शांता कुमार
खुदीराम रात भर भागते रहे। बिना खाए पीए 17 वर्ष का बालक अंधेरी रात में भाग रहा था। किसलिए? क्या उसके दिमाग में कुछ खराबी थी? क्या प्राणों का मोह उसे न था? अपनी जवानी की उमंगें क्या उसके हृदय में उथल पुथल न मचाती थीं? सब कुछ था परंतु अपने देश बांधवों पर अत्याचार उसकी सहनशक्ति से बाहर की वस्तु थी। भारत वसुंधरा के पवित्र वक्षस्थल को अपने पैरों की एडिय़ों से रगडऩे वालों को वह अपने सशक्त हाथों से दण्ड देना चाहता था। इसलिए यह अग्नि पथ उसने स्वयं स्वीकार किया था। नगर से भागते भागते 25 मील दूर वह बैनी नामक स्थान पर पहुंचा। प्रात: हुई। भूख से उसका पेट जल रहा था। वह सारी रात भागता रहाा था। शरीर थक कर चूर था। पेट में भूख की ज्वाला। वह एक बनिए की दुकान पर लाई चने की तलाश के लिए गया। उस बनिए की दुकान पर रात को हुए मुजफ्फरपुर हत्याकांड की चर्चा हो रही थी। खुदीराम यद्यपि थका मांदा था तो भी अपने उद्देश्य की पूर्ति हो जाने के कारण उसका हृदय एक अपूर्व संतोष से ओतप्रोत था। उस संतोष के आनंदोल्लास में वह शरीर के कष्ट को प्रात: भूल जाता था। उस बनिए की दुकान पर कोई कह रहा था कि मुजफ्फरपुर में दो मेमें मारी गईं और मरने वाले भाग निकले। मरने वालों में किंग्जफोर्ड का नाम न सुनकर क्रोध विस्मय व क्षोभ से बोस पागल हो उठा। वह तो अब तक यही समझ रहा था कि उनका उद्देश्य पूरा हो गया। भावनाओं की प्रबलता से उसका हृदय इतना भर गया कि मुंह से एक चीख निकल गयी। उसकी शक्लवेश आदि तो भागते रहने के कारण अस्त व्यस्त थी ही। उस दुकान पर बैठे लोगों को उस पर संदेह हो गया। लोग उसे पकडऩे के लिए उसके पीछे भागने लगे। क्या विडंबना है विधाता की! वह नन्हा सा 17 वर्ष का बालत जिस समाज की मुक्ति के लिए अपने जीवन सर्वस्व पर लात मारकर दर दर की ठोकरें खा रहा था, वही समाज आज उसको पकड़कर साम्राज्यवाद के विशाल मुंह में धकेलने जा रहा है। देश भक्ति का कितना सुंदर उपयुक्त पुरस्कार मिल रहा था खुदीराम को अपने ही देश बंधुओं से।
खुदीराम के पास भरी हुई पिस्तौल थी। पर वह अपने ही देशवासियों पर उसका उपयोग नही करना चाहताा था। भागकर बचने का यत्न किया पर इतने लोगों व सिपाहियों के सामने वह नन्हा रात भर का भूखा प्यासा बालक कितनी देर तक ठहरता। बेचारा पकड़ा गया। गया था बनिए की दुकान पर लाई चना लेने और मिल गयी अंग्रेजी राज्य की हथकड़ी। पकड़कर मुजफ्फरपुर लाया गया। स्टेशन पर जिला मजिस्टे्रट एचसी उडमैन खड़ा था। प्रफुल्ल बदन हंसते हुए खुदीराम ने उसे कहा-मैंने स्वयं ही बम फेंक कर यह हत्या की है।
