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आओ समझें: हिन्दी अक्षरों का वैज्ञानिक स्वरूप-भाग 5


गतांक से आगे….

‘ल’

पाणिनि ने लकार को दस काल तथा अवस्थाओं को प्रकट करने वाला पारिभाषिक शब्दों का ध्वन्यार्थक माना है। इसे इंद्र का विशेषण भी स्वीकार किया गया है। इसे लेने और रमण करने के अर्थों में भी प्रयुक्त किया जाता है। इस वर्ण की आकृति में अकार के मूलाधार से बांयी ओर बनने वाले स्वरूप को देखने की आवश्यकता है, यह किसी वस्तु का अवलोकन करने समीक्षित करने आलोचित करने का सुंदर स्वरूप है। लक्ष शब्द देखना, अवलोकन करना, निरखना इत्यादि अर्थों में लिया जाता है। इसी लक्ष से ही लखाना, लखना, शब्द रूढ़ हो गये हैं। alphabetइस रूढ़ शब्द लख का अर्थ भी अवलोकन करना ही है। लक्ष से ही लाख (संख्यावाचक) बना है। लक्षमाधीश:-लाखों की संपत्ति का स्वामी, यह शब्द हमें उपरोक्त अर्थ ही स्पष्ट कर रहा है। लक्ष्मण=शुभ लक्षणों से युक्त, लक्ष्मी=सौभाग्य, समृद्घि, लक्ष्मीवत = अच्छी किस्मत वाला, लग्न, लज्जा, लता, लब्ध, लब्धि, लभ्य, ललना, ललाट, ललिता, लवण, लालसा, लात (लिया, ग्रहण किया) लिंग, आलिंगन करना, लिखना, लिप्त, लालच, लोभ, लीन, लीला, लेखक, लेखन, लोक, लोप, लोहित, लौह, इत्यादि शब्द विशेष रूप से दृष्टव्य हैं।हिंदी में लिंग दो ही माने गये हैं-पुल्लिंग और स्त्रीलिंग जबकि संस्कृत में नपंसुक लिंग भी माना गया है। अंग्रेजी भाषा में भी नपुसंक लिंग (Neutral Gender) को मान्यता दी गयी है। दूसरे शब्दों में अंग्रेजी ने संस्कृत का अनुकरण ज्यों का त्यों किया है। हिंदी ने संस्कृत का अनुकरण नही किया है तो इससे कोई अंतर नही आता है-प्रत्येक व्यक्ति का ज्ञानी पुरूष होने के लिए यह भलीभांति जानता है कि उसे संस्कृत का ज्ञान तो रखना ही पड़ेगा। कई बार लिंग निर्धारण करना भी बड़ा कठिन हो जाता है। इसलिए लकार से अवलोकन पूर्वक ही लिंग निर्धारण किया जाता है। इसलिए ही लकार से लिंग शब्द बना है।

‘व’

