पिछले दिनों अमेरिका का बोस्टन और भारत का बंगलौर आतंकी घटनाओं से दहलाए गये हैं। कई टिप्पणीकारों या समाचार पत्रों ने अमेरिका के बोस्टन में घटी आतंकी घटना पर कहा है कि अमेरिका में आतंकवाद फिर लौटा। मुझे टिप्पणीकारों की ऐसी टिप्पणियों पर तरस आता है। क्योंकि ऐसी बातें करना अपनी बुद्घिहीनता का ही परिचय देना होता है। ऐसे टिप्पणीकारों को इतिहास पढ़ना चाहिए और दुनिया के ज्ञात इतिहास में सीजर से लेकर नेपोलियन बोनापार्ट और नैपोलियन हिटलर से लेकर स्टालिन, मुसोलिनी, गद्दाफी और सद्दाम हुसैन जैसे क्रूर तानाशाहों के इतिहास को पढ़ना चाहिए। लोगों ने हर क्रूर तानाशाह के जाने के पश्चात भ्रांति पाली कि अब विश्व अमन से रहेगाaatankvad परंतु परिणाम में हमेशा ‘बोस्टन और बंगलौर’ ही मिले हैं। जब ओसामा बिन लादेन मारा गया और भारत में अफजल गुरू को फांसी हुई तो इतिहास की क्रूर परिणतियों से अनभिज्ञ लोगों ने उस समय भी अपने अपने निष्कर्ष निकाले और कहा कि अब विश्व से आतंकवाद समाप्त हो गया है, या हो जाएगा। हमने तब भी लिखा था कि सावधान रहो-क्योंकि आतंकवाद की सोच आज भी जिंदा है, जो लोग मारे गये हैं या फांसी चढ़ गये हैं, वो तो स्वयं ही आतंकवाद की जिंदा सोच की भेंट चढ़ गये हैं। अत: जब तक वो सोच जिंदा है जो मानवता को मानवता बनाम दानवता में विभाजित करती है तब तक किसी गफलत में रहने की आवश्यकता नही है। वास्तव में सच यही है कि आतंकवाद विश्व से कहीं नही गया था, वह यहीं था और अब बोस्टन और बंगलौर में प्रकट होकर उसने अपने अस्तित्व की अनुभूति करायी है कि सावधान रहो और कतई भी मत सोचो कि मैं संसार को तुम्हारे रहमोकरम पर छोड़कर कहीं चला गया हूं? आतंक की समाप्ति की घोषणा करने वाले लोगों को विश्व समाज में अपनी गलत धारणाओं से असावधानी फैलाने की समाज विरोधी सोच से बाज आना चाहिए। विश्व के लिए यद्यपि ये आवश्यक रहा है और रहेगा भी कि विश्व के अधिकांश लोग समाज में शांति चाहते हैं, एक सुंदर और अनुकरणीय व्यवस्था चाहते हैं, परंतु मजहबी शिक्षा से घृणा की फसल तैयार करने वाले लोग विश्व में शांति उत्पन्न नही होने देते हैं। इसके लिए हमें दम्मान स्थित लेखक तुर्की अल हम्मद के इन शब्दों पर ध्यान देना चाहिए -‘तीन दशक से मस्जिदों व मदरसों में जो शिक्षा दी जाती रही है वो मजहबी है और उससे लड़ना आसान नही है। समस्या तो दिमाग में है, सोचने की शैली में है’। इसी प्रकार सउदी अंग्रेजी समाचार पत्र के ‘द सऊदी गजट’ के स्तंभ लेखक डा. मुहम्मद तलाल अल राशिद ने तो और भी स्पष्टï लिखा है-‘आतंकवाद के राक्षसों को हमने ही पाला है, अकेले हम ही उसके लिए जिम्मेदार हैं। मैंने पहले भी यह कहा है और आगे भी कहता रहूंगा, कि समस्या हम हैं, अमेरिका नही। न तो उत्तरी धु्रव पर रहने वाले पैग्विन या अफगानिस्तान की गुफाओं में रहने वाले कोई अन्य। समस्या हम हैं और वे लोग भी जो इस सच्चाई को देख नही रहे हैं।'(30 नवंबर 2003) विश्व को साम्प्रदायिक आधार पर ‘खूनी दरिया’ में परिवर्तित करना जिहाद की खतरनाक मानसिकता का अंतिम उद्देश्य रहा है। भारत ने इस प्रकार के आतंकवाद को 712 में हुए मुहम्मद बिन कासिम के हमले से लेकर आज तक झेला है। यद्यपि कलम के साथ धृष्टता और अन्याय करने वाले कम्युनिस्ट इतिहास लेखकों ने औरंगजेब जैसे अनगिनत क्रूर मुस्लिम बादशाहों  के कृत्यों को और जिहादी सोच को राजनीतिक कृत्य बताकर पाप को पुण्य बनाने का अव्यावहारिक, अतार्किक और बुद्घिहीन प्रयास किया है किंतु सच तो फिर भी सच है। उसे नकारा नही जा सकता। और उस सच को जो जिहाद के माध्यम से इस्लामिक परचम को विश्व में लहराना अपना महान उद्देश्य मानता था और मानते भी रहना चाहिए (इसके लिए चाहे जितना खून बहाया जाए इसकी परवाह नही) उसे इकबाल ने बड़ी दिलेरी और साफगोई से यूं पेश किया है:-

