महाभारत की खोज में बड़ी सफलता , वैदिक सभ्यता के मिले प्रमाण

इतिहास का यह एक कटु सत्य है कि वैदिक सभ्यता संस्कृति ही संसार की सबसे प्राचीन और प्रमाणिक सभ्यता और संस्कृति है ।
जब थे दिगंबर रूप में वे जंगलों में थे घूमते ।
प्रासाद के तोरण हमारे चंद्र को थे चूमते ।।
जयशंकर प्रसाद जी ने यह पंक्तियां यूं ही नहीं कह दी होंगी ? बहुत बड़े अध्ययन के पश्चात उन्होंने पश्चिमी जगत को भारत के समक्ष बौना सिद्ध किया होगा ।
परंतु इस सबके उपरांत भी भारतवर्ष में ही ऐसे इतिहास लेखन की एक बड़ी संख्या है जो भारत को सभ्यता और संस्कृति के क्षेत्र में भी संसार के अन्य देशों के लिए अपेक्षा पिछड़ा हुआ अनुभव करते हैं और ऐसा ही सिद्ध करने का प्रयास भी करते हैं।
परन्तु अब उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले के सनौली गाँव में मिले अवशेषों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। यहाँ मिले रथों और दूसरे सामान की कार्बन डेटिंग से पुष्टि हुई है कि ये 3800 वर्ष पुराने हैं। यह समय ईसा से लगभग 2000 साल पहले का है। ज्ञात रहे कि बागपत , सोनीपत , कुरुक्षेत्र और मेरठ क्षेत्र महाभारत से जुड़ी घटनाओं के लिए प्रसिद्ध रहा है ।

महाभारत को हमारे देश के कुछ इतिहास लेखकों ने एक काल्पनिक घटना माना है और महाभारत जैसे ऐतिहासिक ग्रंथ को उपन्यास सिद्ध करने का प्रयास किया है । जिसे कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों के अपवित्र गठबंधन ने सत्य स्वीकार करने का काम किया है । फलस्वरुप इतिहास संबंधी शोध और अनुसंधान को देश में लगभग रोक दिया गया और बनी बनाई कल्पनिक अवधारणाओं के आधार पर इतिहास को लिखने या प्रस्तुत करने का काम किया गया।
कुछ समय पूर्व सनौली गाँव में एक समाधि स्थल पाया गया था। इस जगह पर 126 लोगों को दफ़नाए जाने के निशान मिले हैं। इनमें कुछ भूमिगत चेंबर जैसी जगहें भी हैं।

इसके अलावा ताबूत जैसी कुछ आकृतियाँ भी निकली हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि शवों को इनमें रखा जाता रहा होगा। इन ताबूतों पर सजावट और नक़्क़ाशी के भी निशान पाए गए। शवों के साथ चावल की पोटली भी दफनाए जाने की बात पाई गई है। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) ने यह पुष्टि की है कि ये सारे अवशेष किसी स्थानीय मूल के ही लड़ाकू समुदाय से जुड़े हो सकते हैं। वास्तव में कार्बन डेटिंग के निष्कर्ष का जो सबसे बड़ा अर्थ है वह यह कि पूरी खोज का कालक्रम महाभारत काल से जुड़ रहा है। माना जाता है कि करीब 5000 वर्ष पहले महाभारत का युद्ध हुआ था। कार्बन डेटिंग के हिसाब से यह उसके बहुत निकट है। बागपत का ये पूरा क्षेत्र उस जगह के बहुत निकट है जिसे महाभारत काल की राजधानी हस्तिनापुर के नाम से जाना जाता है।
इस प्रकार की खोजों से अब नेहरू जी द्वारा बनाई गई इस काल्पनिक धारणा को भी समाप्त करने में सहायता मिलेगी कि आर्य विदेशी थे और :–

सर जमीन ए हिंद पर अखलाक ए आवामे फिराक। काफिले आते गए और हिंदुस्ता बनता गया ।।

जितना ही हम अधिक इतिहास संबंधी खोजों की ओर ध्यान देंगे उतना ही हमें अपने अतीत के गौरवपूर्ण पृष्ठों की जानकारी मिलेगी । आज सोनभद्र में सोना मिल रहा है तो अपने ऋषि पूर्वजों के इस वैज्ञानिक चिंतन पर भी विचार करने की आवश्यकता है कि उन्होंने सोनभद्र को अर्थात जहां सोना मिलता है , उसे सोनभद्र ही क्यों कहा ?

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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