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धर्म-अध्यात्म

संकल्प के धनी व्यक्ति ही पाते हैं मंजिल

इस पर भर्तृहरिजी अपने एक श्लोक में प्रकाश डालते हैं :-

क्वाचिद्भूमौ शय्याक्वचिदपि च पर्यंकशयनम्

क्वचिच्छाकाहारी क्वचिदपि च शाल्योदन रूचि:।

क्वचिन्तकन्थाधारी क्वचिदपि च दिव्याम्बर धरो,

मनस्वी कार्यार्थी न गणपति दुखं न च सुखम्।। (नीतिशतक 83)

भर्तहरि जी स्पष्ट कर रहे हैं कि जो व्यक्ति संकल्प शक्ति के धनी होते हैं, विचारधील और उद्यमी होते हैं, अपने कार्य की सिद्घि के प्रति पूर्णत: समर्पित होते हैं ऐसे व्यक्ति अपनी कार्य सिद्घि के लिए हर प्रकार का प्रयत्न करते हैं, प्रत्येक बाधा से और प्रत्येक विपत्ति से धैर्यपूर्वक जूझते हैं, संघर्ष करते हैं। वे कभी भूमि पर सोते हैं तो कभी पलंग पर सोते हैं अर्थात यह नहीं देखते कि मेरे सोने के लिए कल पलंग था तो आज भी पलंग ही होना चाहिए। ऐसे धीर पुरूष परिस्थितियों के अनुसार चलते हैं, स्थित प्रज्ञ होते हैं और जैसा वर्तमान उपस्थित है, उसका उसी रूप में स्वागत करते हैं। कभी शाकपात पर ही अपना जीवन निर्वाह करते हैं, तो कभी चावल के भात का भोजन करते हैं । कभी स्वाद के चक्कर में नही पड़ते । उनका अपनी रसना पर और अपनी वासना पर पूर्ण नियंत्रण रहता है, वह आत्मानुशासन में रहते हैं, और आत्मानुशासित रहकर ही अपना जीवन संग्राम निरंतर जारी रखते हैं। ऐसे लोग कभी गुदड़ी ओढक़र अपना जीवन यापन करते हैं। कहने का अभिप्राय है कि ये लोग सुख-दुख और हानि-लाभ में समभाव बरतते हैं। अपने धैर्य के बल पर निरंतर आगे बढ़ते हैं, और अपना लक्ष्य भेदन करके ही रूकते हैं।

जिन लोगों के जीवन का लक्ष्य आत्मकल्याण से समष्टि कल्याण हो जाता है – उनकी दिनचर्या और जीवनचर्या कुछ इसी प्रकार के कार्यों में ढल जाती है। जैसे यज्ञ में जब हम आहुति डालते हैं तो उसकी सुगंध हवा के प्रवाह से चाहे हमें कभी पूरब दिशा को जाती दिखे, चाहे कभी पश्चिमादि अन्य दिशा में जाती दिखे पर अंत में वह समष्टि के कण-कण में रच-बस जाती है। उसका सूक्ष्म संस्कार समष्टि के साथ एकाकार हो जाता है और इस प्रकार एकाकार होता है किफिर उसके अस्तित्व या स्वरूप की आप अलग पहचान नहीं कर सकते। इस प्रकार जब हम स्वाहा बोलते हैं तो अपने स्वार्थ को परमार्थ में विलीन कर देते हैं और हमारा स्वार्थ तब परमार्थ में विलीन होकर सृष्टि कल्याण का हेतु बन जाता है।

इससे एक बात यह स्पष्ट हो जाती है कि स्थूल अहंकार कभी भी हमारा भला नहीं कर सकता उसे सूक्ष्म परमार्थ के साथ मिलकर अपना अस्तित्व मिटाना पड़ेगा और अस्तित्व का यह मिट जाना अथवा स्वार्थ का नि:स्वार्थ के साथ एकरस हो जाना ही भारत की ‘इदन्नमम्’ की सार्थक जीवन की परम पवित्र परम्परा है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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