वकार हिंदी का एक महत्वपूर्ण वर्ण है। इसको वायु, हवा, भुजा, वरूण, समाधान, संबोधित करना, मांगलिकता, निवास, आवास, समुद्र, व्याध्र, कपड़ा, राहु का ध्वन्यार्थक माना गया है। पं. रघुनंदन शर्मा ने वकार को अन्य पूर्णत: भिन्न, अथवा गति, गंध का समानार्थक माना है। इसकी आकृति में भी इन्हीं अर्थों की झलक है।इस वर्ण में गकार की गति के भिन्न गति है, उसमें गमन की गति है, जबकि इसमें वाणी की गति है। वाचाल, वक्ता, वाणी, वक्तव्य, प्रवक्ता, अधिवक्ता, आदि शब्द इसी गति को दिखाते हैं, जबकि वंश, वंशी, वक्र, वक्ष (वृद्घि को प्राप्त होना) चौड़ी छाती को वक्ष इसीलिए कहा जाता है, वृद्घि, वात-हवा का चलना, वर्ष, वाजीकर-कामेच्छाओं का उद्दीपक, वायु इत्यादि शब्द भी एक प्रकार की गति का ही बोध करा रहे हैं। वस्त्र, वारिधि, वास, निवास, वास, वासस-परिधान, विकसित आदि शब्द इसके अन्स अर्थों को बताते हैं। पूर्णत: भिन्न के अर्थों में विकृत, विकृति, विकार (इसी से बुखार शब्द बना है-सत, रज, तम की साम्यावस्था से सर्वथा भिन्नावस्था-रोग) विकीर्ण, विकल, विकराल, विशेष, विक्रांत, विक्षेप, विखरित, विख्यात, विगत, विघ्न, विघटित, विचित्र, विपुल, विडंबना, विपत्ति, इत्यादि शब्द हैं। वैभव, विभु विवाह जैसे शब्द मांगलिकता के सूचक हैं। व्यक्ति अभिव्यक्ति, व्यक्त व्यंजनम्-स्पष्ट करने वाला इत्यादि शब्द संबोधन या भावाभिव्यक्ति के लिए बनते हैं।व्यंजन शब्द का निर्माता भी वकार है। हम व्यंजनों पर ही विचार कर रहे हैं। व्यंजन स्पष्ट करने वाले को कहा जाता है। अत: स्पष्ट है कि एक-एक व्यंजन किसी न किसी वैज्ञानिक अर्थ और परिभाषा को स्पष्ट करने वाला है। वकार ‘वा’ के रूप में परिवर्तित होकर कभी कभी हमें नया विकल्प देता है तो कभी जो बात कही जा रही है, उसका प्रवाह ही परिवर्तित कर देता है। जैसे आप खाना खाएंगे, अथवा पहले नहाएंगे? यहां तो विकल्प दिया है, लेकिन जब किसी से कहा जाए कि या तो चुप रहो, नही तो यहां से चले जाओ। यद्यपि यहां भी एक विकल्प सा है, परंतु यहां आदेश भी है, चुप रहना है, नही तो चले जाना है। यह चले जाने का आदेश बात के प्रवाह को बदल रहा है, यहां से आगे अंत है। ऐसे भावों और विचारों को अपने अंतर में समेटने वाला वकार बड़ा वैज्ञानिक वर्ण है-मानो विज्ञान इसी से आरंभ होता है और वैज्ञानिकों के मन मस्तिष्क को आंदोलित करता हुआ-अथवा उनमें मचलन पैदा करता हुआ जनसामान्य के हृदयों में जाकर हलचल मचा डालता है। इसलिए सारा विज्ञान तो इसमें समाहित है ही साथ ही संसार के जन सामान्य को विकास की चरमावस्थ तक पहुंचाना और उसमें विशेषता उत्पन्न करना भी इसी का काम है।

‘श’ ‘ष’ और ‘स’

