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खून का बदला खून-1

शांता कुमार
भारतवर्ष की राजनीति स्थिति दिन प्रतिदिन भयंकर व विस्फोटक बनती जा रही थी। ऐसी बात नही कि अपने साम्राज्य को चिरस्थायी बनाए रखने के लिए अंग्रेज इस स्थिति को शांत करने का विचार न करते हों। जहां दमन चक्र का प्रयोग करके अंग्रेजों ने देशभक्ति की उभरती कोपलों को मसला, वहां कई बार उसने अत्यंत गहरी कूटनीति का भी उपयोग किया। ब्रिटिश शासन समय समय पर इस साधन का उपयोग करता रहा था। 1884 में अंग्रेजी राज्य के एक दूरदर्शी शुभचिंतक डा. ह्यूम द्वारा कांग्रेस के निर्माण के पीछे भी यह भावना काम कर रही थी उस समय जनता की विस्फोटक विरोधी भावनाओं को एक रास्ता देने के लिए मंच की स्थापना कर दी गयी, ताकि लोग इकट्ठे होकर किसी सीमा तक अपने हृदय के गुबार निकाल लिया करें और कभी भी वह रूका हुआ शेष विस्फोट बनकर न फूट पड़े। 1926 में भी इसी प्रकार यहां के लोगों को कुछ शांत करने के लिए लंदन से एक कमीशन भेजा गया। उसके अध्यक्ष लंदन के एक प्रसिद्घ वकील श्री साइमन थे। उस कमीशन का उद्देश्य यह देखना था कि क्या भारत स्वराज्य के योग्य है अथवा नही?
भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस का इस कमीशन से कोई सैद्घांतिक मतभेद न था। उसका रोष इतना ही था कि लाख प्रार्थना करने के बाद भी सरकार ने कांग्रेस का कोई प्रतिनिधि इस कमीशन में सम्मिलित नही किया। अत: कांग्रेस ने इस कमीशन के विरोध की घोषणा कर दी। दूसरी ओर, क्रांतिकारी दल या अन्य हिंदू शक्तियों का दृष्टिकोण भिन्न था। उनका कहना था कि अंग्रेजी सरकार को हमारे भाग्य निर्णय का कोई अधिकार नही है। वे कमीशन भेजने वाले कौन होते हैं? इन दोनों प्रकार के चिंतन में मौलिक भेद स्पष्ट है। भारत की सभी संस्थाओं ने इस कमीशन का भेजा जाना, भारत के गौरव के प्रति अपमान समझा और उसका विरोध करने का निश्चय किया।
हिंदुस्तान प्रजातंत्र सेना के क्रांतिकारी वीरों ने इस कमीशन को बम द्वारा उड़ा देने की योजना बनाई। यह भी सोचा गया कि जिस गाड़ी में कमीशन यात्रा कर रहा है, उदसी को बम से उड़ाकर भारत की आत्मा के रोष को प्रकट किया जाए। इस कार्य के लिए कहते हैं, बंगाल के एक प्रसिद्घ क्रांतिकारी को विशेष रूप से बुलाया गया ताकि विश्व प्रभावित बम बनाए जा सकें। वह सज्जन बम बनाने में विशेषज्ञ था। परंतु इस इतने बड़े कार्य में जितने धन की आवश्यकता थी उतना धन जुटा सकतना संभव न हुआ। दल का एक सदस्य कैलाशपति उन दिनों गोरखपुर डाकखाने में नौकरी करता था। दल के लिए आर्थिक आवश्यकता का अनुभव करके एक दिन वह डाकखाने के 1800 रूपये लेकर भाग आया। उस पैसे से कुछ दिन काम चलाया गया, पर कमीशन उड़ाने की योजना के लिए यह धन पर्याप्त न था, अत: उस योजना को स्थगित कर देना पड़ा।
साइमन कमीशन सारे भारत में घूमता हुआ कहीं पर विरोध, कहीं पर स्वागत प्राप्त करते हुए 20 अक्टूबर 1926 को लाहौर पहुंचा। लाहौर में सब संस्थाओं की ओर से इस अपमानजनक कमीशन का विरोध करने के लिए प्रदर्शन की घोषणा की गयी थी। नौजवान भारत सभा इस मामले में सबसे आगे थी। सरकार ने प्रदर्शन को रोकने के लिए 144 धारा की घोषणा कर दी तो भी चारों ओर अपूर्व जोश था। कानों कान में यह बात सुनाई दे रही थी कि आज लाहौर में भी एक जलियांवाला बनने वाला है। पर युवकों का हृदय जुलूस आरंभ होने के स्थान ब्रेडला हॉल पहुंचने के लिए मचल रहा था।