प्रफुल्लचंद चाकी भागता हुआ समस्तीपुर जा पहुंचा। वहां से वह कलकत्ता के लिए गाड़ी पर सवार हुआ। उसी डिब्बे में नंदलाल नाम के सज्जन बैठे थे। वे पुलिस के अधिकारी थे। हत्या के दिन वे मुजफ्फरपुर में ही उपस्थित थे। प्रफुल्ल चाकी को देखकर उनकी पैनी दृष्टि ताड़ गयी। किसी स्टेशन पर उतरकर मुजफ्फरपुर तार देकर उन्होंने उसका हुलिया मंगवाया। फिर दो तीन स्टेशन के बाद चाकी को पकडऩे के लिए उसकी ओर बढ़े। चाकी भी उनके स्वागत के लिए तैयार था। जेब से पिस्तौल निकालकर नंदलाल पर चला दी। निशाना खाली गया। इससे पूर्व कि कोई उसे पकड़ पाता, उसने पिस्तौल की नाली अपनी छाती की ओर घोड़ा दबाकर अपने जीवित शरीर को उस द्रोही के स्पर्श से बचा लिया। नंदलाल हाथ मलता रह गया। चाकी शहीदों के मार्ग पर चल दिया।
चाफेकर बंधुओं की मृत्यु के बाद अंग्रेजी राज्य बिना किसी विघ्न के भारतीयों का दमन करता हुआ सुख भोग रहा था। उसकी राज्य और ऐश्वर्य की नींद को खराब कर देने वाला यह बम उनके लिए चिंता का विषय बन गया। जिन दिनों बंदेमातरम बोलने पर भी प्रतिबंध था, मुंह से अंग्रेजों के विरूद्घ कुछ भी कह सकता , गौरीशंकर की चोटी को छू लेने के बराबर था, उस आतंकयुक्त वातावरण में यह बम का विस्फोट! अंग्रेजी शासन तिलमिला उठा और उस सारे क्रोध का प्रतिशोध लेने के लिए पास था केवल यह 17 वर्ष का खुदीराम। खुदीराम पर हत्या का अभियोग चलाया गया। लॉर्ड डफ नामक जज की अदालत में अभियोग आरंभ हुआ। श्री मानिक व श्री विनोद मजूमदार सरकार की तरफ से पैरवी करने के लिए आए। देश में वकीलों की कमी न थी, पर बेचारे खुदीराम की वकालत करना बड़े जोखम की बात थी। वह तो था अंग्रेजी राज्य में बगावत करने वाला अपराधी। अंत में एक वीर हृदय सज्जन कालिदास बोस उसकी वकालत के लिए तैयार हुए। न्याय का नाटक खेला गया। खुदीराम ने वीरतापूर्वक अपराध स्वीकार कर लिया था। उसे फांसी की सजा सुनाई गयी। निर्णय के विरूद्घ अपील की गयी पर निर्णय बहाल रहा।
11 अगस्त, 1908 फांसी का दिन तय हुआ। हाथ में गीता लेकर वह 17 वष्र का बालक अपनी मस्तानी जवानी के आगमन से पूर्व ही मां के चरणों में सदा के लिए चला गया। उसके अंतिम संस्कार का सारा प्रबंध वकील कालिदास बोस ने किया। उसकी अर्थी फूलों से सजाई गयी। ललाट पर चंदन लेपन किया गया। घुंघराले काले बालों में युक्त आभावान उसका चेहरा यों चमक रहा था, मानो काली मेघ मालाओं में शरदचंद्र झांक रहा हो। उसके दृढृ़ ओष्ठ हृदय की दृढ़ता के परिचायक थे। हजारों नर-नारी उसकी अंतिम यात्रा में सम्मिलित हुए। शहीद की चिता धू-धूकर जलने लगी। सुगंधित धूप व अन्य पदार्थों की आहूति दी गयी। हजारों नर नारियों ने अपने अश्रुजल से उस अभिमन्यु के अवतार बाल शहीद को अंतिम श्रद्घांजलि दी। शहीद का देह भस्मीभूत हो गया। शेष पड़ी थी सामने शमशान घाट पर चिताभस्म। उपस्थित नर नारी उस भस्म को लेने के लिए झपट पड़े। किसी ने सोने की डिबिया में, किसी ने चांदी की डिबिया में उस धूल को सुरक्षित रखा। अंग्रेजों ने जिसे अपराधी कातिल कहकर दण्ड दिया, जनता ने उसे देवता मानकर सिर माथे पर रख लिया। क्रमश:

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