गुर्जर वंश का गौरवशाली इतिहास : गुर्जर कुषाण वंश के प्रारंभिक शासक , भाग — 1

पिछले अध्याय में हमने स्पष्ट किया था कि भारतवर्ष में शासन करने वाले कुषाण वंशी शासकों के पूर्वज मूल रूप में भारतीय आर्यों की ही क्षत्रिय शाखा के लोग थे। जो देश , काल व परिस्थिति के अनुसार मध्य एशिया से चलकर भारत पहुंचे । जिन्हें यहाँ के क्षत्रिय समाज के लोगों ने अपने साथ सहज रूप में मिला लिया। मूल रूप में भारतीय आर्यों की ही सन्तान होने और भारतीयता व भारतीय संस्कृति से इनका अनन्य प्रेम होने के कारण इन लोगों को हम विदेशी नहीं मान सकते । कुषाण चीन के यूची एवं तोखरी जाति के थे। मंगोलिया का कोवी प्रदेश कुषाणों का मूल निवास स्थान था।

राहुल सांकृत्यायन जी का मत इस विषय में हमारी शंकाओं का समाधान करता है। वह लिखते हैं कि :– ” कुषाणों को बौद्ध या शैव आदि धर्मों के साथ सम्बध्द देखकर उन्हें भारत में आकर हिंदू संस्कृति और धर्म को ग्रहण करने वाले समझने की गलती इस कारण की जाती है कि हम यह नहीं जानते कि उनका मूल स्थान (तुषार देश तरिम उपत्यका) इससे पहले ही से धर्म और संस्कृति में हिंदू था।”

कुजुलकडफिस

यूची जाति के प्रथम शासक कुजुल कडफिस या कडफिसेस प्रथम था। इन्होंने रोमन सिक्के की नकल करके तांबे का सिक्का जारी किया। भारत में कुषाण वंश के संस्थापक कुजुल कडफिसेस था। भारत में कुषाण या कसाना साम्राज्य के संस्थापक के रूप में कुजुलकडफिस को ही सम्मान प्राप्त हुआ है । इसने दीर्घकाल तक संघर्ष करने के पश्चात सन 25 में सम्राट पद प्राप्त किया और भारत में विधिवत शासन करना आरम्भ किया। चीनी इतिहास लेखकों की साक्षी पर विश्वास किया जाए तो पता चलता है कि कुजलकडफिस का जन्म 30 ई0पू0 में हुआ था ।उसकी मृत्यु 80 वर्ष की अवस्था में सन 50 में हुई थी। जिस समय उसने सम्राट पद प्राप्त किया था ,उस समय उसकी अवस्था 55 वर्ष की थी।

इस गुर्जर सम्राट का एक नाम ‘गुजुर कपिशिया’ भी था । महाभारत कालीन बाह्लीक ( बल्ख ) राज्य की राजसत्ता को छोड़ने के लिए यूनानियों को कुषाणों ने ही अपने पराक्रम से बाध्य किया था। यवन लोगों का भारतवासियों से लम्बे समय से 36 का आंकड़ा चला आ रहा था । मूल रूप में भारतीय होने के उपरान्त भी यवन लोग भारतवासियों के विरुद्ध कार्य करने के लिए जाने जाते थे । इसलिए यूनानियों अथवा यवनों को वहाँ से पराजित कर भगाने का काम उस समय सचमुच बहुत ही सराहनीय कार्य था । जिसका स्वाभाविक प्रभाव भारत के लोगों पर यह पड़ा कि कुषाणों को उन्होंने अपने अनुकूल समझा ।

कुषाणों के द्वारा किए गए इस महान कार्य को भारतवर्ष की जनता ने अपनी स्वीकृति और सहमति प्रदान की।

