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देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता पर हमला करने वाले आतंकी अफजल गुरू की फांसी की सार्थकता

afjalप्रमोद भार्गव
सामंती युग में जिस तरह से देश के वजूद के प्रतीक दुर्ग हुआ करते थे और दुर्ग पर हमले का मतलब राष्ट्र पर हमला माना जाता था,उसी तरह किसी भी प्रजातांत्रिक देश में राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक संसद भवन होते हैं। संसद पर हमले के सीधे-सीधे मायने देश पर हमला है। मसलन संसद पर 2001 में सशस्त्र हमले के मुख्य आरोपी अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने की कार्रवाई एक तार्किक परिणाम तक पहंच गई है। कानून और न्याय ने अपना काम शनिवार की सुबह आठ बजे पूरा कर दिया। 43 साल का अफजल आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का सदस्य था। इसे 2002 में विशेष न्यायालय ने फांसी की सजा सुनाई थी। इस सजा को 2004 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा था। 21 नवंबर 2012 को जिस तरह से पुणे की जेल में कसाब को फांसी दी गई थी उसी तरह के गोपनीय अभियान के तहत दिल्ली की तिहाड़ जेल में अफजल को फांसी दे दी गई। केंन्द्र सरकार के गृहमंत्रालय को यह गोपनीयता बरतनी जरुरी थी। अफजल उत्तरी कश्मीर के सोपुर का रहने वाला था। उसके परिजनों ने दया याचिका भी लगाई हुई थी। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने याचिका को नामंजूर कर दिया था। इस फैसले की जानकारी से सरकार ने अफजल के परिजनों को भी अवगत करा दिया था अफजल को 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हुए आतंकी हमले को रुपरेखा रचने का दोषी ठहराया गया था। इस हमले में आधुनिक हथियारों से लैस पांच आतंकवादी एकाएक चलती संसद में घुस गये और अंधाधुंध गोलियां बरसा कर नौ लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। बाद में पुलिस द्वारा की गई जबावी कार्यवाही में पांचों हमलावरों को मार गिराया गया था। हमले के कुछ घंटों के ही भीतर अफजल गुरु को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पुलिस ने एक बस में सफर करते हुए हिरासत में ले लिया था। फल व्यापारी गुरु की संसद हमला योजना में दिल्ली विश्व विधालय के प्राध्यापक एस.ए.आर. गिलानी और सौकत हुसैन भी शामिल थे। इन्हें भी निचली अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी। किंतु अपील में उच्च न्यायालय दिल्ली ने गिलानी को बरी कर दिया था और हुसैन की सजा को बरकरार रखा था। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने हुसैन की मौत की सजा को दस साल के कारावास में बदल दिया था। देश में अभी पांच और ऐसे आतंकवादी है जिन्हें फांसी दी जानी है। इनमें राजीव गांधी और पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे शामिल है। यदि कसाब और अफजल गुरु को फांसी नहीं दी जाती तो इसके मायने होते की सरकार आतंकवादियों के आगे घुटने टेक रही है।