संस्कृत और नागरी वर्णमाला का 30वां व्यंजन वर्ण ‘श’ है। पं. रघुनंदन शर्मा इन तीनों वर्णों के विषय में लिखते हैं कि अ,ई, उ की भांति मुख में एक सीटी का सा स्वर भी होता है। (जुकाम की स्थिति में इसका ज्ञान स्वयं होता है) उसी स्वर को लेकर ये तीनों अक्षर छोटी बड़ी ध्वनि के कारण तीन प्रकार के हो गये हैं और छोटे बड़े क्रम से एक ही अर्थ रखते हैं। किसी को दूर से सूचना देने के लिए पहले लोग शंख फिर नफीरी और बाद में बिगुल बजाया करते थे। परंतु थोड़े फासलों के लिए सीटी और बहुत ही थोड़े फासले के लिए सकार का ही प्रयोग होता है। दूसरे को सूचना देना अपने अभिप्राय का प्रकाश करना है। इसलिए इन तीनों अक्षरों का अर्थ प्रकाश करना है। इनमें जो अक्षर जितना प्रबल होता है, उससे उतने ही दर्ज का प्रकाश बोध कराया जाता है। अधिक से अधिक प्रकाश अर्थात हस्तामलक प्रकाश को ज्ञान कहते हैं। इसलिए इन तीनों में बड़े ‘ष’ का अर्थ ज्ञान होता है। जिससे ऋषि आदि शब्द बनते हैं। मध्यम शकार से प्रकाश, आकाश, नाश आदि शब्द बनते हैं, और प्रत्यक्ष आग्नेय प्रकाश का अर्थ रखते हैं। इसी प्रकार निकृष्ट सकार से सूचना देना, स्पष्ट करना, प्रकाशित करना, अर्थ लिया गया है और स-शब्दे धातु बनाया गया है। ‘स’ साथ में भी आता है, और सर्वथा तृतीया पुरूष के लिए प्रयुक्त होता है।शकार का अर्थ काटने वाला, विनाश कर्ता, शस्त्र, शिव-शाम, आनंद भी माना है। जबकि ‘ष’ का अर्थ सर्वोत्तम, सर्वोत्कृष्ट, हानि, विनाश, अंत, शेष, अवशिष्ट, मोक्ष और सकार का अर्थ-के साथ, मिलाकर, के साथ साथ संयुक्त होकर युक्ति, सहित, समान सदृश, सधर्मन, समान प्रकृति का इत्यादि माना गया है।ऊपर पंडित रघुनंदन शर्मा ने ‘ष’ को बड़ा मानकर उसका प्रथम वर्णन किया है। परंतु आजकल बड़ी ‘श’ ये मानी जाती है और उसके पश्चात ‘ष’ और ‘स’ का स्थान है।श्री शर्मा जी के अनुसार अतिभाषा-आदिभाषा में यह क्रम ही था। आजकल संसार में जितनी भी भाषाएं हैं वो सभी उस आदिभाषा-देववाणी संस्कृत का विकार मात्र हैं। संसार के सारे के सारे भाषाविद देववाणी को सब भाषाओं की जननी तो स्वीकार करते हैं पर संसार में भाषायी एकता स्थापित कर वास्तविक भाईचारे को लाकर विश्वशांति और सदभाव के लिए प्रयास करते नही दीखते। हमारा मानना है कि संसार में शांति भाषाई एकता से आएगी और यह भाषाई एकता देववाणी के माध्यम से ही लायी जा सकती है। ‘ओउम् द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष…’ वाले वेदमंत्र में जिस शांति की स्थापना की प्रार्थना की गयी है, मानो वह विश्वशांति का शिवसंकल्प है। वैसा शिव संकल्प अन्य भाषाओं में कहीं नही दिखाई देता, और यदि कहीं दीखता भी है तो उसके लिए इच्छाशक्ति उतनी प्रबल नही है, जितनी देववाणी की है।वर्ण ‘क्ष’ ककार और षकार के योग से बना है। ककार का अर्थ बांधना और षकार का अर्थ ज्ञान है। इसलिए ‘क्ष’ का अर्थ रूका हुआ ज्ञान, बंद ज्ञान, अज्ञान, निर्जीव, नाश, अथवा मृत्यु आदि होता है। क्षय, क्षयी, पक्ष, कक्ष, क्षत्रिय, इत्यादि शब्द ऐसे ही अर्थ निष्पन्न कर रहे हैं। क्षत्रिय क्षरण होती हुई सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक व्यवस्था को रोकता है, उसका त्राण करता है, इसलिए क्षत्रिय है। इसमें ‘क्ष’ क्षरण का ही ध्वन्यार्थक है। क्षीण, क्षुद्र, क्षुधा, क्षीर, क्षेत्र, क्षेप, विक्षेप, क्षुर उस्तरा-छुरा, क्षमा (किसी की गलती से उपजे क्रोध या असंतोष के भाव का नाश कर देना) इत्यादि शब्द भी क्षकार के उपरोक्त अर्थों को ही दर्शाते हैं।

‘त्र’

त्रकार ‘त’ और ‘र’ के संयोग से बनता है। इसका अर्थ नीचे तक देना, सब कुछ देना, कुछ देना होता है। सर्वत्र, यत्र, तत्र, एकत्र जैसे शब्दों में त्रकार यही अर्थ निष्पन्न कर रहा है। त्रिकाल, त्रिगुण, त्रिदोष, इत्यादि शब्द भी इन्हीं अर्थों के सूचक हैं।

ज्ञकार में ‘ज्ञ’ और ‘ञ’ का संयोग है।

ज्ञकार का अर्थ (ज=जनम और ञ=नही होने से) अजन्मा नित्य आदि होता है। संसार में अजन्मा ईश्वर जीव और प्रकृति हैं। इनमें प्रकृति का गुण कर्म है तो ईश्वर का गुण ज्ञान है, जबकि जीव कर्मशील रहकर ज्ञानवान बनने के लिए सचेष्टï रहता है। ज्ञान प्रज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञा, इत्यादि शब्द इसी प्रकार के अर्थों को स्पष्ट करते हैं। ज्ञकार को ‘ग्य’ बोलना दोषपूर्ण है। जैसे ज्ञानी को ग्यानी और ज्ञान को ग्यान कहा जाता है। ज्ञकार जीवन को उन्नति में ढालने वाला है, प्रकाश और आनंद से भरने वाला। इसीलिए यह अजन्मा और अनन्त की ओर हमारी उड़ान को भरवाने में सहायता करता है। यज्ञ और यज्ञमयी जीवन से अनंत की ओर बढऩे की तरंगें हवि स्वरूप में निकलने लगती हैं, इसलिए यज्ञ को बहुत ही पवित्र माना गया है।

‘ह’

