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वेद, महर्षि दयानंद और भारतीय संविधान-49

महर्षि दयानंद का इतिहास विषयक ज्ञान
महर्षि दयानंद अपने काल के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने इतिहास और वेद को अलग अलग निरूपित किया। उन्होंने वेदों में इतिहास होने की धारणा को निर्मूल सिद्घ किया। महर्षि दयानंद का इतिहास संबंधी ज्ञान भी उतना ही गहन और गंभीर था जितना कि उनका वेद संबंधी ज्ञान गहन और गंभीर था। परंतु महर्षि दयानंद ने इतिहास को प्रचलित मान्यताओं से अलग हटकर नई परिभाषा दी।
भारत में इतिहास को केवल मरे हुए लोगों के विषय में लिखा पढ़ी का बहीखाता मानने वाले लोग बहुत हैं। परंतु महर्षि दयानंद ने इतिहास की इस संकीर्ण परिभाषा से अलग हटकर इतिहास को अतीत की मार्गदर्शिका पगडंडी मानकर उसे वर्तमान के लिए आदर्श के रूप में स्थापित किया। उन्होंने बताया कि यदि अतीत और वर्तमान का समन्वय स्थापित करके नही चलोगे तो मार्ग से भटक जाओगे। क्योंकि विषम परिस्थितियों में इतिहास के महापुरूष और उनका जीवन व्यवहार ही हमारा उचित मार्गदर्शन किया करता है। इतिहास पुरूष वही होता है जो आदर्शों की स्थापना करता है, जो व्यक्ति आदर्शों की हत्या करके आगे बढ़ते हैं उन्हें आप इतिहास के देवता के स्थान पर इतिहास के दैत्य कहें तो अधिक उपयुक्त रहेगा इतिहास हमें बताता है कि इन इतिहास दैत्यों के सामने इतिहास के देवताओं ने अपने समय में मानवता की किस प्रकार रक्षा की। बस, उनका यह कृत्य ही हमारे लिए मानो एक विधिक-व्यवस्था (नजीर) बन जाता है। हमारे जीवन व्यवहार में इतिहास की ये विधिक व्यवस्थाएं हमारे लिए एक अलिखित संविधान का निर्माण करती हैं। क्योंकि बड़ों के जीवन व्यवहार का अनुकरण करना हमारे लिए अनिवार्य माना गया है ‘यथा राजा तथा प्रजा: का मुहावरा’ भी हमारे लिए यहां इसी कारण प्रसिद्घ हुआ कि राजा का अनुकरण करना प्रजा के लिए अनिवार्य था। जिस महामति चाणक्य ने हमारे लिए ‘यथा राजा तथा प्रजा’ की बात कही है उसी ने हमें बताया कि राजा कैसा होना चाहिए?
उसने लिखा कि राजा दार्शनिक और दार्शनिक राजा होना चाहिए। यदि यह स्थिति उत्पन्न हो जाए तो आज की सारी व्यवस्था ठीक हो जाएगी। जब राजा दार्शनिक होगा तो प्रजा भी दार्शनिक होगी। जब ये दोनों दार्शनिक होंगे तो समाज में लोक कल्याण को प्राथमिकता देने वाले लोगों का वर्चस्व स्थापित होगा।
महर्षि दयानंद सरस्वती जी महाराज ने इतिहास के अध्ययन की इसी शैली का आश्रय लिया और लोगों को इतिहास के अतीत को अपने लिए एक विधि व्यवस्था के रूप में मानने और जानने पर बल दिया। उनके इस प्रकार के इतिहास अध्ययन का एकमेव कारण ये था कि वह इतिहास को भी संविधान की मर्यादाओं (वेद की आज्ञाओं) को स्थापित करने में सहायक ग्रंथ के रूप में मानते थे और मानव के पतन का इतिहास वर्णन करके उसे यह बताना चाहते थे कि जब शासक राजधर्म निर्वाह से च्युत हुए तो उसका ये परिणाम निकला कि तत्कालीन समाज और राष्ट्र ही दुर्बल हो गया। इसलिए इस दुर्बलता से भी ये अनुभव लिया जाए कि हम वर्तमान संदर्भों में ऐसी किसी दुर्बलता की पुनरावृत्ति नही होने देंगे।