इससे आतंकवाद को प्रोत्साहन भी मिलता। इन दो क्रूर आतंकवादियों को फांसी देकर राजग सरकार ने साबित कर दिया है कि वह ना तो आतंकी संगठनों के दबाव में हैं और न ही मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करते हुए मुस्लिम तुष्टिकरण में लगी हुई है। हालांकि कुछ समय पूर्व अफजल की फांसी के परिप्रेक्ष्य में केन्द्रीय मंत्री बेनीप्रसाद वर्मा ने कहा था कि अफजल की सजा फांसी से उम्र कैद में बदल दी जाए। इस बयान की तीखी निंदा की गई थी। कांगे्रस प्रवक्ता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने तुरंत इस बयान का खण्डन करते हुए कहा था कि अफजल की सजा फांसी से कम हो ही नहीं सकती। किंतु ऐसे बयान बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और बचकाना हरकतें हैं। हमारे देश में चंद राजनेता, चंद सामाजिक व स्वंयसेवी संगठन और कुछ मीडिया घराने अपने को थोथी चर्चाओं में बनाए रखने के लिए फांसी को अमानवीय कृत्य बताकर इसके पक्ष में बेहूदी दलीलें पेश करते रहते हैं। ऐसी चर्चाएं सांप्रदायिक वैमनस्यता फैलाने का भी काम करती है। आम जनता जिस तरह से मुंबई में हुए 26/11 के हमले के अतिप्रतीक्षित आरोपी अजमल कसाब को फांसी पर लटका दिए जाने से प्रसन्न हुई थी, उससे कहीं ज्यादा अफजल गुरू को फांसी पर लटकाये जाने पर है। इस बहुप्रतीक्षित इच्छा के पीछे खुशी जताने के कई कारण हो सकते हैं। एक तो अफजल गुरू भारतीय नागरिक था, इस नाते उसने राष्ट्र के साथ द्रोह किया था। अफजल ने हमले की भूमिका सीधे-सीधे संसद के उस भवन पर करने की रची थी, जो देश की संप्रभुता और स्वंतत्रता का प्रतीक है। इस हमले से न केवल देश सकते में था, बलिक पूरी दुनिया आतंकवादियों की बढ़ी ताकत से रूबरू होकर हैरान थी,कि चंद आतंकवादी किसी देश की संसद पर हमला करने का भी दुस्साहज जुटा सकते हैं ? तत्काल तो भारतीय संसद और अटल बिहारी बाजपेयी की राजग सरकार ने भी इसे गंभीरता से लिया था। पकिस्तान से सटी सीमाओं की ओर सेनाओं ने कूच कर दिया था। लेकिन अमेरिकी दबाव में राजग सरकार पाकिस्तान के विरूद्ध कोई कड़ा कदम नहीं उठा पाई। और अटल बिहारी बाजपेयी अमेरिका की कूटनीतिक पराजय के शिकार हो गए। यदि वाजपेयी सख्त कदम उठाने की इच्छा शकित जताते तो वे इंदिरा गांधी के साहस की तरह देश के लिए दूसरा आर्दश उदाहण बन गए होते। इंदिरा गांधी ने अमेरिका की परवाह न करते हुए 1971 में न केवल पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर किया,बलिक उसके टुकड़े करके एक नए राष्ट्र बांग्लांदेश को असितत्व में ला दिया था। संसद पर हमले के समय पूरे देश मे पाकिस्तान से दो-दो हाथ करने का माहौल बन गया था, लेकिन अटल बिहारी पाकिस्तान को सबक सिखाने में नाकाम साबित हुए।

