपत्तियों यदि वापस होती हैं तो राज्य सरकार की माली हालत तो सुधरेगी ही, उन पूर्व सामंतों के मुख से नकाब उतरेगा, जो लोक कल्याण का मुखौटा लगाकर देश-प्रदेश की राजनीति में अपना वजूद बनाए हुए हैं। लेकिन ऐसे मामलों में राज्य सरकार लोकायुक्त का दखल स्वीकारेगी ऐसा लगता नहीं ? एक मजबूत लोकपाल और निर्भीक व सख्त लोकायुक्त से खतरा केवल उन राजनेताओं और नौकरशाहों को है, जो भ्रष्ट हैं और कानून को खिलौना समझते हुए पद का दुरुपयोग करते हैं। कर्नाटक में लोकायुक्त को सबसे ज्यादा अधिकार प्राप्त हैं। यही वजह रही है कि यहां अच्छे नतीजे देखने में आए हैं। वहां के लोकायुक्त रहने के दौरान न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े ने बेल्लारी के अवैध खनन के बारे में विस्तृत रिपोर्ट दी। नतीजतन मुख्यमंत्री वीएस येदिरप्पा समेत कई अधिकारियों पर गाज गिरी और उन्हें जेल तक की हवा खानी पड़ी। कर्नाटक के इस अनुभव से दूसरे राज्यों को सबक लेने की जरुरत है। अधिकतर राज्यों में लोकायुक्त के पास जांच का अपना कोई तंत्र नहीं है। उसे राज्य सरकार और उसकी नौकरशाही का मुंह ताकना होता है। यहां विडंबना यह भी
देखने में आती है कि जो आरोपी हैं, उनकी जांच उन्हीं के विभाग के वरिष्ठ
अधिकारी करते हैं। ये दोनों परस्पर लेने-देने के स्वार्थ से जुड़े रहे होते हैं, ऐसे में निष्पक्ष जांच की उम्मीद कम ही रहती है। बलिक जांच में आरोपियों के बचाने के उपाय थोप दिए जाते हैंं। कमोबेश यही स्थिति केंद्रीय जांच ब्यूरो और प्रमुख सतर्कता आयुक्त की है। ऐसे में इन्हें जब तक निर्वाचन आयोग की तरह पूरी तरह स्वायत्त नहीं बना दिया जाता, तब तक इनकी सार्थक भूमिका सामने आने वाली नहीं है। लोकायुक्तों की महत्ता को देखते हुए जरुरत इस बात की है कि पूरे देश में एक जैसा लोकायुक्त कानून बने और वह खासतौर से भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने की दृशिट से पर्याप्त रुप में सक्षम हो। इस बाबत विडंबना यह भी
देखने में आती है कि जो राजनीतिक दल केंद्र में मजबूत लोकपाल बनाए जाने की वकालात करते हैं, वही दल अपनी राज्य सरकारों में शिथिल लोकपाल चाहते हैं। यही वजह है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और वहां की राज्यपाल श्रीमती कमला बेनीवाल के बीच लोकायुक्त की नियुकित को लेकर जबरदस्त विवाद छिड़ा हुआ है और भाजपा मोदी के पक्ष की खुले तौर से पैरवी कर रही है। गुजरात की तरह कई अन्य राज्य सरकारें भी लोकायुक्त की तैनाती को टालें हुए है। इस लिहाज से लोकायुक्तों की नियुकित और लोकायुक्त विधान के लिए जरुरी है कि कानून में एकरुपता दिखाई दे और वह हाथी के उपर से दिखाई देने वाले दांत भर न हो ? दरअसल संघीय ढांचे अथवा राज्यों की स्वायत्तता की दलीलें देकर राज्य सरकारें लोकायुक्त की नियुकित और उसके अधिकारों से जुड़े कानून की संहिताएं अपनी मर्जी के मुताबिक गढ़ लेती हैं। इसी दबाव के चलते जो नए लोकपाल विधेयक का प्रारुप सामने आया है, उसमें लोकायुक्त के गठन को लोकपाल से अलग कर दिया गया है।

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