इतिहास के पन्नों से: लंदन में धाँय-धाँय-2

गतांक से आगे…..
शांता कुमार
जीवन की गाड़ी का कांटा ही मानो बदल गया। बिलासिता प्रिय मदन पर अब देश भक्ति का रंग चढऩे लगा। उन्हीं दिनों खुफिया पुलिस ने रिपोर्ट दी थी कि मदनलाल घंटों अकेले फूलों को देखता रहता है। पुलिस का अनुमान था कि वह या तो कोई कवि हो सकता है या फिर क्रांतिकारी।
गिरफ्तारी के समय उसके पास दो पिस्तौल, एक चाकू व एक बड़ा छुरा प्राप्त हुआ। उसे ब्रिक्सटन जेल में बंद कर दिया गया। वाहली को मारने के लिए जाते समय ढींगरा की जेब में एक वक्तव्य भी तैयार करके रख दिया गया था। तलाशी में पुलिस ने उसे प्राप्त तो कर लिय पर उसे छिपा दिया गया। सरकार नही चाहती थी कि वक्तव्य अदालत के सामने आकर अखबारों में प्रकाशित हो। उस वक्तव्य को सरकार ने अति सुरक्षित स्थान में रख दिया
लंदन की भरी सभा में एक अंग्रेज की हत्या एक बड़े आश्चर्य की बात थी। चारों ओर उसी की चर्चा होने लगी। समाचार पत्रों द्वारा हत्या का समाचार चारों ओर फैल गया। भिन्न भिन्न प्रकार की चर्चा, टीका टिप्पणियां होने लगीं। साम्राज्यवाद के पिट्ठू खुले तौर पर उस कृत्य की निंदा करने लगे। लंदन जैसे नगर में भी प्रशंसा करने वाले कम न थे, पर प्रशंसा कर सकना उनके लिए संभव न था। पंजाब से मदनलाल के पिता ने लंदन में लॉर्ड मोरेल को यह तार भेजा, ऐसे देश द्रोही व हत्यारे पुत्र को मैं अपना पुत्र मानने को तैयार नही। इस मूर्ख ने मेरे मुंह पर कलंक का टीका लगाया है। लंदन में स्थित मदनलाल के भाई ने भी उसकी भत्र्सना की। क्या कमाल है? जिस नरवीर को सारा भारत श्रद्घा से अपनी सर आंखों पर उठा रहा था, जो आने वाली पीढिय़ों के लिए अतीव श्रद्घा व प्रेरणा का स्रोत बनने वाला था, उसी मदनलाल को जन्म देने वाले पिता व सगे सहोदर न पहचान सके। अपनों के ही द्वारा निंदा व भत्र्सना का कटु विष उसे पीना पड़ा। 5 जुलाई को प्रसिद्घ कैकसटन हॉल में इस कृत्य की सार्वजनिक निंदा करने के लिए एक सभा बुलाई गयी। सभा की अध्यक्षता श्री भावनागरी कर रहे थे। भारत के कुछ प्रसिद्घ व्यक्ति सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी सर आगा खां, विपिनचंद्र पाल तथा खपर्डे आदि उस सभा में उपस्थित थे। सबने मुक्त कण्ठ से इस हिंसा के कृत्य की भत्र्सना की। मदनलाल के भाई को भी मंच पर लाया गया। उसने भी देश भक्ति के इस कार्य पर लज्जा का अनुभव किया। श्री सावरकर अपने कुछ साथियों को लेकर इस सभा में आए थे। अपने देश भक्त साथी के विरूद्घ इतना विष उगलते देखकर भी उन बेचारों को शांत करने पर विवश होना पड़ा। विरोधियों की कटु बातें सुनकर उनके होंठ कुछ कहने को फड़क उठते। भुजाओं का रक्त जोश मारता, पर वह लंदन था। अंग्रेज साम्राज्य का केन्द्र स्थान है। वे विष के घूंठ ही मानो पी रहे थे।
सर आगा खां खड़े होकर कहने लगे, तो यह सभा सर्वसम्मति से मदनलाल की निंदा करती है। अभी आगा खां के ये शब्द हॉल ही पिछली दीवार से टकराए भी न होंगे कि कड़कती आवाज में प्रतिध्वनि गूंज उठी, नही, सर्वसम्मति से नहीं। क्रोधित होकर आगा खां ने पूछा, यह कौन कहता है? फिर तीखा जवाब आया, मैं कहता हूं। सभा स्थल शांत होकर अति विस्मय से यह प्रश्नोत्तर सुन रहा था। प्रधान ने खड़े होकर पूछा अपना नाम बताओ।
