वानर नहीं , महाबुद्धिमान , महापराक्रमी और महान कूटनीतिज्ञ थे हनुमान जी

अभी हमने हनुमान जयंती मनाई है । साथ ही टी0वी0 चैनलों पर रामायण को भी देख रहे हैं । जिसमें हमारे कई पात्रों के साथ प्रचलित रामायण में पूर्णतया अन्याय किया गया है । विज्ञान के युग में अवैज्ञानिक , अतार्किक और मूर्खतापूर्ण बातें देशवासियों को और नई पीढ़ी को बताई जा रही हैं। जिनसे हमारे पूर्वजों का चरित्र तो स्पष्ट हो ही नहीं पा रहा है साथ ही संसार को हम पर हंसने का अवसर भी मिल रहा है। यदि बात हनुमानजी की करें तो वह अपने जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले महामानव थे । उनको पूंछ नहीं थी और वह एक मानव होने के कारण मानव की भांति ही सारे व्यवहार करते थे। वह महाबुद्धिशाली , महान कूटनीतिज्ञ और महापराक्रमी थे ।

दुर्भाग्यवश उनके इस स्वरूप को प्रकट न करके उनको हमने रामायण का एक ऐसा पात्र बना दिया है जो हमारा मनोरंजन कराने का माध्यम है । अभी टी0वी0 चैनल पर मैं देख रहा था कि उन्हें अशोक वाटिका में पेड़ों को उखाड़ते हुए और वहां पर रावण के सैनिकों के साथ अशोभनीय सा आचरण करते हुए दिखाया जाता है । जबकि उन्हें एक गंभीर चिंतक , महान कूटनीतिज्ञ , महाबुद्धिशाली और महान पराक्रमी के रूप में प्रस्तुत किया जाना अपेक्षित था । उनके पेड़ों को उखाड़ने और उन्हें शत्रु पक्ष पर फेंकने की कला को देख ,- देख कर हम हंसते रहे । हमने उनकी कूटनीति और महा बद्धिशाली सोच पर चिंतन नहीं किया। इसी प्रकार जब वह रावण के दरबार में गए तो वहां पर भी उन्होंने जो कुछ किया उसको देखकर भी हम हंसते रहे । हमने नहीं सोचा कि वहां भी वह कितनी बड़ी कूटनीति खेल कर आए ? जैसी ‘आग’ लंका में उनके द्वारा लगी हुई दिखाई गई , वह ‘आग ‘ न लगाकर अपनी अपने कूटनीतिक राजनय के सफल अभिनय और कूटनीतिक बौद्धिक कौशल के माध्यम से वह लंका में एक ऐसी ‘आग’ लगाकर आए , जिसका परिणाम रामचंद्र जी की जीत में जाकर निकला।

अब हम थोड़ा विचार करें कि जब हनुमान जी अशोक वाटिका में पहुंचे तो उनके मस्तिष्क में यह विचार आया कि सीताजी से तो वार्तालाप हो गया , परंतु अब यहां से प्रस्थान करने से पहले शत्रुपक्ष की थाह लेनी भी आवश्यक है । एक सामान्य बुद्धि का व्यक्ति यदि उनके स्थान पर होता तो वह सीताजी से वार्तालाप करने के पश्चात ही प्रसन्न चित्त हो जाता और वहीं से खुशी – खुशी रामचंद्र जी के पास को भाग लेता । उसकी सोच होती कि सबसे पहले जाकर रामचंद्र जी को बताऊं कि सीताजी मिल गई हैं । उधर फिर रामचंद्र जी का अगला प्रश्न यह होता कि क्या तुमने रावण के बारे में कुछ जानकारी ली कि उसका कितना सैन्य बल है ? उसके मंत्री आदि कैसे हैं ? यदि हम उस पर हमला करते हैं तो हमें कौन-कौन सी समस्याओं का और कैसी-कैसी शक्तियों का सामना करना पड़ेगा ? इत्यादि ।

इन सब बातों पर विचार करते हुए हनुमान जी ने अपनी दूरदर्शिता , बुद्धिकौशल , कूटनीतिक सोच और सफल राजनय का परिचय देते हुए विचार किया कि मुझे यह जानना चाहिए कि शत्रु कितना प्रबल है ? और रावण के दरबार में कितने लोग ऐसे हैं जो रामचंद्र जी की न्यायप्रियता और उनके उत्तम चरित्र के प्रशंसक हैं ? साथ ही ऐसे कितने लोग हैं जो रावण के अनीति व अन्यायपरक कार्यों का विरोध करने वाले हैं ? उसका सैन्य बल कितना है ? उसके मंत्रिपरिषद के लोग कैसे हैं ? इत्यादि ।

