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अक्टूबर तक आ सकती है चुनाव की नौबत

वीरेन्द्र सेंगर
केंद्र की यूपीए सरकार को फिलहाल फौरी राहत मिलती नजर आ रही है। क्योंकि, केंद्रीय मंत्री बेनी वर्मा के मुद्दे पर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव नरम पड़ गए हैं। लेकिन, यह सवाल बना हुआ है कि सपा की ‘कृपा’ कितनी टिकाऊ है? संसदीय दल की बैठक में पार्टी के सांसदों ने अपने सुप्रीमो मुलायम सिंह को औपचारिक रूप से कोई भी फैसला लेने के लिए अधिकृत कर दिया है। सपा नेतृत्व ने अपने सांसदों को संकेत दे दिया है कि वे सितंबर और अक्टूबर के आस-पास लोकसभा चुनाव के लिए तैयार रहें। इस बीच चेन्नई में डाले गए सीबीआई छापों से मनमोहन सरकार की खासी फजीहत हो गई है। सपा ने भी सरकार की इस कार्यशैली की तीखी आलोचना कर डाली है। दरअसल, कल सुबह चेन्नई में सीबीआई ने डीएमके सुप्रीमो एम. करुणानिधि के बेटे एम. के स्टालिन के घर पर ताबड़-तोड़ छापेमारी शुरू कर दी थी। जब यह खबर दिल्ली पहुंची, तो विपक्ष ने सरकार के खिलाफ चौतरफा निशाना साधना शुरू कर दिया। मुख्य विपक्षी दTeenल भाजपा ने कह दिया कि समर्थन वापसी के फैसले से खुन्नस खाकर सीबीआई का दुरुपयोग किया गया है। इन छापों के जरिए मायावती और मुलायम सिंह को भी एक खास संदेश देने की कोशिश की गई है। इन छापों को लेकर जब सरकार की फजीहत होने लगी, तो सरकार के वरिष्ठ मंत्री ‘बैकफुट’ पर नजर आए। वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने भी कह दिया कि ‘टाइमिंग’ को लेकर गलतफहमी होने की पूरी गुंजाइश है। उन्हें खुद इस कार्रवाई से हैरानी हो रही है। उन्हें नहीं मालूम कि सीबीआई में किसके आदेश से ये छापेमारी हुई है?
उल्लेखनीय है कि छापेमारी की कार्रवाई महज एक घंटे ही चली थी। जब दिल्ली में राजनीतिक बवाल बढऩे लगा, तो पता नहीं किसके आदेश से छापे मारने गए अधिकारी चुपचाप वापस लौट आए? भाजपा प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नकवी का सवाल है कि आखिर सरकार बताए कि किसके आदेश से छापेमारी की कार्रवाई रोक दी गई? लगता यही है कि केंद्र सरकार सीबीआई का इस्तेमाल बहुत बेशर्मी से करने लगी है। महज दो दिन पहले डीएमके ने सरकार से समर्थन वापस लिया है। सबक सिखाने के लिए स्टालिन के यहां सीबीआई भेज दी गई है। कांग्रेस नेतृत्व का यह तौर-तरीका एकदम गैर-लोकतांत्रिक है। जरूरत है कि सभी दल इस कार्यशैली के विरोध में लामबंद हो जाएं।
एम. के स्टालिन, करुणानिधि के छोटे बेटे हैं। करुणा की सरकार में वे उपमुख्यमंत्री थे। पिता के बाद डीएमके में सबसे ज्यादा उन्हीं की चलती है। चर्चा रही है कि स्टालिन के दबाव के चलते ही पार्टी सुप्रीमो ने केंद्र से समर्थन वापस लेने का फैसला किया था। आरोप लग रहा है कि इसी वजह से सीधा निशाना स्टालिन पर साधा गया है। स्टालिन के बेटे हैं, उदयनिधि। आरोप है कि स्टालिन के बेटे ने महंगी विदेशी कार ‘हमर’ मंगाई थी। इसमें कानूनी तौर पर ड्यूटी अदा नहीं की गई। चेन्नई में कई और रसूखदार लोगों ने विदेशी महंगी कारों के आयात में ड्यूटी टैक्स अदा नहीं किया। इसी मामले में सीबीआई ने 19 जगह छापे मारे थे। इनमें तीन ठिकाने करुणानिधि के परिवार से जुड़े बताए जा रहे हैं। स्टालिन ने आरोप लगाया है कि एक राजनीतिक साजिश के तहत केंद्र के इशारे पर सीबीआई ने ये कार्रवाई डराने के लिए की है। लेकिन, श्रीलंका में तमिल अत्याचारों के मामले में उनकी पार्टी अपने स्टैंड पर कायम रहेगी। जरूरत पडऩे पर पार्टी केंद्र के रवैए के खिलाफ सड़कों पर भी उतर सकती है। इन छापों से सरकार की नीयत का खुलासा हो गया है। जबकि, संसदीय कार्य मामलों के मंत्री कमलनाथ ने सीबीआई की कार्रवाई पर गहरी नाराजगी दर्ज कराई है। उन्होंने सफाई दी है कि सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ सीबीआई का इस्तेमाल नहीं कर रही है। लेकिन, चेन्नई की घटना से गलतफहमी जरूर फैल सकती है। सरकार यह पता कराएगी कि आखिर यह सब कैसे हो गया?
