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राजनीति

महारानी के लिए मुखौटे की तलाश

निरंजन परिहार
राजस्थान में बीजेपी नए अध्यक्ष के लिए मशक्कत कर रही है। कहा तो यही जा रहा है कि ऐसा अध्यक्ष चाहिए, जो अगले विधानसभा चुनाव में न केवल कांग्रेस के सर पर सवार हो सके। बल्कि बीजेपी को भी सत्ता के करीब लाने में सक्षम हो। पर, सच यह है कि राजस्थान में बीजेपी को कोई अध्यक्ष – वध्यक्ष नहीं चाहिए। असल तलाश मुखौटे की है। मुखौटा, जो, महारानी साहिबा श्रीमती वसुंधरा राजे की उंगलियों की कठपुतली और हुकुम का ताबेदार हो।
वरना, अध्यक्ष के रूप में अरुण चतुर्वेदी क्या बुरे हैं। बहुत बढिय़ा काम कर रहे हैं। ईमानदार है, सक्षम हैं और अपेक्षाकृत जवान भी। बहुत अच्छे से पार्टी को चला रहे हैं। और अपने कई पार्टी पूर्वजों के मुकाबले बीजेपी को कई गुना ज्यादा जोरदार शक्ल बख्शने में भी सफल रहे है । हां, बस इतना जरूर है कि वे किसी के गुलाम की तरह काम नहीं कर सकते, हां में हां नहीं मिलाते और गलत काम में सहभागी नहीं हो सकते। यही वजह है कि राजस्थान की सत्ता पर एक बार फिर काबिज होने को तैयार खड़ी वसुंधरा राजे हर हाल में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपने किसी चंगू का चेहरा देखना चाहती हैं। क्योंकि एक तो वे पहले ही राजस्थान में बीजेपी के अगले सीएम के रूप में अपने आप को स्थापित कर चुकी हैं। दूसरा, वे मानकर चल रही है कि सूबे की बीजेपी का सरदार उन्हीं का होगा, तभी वे सत्ता की सीढिय़ों की तरफ सर्र से सरक सकेंगी।
वरना मामला मुश्किल है। पिछली बार की तरह। गई बार ओम प्रकाश माथुर राजस्थान बीजेपी के अध्यक्ष थे। उनके अध्यक्षीय आचरण की वजह से वसुंधरा राजे अपनी मनमानी करने में असफल रही और झगड़े में सत्ता की सीढिय़ों से फिसलकर पांच साल के लिए घर बैठने को मजबूर हुईं। इस बार वे कोई कमी नहीं छोडऩा चाहतीं, सो पार्टी पर अध्यक्ष बदलने के लिए दबाव डाल रही हैं। इसीलिए राजस्थान में बीजेपी अपने अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी की जगह किसी नए अध्यक्ष की नहीं, बल्कि महारानी के मुखौटे पर मंथन कर रही है।
अपना मानना है कि एक बेहतरीन कार्यकाल देनेवाले अध्यक्ष को हटाकर महारानी के कुछ भी मिलनेवाला नहीं है। क्योंकि, राजनीति बहुत अजीब किस्म की उलझनों का गजब मायाजाल है। फिर राजनीति अगर राजस्थान की हो, उस पर भी बीजी की हो, तो उलझनें और मुश्किल हो जाती हैं। पहली उलझन यह है कि जब कोई बड़ा नेता किसी एक नेता का समर्थन करता हैं, उसे आगे लाता हैं और उसे ताकत बख्शता हैं, तो बाकी बहुत सारे पुराने साथी भी उससे नाराज हो जाते हैं। फिर यहां तो अरुण चतुर्वेदी को हटाकर किसी को बैठाना है। सो, डबल संकट है। राजनीति में खेमे होते हैं, उन खेमों में भी खेमेबाजी होती है। सो, वसुंधरा खेमे से जो मुखिया बनेगा, उसके विरोध में भी खड़े होनेवालों की वसुंधरा खेमे में ही कमी नहीं होगी। फिर अरुण चतुर्वेदी भी कोई कम ताकतवर नहीं है। उनके समर्थक और उनके लोग नाराज होंगे, वह अलग। लेकिन महारानी फिर भी माथा मार रही है। कैसे भी करके अपने आदमी को प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहती है। राष्ट्रीय स्तर पर राजनाथ सिंह नए मुखिया हैं।
वे जैसा चाहेंगे, करेंगे। हो सकता है, महारानी के चंगू को राजस्थान बीजेपी के मुखिया पद पर बिठाने का फैसला कर लें। मुश्किलें फिर भी कम होनेवाली नहीं हैं। ओम प्रकाश माथुर फिलहाल भले ही साथ हैं, पर उनकी याददाश्त अभी इतनी कमजोर नहीं हुई हैं कि वसुंधरा के दिए घाव भूल गए हों।
घनश्याम तिवाड़ी के घनघोर तेवर देखने लायक हैं। वृद्ध होते जा रहे ललित किशोर चतुर्वेदी की अदाएं भी कोई कम खरतनाक नहीं हैं। गजब के नेता गुलाबचंद कटारिया वार पर वार कर रहे हैं। जसवंत सिंह ने वसुंधरा के खिलाफ जो सीधे-सीधे मोर्चा खोल रखा था, वह उन्होंने अभी भी पूरी तरह बंद नहीं किया है।
सो, अपना मानना है कि अरुण चतुर्वेदी को हटाने का एक और राजनीतिक पाप करने के बजाय महारानी साहिबा को मैदान संभालना चाहिए। चुनाव सर पर हैं और अशोक गहलोत कोई कमजोर मुख्यमंत्री नहीं है।

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