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राजनीति

हम और हमारे लोकतंत्र की दिशा क्या ठीक है?

मनीराम शर्मा
जापान के संविधान के अनुच्छेद 35 में आगे प्रावधान है कि समस्त लोगों का अपने घरों में, कागजात और सामान का प्रवेश, तलाशी और जब्ती के प्रति सुरक्षित रहने के अधिकार का पर्याप्त कारण और विशेष रूप से तलाशी के स्थान और तलाशी की वस्तुओं का उल्लेख सहित जारी वारंट या अनुच्छेद 33 में प्रावधान के अतिरिक्त अतिक्रमण नहीं किया जायेगा। प्रत्येक तलाशी या जब्ती सक्षम न्यायिक अधिकारी द्वारा अलग अलग जारी वारंट से की जायेगी। किसी भी लोक अधिकारी द्वारा यातना और निर्दयी दण्ड पूर्णतया मना है। भारत में पुलिस यातनाएं एक सामान्य बात है और यातनाओं से अपराधी से जुर्म आदि कबुलाना भारतीय आपराधिक न्यायतंत्र का अभिन्न अंग है प्रत्येक आपराधिक मामले में अभियुक्त को निष्पक्ष ट्राइब्यूनल द्वारा त्वरित व सार्वजानिक विचारण का अधिकार है। भारत में तो ऐसे प्रावधान का नितांत अभाव है और अपराध के लिए निर्धारित दण्ड से अधिक अवधि तक कारागार में रहने के बावजूद विचारण पूर्ण नहीं होता। उसे समस्त गवाहों की परीक्षा हेतु पूर्ण अवसर दिया जायेगा और उसे सार्वजनिक व्यय पर अनिवार्य प्रक्रिया से समस्त गवाहों को आहूत करने का अधिकार होगा। अभियुक्त हमेशा सक्षम परामर्शी की सहायता ले सकेगा , यदि अभियुक्त अपने प्रयासों से यह प्राप्त नहीं कर सके तो राज्य द्वारा उपलब्ध करवाया जायेगा।
किसी भी व्यक्ति को स्वयं के विरुद्ध गवाही देने के लिए विवश नहीं किया जायेगा। यातना, धमकी, लंबी गिरफ़्तारी या बंदीकरण, विवशता से प्राप्त दोष संस्वीकृति साक्ष्य में ग्राह्य नहीं होगी। मात्र स्वयं की संस्वीकृति के प्रमाण के आधार पर किसी भी व्यक्ति को दोषसिद्ध या दण्डित नहीं किया जायेगा। अनुच्छेद 40 में आगे प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति जिसे गिरफ्तार करने या निरुद्ध करने के पश्चात दोषमुक्त कर दिया गया हो विधि के प्रावधानों के अनुसार प्रतितोष के लिए राज्य पर वाद ला सकेगा। [भारत में ऐसे प्रावधानों का नितांत अभाव है जिससे पुलिस का आचरण स्वछन्द है। अनुच्छेद 41 में आगे प्रावधान है कि डाईट (संसद) राज्य शक्ति का सर्वोच्च अंग होगी, और राज्य का विधि बनाने वाला एकमात्र अंग होगी। जब प्रतिनिधि (लोक) सभा भंग की जाये तो भंग किये जाने के 40 दिन के भीतर उसके सदस्यों के लिए आम चुनाव होंगे, और संसद की सभा चुनाव के 30 दिवस के भीतर संपन्न होगी। संसद, दोनों सदनों के सदस्यों में से, एक महाभियोग न्यायालय स्थापित करेगी जो उन न्यायाधीशों का विचारण करेगी जिन्हें हटाने के लिए प्रक्रिया प्रारंभ की गयी है। [भारत में न्यायपालिका नियंत्रणहीन घोड़े के समान कार्य करती है। स्वतंत्र भारत के 64 वर्ष के इतिहास में न्यायिक भ्रष्टाचार के कई मामले गुंजायमान होने पर भी आज तक एक न्यायाधीश पर भी महाभियोग की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो सकी है जबकि जापान में महाभियोग न्यायालय सदन का एक स्थायी अंग है। अनुच्छेद 76 में आगे कहा गया है कि समस्त न्यायिक शक्तियाँ एक सर्वोच्च न्यायालय और विधि द्वारा स्थापित अधीनस्थ न्यायालयों में निहित होंगी। न तो कोई विशेष ट्राइब्यूनल बनाया जायेगा और न ही किसी कार्यपालक एजेंसी या अंग को अंतिम न्यायिक शक्ति दी जायेगी। [भारत में न्यायिक न्यायालयों से ज्यादा संख्या में ट्राइब्यूनल्स कार्यरत हैं और इस प्रकार न्यायिक क्षेत्र में राज्य कार्यपालकों का हस्तक्षेप दिनों दिन बढ़ रहा है जिसे न्यायालयों का भी मूक समर्थन प्राप्त