साम्राज्यशाही के केन्द्र लंदन में भारतीय युवक द्वारा एक बड़े अधिकारी की हत्या कर देना मानो साम्राज्यवाद के घर जाकर उसकी छाती पर मूंग दलने के बराबर था। फिर उस कृत्य की निंदा के लिए अंग्रेजों व अंग्रेज भक्तों से भरी इस सभा में यह कौन सिरफिरा निकल आया जो मदनलाल के निंदा के प्रस्ताव का विरोध करने का साहस कर सका? लंदन की भरी सभा में यह विरोध कितना असंभव रहा होगा, यह कल्पना की जा सकती है। पर वीर तो वही होता है, जो अपने साहस से असंभव को भी संभव बना देता है।
नाम पूछे जाने पर उसी निडरता व तीव्रता से भीड़ में से आवाज आई, यह मैं हूं सावरकर। नाम सुनते ही कुछ लोगों की टांगे कांपने लगीं। कितनों के ही हृदय दहलने लगे। लोगों ने सोचा कि ये क्रांतिकारी इस सभा में भी पहुंच गये हैं। कहीं ये यहां बम न चला दें। कुछ जोशीले अंग्रेज इस साहस व स्पष्टवादिता को सहन न कर सके। वे आपे से बाहर हो गये। पामर नामक एक अंग्रेज ने सावरकर के मुंह पर बड़े जोर का घूंसा जमाते हुए कहा, जरा अंग्रेजी घूंसे का मजा ले लो। देखो कैसा ठीक बैठता है। सावरकर घूंसा लगने से मुंह पर पीड़ा का अनुभ्ज्ञव करने लगे। सावरकर के साथ उनकी साथी आचार्य खड़ा था। उससे न रहा गया। उस पामर के सिर पर जोर से डंडा मारते हुए उसने कहा, जरा इसका भी मजा ले लो, यह हिंदुस्तानी डंडा है। सावरकर के एक अन्य साथी तो इस सारे वातावरण से क्षुब्ध हो उठे कि पामर पर पिस्तौल से आक्रमण करने लगे, पर परिस्थिति की गंभीरता पहचान सावरकर ने उन्हें आंख के इशारे से रोका।
सभा में भगदड़ गच गयी। सावरकर पर, मारो, बाहर निकलो की आवाजें कसी जाने लगीं। सभा के अध्यक्ष भाव नागरी बड़े क्रोधित हो भीड़ को चीरकर सावरकर के पास पहुंच गये। घूंसा खाने के बाद अपना लाल मुंह उन्हें दिखाते हुए सावरकर ने उनसे कहा, इस सबके बाद भी मैं कहता हूं कि इस प्रस्ताव के विरूद्घ हूं। इतने में किसी ने सभा में एक पटाखा चला दिया। बस फिर क्या था। लोग बम समझकर अपनी जान बचाने के लिए भाग खड़े हुए। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी व सर आगा खां, सावरकर पर आक्रमण के विरोध स्वरूप पहले ही सभा छोड़कर जा चुके थे। लंदन में एक अंग्रेज की हत्या तो कर दी गयी पर उस बेचारे के हत्यारे की निंदा का प्रस्ताव भी पास न हो सका।
दूसरे दिन सावरकर ने लंदन टाइम्स में अपना एक पत्र छपवाया। उस समय खुलेआम मदनलाल के कृत्य का समर्थन नही किया जा सकता था। इसलिए प्रस्ताव के विरोध के लिए उन्होंने एक कानूनी पैच निकाला। उन्होंने उस पत्र में लिखा थ कि क्योंकि मदनलाल का अभियोग अदालत के सम्मुख उपस्थित है, इसलिए अदालत के निर्णय देने से पूर्व किसी भी व्यक्ति को उस विषय में कुछ कहने का अधिकार नही है। सभा में प्रस्ताव कानून का उल्लंघन होता व अदालत की मानहानि होती। समाचार पत्र में सावरकर की कानूनी बुद्घि की इस बारीकी को पढ़कर लंदन के बुद्घिजीवी विस्मित हो गये।

क्रमश:

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