Categories
प्रमुख समाचार/संपादकीय

अंग्रेजी भाषा की दयनीय स्थिति

वर्णों की न्यूनता के कारण अन्य भाषाओं की बड़ी दयनीय स्थिति है। अंग्रेजी में ‘a’ अक्षर Fan में ‘ऐ’ की तो name में ‘ए’ की आवाज निकालता yoहै। जबकि ten में e ‘ए’ बनाती है। इसी प्रकार e कहीं चुप रही है जैसे simple शब्द में है, तो कहीं ये ‘ई’ की आवाज भी बनाती है, जैसे Geo (जियो) कहीं  g ग होती है तो कहीं ये ‘ज’ होती है जैसे go, gate, और geo  व gentleman इत्यादि। अंग्रेजी को हम समझ लें, अथवा जान लें ये एक अलग बात है, जबकि अंग्रेजी हमें भी जान ले, ये एक अलग बात है हमने अंग्रेजी को इसलिए अपनाया है कि वह कभी विश्व में ब्रिटिश साम्राज्य की संपर्क भाषा रही थी, उसके साथ एक राजकीय वैभव जुड़ा है, जो उसे बड़प्पन देता है, वरन अंग्रेजी ने कभी मानव के स्वर यंत्रों को ठीक से नही समझा, इसलिए उसके वर्णों के अर्थों में भारी दोष है और एक ही वर्ण सदा एक सी अवस्था में अर्थात आवाज निकालने की स्थिति में नही रहता है। इसीलिए अंग्रेजी संगीत भी अपने आप में उतना हृदय स्पर्शी नही बन पाता जितना संस्कृत और हिंदी का संगीत बन जाता है। इस भाषा ने अष्ट को ‘एट’ उलूक को आउल, नक्त को नाइट, तारा को स्टार, मन को माइंड, हृत को हार्ट, लोक को लुक, मुख को माउथ, अंतर को अण्डर कहा तो अवश्य है पर वास्तव में ये मूल भाषा संस्कृत के विकार के रूप में ही इस भाषा में मिलने वाले दुष्ट शब्द हैं। अंग्रेजी में घ, झ, ठ, ढ, ण, ध, फ, भ, श जैसे कई अक्षरों का अभाव है। इसीलिए अंग्रेज लोग हमारी हिंदी को जब बोलते थे तो तुम ये कहते हो जैसे वाक्य को भी ‘ओ, टुम ये कैटा ए’ कहते थे। ऐसी दयनीय स्थिति को आप भाषा की पूर्णता नही कह सकते। chat,chant जैसे शब्दों में ch च की आवाज निकालता है तो character जैसे शब्द में ch क की आवाज बनाता है। इसीलिए कई लोगों ने अंग्रेजी को हास्यास्पद भाषा माना है। इसीलिए स्टुर्टिवण्ट जैसे विद्वान ने भी लिखा है-that the english alpha bet is very imperfect every one known इस प्रकार लिपि दोष से भी भाषा में परिवर्तन आकर विकार आ जाता है। भाषा में परिवर्तन आने का अगला महत्वपूर्ण कारण है देश भिन्नता। देश भिन्नता से विश्व की कई भाषाओं का विकास हुआ है। यह तभी संभव हुआ जब उस देश विशेष का संपर्क और संबंध मूल और आदि भाषा से सदियों तक कटा रहा तो धीरे धीरे वहां मूल भाषा के विकृत शब्दों को जोड़ तोड़कर नई भाषा को विकसित किया गया। इस पर हम पूर्व में भी प्रकाश डाल चुके हैं। भाषा परिवर्तन के संबंध में पाश्चात्य विचार पश्चिमी देशों के लोग अपने भावों को व्यक्त करते समय हाथों का सिर का, चेहरे की विभिन्न भाव भंगिमाओं का बार-बार प्रयोग करते हैं। यद्यपि इस प्रकार की भाव भंगिमाएं भाषण के समय सामान्यतया हर व्यक्ति की बन जाती हैं, परंतु ध्यान से देखने पर ज्ञात होता है कि पश्चिमी देशों में यह प्रचलन कहीं अधिक है। इसका कारण यही है कि पश्चिमी देशों की भाषाओं के पास वर्णों की और शब्दों की कमी है। लगता है वहां डार्विन का विकासवाद अभी भी कोई नई भाषा गढ़ रहा है। पाश्चात्य विचारकों ने मनुष्य के शरीर की बनावट के आधार पर शारीरिक भिन्नता को भाषा परिवर्तन का पहला कारण माना है। भौगोलिक आधार पर देशभेद के कारण होने वाले भाषा परिवर्तन को दूसरा, जर्मन और आर्य जाति के लोगों में भाषा के