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क्या है ओ३म और भूर्भुव: स्व: की व्याख्या

अब इस पर विचार करते हैं कि जीवात्मा जो हमारे शरीर के अंदर रहती है उसका कर्तत्व क्या है?

इस बिंदु पर विचार करने के लिए सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि ईश्वर , जीव और प्रकृति तीनों की स्वतंत्र सत्ता होती है। यह हमारे लिए प्रसन्नता का विषय है कि हमारे ऋषियों , मुनियों, तपस्वियों, ज्ञानियों , ध्यानियों, योगियों ने कर्त्तव्य पालन में सहायता प्रदान करने के लिए सत साहित्य एवं दर्शन और आर्ष साहित्य,की रचना करके हमको प्रदान की है। जिससे हमारा मार्गदर्शन होता रहा है। जिनके लिए हम अपने महान पूर्वजों के ऋणी हैं । ऐसे ऋषि और मुनियों की इन रचनाओं के कारण ही आर्यावर्त अर्थात भारत सदैव से विश्वगुरु के पद पर पदासीन रहा है।

वेद में ईश्वर को आचि व्याहरतायाम उल्लेखित किया गया ,अर्थात ईश्वर वाच्य के वाचक व्याहृति भूर्भुव: स्व: है। जो सत ,चित और आनंद का बोध कराता है। यहां पर भू: सत के अर्थ में और भुव: का अर्थ चित् अर्थात जीव और ‘स्व:’ आनंद को कहा गया है ,अर्थात प्रकृति में केवल सत् है और जीव में सत और चित दोनों हैं ।लेकिन ईश्वर के अंदर सत ,चित और आनन्द तीनों हैं। प्रकृति जड़ है। क्योंकि उसके अंदर चेतना नहीं और जीव में सत के साथ चेतना भी है।इसलिए जीव आनंद (ईश्वर)की खोज में प्रयासरत रहता है। इसीलिए जीव को आनन्द धाम का राही कहा जाता है

ओ३म शब्द को यदि संधि विच्छेद करें तो तीन अक्षर ‘अ’ , :उ’,और ‘म’ प्राप्त होते हैं।

जिनमें से प्रथम अक्षर ‘अ’ ईश्वर का, ‘उ’ अक्षर जीव का तथा ‘म’ अक्षर से प्रकृति का बोध होता है। ‘अ’ सर्वत्र व्याप्त है , जीव अपनी चेतना के द्वारा इसको प्राप्त करने में प्रयासरत रहता है ।लेकिन प्रकृति जड़ होने के कारण चित् एवं आनंद से दूर रहती है। जीव ईश्वर और प्रकृति के बीच में रहता है , जीव जब ईश्वर की ओर अभिमुख होता है तो वह उसका उन्नयन काल होता है और जब वह प्रकृति में खो जाता है तो वह उसका अधोगति का काल होता है इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह ईश्वर को प्राप्त करें और प्रकृति में न खोए।

भूर्भुव: स्व: अथवा सच्चिदानंद शब्द पर विचार करने से जीव के कर्त्तव्य का उद्देश्य निश्चित हो जाता है ।क्योंकि हमने देखा कि प्रकृति को सत कहते हैं। सत ,चित जीव का नाम हो गया । सच्चिदानंद ईश्वर को कहा जाता है ।सत चित दोनों जीव के पास हैं । दूसरी ओर ब्रह्म का स्वरूप आनंद है ।सत जो प्रकृति का गुण है वह जीव को पहले से ही उपलब्ध होता है इसलिए उसका प्रयास उसकी ओर होता है जो उसके पास नहीं होता और ईश्वर का जो आनंद स्वरूप है , वह जीव को चाहिए , इसलिए जीव के कर्त्तव्यों का अंतिम उद्देश्य आनंद अर्थात ईश्वर को प्राप्त करना ही होता है। संक्षेप में निम्न प्रकार से कहा जा सकता है।

प्राप्त संसार अर्थात प्रकृति रूप जगत को इस प्रकार वर्तना चाहिए ,व्यवहार में लाना चाहिए । जिससे वह अन्त में आनन्द स्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति का साधन बन जाए।

उपरोक्त सिद्धांत के दृष्टिगत जगत मिथ्या नहीं है, बल्कि वह तो जीव के लिए आवश्यक है ।क्योंकि यदि जगत नहीं, होता ,तो जगत में जीव आनन्द की प्राप्ति का प्रयास ही नहीं करता। उसको मुक्ति की प्राप्ति भी नहीं होती। इसलिए मोक्ष की प्राप्ति के लिए जगत में आना और सदकार्य करना जीव के लिए बहुत आवश्यक है। आत्मा के स्वाभाविक गुण , ज्ञान और प्रयत्न है ।जीव का यह ज्ञान और प्रयत्न अर्थात कर्म रूप पुरुषार्थ जीव के बाहर जगत में भी काम करता है और जीव के अंदर भी कार्य करता है। लेकिन जीव का पुरुषार्थ जब बाहर जगत में काम करता है। तब उसकी चित्त की वृत्तियां बहिर्मुखी होती हैं और जब उसका प्रयास अंदर काम करता है । तब उसको अंतर्मुखी व्रतियों वाला कहते हैं । जीव जो कि चेतना से अपना प्रयास करता है , इसलिए दोनों वृत्तियां में से कोई सी एक उसके पास सदैव जारी रहती है ।यदि बहिर्मुखी बंद होती है तो स्वभावगत अंतर्मुखी वृत्ति कार्य प्रारंभ कर देती है ।बहिर्मुखी वृत्तियां जब अपना कार्य करती होती हैं तब जीव अंतः करणों के माध्यम से जगत में इंद्रियों द्वारा काम किया करता है ।परंतु अंतर्मुखी होने पर वह आत्मा अनुभाव और परमात्मा दर्शन किया करता है ।इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह हमेशा अंतर्मुखी वृत्ति को कार्यरत रखे, उसी का उपयोग करें

और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करे।

महर्षि दयानंद द्वारा सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम समुल्लास में ओ३म की जो व्याख्या की है , उस पर एक दृष्टिपात करते हैं।

देवेंद्र सिंह आर्य

चेयरमैन : उगता भारत

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