हकार हिंदी वर्णमाला का अंतिम वर्ण है। यह बलबोधक नियात जो पूर्ववर्ती शब्द पर बल देता है, इसका अर्थ है-सचमुच, यथार्थ में निश्चय ही आदि, परंतु कभी कभी इसका प्रयोग बिना किसी विशेष अर्थ को प्रकट किये केवल पादपूर्ति के निमित्त भी किया जाता है। विशेषकर वैदिक साहित्य में ऐसा होता है। यह वर्ण कभी कभी संबोधन के लिए भी प्रयुक्त होता है, तिरस्कार व उपहास के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है। संबोधन में हे राम! इत्यादि शब्द हैं तो हे! क्या करता है? इत्यादि तिरस्कार भरे शब्द हैं और किसी पर ठहाका मारकर (हा…हा…हा) हंस पडऩा उसका उपहास उड़ाना है। परंतु इतिहास जैसे शब्दों में हकार का ‘प्रयोग निश्चित रूप से’ के अर्थ में ही हुआ है। इसकी निचली आकृति इसके निश्चित स्वरूप को अहंकारी बना रही है, पूरी ऐंठन के साथ। यही भाव इसमें मिलता है। हे हे, हो संबोधनात्मक हकार के दर्शक हैं।

उपसंहार

जैसे एक औषधि के साथ दूसरी औषधियों का सम्मिश्रण तैयार करने से औषधियों के गुणों में वृद्घि हो जाती है, उसी प्रकार वर्णों के सम्मिलन से जब शब्द बनते हैं तो उन शब्दों के वर्णार्थों और धातुओं के सम्मिश्रण से अनेक अर्थ बन जाते हैं। यहां जो हमने अभी तक चिंतन किया है उसका अर्थ केवल यही था कि हम अपनी हिंदी वर्णमाला के अक्षरों की वैज्ञानिकता को समझें।पतंजलि महाराज ने कहा है कि बहुर्था अपि धात्वो भवन्ति अर्थात धातुएं बहुत अर्थ वाली भी होती हैं।इस पर स्वामी दयानंद सरस्वती जी महाराज ने ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका के पृष्ठ 384 पर लिखा है-’इस महा भाष्यकार के वचन से यह बात समझनी चाहिए कि धातुपाठ में धातुओं के जितने अर्थ लिखे हैं, उससे अधिक और भी बहुत अर्थ होते हैं।इस लेखमाला को हमने पं. रघुनंदन शर्मा जी की वैदिक संपत्ति नामक पुस्तक निरूक्तम, पं. भगवतदत्त जी की पुस्तक ‘भाषा का इतिहास’ श्रीमद दामोदर सातवलेकर जी की पुस्तक ‘संस्कृत स्वयं शिक्षक’ के आधार पर आप तक पहुंचाया है। स्पष्ट है कि अपनी किसी प्रकार की मिथ्या विद्वत्ता में चार चांद लगाना मेरा प्रयोजन नही था। अपने ज्ञान की वृद्घि के लिए उक्त पुस्तकों का अध्ययन आप कर सकते हैं। डा. मधुसूदन जी (अमेरिका) का विशेष आभारी हूं जिन्होंने लेखमाला के पहले भाग को पढ़कर ही मुझे निर्देशित किया कि निरूक्तकार को भी पढ़ो और समझो।अंत में रघुनंदन शर्मा जी के इस कथन को उद्वृत कर लेख माला का समापन करना उचित समझता हूं- धातुएं दो प्रकार की होती हैं एक स्वाभाविक और दूसरी कृत्रिम। वेद के शब्दों की जितनी धातुएं हैं, वे स्वाभाविक हैं और मनुष्यों की कल्पना से जो धातुएं बनी हैं, वे कृत्रिम हैं। जो कृत्रिम हैं, उनके लिए विश्वासपूर्वक नही कहा जा सकता है कि वे वैज्ञानिक आधार पर अक्षरार्थों के अनुसार बनाई गयी होंगी। किंतु जो वैदिक हैं-ईश्वरकृत हैं उनके लिए यह शंका ही नही हो सकती कि वे अक्षरार्थ के अनुसार हैं या नही? क्योंकि मनुष्य के मुख के समस्त स्थान और प्रयत्नों की रचना परमात्मा ने ही की है। उसी ने इतने वर्ण मनुष्य के मुख से उच्चारित होने का आयोजन किया है और उसी ने उन वर्णों के द्वारा मनोभाव प्रकट करने का सामथ्र्य दिया है इसलिए यह असंभव है कि उसने उन वर्णों का कुछ भी अर्थ न सोचा समझा हो और यह निर्विवाद है कि उसका सोचा समझा सार्थक होता है। अत: ईश्वरकृत धातुएं वर्णों के अनुसार ही बनी हैं। इसमें जरा भी संदेह नही है।

 

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