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न्याय की अपेक्षा अपराधियों के साथ सख्ती हो

संयुक्त राज्य अमेरिका के (आठवें सर्किट) अपील न्यायालय ने संयुक्त राज्य अमेरिका बनाम माईकल एंजिलो बर्मियो द्वारा दिनांक 16.06.11 को दायर अपील के निर्णय दिनांक 30.09.11 में कहा है कि फरवरी 2009 में एक 15 वर्षीय बालिका जे. ने स्कूल के अधिकारियों को सूचित किया कि उसके साथ माईकल बर्मियो, जो कि स्काउट टुकड़ी का नेता होते हुए वर्ष 2007 की गर्मियों में उसके परिवार के साथ रहा था, द्वारा ब्लात्संग किया गया है। अनुसंधान में बर्मियो के मोबाइल व कंप्यूटर पर जे. व उसकी 13 वर्षीय बहिन के कामुक चित्र और एक वयस्क पुरुष के साथ जे. के अश्लील चित्रों का विडियो पाए गए। 6यहाँ उल्लेखनीय है कि एक बालिका द्वारा अपने स्कूल प्रशासन को सूचित करने मात्र से मामला शुरू हो गया और आजीवन कारावास की सजा मिल गयी जबकि भारत में तो स्थिति यह है कि ऐसी सूचना देने पर पुलिस तो दूर मजिस्ट्रेट भी कार्यवाही में आनाकानी करते हैं अन्य विशेषता यह प्रकट होती है कि वहाँ के न्यायालय मामला दायर एवं निर्णय होने दोनों की तिथियाँ शीर्षक पर ही दे देते हैं जिससे प्रथम दृष्टया ही मामले में लगा समय ज्ञात हो जाता है व पारदर्शिता बनी रहती है जबकि भारत में तो पारदर्शिता से सर्वाधिक परहेज तो न्यायपालिका को ही है। उपभोक्ता संरक्षण कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि मामले के निर्णय में दायर एवं निर्णय की तिथि सूचित की जायेगी किन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं किया जा रहा है। अमेरिकन मामले का अन्य सुखद पहलू यह है कि इतने गंभीर मामले में भी अपील में निर्णय लगभग मात्र 105 दिन में हो गया जिसकी भारत में कल्पना ही नहीं की जा सकती क्योंकि यहाँ तो नोटिस की तामील के लिए प्रथम पेशी में ही 90 दिन से भी अधिक समय देने में भारत की न्यायपालिका को कोई संकोच नहीं होता है। मामले में आगे अनुसंधानकर्ताओं को ज्ञात हुआ कि बर्मियो ने जे. के साथ वर्ष 2007 के अंत से कामुक दुव्र्यवहार व प्रकृति विरुद्ध अपराध किया। बर्मियो ने आरोप स्वीकार कर लिए और उस पर बाल अश्लील चित्रण के सात अभियोग लगाये गए थे। बर्मियो की गिरफ़्तारी के बाद उसकी स्वयं की 12 वर्षीय पुत्री ओ. ने भी सूचित किया कि उसने उसका (पुत्री का) भी छ: वर्षों से नियमित रूप से, कामुक व प्रकृति विरुद्ध अपराध सहित, शोषण किया और जब बर्मियो ने जे. के साथ संसर्ग किया तब वह उपस्थित थीं।
प्रकरण में निचले विचारण (जिला) न्यायालय ने अवयस्कों के साथ बारम्बार और खतरनाक कामुक अपराधों के लिए आजीवान कारावास से दण्डित किया था। बर्मियो ने अपराध स्वीकार कर लिया किन्तु उसका तर्क था कि उसने अश्लील चित्रों को आगे प्रसारित नहीं किया अत: उसने परामर्शी दिशानिर्देशों (जो कि न्यायालय पर बाध्यकारी नहीं हैं) में इस अपराध के लिए विहित न्यूनतम 262 माह के कारावास की प्रार्थना की और दूसरी ओर सरकार ने अधिकतम 327 माह के कारावास की प्रार्थना की किन्तु अनुसंधान पक्ष ने एकाधिक पीडि़त व्यक्तियों का फार्मूला सुझाया और आजीवन कारावास की अनुशंसा की। 6भारत में न्यायपालिका के लिए विवेकाधिकार का स्वछन्द मैदान उपलब्ध है। यहाँ अधिकांश अपराधों में अधिकतम दण्ड की सीमाएं दी गयी हैं और न्यूनतम दण्ड निर्धारित न होने से, अपवित्र करणों से कानून की व्याख्याएं प्राय: अभियुक्तों के पक्ष में ही की जाती हैं। जहाँ कहीं न्यूनतम और अधिकतम सीमाएं हैं उनके मध्य अंतर भी काफी लंबा है अत: वे सीमाएं ही बेमानी हो जाती हैं। उक्त प्रकरण में न्यूनतम और अधिकतम दण्ड अवधि के बीच अंतर कम यानि 20त्न ही है जबकि भारत में यह अंतर 90त्न तक पाया जाता है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 55 के अनुसार भारत में आजीवन कारावास की प्रभावी अवधि 14 वर्ष मात्र है जबकि अमेरिका में यह अवधि 30 वर्ष निर्धारित है। अमेरिका में