ज्योंही कमीशन को लाने वाली गाड़ी स्टेशन पर पहुंची, साइमन वापस लाओ और वंदेमातरम के नारों से दिशाएं गूंज उठीं। जुलूस का नेतृत्व वयोवृद्घ नेता लाला लाजपतराय कर रहे थे। कड़कती धूप में अपने वृद्घ नेता की रक्षा करने के लिए नौजवान वृद्घ लालाजी पर छतरी से छाया किये हुए थे। जुलूस की भीड़ में धक्कों से उन्हें कोई हानि न पहुंचे, इसलिए कुछ नौजवान उन्हें चारों ओर से घेरे हुए थे। जुलूस में अपार भीड़ थी। लाहौर के इतिहास में इतना बड़ा जुलूस शायद कभी निकला हो। साइमन के विरोध में लगने वाले नारों से कान फटे जा रहे थे।
कमीशन को रास्ता देने के लिए पुलिस ने जुलूस को पीछे हटाना चाहा, पर लालाजी के पीछे इतनी अपार भीड़ इकट्ठी हो गयी थी कि पीछे हटना संभव ही न था। फिर नौजवान अपनी साइमन वापस जाओ की आवाज कमीशन के कानों तक पहुंचा देने के लिए कृत संकल्प थे। कुछ प्रसिद्घ क्रांतिकारी भगवतीचरण, सुखदेव तथा यशपाल वही लालाजी के पास उपस्थित थे। कमीशन को रास्ता मिलना कठिन हो गया।
जुलूस का जोश बढ़ता ही जा रहा था। आखिर पुलिस ने लाठी चार्ज करना आरंभ किया। कितने ही लोगों की हड्डियां चकनाचूर कर दी गयीं। फिर भी रास्ता न बनाया जा सका। पुलिस सुपरिण्टेंडेंट मि. स्कॉट की दृष्टि लालाजी पर पड़ी तो वह क्रोध से पागल सा हो गया। उसने उनके चारों ओरके नवयुवकों पर लाठी बरसाने की कड़ी आज्ञा दी। आदेश पाकर सांडर्स अपने हाथों में भी एक लाठी लेकर आगे बढ़ा। बस निर्दयता से लाठी प्रहार होने लगा। वृद्घ लालाजी की छाती पर उन दुष्टों की लाठियों के कठोर आघात होने लगे, पर यह नरवीर, साहस से छाती फुलाए उन्हें सहन कर रहा था। यह देख रायजादा हंसराज आगे बढ़े और लाठियां अपने ऊपर सहन करने लगे। सांडर्स की पहली लाठी से लालाजी के ऊपर की छतरी टूटकर नीचे गिर पड़ी और उनके कंधे व छाती व चोट आई। लाठियां जोर से बरसती देख वह गोरा ऑफिसर खिसकने लगा। लालाजी ने चोटों से मर्माहत होकर बड़े रोष से उसका नाम पूछा। पर वह घृणा से उधर देखता हुआ नाम बताये बिना चला गया। तो पास खड़े एक नवयुवक ने मन ही मन कहा, मत बता तू अपना नाम लेकिन एक दिन तेर नाम गली गली मारा मारा फिरेगा। परिस्थिति की गंभीरता का अनुभव कर लालाजी ने जुलूस को वापस जाने का आदेश दे दिया। क्रांतिकारी जुलूस के स्थगित किये जाने के पक्ष में न थे, पर जुलूस के नेता की आज्ञा माननी पड़ी।
उसके बाद जुलूस छोटे छोटे भागों में नगर के विभिन्न बाजारों में से होकर नारे लगाता हुआ गया। पुलिस जहां भी संभव हो सका, लाठियां बरसाईं, पापड़मंडी में यशपाल, भगवतीचरण व सुखदेव इस प्रकार के एक जुलूस के साथ चल रहे थे कि पुलिस के हाथ चढ़ गये। उन सबकी अच्छी पिटाई हुई।
उसी सांयकाल पुलिस के इन अत्याचारों के विरोध स्वरूप लाहौर के मोरी दरवाजे में एक विशाल सार्वजनिक सभा आयोजित की गयी। उस सभा में सभी नेताओं ने भाषण दिये।
प्रात: के प्रदर्शन में पुलिस की लाठियों से आहत भारतीयों के हृदय सम्राट लाजपतराय ने बड़ी मार्मिक भाषा में कुछ शब्द कहे। यह शब्द ऐतिहासिक बन गये, क्योंकि दुर्भाग्य से यह सार्वजनिक सभा तथा लालाजी का वह सार्वजनिक भाषण उनके जीवन की अंतिम घटनाएं बन गयीं। उन्होंने कहा जो सरकार निहत्थी प्रजा पर इस प्रकार के नृशंस आक्रमण करती है, उसे सभ्य सरकार भी नही कहा जा सकता।
याद रहे इस प्रकार की सरकार कभी भी कायम नही रह सकती। मैं आज चुनौती देता हूं कि मुझे पर पड़ने वाली हर लाठी का प्रत्येक प्रहार अंग्रेजी साम्राज्य के कफन में कील प्रमाणित होगा।
पास ही खड़े अंग्रेज डिप्टी सुपरिटेंडेंट नील को लक्ष्य कर लालाजी ने अपनी बात अंग्रेजी में दोहराई I declare that the blows struck at me will be the last nails in the coffin of the british rule in India. यह सुनकर साम्राज्य की मदहोशी में पागल नील ने एक घृणा सूचक व्यंग्य भरी हंसी हंसी।
क्रमश:

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