तू (खुदा) ही कह दे कि उखाड़ा दरे खैबर किसने?

शहर कैसर का जो था किया सर किसने?

तोड़े मखलूके खुदाबंद के पैकर किसने?

काटकर रख दिये कुफ्फार लश्कर किसने?

किसने ठंडा किया आतशकद-ए-ईरां को?

किसने फिर जिंदा किया ताज्जिरे यजदां को?

तुझको छोड़ा कि रसूले अरबी को छोड़ा?

बुतारी पेश किया बुतशिकनी को छोड़ा?

अर्थात खुदा के अरबी संदेशवाहक (रसूल मुहम्मद) के नाम पर पूरी दुनिया के दूसरे मजहबों और उन्हें मानने वालों को मिटाने के लिए मुसलमानों ने खूनी ताकत का प्रयोग किया। यूरोप में सीजर का शहर उजाड़ा। अफ्रीका एशिया में देवी देवताओं के असंख्य मंदिर और मूर्तियों को तोड़ा। ईरान में पारसियों की पवित्र आग बुझा डाली। मंदिरों की मूर्तियों के सिर गिराकर डरकर अल्लाह की सत्ता स्वीकारते थे,

‘किसी की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थे

मुंह के बल गिर के हुवल्ला- हो – अहद करते थे।’

इकबाल का मानना था कि मुस्लिमों ने और उनके बादशाहों ने ये सब कुछ अपने लिए नही किया था अपितु इसलाम की सेवा के लिए किया था। इकबाल कहता है–

थी न कुछ तेगजनी अपनी हुकूमत के लिए

सर बकफ फिरते थे क्या शहर में दौलत के लिए?

कौम अपनी जो जरोमा ने जहां पै मरती।

बुत फरोसी की एवज बुत शिकनी क्यों करती?

जो कम्युनिस्ट इतिहासकार मुस्लिम बादशाहों की क्रूरताओं को केवल राजनीतिक कृत्य कहकर महिमामंडित करते रहे उनके मुंह पर इकबाल की उपरोक्त पंक्तियां करारा तमाचा हैं। इकबाल ने ये पंक्तियां अपनी शिकवा नामक पुस्तक में लिखीं और उसका अंत उसने इस प्रकार किया-

