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स्वर्णिम इतिहास

शिवा काशिद का शिवाजी के लिए वह अमर बलिदान : जब 300 मराठों ने हरा दिया था मुगलों की एक लाख की फौज को

बात 1660 ईस्वी की है। जब शिवाजी महाराज पन्हाला किले में डेरा डाले पड़े थे । उनके बारे में यह जानकारी मिलने पर कि वह इस समय पन्हाला किले में हैं ,अली आदिलशाह ने अपनी एक सेना जनरल सिद्धि जौहर के नेतृत्व में शिवाजी को पकड़ने के लिए भेजी। सिद्धि जौहर ने पन्हाला किले को घेर लिया। मुस्लिमों की इस गहरा बनती को देख शिवाजी ने आधी रात को उस किले से निकल जाने का निर्णय लिया । शिवाजी के वीर मराठा साथियों ने 300 सैनिकों के साथ छत्रपति शिवाजी को कवर दिया , जिससे वे शेष सेना के साथ सुरक्षित निकल सके। पन्हाला का यह किला कोल्हापुर शहर के निकट था।
अफजल खान और प्रतापगढ़ में बीजापुरी सेना की पराजय के बाद से शिवाजी ने बीजापुरी क्षेत्र में मजबूत पकड़ बना रखी थी। कुछ दिनों के भीतर मराठों ने पन्हाला किले पर कब्जा कर लिया। इस बीच, नेताजी पालकर के नेतृत्व में एक और मराठा बल बीजापुर की ओर सीधे बढ़ा। शिवाजी, उनके कुछ कमांडरों और सैनिकों को पन्हाला किले से पीछे हटने के लिए विवश किया।