अफजल को जल्द से जल्द फांसी पर लटकाना भी तर्कसंगत व न्यायोचित था। अफजल को फांसी देना उन तमाम पुलिसकर्मियों और बेगुनाह लोगों को भी सच्ची श्रद्धांजली है, जिन्होंने हमलावरों से मुकाबला करते हुए अपने प्राण गवाएं थे। हालांकि भारत ने 21 नवंबर को कसाब को फांसी पर चढ़ाकर पाकिस्तान समेत दुनिया के सामने यह नजीर पेश कर दी थी कि वह इस तरह के हमलों को बर्दाष्त करने वाला नहीं है। यही वजह रही कि जब कसाब को फांसी पर चढ़ाने वाली खबर दुनिया में फैली तो न केवल भारत में बलिक पूरी दुनिया में रह रहे भारतीयों ने सामूहिक रूप से एकत्रित होकर वंदे मातरम के नारे लगाए थे। अब ऐसा ही वातावरण अफजल को फांसी दिये जाने पर दिखाई दे रहा है।

कुछ समय पहले ही दिल्ली के मुख्य सचिव का बयान आया था कि दिल्ली सरकार अफजल की फांसी दृढ़ संकलिपत है। साथ ही वह इस बात के लिए भी अडिग थी कि अफजल को फांसी ही होनी ही चाहिए। दूसरी तरफ कांग्रेस के महासचिव दिगिविजय सिंह भी अफजल की फांसी की मांग लगातार कर रहे थे। इसलिए यह संभावना प्रबल थी कि संसद का बजट सत्र आने से पहले अफजल की दया याचिका पर अंतिम फैसला हो जाएगा और फिर एक दिन कसाब की तरह अचानक मीडिया में खबर आएगी कि गोपनीय ढ़ंग से अफजल को फांसी पर लटका दिया गया।

कसाब की ही तरह अफजल को भी गोपनीए ढ़ंग से फांसी पर लटकाया जाना इसलिए जरूरी था क्योंकि हमारे यहां तथाकाथित मानवाधिकार हनन से जुड़े सामाजिक तथा कुछ गैर सरकारी संगठन मौत की सजा पर न केवल सवाल उठाने लग जाते हैं, बलिक फांसी स्थल पर पहुंचकर कानूनी कारवाई को बाधित कर गैर कानूनी कोशिशे भी कर सकते थे ? हालांकि भारत ने कसाब के फांसी पर लटकाए जाने के ठीक एक दिन पहले ही मृत्युदण्ड समाप्त करने संबंधी सयुक्ंत राष्ट्र संघ के प्रस्ताव को नकारते हुए हस्ताक्षर नहीं किए थे। जबकि इस प्रस्ताव के पक्ष में 110 देश और विपक्ष में केवल 39 देश थे।

फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे 61 पशिचमी और ऐसे कई योरोपीय देश हैं, जो मौत की सजा को अपने देषों में समाप्त कर चुके हैं। जबकि 70 ऐसे देश हैं, जिनमें मृत्युदण्ड खत्म तो नहीं हुआ है, लेकिन मुजरिम को फांसी पर नहीं लटकाते हैं। संयुक्त राश्ट का यह प्रस्ताव अहिंसा के उदात्त व मानवीय सिद्धांत पर आधारित है, लेकिन आदर्ष और यथार्थ में अंतर होता है। अहिंसा का विस्तार महावीर, बुद्ध और महात्मा गांधी के विचारों के मार्फत ही पूरी दुनिया में भारत – भूमि से हुआ है, लेकिन आज भारत समेत ब्रिटेन, अमेरिका व चीन जैसे शकित संपन्न देश भी आतंकवाद की चपेट में हैं। भारत के लिए तो बीते दो दशक से पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद एक जबर्दष्त चुनौती बना हुआ है। शायद इसीलिए देश की सर्वोच्च न्यायालय ने उम्र कैद को नए सिरे से परिभाशित करते हुए कहा है कि आजीवन कारावास का मतलब दोशी की जिंदगी समाप्त होने तक जेल में रहना है, ना कि 14 अथवा 20 साल कारावास में बिताना।

दरअसल यूरोप के बहुसंख्यक ऐसे देश हैं, जिनमें भारत जैसी सांप्रदायिक, जातीय व उग्रवाद की कोई समस्याएं नहीं हैं। वहां न बहुलतावादी संस्कृति है और न ही एकता में अनेकता। वहां पड़ोसी देषों में सदभाव का माहौल है और बिना पासपोर्ट व वीजा के लोगों की आवाजाही है। इसलिए वे मौत की सजा खत्म करने के तर्क आसानी से गढ़ लेते हैं। जबकि भारत सुरक्षा के मोर्चे पर अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। पाकिस्तान जहां कश्मीर के रास्ते प्रशिक्षित आतंकवादियों को घुसपैठ कराकर भारत की षांति भंग करने में लगा है, वहीं बांग्लादेशी घुसपैठियों ने असम के मूल निवासी बोडो आदिवासियों की ही बेदखली की भूमिका रच दी है। केवल इसी कारण पिछले छह माह से असम हिंसा की आग में जल रहा है। ऐसे विपरीत हालातों में सोचा ही नहीं जा सकता कि भारत मौत की सजा से तौबा कर ले ?

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