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स्वर्णिम इतिहास

दिव्य और भव्य इतिहास के उत्तराधिकारी हैं हम

श्री राम अयोध्या से वन में पहुंच जाते हैं । पीछे से भरत अपने भाई को वापस अयोध्या लाने के संकल्प के साथ दल बल सहित वन में पहुंच जाते हैं । बहुत ही भावुक दृश्य उत्पन्न होता है । दोनों भाई बिना अस्त्र शस्त्र लिए युद्ध करने लगते हैं । देखने लायक वाक – बाण चलने आरंभ हो जाते हैं । युद्ध चल रहा है , जिसमें दिलों को जख्मी करने वाले बाण नहीं चल रहे। ना ही कोई तलवार चल रही।

इसमें मर्यादा ,कर्तव्य पथ, उत्तरदायित्व, प्रायश्चित, पिता के वचनों का पालन, प्रेम, त्याग, तपस्या ,उच्च आदर्शों की पराकाष्ठा,रेशमी और मखमली वस्त्रों का परित्याग करके कुटिया में पर्ण एवं कुशा पर शयन

स्वीकार करना ,धर्म की रक्षा, मर्यादा का संतुलन रखते हुए अपने अग्रजों का ,गुरुओं के आदेश का पालन ,जिसे देवता भी देखकर प्रसन्न होते हों ऐसे न्यायपूर्ण और प्यार भरे व्यवहार को अपनाने का पवित्र भाव है। यह ऐसा स्वैर्गिक वातावरण उत्पन्न करता है जहाँ सत्ता सुख और राजसत्ता को ठोकर पर मारा जाता है , जिसमें भगवान और भक्त के प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं , निश्छल ,नि:स्वार्थ प्रेम, कर्तव्य पथ की आन, ममता, एक दूसरे की भावनाओं का पूरा सम्मान करते हुए और एक दूसरे को प्रसन्न करने के लिए अपने – अपने तर्को से प्रयास किए जा रहे हैं ।जिस राज्य को प्राप्त करने के लिए युद्ध होते हैं तथा राज्य को प्राप्त करने की लालसा हो , वह राम और भरत के इस पवित्र और दिव्य संवादात्मक युद्ध में कहीं दिखाई नहीं पड़ती।

यह ऐसा अद्भुत युद्ध है जिसमें वाक् बाण चलते हैं।वाक चातुर्य ,धर्म अनुकूल आचरण की तलवार चलती है। देखने और सुनने से पता चलता है कि शायद हमारे पूर्वज इसी को धर्म युद्ध कहते रहे हैं । सचमुच मानव व्यवहार के माध्यम से दिव्यता को प्रकट करने वाला ऐसा धर्म युद्ध विश्व में कहीं अन्यत्र सुनने को या देखने को नहीं मिलेगा। इसलिए आर्यावर्त की ,भारत की सभ्यता और संस्कृति विश्व पटल पर एक छत्र विद्यमान रही है। इसलिए भारत विश्व गुरु के पद पर सुशोभित होता रहा है ।

इतिहास में ऐसी घटनाओं से बहुत सारे प्रकरण भरे पड़े हैं जहां भाई ने भाई से छल करके, गला काटकर राज्य को प्राप्त किया। परंतु इस विलक्षण युद्ध में मर्यादा और धर्म, कर्तव्य पालन के तर्क बाण और प्रेम की तलवार चलती हुई दिखाई पड़ती है।

यह केवल और केवल भारत की संस्कृति है जिसमें जहां बड़े भाई की चरण पादुका शासन करती हो।

अपने मर्यादा पथ का पालन करने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम राम के लिए यह सच ही है कि 12 लाख वर्ष व्यतीत हो जाने के पश्चात भी भारतीय जनमानस में ही नहीं बल्कि विश्व पटल पर उनका आदर और सम्मान के साथ नाम लिया जाता है। यही कारण है कि सारा विश्व मर्यादा पुरुषोत्तम राम को अपना पूर्वज मानने में गौरव का और गर्व का अनुभव करता है।

राम ,लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न , महर्षि वशिष्ठ , आर्य सुमंत मंत्री, केकई का प्रायश्चित, उर्मिला का त्याग जिसने माता सुमित्रा के पास रहकर सेवा करना अपना धर्म समझा और पति को वन भेजने का बलिदान दिया, माता सुमित्रा का सहर्ष लक्ष्मण को आशीर्वाद देकर राम के साथ वन के लिए विदा करना, लक्ष्मण का भाई के प्रति सेवा भाव ,भरत को महात्मा और भक्त ,त्याग की प्रतिमूर्ति कहलाने का अधिकारी होना,सीता का पति धर्म, माता कौशल्या पुत्र मोह और धर्म पालन में भेद नहीं कर पा रही है। आखिर सभी कुछ प्रेरणादायक , विश्व इतिहास में अतुलनीय अनुपमेय , अनुकरणीय एवं अद्भुत है।

आज इस धर्म युद्ध के एक पात्र लक्ष्मण के चरित्र ,सेवा भाव ,बलिदान, त्याग पर विचार करते हैं।