नेताजी पालकर ने बीजापुरी घेराबंदी को तोड़ने का बार-बार प्रयास किया, लेकिन वे विफल रहे। अंत में, एक बहुत दुस्साहसी योजना बनाई गई और कार्रवाई की गई। शिवाजी, बाजी प्रभु देशपांडे ने वीर सैनिकों की चुनी हुई टुकड़ी के साथ रात में घेराबंदी को तोड़ने और विशालगढ़ को बचाने का प्रयास किया। यहां पर शिवाजी महाराज के प्राणों को संकट खड़ा देख शिवा काशिद नाम के एक वीर मराठा ने अपने आपको बलिदान के लिए आगे कर दिया। उसने स्वेच्छा से राजा जैसे कपड़े पहने और स्वयं को पकड़वा लिया।
भारतीय इतिहास में ऐसे अनेकों अवसर आए हैं जब अपने स्वामी की रक्षा के लिए ऐसे वीर काशिदों ने अपने आपको सहर्ष बलिदान के लिए समर्पित कर दिया ।परंतु यहां गद्दारों का नाम तो ‘जयचंद’ के रूप में बार-बार लिया जाता है , पर वीर काशिद पर कोई शोध नहीं किया जाता और ना ही उनका नाम बार-बार लिया जाता है। कारण स्पष्ट है कि यदि वीर काशिद का नाम लिया जाएगा तो हमारा गौरवबोध जागेगा और जयचंद को बार-बार रटेंगे तो हमारे अंदर हीन भावना उत्पन्न होगी।
जैसा कि योजना बनाई गई थी, शिवा काशिद पकड़े गए और उन्हें बीजापुरी शिविर में ले जाया गया। वे चाहते ही थे कि शिवाजी की जान बचाने के लिए उन्हें पकड़ लिया जाए। इस बलिदान ने पीछे हटते मराठा बल को कुछ साँस लेने का अवसर दिया। शिवा काशिद एक नाई थे। उनकी शक्ल शिवाजी से मिलती थी। उनके बलिदान से मराठा साम्राज्य व पूरा भारत कृतज्ञ हुआ और छत्रपति वहाँ से सुरक्षित निकलने में सफल रहे। तनिक कल्पना कीजिए , यदि वीर काशिद न् होते और 1660 में वह शिवाजी को नहीं बचा पाते तो क्या 1674 में शिवाजी हिंदवी स्वराज्य स्थापित कर पाते ? और क्या फिर उनके वंशज आगे चलकर मुगल साम्राज्य को उखाड़ फेंकने में सफल हो पाते ? उत्तर है बिल्कुल नहीं । तब वीर काशिद ने अपना बलिदान देकर मां भारती पर कितना बड़ा उपकार किया ? यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
जैसे ही बीजापुरी बल को अपनी गलती का एहसास हुआ उन्होंने फिर से पीछा करना शुरू कर दिया। उनका नेतृत्व सिद्धि जौहर का दामाद सिद्धि मसूद कर रहा था। घोड़खिंड (घोड़े का दर्रा) के पास मराठों ने एक अंतिम रुख अपनाया। शिवाजी और मराठा सेना के आधे लोगों को विशालगढ़ के लिए भेज दिया, जबकि बाजी प्रभु, उनके भाई फूलजी और लगभग 300 आदमियों ने मार्ग को अवरुद्ध कर दिया। 18 घंटे से अधिक समय तक घोषदंड दर्रे में 10,000 बीजापुरी सैनिकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी।
कई गाथाएँ इस दुस्साहस भरी कार्रवाई के दौरान मराठों द्वारा प्रदर्शित वीरता के कार्यों का वर्णन करती हैं। बाजी प्रभु को “दंड पट्ट” नामक एक हथियार का उपयोग करने की कला में महारत हासिल थी। गंभीर रूप से घायल होने के वाले बाजी प्रभु ने लड़ाई जारी रखी। अपने लोगों को तब तक लड़ते रहने के लिए प्रेरित किया जब तक कि शिवाजी ने विशालागढ़ सुरक्षित रूप से पहुॅंचने का संकेत तीन तोपों से गोलाबारी कर नहीं दिया। यहॉं यह जानना आवश्यक है कि जब शिवाजी ने 300 लोगों के साथ विशालगढ़ का रुख किया था तो किला पहले से ही सूर्यपुरा सुर्वे और जसवंतराव दलवी नाम के बीजापुरी सरदारों के घेरे में था। शिवाजी को अपने 300 वीर सैनिकों के साथ किले तक पहुँचने के लिए सुर्वे को हराना पड़ा।
शिवाजी ने कुछ मवाले सैनिकों के साथ उबरखिंद की लड़ाई में शाहिस्ता खान के एक सरदार कलतल्फ खान को हराया। औरंगजेब ने अपने मामा शाहिस्ता खान को बादीबागम साहिबा, आदिशाही सल्तनत के अनुरोध पर 1,50,000 से अधिक शक्तिशाली सेना के साथ भेजा। अप्रैल 1663 में छत्रपति शिवाजी ने व्यक्तिगत रूप से लाल महल पुणे में शाहिस्ता खान पर आश्चर्यजनक हमला किया। ख़ान के बेटे मारे गए और मुग़ल भाग खड़े हुए।
छत्रपति शिवाजी ने आधी रात को 300 सैनिकों के साथ हमला किया, जबकि लालमहल में शाहिस्ता खान के लिए 1,00,000 सैनिकों की कड़ी सुरक्षा थी। इस घटना में छत्रपति शिवाजी ने शाहिस्ता खान के विरुद्ध विश्व ज्ञात इतिहास में संभवतः पहली बार किसी कमांडो कार्रवाई का प्रदर्शन किया। यदि कहीं किसी युद्ध क्षेत्र में भारतीयों के हारने का इतिहास है तो इतिहास यह भी है कि जब 300 सैनिकों ने 100000 सैनिकों को हराया । सचमुच दोनों दलों के बीच जमीन आसमान का अंतर था । वास्तव में भारत का पुनरुज्जीवी पराक्रम देखने के लिए उन 300 सैनिकों के इस दुस्साहस भरे कार्य को बार-बार दोहराना व समझना ही पड़ेगा । तभी पता चलेगा कि भारत आज भारत क्यों है ? क्यों वह एक जीवंत राष्ट्र है और क्यों वह अपने आप को सभ्यताओं के संघर्ष में बचाए रखने में सफल हुआ है ?

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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