है। समस्त न्यायाधीश अपनी अंतरात्मा के प्रयोग में स्वतंत्र होंगे और मात्र इस संविधान व कानूनों से बाध्य होंगे। अनुच्छेद 79 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) में एक मुख्य न्यायाधीश और विधि द्वारा निर्धारित संख्या में न्यायाधीश होंगे, मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर ऐसे समस्त न्यायाधीश मंत्रिमंडल द्वारा नियुक्त किये जायेंगे। सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों की नियुक्ति उनकी नियुक्ति के बाद प्रथम आम चुनाव में लोगों द्वरा समीक्षा की जायेगी, और दस वर्ष के बाद संपन्न प्रथम चुनाव में पुन: समीक्षा की जायेगी और इसी प्रकार उसके बाद भी। इस पुनरीक्षा में यदि मतदाताओं का बहुमत, पूर्वोक्त पैरा में उल्लेखित मामले में, यदि एक न्यायाधीश की बर्खास्तगी के पक्ष में है तो उसे बर्खास्त कर दिया जायेगा। इतिहास साक्षी है कि भारत में सरकार को तो अपदस्थ किया जा सकता है किन्तु न्यायाधीश को नहीं।
निचले न्यायालयों के न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट द्वारा नामित न्यायाधीशों की सूची में से मंत्री मंडल द्वरा नियुक्त किये जायेंगे। ऐसे समस्त न्यायाधीश पुन: नियुक्त के विशेषाधिकार सहित 10 वर्ष के लिए पद धारण करेंगे। [भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश की राय बाध्यकारी है। न्यायाधीश पद पर नियुक्ति होने बाद सेवानिवृति की आयु पूर्ण करने तक की लगभग गारंटी है। भारतीय लोक तंत्र के पास अवांछनीय न्यायाधीशों को सहन करने अतिरिक्त व्यवहार में कोई विकल्प नहीं है। सुप्रीम कोर्ट कानून, आदेश, विनियम या शासकीय कृत्य की संवैधानिकता के निर्धारण की अंतिम शक्ति रखेगा। अनुच्छेद 82 में यह विशेष प्रावधान है कि राजनैतिक अपराधों, प्रेस से सम्बंधित अपराधों या लोगों को गारंटीकृत अधिकारों से सम्बंधित मामलों की अन्वीक्षा हमेशा सार्वजानिक रूप में होगी।
उक्त विवरण से सपष्ट है कि जापानी लोगों का देश के प्रति समर्पण है और वे उच्च नैतिकता वाले हैं अत: वे शर्मनाक कार्य को सहन नहीं कर सकते। यही कारण है कि विश्व में जनसँख्या के अनुपात में सर्वाधिक आत्महत्याएं जापान में ही होती हैं। दूसरी और देखें तो यह भी सपष्ट है कि भारतीय एवं जापानी संविधान लगभग समकालीन ही हैं किन्तु हमारा संविधान तो एक स्थिर और जीवित मात्र दस्तावेज है और जापानी संविधान विकासशील राष्ट्र का दर्पण है। आज हमारी प्रतिव्यक्ति आय मात्र 35000 रुपये प्रतिवर्ष है जबकि हमारे पास विस्तृत कृषि योग्य भूभाग और समृद्ध वन, जल स्रोत व खनिज सम्पदा है किन्तु जापान में प्रति व्यक्ति आय रुपये 2200000 प्रतिवर्ष है। उनके पास मात्र 1/6 भाग ही कृषि योग्य है शेष भाग पठारी और पहाड़ी है जिसमें भी लगातार भूकंप एवं ज्वालमुखी जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा मंडराता रहता है। उचित नियोजन के अभाव में भारत आज बाढ़ व अकाल दोनों से एकसाथ पीड़ित है।
हमारे नेतृत्व द्वारा भारतीय संविधान की भूरी भूरी प्रशंसा की जाती है और कहा जाता है कि हमारा संविधान विश्व के श्रेष्ठ संविधानों में से एक है। वास्तविकता क्या है यह निर्णय विद्वान पाठकों के विवेक पर छोडते हुए लेख है कि मेरी सम्मति में तो हमारा संविधान कोई मौलिक कृति न होकर भारत सरकार अधिनयम,1935 का प्रतिरूप मात्र है। अब हमें जागना है, अन्य प्रगतशील राष्ट्रों के संविधानों से हमारे संविधान की तुलना करनी है और हमारे संविधान का सामन्तशाही कलेवर बदलकर इसे समसामयिक और जनतांत्रिक रूप देना है।

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