अभियोजन पक्ष -सरकार के अतिरिक्त अनुसन्धान एजेंसी एवं पीडि़त पक्षकार की स्वतंत्र भूमिकाएं हैं व न्यायालय अभियोजन की मांग से भी अधिक दण्ड दे सकता है। भारत में परम्परा यह है कि एक से अधिक अपराधों की स्थिति में अधिकतम दण्ड वाले अपराध की सीमा तक दण्ड देकर न्यायालय अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं और आदेश में यह उल्लेख कर दिया जाता है कि सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी जबकि उक्त अमेरिकी मामले में ऐसा नहीं करके बलात्संग के लिए निर्दिष्ट अधिकतम 327 माह के दण्ड से भी कठोर किन्तु अधिकतम 360 माह का दण्ड दिया गया है। अन्य उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि अमेरिका में (यु एस कोड धारा 920) कामुकता से संबंधित दुराचार व यौन हिंसा की सूची पर्याप्त लंबी व व्यापक है और अभद्र प्रदर्शन भी इस श्रेणी के अपराधों में आता है। इस प्रकार हमारी विधायिकाएं एवं न्यायपालिका दोनों ही अपराधियों के लिए ज्यादा अनुकूल हैं। अमेरिकी व्यवस्था के संबंध में अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि भारत में अधिकांश मामलों में न्यूनतम दण्ड सीमा न होने, कुछेक मामलों में न्यूनतम व अधिकतम सीमाओं में भारी अंतर होने और दण्ड के लिए स्पष्ट दिशानिर्देशों के अभाव में मनमानेपन को बढ़ावा मिलता है। इसके ठीक विपरीत अमेरिका एवं इंग्लैंड में दण्ड परिषद कार्यरत हैं जो कि दण्ड के लिए दिशानिर्देश निर्धारित करती हैं यद्यपि ये निर्देश न्यायालयों पर बाध्यकारी नहीं हैं किन्तु सामान्यतया इनका अनुसरण किया जाता है और विशेष परिस्थितियों व कारणों से ही न्यायालय इन दिशानिर्देशों से भिन्न सजा देते हैं। अपराध की गंभीरता को देखते हुए पीडिता जे. और उसका परिवार आजीवन कारावास के पक्ष में थे क्योंकि अन्य बच्चों को बोर्मियो से बचाने का यही एक मात्र रास्ता था। तदनुसार जिला न्यायालय ने उसे 360 माह के कारावास से दण्डित किया था। अपील में बोर्मियो की आपति यह रही कि जिला न्यायालय ने दण्डित करने में विवेकाधिकार का दुरूपयोग किया है। अपीलीय न्यायालय ने आगे विवेचना करते हुए कहा कि एक न्यायाधीश द्वारा विवेकाधिकार का दुरूपयोग तब कहा जाता है जब वह ऐसे सम्बंधित तथ्य का विचारण नहीं करता जो महत्वपूर्ण हो, अथवा असंबंधित या अनुचित तथ्य को महत्त्व दिया हो या महत्त्वपूर्ण तथ्यों को उचित महत्त्व देने में स्पष्ट गलती की हो। दण्ड देते समय विचारण न्यायालय ने दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत समस्त सामग्री एवं तर्कों पर ध्यान दिया है।
न्यायालय ने यह भी पाया कि उसने बोर्मियो के अपराध की गंभीरता और उससे समाज को उत्पन्न भयंकर खतरे का भी मूल्यांकन किया है। न्यायालय ने कहा कि आखिर हिंसा का चक्र कहीं रुकना चाहिए था किन्तु बोर्मियो तुमने तो तीन शिकार/पीडितों का शोषण किया है। बोर्मियो का यह तर्क था कि उसने अश्लील चित्रों का आगे वितरण नहीं किया अत: उसके साथ नरमी बरती जानी चाहिए किन्तु न्यायालय का यह दृष्टिकोण था कि इस बात की पूर्ति तो इस अपराध की गंभीरता व इस अति ने कर दी है कि पीडितों को हुई क्षति की कभी भी पूर्ति नहीं हो सकेगी। यह एक उपयुक्त मामला है जहाँ अधिकतम दण्ड देना बोर्मियो जैसे अपराधी के लिए उपयुक्त है। न्यायालय नहीं समझता कि इससे कम दण्ड देने से जनता सुरक्षित रह सकेगी अथवा वास्तव में इस असाधारण र्रोप से गंभीर अपराध के लिए कोई अन्य दण्ड पर्याप्त हो सकेगा।
पीडितों के साथ संबंधों का जिस प्रकार बोर्मियो ने नाजायज लाभ उठाया वह समाज के सामने भयावह दृश्य प्रस्तुत करता है और उसी अपराध की बारम्बरता को देखते हुए दण्ड पूर्णत: न्यायोचित और न्यायालय की शक्ति के भीतर है। इस प्रकार न्यायालय द्वारा विवेकाधिकार का कोई दुरूपयोग नहीं हुआ है और तदनुसार अपील ख़ारिज कर अधीनस्थ न्यायालय के दण्ड आदेश की पुष्टि कर दी गयी।

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