मुश्किलें उम्मते मरहूम की आसां कर दे,

हिंद के दैर नशीनों को मुसलमां कर दे।

अर्थात मंदिर जाने वाले भारतीयों को मुसलमान बना दे। यह पुस्तक इकबाल ने 1909 में लिखी थी। अब जिन लोगों ने आतंकवाद का इस्लाम से कोई वास्ता न होने का राग छेड़ रखा है-वो अधिक दूर के इतिहास को छोड़ दें और केवल 1909 से 2009 के एक शताब्दी के इतिहास पर ही अपना ध्यान केन्द्रित कर लें, तो उन्हें ज्ञात हो जाएगा कि जो सोच 1909 में थी वही 2009 में इस्लाम के पैरोकारों की रही है। उसमें कोई परिवर्तन नही आया। इकबाल भी अपने समय में यकायक शिकवा को लिखने के लिए तैयार नही हो गये होंगे उन्हें भी इसके लिए मसाला पिछली पीढ़ियों से ही मिला था और वो पिछली पीढ़ियां कुरान शरीफ की कुछ शरीफ आयतों से प्रेरित रही थीं। इसीलिए वरिष्ठ राजनायिक और विद्वान लेखक एम.आर.ए. बंग ने अपनी पुस्तक ‘द मुस्लिम डिलेमा इन इंडिया’ (1974) में बड़ी गंभीरता से लिखा है-‘अंतिम विश्लेषण में न तो कुरान और ना ही मुहम्मद ने मानवतावाद यहां तक कि मुसलमानों और गैर मुसलमानों के बीच सह अस्तित्व की भी बात की थी। इस्लाम अपने तमाम सरंजाम के साथ केवल इसी रूप में कल्पित किया गया था कि यह दूसरे सभी धर्मों का नाश कर देगा। इस रूप में इस्लाम की कभी परिकल्पना ही नही की गयी थी कि जो इसके अनुयायियों को भारत या किसी देश में लोकप्रिय बना सके जहां मुसलमान अल्पसंख्यक हों। इसी से इस बात की व्याख्या भी होती कि क्यों किसी देश में सैक्यूलर संविधान नही हो सकता, जहां मुसलमान बहुमत में है और क्यों अपने मजहब का पालन करने वाला मुसलमान मानवता वादी नही हो सकता’ जिहादी आतंकवाद की शक्ति स्रोत और भूमिका दुनिया से सारे मजहबों को और उनके अनुयायियों को मिटा देने की रही है। जैसा कि अयातुल्ला खुमैनी ने एक बार कहा था-‘जिहाद का अर्थ सभी गैर मुस्लिम धरती को जीत लेना है। वैसा युद्घ एक सच्ची इस्लामी सरकार बनने के बाद इस्लामी  इमाम के निर्देश या उसके आदेश पर घोषित किया जा सकता है। अत: सभी स्वस्थ पुरूषों का कर्त्तव्य होगा कि वे इस जीत के लिए लड़े जाने वाले युद्घ के स्वयंसेवक बनें, जिसका अंतिम लक्ष्य है इस धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक कुरान के कानून को सत्ताधारी बनाना।’ बस यही वह सोच है जिसके कारण जिहादी आतंकवाद हमें अल्जीरिया, ऑस्टे्रलिया, इटली, इंडोनेशिया, ईरान, कम्पूचिया, चीन, जर्मनी, डेनमार्क, तुर्की, थाईलैंड, नाइजीरिया, पाकिस्तान, फ्रांस, बांगलादेश, भारत, ब्रिटेन, मलेशिया, स्पेन से चलकर अमेरिका और अमेरिका से चलकर सïऊदी अरब तक में किसी न किसी रूप में दीखता रहता है। आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है, इसमें दो राय नही है। परंतु हमें इसे इस दृष्टिकोण से सोचने या देखने ही नही दिया गया है। इसे क्षेत्रीय और देशीय समस्या सिद्घ करने का प्रयास किया गया है और सच को कुतर्कों की छैनी से काटने का बेतुका प्रयास किया गया है। सच की तरफ देखने को निषिद्घ किया गया है और झूठों के ढेर में सच को दबा दिया गया है। इसलिए एमआरए बेग जैसे लेखक और मनीषी लोगों की बातों को भी ‘बिगड़े दिमागों’ की उपज कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। जो लोग अमेरिका में बोस्टन में हुए आतंकी हमले को अमेरिका में फिर लौटा आतंकवाद कहकर अभिहित कर कर रहे हैं वो झूठों के ढेर में सच को दबाने के परिवेश की पैदाइश हैं। दुर्भाग्य से उनका कब्जा इस समय मीडिया पर है, इसलिए लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के कालमों में ये बहकी हुई और बचकानी टिप्पणियां पढ़ने को हमें मिलती रहती हैं। हमारी आपकी सबकी एक महान जिम्मेदारी है-संपूर्णता के साथ समग्र मानवता का विकास करना। हमें मानवतावाद अपंग या लंगड़ी लूली नही चाहिए। संसार के कथित अशिक्षित, असभ्य, दलित, शोषित,उपेक्षित, पीड़ित और ‘काफिर समाज’ को खत्म करने का अर्थ होगा दुनिया में शमशान की शांति कायम करना जो लोग इस प्रकार की शांति को लाने का प्रयास कर रहे हैं, उनके प्रयास तो दीवार पर लिखे की भांति स्पष्टï पढ़ने में आ रहे हैं, परंतु विश्व की सज्जन शक्ति इसका विरोध क्यों नही कर रही है, वह हर बार ‘बोस्टन और बंगलौर’ के शहीदों के लिए दो मिनट का मौन रखकर शांत क्यों हो जाती है? क्या इससे आगे उसकी कोई जिम्मेदारी नही है? जिम्मेदारियों के मानदण्ड स्थापित करने के लिए निश्चय ही संपूर्ण विश्व को एक ही रणनीति पर कार्य करना होगा। तभी आतंकवाद का सफाया संभव है।

-राकेश कुमार आर्य

(संपादक उगता भारत)

Comment:

betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
kolaybet
betgaranti
betpark
kolaybet
betpark
betpark
casibom giriş
casibom giriş
casibom
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
betpark
betpark
kolaybet giriş
betpark
betpark
betgaranti
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
betpark
kolaybet
kolaybet
vaycasino
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet
bettilt giriş
bettilt giriş
harbiwin giriş
harbiwin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betbox giriş
betbox giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
Hitbet giriş
xbahis
xbahis
vaycasino
vaycasino