अपनी इस योजना को फलीभूत करने के लिए उन्हें किसी भी प्रकार रावण के दरबार में पहुंचना था। इसलिए उन्होंने अशोक वाटिका में पेड़ पौधों को तोड़ना व उखाड़ना आरम्भ किया । जिससे कि सैनिक उन्हें गिरफ्तार करें और रावण के समक्ष उन्हें उपस्थित करें । यदि वह छोटा-मोटा उपद्रव मचाते तो सैनिक उन्हें वहीं दंडित कर सकते थे , इसलिए उपद्रव भी बड़े पैमाने पर मचाना अपेक्षित था। क्योंकि जितना बड़ा उपद्रव मचेगा उतनी ही अधिक संभावना इस बात की थी कि उन्हें रावण के समक्ष उपस्थित किया जाता । उनका अंतिम लक्ष्य यही था कि किसी भी प्रकार मैं एक बार रावण के समक्ष पहुंच जाऊं । इसके लिए उन्होंने जिस रणनीति पर कार्य किया उसे एक रणनीति के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना और समझा जाना आवश्यक है । उन्हें उपहास का पात्र बना कर प्रस्तुत किया जाना उनके साथ सबसे बड़ा अन्याय है। यहां पर उनकी बुद्धिमत्ता , कूटनीतिज्ञता , राजनय के सफल अभिनय और राजनीतिक चातुर्य आदि को प्रस्तुत करना और समझना चाहिए था। उनके सारे उपाय सफल सिद्ध हुए जब वह अशोक वाटिका में की गई तोड़फोड़ के अपराध में रावण के समक्ष ले जाकर उपस्थित कर दिए गए।

वहां रावण के दरबार में पहुंचने के पश्चात भी उन्होंने फिर एक सफल कूटनीतिक बाण चलाया । जब उन्होंने अपनी सारी बातें स्पष्ट रूप से और कठोर शब्दों के साथ रावण को बताईं । उनकी स्पष्टता और कठोरता से दरबार के उन लोगों की जानकारी उन्हें मिली जो रामचंद्र जी के उत्तम चरित्र से प्रभावित और रावण के दुष्कर्म से दु:खी थे । रावण की मंत्रीपरिषद के कई सदस्य और विभीषण जैसे लोग निकलकर सामने आए और वह हनुमान जी की बातों से सहमत होते हुए दिखाई दिए। रावण के यह पूछने पर कि तुम कौन हो ? हनुमान जी ने बहुत सधा हुआ उत्तर रावण को दिया कि वह रामचंद्र जी के ‘दूत’ हैं । यद्यपि वह उस समय रामचंद्र जी के दूत नहीं थे , क्योंकि वह रामचंद्र जी ने रावण से वार्ता करने के लिए नहीं भेजे थे , बल्कि सीताजी की खोज के लिए भेजे थे । यदि हनुमान जी रावण को यही बताते कि मैं सीताजी की खोज में आया हूँ तो उनको मृत्युदंड दिया जाना निश्चित था । इसलिए उन्होंने अपने आपको ऐसा न बताकर दूत बताया, जिसका एक गहरा अर्थ था। जैसे ही उन्होंने रावण को यह बताया कि वह रामचंद्र जी के दूत हैं वैसे ही मंत्रिपरिषद के कई सदस्यों ने रावण को यह सलाह दी कि वह हनुमान जी की हत्या न कराकर कोई और दंड दें , क्योंकि दूत को मारना अपराध है । यद्यपि रावण हनुमान जी को मारने का आदेश दे चुका था , परंतु मंत्रिपरिषद में कई लोग उसके निर्णय के विरुद्ध खड़े हो गए । जिससे उसके घर में ‘आग’ लग गई अर्थात मंत्रिपरिषद में फूट पड़ गई और उसे अपना निर्णय वापस लेना पड़ा।

यहां पर यह बात भी समझनी आवश्यक है कि आजकल की अंतरराष्ट्रीय विधि के अनुसार कोई भी देश किसी भी देश के राजदूत के साथ कोई अभद्रता नहीं करेगा और न ही उसे अपने कानून के अनुसार कोई दंड देगा ।इस प्रकार के कानून को हम यूएन या किन्हीं अंतरराष्ट्रीय समझौतों की परिणति मानते हैं। जबकि यह हमारी अज्ञानता है । दूत को दंड न देने का प्रावधान भारतवर्ष में लाखों वर्ष पहले से है। हनुमान जी को दूत होने के कारण दंड न देने की वकालत करने वाले रावण के मंत्रिपरिषद के सदस्यों के तर्कों को सुनकर यह बात स्पष्ट हो जाती है । इस प्रकार इस क्षेत्र में संसार का मार्गदर्शन करने वाला भारत ही है कि किसी भी दूत को दंडित करने का किसी दूसरे राजा को अधिकार इसलिए नहीं है कि वह अपने राजा का वहां पर प्रवक्ता मात्र है । जो कुछ वह कह रहा होता है वह उसके शब्द न होकर उसके राजा के या स्वामी के शब्द हैं । इसलिए दंडित किया जाना है तो उसके राजा को ही किया जाना चाहिए । भारत की इस विधि को संसार ने स्वीकार किया है ना कि संसार की किसी विधि को भारत ने स्वीकार किया।