पंडित भगवत दत्त सत्यश्रवा जी ने अपने ग्रंथ ‘भारतवर्ष का इतिहास’ के पृष्ठ संख्या 151 पर महाभारत के शांति पर्व ( 64 / 13 ) की साक्षी के आधार पर स्पष्ट किया है कि बहुत पुराने दिनों में यवन लोग भारत की उत्तर पश्चिमी सीमा पर रहते थे। कालांतर में वे वहीं से वर्तमान यूनानी या ग्रीस देश को गए । उनकी भाषा संस्कृत से ही निकली है ।आधुनिक भाषा विज्ञानियों ने इनकी स्थिति पूर्णतया नहीं समझी । सम्राट मांधाता के काल में भी यवन विद्यमान थे। महाभारत युद्ध में कशेरुक यवन को श्रीकृष्ण ने मारा था । जिसका उल्लेख सभा पर्व में आता है। युधिष्ठिर के सभा प्रवेश उत्सव में एक यवनाधिपति उपस्थित हुआ था । इसकी भी साक्षी महाभारत के सभा पर्व से ही हमें मिलती है। उसका विरोधी कंपन भी वहीं था। यवन लोग अश्वयुद्ध में बड़े कुशल थे।

इसके बाद हम देखते हैं कि यूनान के शासक सिकन्दर ने भी भारत पर आक्रमण किया । यद्यपि हम अन्य लोगों की भान्ति यवनों को भी मूल आर्यों की ही सन्तान मानते हैं । परन्तु उनके स्वभाव में भारत विरोध संभवत: प्रारम्भ से ही रहा । इसलिए मूल भारतीय संस्कृति के होते हुए भी अपनी ही मातृभूमि के प्रति विरोध का भाव होने से उन्हें तत्कालीन भारतीय समाज के लोगों ने अपना स्वीकार नहीं किया । यह प्रवृत्ति सामान्य रूप से आज भी लोगों में देखी जाती है कि अपने परिवार के ही उस व्यक्ति को लोग त्याग देते हैं जो अपना होकर भी घर परिवार के सम्मान के अनुसार काम नहीं करता है। यही कारण था कि भारतीय धर्म व संस्कृति को मिटाने के लिए कटिबद्ध रहे यवन लोगों ने जब सिकन्दर के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया तो चाणक्य और चन्द्रगुप्त को भारत की सुरक्षा के लिए विशेष प्रबन्ध करने पड़े । जो लोग यह मानते हैं कि उस समय राष्ट्रीय चेतना का भारतवासियों में अभाव था , उन्हें चन्द्रगुप्त और चाणक्य की सुरक्षा नीति पर विचार करना चाहिए , जो उन्होंने यवनों से भारत को सुरक्षित करने के लिए उस समय अपनाई थी । उससे पता चलता है कि वे लोग यूनानियों को भारत विरोधी ही मानते थे । यवन लोगों की यह भारत विरोधी भावना ही धीरे-धीरे उन्हें हमसे दूर करती चली गई।

ज्ञात रहे कि महाभारत काल से लेकर सिकन्दर और उसके पश्चात कुषाण वंश के आने तक भी यूनानियों की भारत विरोध की यह भावना ज्यों की त्यों चली आ रही थी। यवन राजाओं के बारे में हमें पता चलता है कि अशोक के समय में यवनराज तुषास्फ उसका एक सामन्त था। शालिशूक मौर्य के काल में यवन राज धर्ममीत ने मगध पर आक्रमण किया था। इसके पश्चात पुष्यमित्र के समय में उसके पुत्र वसुमित्र ने सिन्धु तीर पर यवनों को परास्त किया । पुष्यमित्र का याज्ञीक पतंजलि मध्यमिका और साकेत पर भी किसी यवन आक्रमण का पता देता है। इन तथ्यों की जानकारी हमें पंडित भगवत दत्त सत्यश्रवा जी अपनी उपरोक्त पुस्तक के पृष्ठ संख्या 282 पर देते हैं।

कुल मिलाकर इन तथ्यों को यहाँ पर प्रस्तुत करने का हमारा उद्देश्य केवल यह है कि जब कुषाण शासक ने यूनानियों को परास्त कर बाह्लीक प्रान्त से दूर भगाया तो अपने परम्परागत शत्रुओं को इस प्रकार परास्त होते देखकर स्वाभाविक रूप से भारत के लोगों ने कुषाण शासक का अभिनन्दन किया।