आप लोगों ने प्राय: देखा होगा कि राम के साथ लक्ष्मण अवश्य होते हैं। अर्थात राम- लक्ष्मण के बिना अधूरे हैं और भरत के साथ शत्रुघ्न होते हैं। अपने बाल्यकाल से लक्ष्मण अपने भाई श्रीराम की सेवा में रहते हैं। इसलिए वन गमन करते समय लक्ष्मण श्रीराम से अलग हो जाएं यह संभव ही नहीं था ।इसीलिए माता सुमित्रा से अनुमति लेने के पश्चात उर्मिला के कक्ष में जब जाते हैं तो भिन्न-भिन्न प्रकार के विचार उनके मन में उथल-पुथल करते हैं कि उर्मिला को कैसे समझाउंगा ? वह कैसे मुझे राम के साथ वन में जाने की सहमति देगी ? ,वह साथ चलने की जिद करेगी ? अपने पति धर्म का पालन करने की बात कहेगी ?

यही हुआ भी । उर्मिला ने अनेकों दुश्चिंताएं , शंकाएं, साथ चलने की जिद , सीता की तरह अपने पति के साथ रहने की भावना ,सभी आग्रह लक्ष्मण से किए। तब लक्ष्मण ने उर्मिला को यह समझाया कि आप मेरी अनुपस्थिति में माता सुमित्रा और कौशल्या की सेवा करना । जिससे कि उनको हमारी कमी महसूस ना हो और उर्मिला ने अपने पति की यह आज्ञा स्वीकार करके बहुत बड़ा बलिदान और त्याग किया था। उर्मिला की तपस्या कम नहीं है । इससे उर्मिला का चरित्र भी बहुत ही उज्ज्वल और अनुकरणीय हो जाता है।

उर्मिला के तप के कारण ही मेघनाद के द्वारा छोड़े गए अमोघ अस्त्र से घायल होकर भी लक्ष्मण की प्राण रक्षा हुई थी। अपने सतीत्व और पति धर्म के कारण ही उर्मिला ने अपने पति के सकुशल वन से लौटने के लिए तपस्या की थी।

लक्ष्मण वन में अपने भाई और भाभी के साथ होते हैं। रात्रि को पहरा दे देकर उनकी रक्षा करते हैं। दिन में लकड़ी लाना, कंदमूल लाना, पहले भाई और भाभी को खिलाना, यह सारे प्रबंध लक्ष्मण के द्वारा किए जाते हैं । रात्रि के समय में धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर तीर लेकर एकटक भाई और भाभी को देखते रहना इनके सोने में कोई कष्ट न हो , यह सभी सेवाभाव लक्ष्मण के अंदर कूट-कूट कर भरा हुआ था ।

अपने वन प्रस्थान के समय लक्ष्मण ने उर्मिला से कहा भी था कि मैं भाई और भाभी की सेवा से समय निकालकर वन में कुटिया में आकर तुम्हें समय नहीं दे पाऊंगा। इसलिए तुम यहीं पर रहो। मैं उनकी सेवा करने के लिए उनके साथ जा रहा हूं ।

रावण के साथ युद्ध होने से पहले शूपर्णखा ने जो जाल रचा था और राम और लक्ष्मण से अलग-अलग शादी का प्रस्ताव दिया था। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने शूपर्णखा का यह प्रस्ताव यह कहकर सविनय ठुकरा दिया थाकि मेरी पत्नी तो मेरे साथ है । उसके बाद शूपर्णखा बाल यति लक्ष्मण के पास जाती है तो वहां से भी उसे निराशा ही हाथ लगती है। कहने का अभिप्राय है कि दोनों भाई ही अपनी अपनी मर्यादा और धर्म का निष्ठा से पालन करते हैं । इसके पश्चात रावण के साथ युद्ध में लक्ष्मण ने जिस प्रकार अपने शौर्य और वीरता का परिचय दिया , वह भी विश्व के इतिहास में अन्यत्र कहीं देखने को मिलता नहीं है। रावण की शत्रु सेना को तहस-नहस करना ,राम को विजय श्री दिलाना, सीता माता को वापस लाना, इन सभी कार्यों में लक्ष्मण की वीरता और साहस बलिदान छिपा पड़ा है।

रामायण के सारे पात्र हमें आज भी बहुत कुछ सोचने, सीखने , समझने की शिक्षा दे रहे हैं । आज हर घर में रावण छुपा बैठा है । आवश्यकता हर घर में श्रीराम को बैठाने की है । लक्ष्मण को , भरत को , शत्रुघ्न को और मर्यादाओं की डोर से बंधी सीता , उर्मिला आदि को बैठाने की आवश्यकता है । कौशल्या आदि तीनों माताओं के रूप में उन देवियों को लाने की आवश्यकता है जिन्होंने प्रत्येक परिस्थिति में न्यायपूर्ण व्यवहार करने का प्रयास किया । राजा जनक जैसे विदेह को स्थापित करने की आवश्यकता है जिन्होंने हर स्थिति में मर्यादा , धर्म और न्याय का पालन किया । सचमुच हम दिव्य और भव्य इतिहास के उत्तराधिकारी हैं ।

देवेंद्र सिंह आर्य

चेयरमैन : उगता भारत

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