अपनी सफल कूटनीति के माध्यम से हनुमान जी को कुछ ही देर में यह पता चल गया कि रावण के साथ उसके मंत्रिपरिषद के कई सदस्य , उसका मंत्री पार्श्व , उसका भाई विभीषण और यहां तक कि उसकी पत्नी मंदोदरी भी नहीं है । अपने राजनीतिक चातुर्य और कूटनीतिक राजनय के सफल अभिनय से हनुमान जी रावण के विरोधियों या उसके निर्णय से असहमत लोगों को उसके विरुद्ध और भी अधिक भड़काने में सफल हुए । यही उनके द्वारा रावण की ‘लंका में आग’ लगाने की आलंकारिक भाषा है । जिसे सूक्ष्म बुद्धि के व्यक्ति आराम से समझ सकते हैं।

ऐसे महामानव , बुद्धिमान , कूटनीतिज्ञ , सफल रणनीतिकार , महापराक्रमी , महान् तेजस्वी हनुमान जी को वानर समझकर हमने मूर्खता की है । उनके पूँछ लगी दिखाना और भी बड़ी मूर्खता है। वास्तव में किष्किंधा पर्वत के आसपास का सारा क्षेत्र उस समय वनाच्छादित था । जिसमें रहने वाले लोगों को वानर अर्थात वनवासी कहा जाता था ।वनों में रमण करने वाला होने के कारण वानर शब्द प्रयोग हुआ। जैसे सेंधव नमक को भी कहते हैं और सेंधव घोड़े को भी कहते हैं , लेकिन समय के अनुसार दोनों का अर्थ समझ लेना ही व्यक्ति की समझदारी होती है । वैसे ही वानर बंदर को भी कहते हैं क्योंकि वह भी वनों में रमण करता है और वानर मनुष्यों की वह जाति भी है जो वनवासी है ,वनों में रमण करने वाली थी । उसी समुदाय या समाज में हनुमान जी का जन्म हुआ ।

अपने झारखंड जैसे वनाच्छादित राज्य में हम देख सकते हैं कि वहां पर लोगों की वेशभूषा कुछ अलग है लेकिन इसके उपरांत भी वह सभी मनुष्य हैं और मनुष्य के रूप में ही सम्मानित किए जाते हैं।

और अंत में यह भी बताना चाहूंगा कि हनुमान जी बजरंगबली नहीं थे , वरन वज्रांग बली थे ।उनके अंग वज्र जैसे कठोर थे । इसलिए वज्रांग बली थे । जिसे बिगाड़ कर हम बजरंगबली बोलते हैं ।संस्कृत का ज्ञान सचमुच आवश्यक है ।शब्दों की गरिमा तभी समझ आती है जब उनको उनकी वास्तविक भाषा में बोला जाता है।

अतः आवश्यकता है कि अपने हनुमान जी जैसे महान इतिहास नायक के साथ न्याय करते हुए हम उनके वास्तविक चरित्र को समझें और अपनी आने वाली पीढ़ी को उनकी वास्तविकता का बोध कराने का काम करें ।

नोट :– हनुमान जी के उपरोक्त चित्र को ही वास्तविक चित्र माना जाना चाहिए।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

डॉ॰ राकेश कुमार आर्य

डॉ॰ राकेश कुमार आर्य

मुख्य संपादक, उगता भारत

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1 thought on “वानर नहीं , महाबुद्धिमान , महापराक्रमी और महान कूटनीतिज्ञ थे हनुमान जी

  1. नमस्ते सर जी
    मैने श्री हनुमान जी वाला लेख पढआ मन को अच्छा लगा वास्त्विक जानकारी मिली
    लेकिन सर मेरा एक संशय है, बाल्मीकि कृत रामायण में लांग में आग लगाने का जिक्र आता है। (जोकि थोती है पूंछ नहीं) लेकिन आप कह रहे हैं कि उनमें आपस में फुट डालकर आग लगाई।
    मान्यवर मेरे संशय का निवारण करें।

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