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी इन छापों को एकदम दुर्भाग्यपूर्ण करार किया है। उन्होंने कहा है कि इस मामले की जांच कराई जाएगी। यह पता किया जाएगा कि किसके आदेश पर छापेमारी हुई है? प्रधानमंत्री के बयान के बाद भी सरकार की नीयत पर विपक्ष ने जमकर सवाल उछाले हैं। सरकार को समर्थन देने वाली मायावती ने भी यही कहा है कि कांग्रेस पहले से ही सीबीआई का राजनीतिक दुरुपयोग करती रही है। लेकिन, इस तरह का काम भाजपा नेतृत्व वाली सरकार के दौर में होता रहा है। वे खुद इसकी सबसे बड़ी भुक्तभोगी हैं।
डीएमके के 18 सांसदों का समर्थन हटने के बाद, सरकार अल्पमत में आ गई है। उसके पास महज 224 सांसदों की अपनी ताकत बची है। जबकि, 59 सांसद सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे हैं। इनमें 43 सपा और बसपा के ही हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती तो पूरी तौर पर सरकार के समर्थन में नजर आ रही हैं। लेकिन, सपा नेतृत्व ने राजनीतिक पैंतरेबाजी के दांव अभी से खेलने शुरू कर दिए हैं। कल यहां सपा संसदीय दल की बैठक हुई थी। इसमें मुलायम ने बेनी प्रकरण में सांसदों को जानकारी दी कि कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने हाथ जोड़कर खुद उनसे माफी मांग ली है। ऐसे में, बेनी वाले मामले में क्या करना चाहिए? इस पर कई सांसदों ने यही कहा कि उनके इस्तीफे का दबाव बढ़ाइए। लेकिन, बाद में तय हुआ कि इस मुद्दे को अब तूल देने की जरूरत नहीं है। सरकार का समर्थन अभी जारी रहेगा। उपयुक्त समय पर पार्टी जरूरी फैसला कर लेगी।
सपा नेतृत्व इस जमीनी हकीकत को समझ रहा है कि फिलहाल उसी के समर्थन पर सरकार अस्तित्व में है। ऐसे में, नए राजनीतिक समीकरणों का इंतजार करना चाहिए। क्योंकि, कांग्रेस के रणनीतिकार तृणमूल कांग्रेस सहित जदयू नेतृत्व से भी ‘मदद’ के लिए संपर्क साथ रहे हैं। आज संसद सत्र का मध्यावकाश हो जाएगा। बजट सत्र का अगला दौर 22 अप्रैल से शुरू होना है। सपा सुप्रीमो ने अपने सिपहसालारों से कह दिया है कि एक महीने के भीतर वे लोग अपनी अगली रणनीति के बारे में फैसला करेंगे। तब तक दूसरे सेक्यूलर दलों से संपर्क साधने की कोशिश जारी रहेगी। उल्लेखनीय है कि बुधवार को मुलायम सिंह ने एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार से मुलाकात की थी। इसको लेकर राजनीतिक कयासबाजी भी शुरू हो गई है।
तमिल मामले में श्रीलंका के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र में कल प्रस्ताव पास हो गया है। इसमें भारत ने श्रीलंका के खिलाफ वोट डाला है। लेकिन, डीएमके की मांग के अनुरूप भारत, अमेरिकी प्रस्तावों में संशोधन नहीं करा पाया। जबकि, डीएमके सुप्रीमो इसके लिए भारी दबाव बना रहे थे। संसद में श्रीलंका के खिलाफ प्रस्ताव पास करने के लिए भी राजनीतिक दलों में सहमति नहीं बन पाई। बुधवार को देर शाम सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। इसमें सपा, बसपा और तृणमूल कांग्रेस ने जोर देकर कह दिया कि द्रमुक और अन्नाद्रमुक के दबाव में श्रीलंका के खिलाफ निंदा प्रस्ताव नहीं पास किया जाना चाहिए।
सपा के वरिष्ठ सांसद रेवती रमण सिंह ने यह याद दिलाया कि 1962 में चीन के विरुद्ध हुए युद्ध के दौर में अकेले श्रीलंका ने ही भारत के पक्ष में खुलकर आवाज उठाई थी। जरूरत है कि इस दोस्ती की कद्र की जाए। तमिलों के खिलाफ वहां जो अत्याचार हुए हैं, इस मामले में किसी और तरीके से बात उठाई जाए। सपा ने प्रस्ताव के खिलाफ खुली हुंकार भरी, तो इस मामले में कोई फैसला नहीं हो पाया। ऐसे में, मनमोहन सरकार के लिए डीएमके को लेकर रही-सही दूर की गुंजाइश भी खत्म मानी जा रही है।

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