यहाँ पर यह शंका करने की भी आवश्यकता नहीं है कि भारत के लोगों में उस समय राष्ट्रवाद की भावना नहीं थी और उस समय की परिस्थितियां ऐसी थीं कि जो भी कोई विदेशी आता था वह जहाँ चाहे अपना कब्जा कर सकता था । भारत के लोग उस ओर से पूर्णतया निरपेक्ष भाव अपनाते थे । इस प्रकार की शंका करने का हमने ऊपर ही समाधान कर दिया है कि जिस देश के लोग सिकन्दर के आक्रमण से सावधान होकर एक सफल रणनीति बना सकते हैं और सिकंदर के बाद के आक्रमणकारियों के विरुद्ध एकजुट होकर उनका मुकाबला कर सकते हैं ,उनके बारे में यह सोचना ही गलत है कि उनमें राष्ट्रवाद की भावना नहीं थी । यूनानियों को परास्त करने के उपररान्त यदि कुषाण शासक का अभिनन्दन हो रहा था तो केवल इसलिए कि वह मूल रूप में हिन्दू होने के कारण भारतीय संस्कृति और परम्परा के लिए संघर्ष करने वाले योद्धा के रूप में भारत से इन लोगों को भगाने का काम कर रहा था।

चीन के ऐतिहासिक ग्रन्थ होऊ हंशु के अनुसार कुषाणों के सरदार कुजुल कड़फिस ने बाह्लीक प्रदेश के दक्षिण में स्थित कपिशा और गंधार राज्यों को जीत लिया । पश्चिमी गान्धार से और आगे पश्चिम की ओर चलने पर हिन्दुकुश पर्वत के साथ का प्रदेश प्राचीन समय में ‘कपिश देश’ कहलाता था। इस देश के उत्तर-पश्चिम में आजकल बदख्शां और बल्ख हैं । जिन्हें प्राचीन काल में कम्बोज और वाह्लीक देश कहते थे। उस समय कपिशा एक बहुत ही प्रतिष्ठित राज्य के रूप में जाना जाता था । कपिशा की विजय से कुषाणों को बहुत अधिक सम्मान प्राप्त हुआ । भारत के तत्कालीन समाज के राष्ट्रवादी लोगों ने उनकी इस ऐतिहासिक जीत पर उनका स्वागत किया । कुजुल कड़फिस ने ‘कपिशा’ को अपने पुरुषार्थ और पराक्रम से खड़े किए जा रहे साम्राज्य की राजधानी बनाने का निर्णय लिया। उसने कुषाण शासक के रूप में यही से उसने अपना पहला सिक्का भी जारी किया था ।

कपिशा के बारे में यह भी एक तथ्य है कि कनिष्क यहाँ पर अपना ग्रीष्म काल व्यतीत करने के लिए आया करता था। यहाँ कुषाण शासकों का गर्मी ऋतु का महल तथा एक सुसज्जित बाज़ार था । कपिशा को शत्रुओं से संरक्षित करने के लिए ऊंची दीवारों से सुरक्षित किया गया था। कुषाण वंश के प्रसिद्ध सम्राट कनिष्क ने अपने शासनकाल ( 78 – 101 ई0 ) में जब कपिशा से अपनी राजधानी पेशावर स्थानान्तरित की तो उस समय तक उसका सम्पूर्ण विश्व की राजनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान था । इस नगर की ऐतिहासिकता , प्रसिद्धि और इसके प्रति अपने स्वाभाविक लगाव को प्रदर्शित करने के लिए कनिष्क ने अपनी राजधानी पुरुषपुर (पेशावर ) बनाने के उपरान्त भी ग्रीष्मकालीन राजधानी कपिशा को ही बनाए रखा । ह्वेनसांग के ग्रन्थ सी यू की के अनुसार कनिष्क ने यहाँ पर अपने शत्रु देश चीन को पराजित कर उसके राजकुमारों को कपिशा के महल में बन्धक बना कर रखा था । ह्वेनसांग का चीन को कनिष्क का एक शत्रु देश बताना बहुत महत्वपूर्ण है। स्पष्ट है कि चीन के और कुषाण शासकों के सम्बन्ध अच्छे नहीं थे और चीन के तत्कालीन शासक कुषाण वंश के शासकों के बढ़ते प्रताप और पौरुष से आशंकित और आतंकित रहते थे ।यहाँ से कुषाण कालीन बेग्राम कोष की भी प्राप्ति हुई है।