महर्षि दयानंद जी महाराज ने अपने पूना में दिये गये 15 भाषणों में से दसवें भाषण में जो कुछ कहा था वह हमारे इसी मत की पुष्टि करता है। उन्होंने कहा था-कौषीतकीय ब्राहमण में लिखा है कि सब पुत्र या पुत्रियां पांच वर्ष की अवस्था में पाठशाला को भेजे जाते थे। यह एक सामाजिक नियम था। (मानो एक विधिक अनिवार्यता थी क्योंकि) परंतु माता पिता इस सामाजिक नियम को तोड़ते तो राज सभा से उनको दण्ड मिलता था। इस प्रकार की उन्नति का समय व्यतीत होते हुए राजा शंतनु का समय आ पहुंचा। इस समय आर्यावर्त का ऐश्वर्य बहुत बढ़ गया था। इस ऐश्वर्य के नशे के कारण ही इस आर्यावत्र्त की दशा बिगडऩी आरंभ हुई। जिसके पास द्रव्य बहुत था, वह नशे में मस्त था। इस कारण से एकाएक देश में सामाजिक नियमों में निरूद्घता उत्पन्न हो गयी।
राजा शंतनु को ऐश्वर्य का बड़ा भारी अभिमान उत्पन्न हो गया और देश में व्यभिचार बढ़ गया। निष्कपट राज्य होने के कारण से शांतनु और भी विशेष अभियान संयुक्त हुआ। मनु जी ने कहा है:-
अर्थकामेष्वसक्तानां धर्म ज्ञानम विधीयते।
धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुति:
‘जो मनुष्य सांसारिक विषयों में फंसे हुए हैं उन्हें धर्म का ज्ञान नही हो सकता। धर्म के जिज्ञासुओं के लिए परम प्रमाण वेद हैं।
इसके अनन्तर शांतनु विषयों में अत्यंत आसक्त हो गया। सत्यवती के प्रति इसकी आशक्ति का समाचार आप सब लोग जानते हैं, परंतु शांतनु राजा होकर भी सत्यवती के पिता पर बल प्रयोग न कर सका। सत्यवती के पिता ने उसको डांटा था। जब तक भीष्म ने अपना कुल हक सत्यवती के पुत्रों को देने का निश्चय नही किया तब तक सत्यवती के दरिद्री पिता ने राजा की आज्ञा स्वीकार नही की। भीष्म पितामह के इस निश्चय पर कि उसने अपना कुल हक सत्यवती के पुत्रों को दे दिया, सत्यवती के दरिद्री पिता ने राजा का कहना स्वीकार किया। इससे ही प्रकट हो जाता है, कि प्राचीन आर्य मनुष्यों में कितनी स्वाधीनता थी और राजा लोग भी सामाजिक प्रबंध में किस प्रकार प्रबंधकर्ता हुए थे।
इतिहास की कितनी न्यायसंगत और तर्क संगत समीक्षा महर्षि दयानंद ने की है। इस छोटे से प्रसंग से भी हमें अपने प्राचीन इतिहास और संवैधानिक मर्यादाओं का बहु आयामी महत्व ज्ञात होता है। हमें पता चलता है कि इतिहास की परंपराएं किस प्रकार संविधान (सामाजिक मान मर्यादाओं का) का निर्माण करती है और संविधान वेद किस प्रकार पग पग पर मानव समाज का मार्गदर्शन करता है। महर्षि की इतिहास की इस व्याख्या से हमें पता चलता है कि यदि महाराज शांतनु अपने राजधर्म से च्युत न होते तो महाभारत न होता। पुत्र पुत्रियों को पाठशाला भेजने की अनिवार्यता के भंग होने से देश में आज्ञानान्धकार फैला। इससे ज्ञात होता है कि शिक्षा स्वैच्छिक नही अपितु अनिवार्य होनी चाहिए। क्योंकि मानव योनि अपने व्यक्तित्व के विकास की पराकाष्ठा को प्राप्त करने के लिए ईश्वर की ओर से प्रदान की जाती है। व्यक्तित्व के इस विकास में समाज और राष्ट्र (शासकीय नियम-राज्यधर्म-राजनीति) सहायक होने चाहिए ना कि बाधक।
राजा यदि विलासी है, व्यभिचारी है, धर्म का ज्ञान नही रखता है, तो वह राष्ट्र का विकास नही अपितु विनाश करता है। वर्तमान संविधान का यह भारी दोष है कि वह राजा के विषय में कोई भी व्यवस्था देने में पूर्णत: मौन है। सत्यवती के पिता पर शक्ति प्रयोग न करना राजा शांतनु पर तत्कालीन समाज का एक प्रतिबंध था, एक नैतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव था कि यदि ऐसा किया तो जनता विद्रोह कर सकती है।

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