कुजुलकडफिस के द्वारा जारी किए गए सिक्कों में एक हरमीयस नाम के यूनानी बैक्ट्रियन शासक का नाम भी मिलता है । विद्वानों का मानना है कि वह कुजुल के लम्बे संघर्षों में संभवत: उसका सहायक रहा। यही कारण है कि उसे सम्मान देने के लिए कुजुलकडफिस ने उसे अपने सिक्कों में स्थान दिया।

साम्राज्य का विस्तार होने के पश्चात कुजुलकडफिस की उपाधियां उसके सिक्कों में महरयस , राजतिरजस, देवपुत्रम , महरजस महतस कुषाण , कुजुल – कुश , महरयस , राजतिरजस , यवगुप्त आदि मिलती हैं। इन उपाधियों में कुजुल कुश नाम की उपाधि का विशेष महत्व है । कुश रामचन्द्र जी के पुत्र का नाम भी था और जैसा कि हम कुषाण वंश के प्रारम्भ में ही लिख आए हैं कि हिन्दू कुश से भी इस क्षेत्र का विशेष संबंध था। स्पष्ट है कि कुजुलकडफिस ने अपने आपको भारत के सूर्यवंशी क्षत्रिय शासकों की वंश परंपरा से ही जोड़ा और कुश प्रान्त में या हिन्दूकुश क्षेत्र में रामचंद्र जी के पुत्र कुश के साथ अपना सम्बन्ध स्थापित किया ।

कपिशा को पाकर सम्राट स्वयं भी गौरवान्वित होता था

कुजुल कडफिस के नाम में ‘कडफिस’ का भी एक विशेष महत्व है कुछ विद्वानों ने इसे इस शासक की उपाधि माना है ,जो उसके पौत्र विम कडफिस के समय तक यथावत रही। प्रथम शताब्दी के रोमन विद्वान प्लिनी की पुस्तक ‘नेचुरल हिस्ट्री’ का अनुवाद तैयार करने वाले विद्वान सोलिनुस ने ‘कपिशा’ को काफुसा लिखा है । कडफिस का खरोष्ठी रूप कप्शा इनकी राजधानी के नाम कपिशा के अत्यधिक निकट है। कपिशा या कडफिस को अपने लिए एक उपाधि के रूप में धारण करने से पता चलता है कि कुजुलकडफिस को कपिशा का शासक होने में बहुत ही गौरव की अनुभूति होती थी ।इससे भी पता चलता है कि उसने यूनानियों से कपिशा को प्राप्त कर सचमुच उस समय एक महान कार्य किया था । जिस पर वह स्वयं भी गौरवान्वित होता था। कपिशा पर अपने गौरवपूर्ण शासन को प्रदर्शित करने के लिए ही उसने यह उपाधि धारण की । लेवी के अनुसार ‘कड़फिसेस’ का अर्थ ‘कपिशा मैन’ है।कुजुल और विम के नाम में कडफिस कपिशा से सम्बंधित शब्द हैं, जिसका अर्थ ‘कपिशा का शासक’ हैं । यही कारण कि जब कनिष्क ने पुरुषपुर (पेशावर) को अपनी राजधानी बनाया तो उसने और उसके उत्तराधिकारियो ने परम्परगत कडफिस’ शब्द अपने नाम के साथ प्रयोग करना बन्द कर दिया ।

ऍफ़ डब्ल्यू थॉमस के अनुसार कुजुल वास्तव में गुशुर हैं । कुषाण काल में कुषाणों के राजसी वर्ग के लिए गुशुर शब्द के प्रयोग के उदहारण उपलब्ध हैं । कुजुलकडफिस के शासन काल में ही उसके अधीनस्थ क्षेत्रीय शासक सेनवर्मन के स्वात घाटी अभिलेख में ‘गुशुर’ शब्द का प्रयोग सेना के अधिकारियों के लिए किया गया हैं । ऍफ़ डब्ल्यू थॉमस के मत का समर्थन टी. बरो नामक विद्वान ने किया हैं ।भारत में कुषाण अध्ययन के विशेषज्ञ माने जाने वाले बी एन मुख़र्जी ने भी इस बात का समर्थन किया है कि कुजुल को वास्तव में गुशुर ही पढ़ा जाना चाहिए । विद्वानों की सम्मतियों का निष्कर्ष यही है कि कुजुल गुर्जर है ।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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