उच्चारण के प्रति दीखने वाली विशेष सावधानी को तीसरा कारण माना है। एक दूसरे संप्रदायों के शब्द परस्पर जब प्रयोग किये जाते हैं तो उनसे भी भाषा परिवर्तन होना माना गया है। यातायात के साधनों से तथा पत्र व्यवहार से भी भाषा परिवर्तन होता है। इसी प्रकार समाज में परस्पर एक दूसरे की नकल करने की प्रवृत्ति भी लोगों को भाषा परिवर्तन के लिए प्रेरित करती है। भारत में पंडित नेहरू को जिन लोगों ने अपना आदर्श माना उन्होंने नेहरू जी का अनुकरण करते हुए भारत में एक ऐसी खिचड़ी भाषा तैयार करने का प्रयास किया है, जिसमें सब भाषाओं के शब्द हों। नेहरू के अनुकरण करने वालों ने इसी भाषा को आकाशवाणी, दूरदर्शन और समाचार पत्रों में इतना प्रचलित कर दिया है कि हिंदी की वास्तविकता को समझना ही कठिन हो गया है। नेहरू जी को जिन लोगों ने अपना आदर्श माना यदि कल को वही लोग नेहरू जी से नितांत भिन्न विचार रखने वाले व्यक्ति को अपना आदर्श मान लें तो स्थिति दूसरी हो जाएगी। अत: आदर्श के परिवर्तन को भी पश्चिमी विद्वानों ने भाषा के परिवर्तन का एक कारण माना है। पश्चिमी विचारकों ने साहचर्य अर्थात साथ रहने को भी भाषा परिवर्तन का कारण माना है। पश्चिमी विचारकों के उपरोक्त भाषा परिवर्तन संबंधी विचारों पर गंभीरता से विचार करने पर ज्ञात होता है कि ये सारे कारण समस्या के बाहरी स्वरूप को झलकाने वाले हैं। भीतरी स्वरूप तो चिंतन में आया ही नहीं लगता है। भीतरी स्वरूप में मनुष्य के जातीय साम्प्रदायिक देशीय और ‘हम सबसे अच्छे’ के पूर्वाग्रह और मताग्रह हैं। भारत में सैकड़ों वर्ष से मुस्लिम रह रहे हैं, अधिकांश हिंदुओं को भी मुसलमान बनाया गया है। जैसे ही मजहब परिवर्तन होता है, वैसे ही तुरंत भाषा परिवर्तन भी हो जाता है। परंपरावश कुछ चीजें यदि बनी रह जायें तो वो अधिक महत्व नही रखती हैं। महत्वपूर्ण ये है कि मजहब परिवर्तन के साथ ही भाषा परिवर्तन का मताग्रह लोगों पर कितना हावी है। इसी प्रकार देश में जहां जहां ईसाईकरण हो रहा है, वहां वहां बाइबिल की भाषा और बाईबिल की भाषा के अनुसार सोचने विचारने की प्रवृति बलवती होती जा रही है। यहां तक कि जीवनशैली और दाढ़ी मूछ रखने तक की प्रवृत्ति में भी परिवर्तन अनुभव किया जा रहा है। जब आज ये स्थिति है तो प्राचीन काल में मजहब परिवर्तन ने भाषा परिवर्तन को बढ़ावा ना दिया होगा, ये कैसे हो सकता है? इसीलिए हमारा मानना है कि संस्कृत प्रचलन से इसीलिए बाहर हुई  कि संप्रदाय परिवर्तन से संस्कृत के प्रति ईर्ष्या भाव रखने वालों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती गयी और विश्व में नई नई बोलियां भाषा के रूप में आती गयीं। जिन लोगों ने मानव के एक धर्म मानवता के ही विभिन्न भाग कर दिये तो भाषा को इससे अछूता छोड़ा गया हो-यह नही हो सकता। संसार वैदिक संस्कृति से मानवतावाद की प्रेरणा आदि काल से लेता रहा-कहीं बहुत देर बाद जाकर साम्प्रदायिक प्रवृत्ति बढ़ी तो सब कुछ अस्त व्यस्त हो गया। विश्व जब तक वेद व्यवस्था से शासित और अनुशासित रहा तब तक सारे विश्व की एक ही भाषा थी-एक ही भूषा थी, एक ही परिवेश था और एक ही वेश था,  एक ही देश (आर्यावर्त्त) था। वेद का सं गच्छ ध्वं सं वद ध्वं सं वो मनांसि जानताम् का उद्घोष केवल उद्घोष नही है, अपितु एक समय ऐसा भी था कि जब सारे विश्व की चाल एक ही ओर थी-मोक्ष की ओर, सबके एक ही विचार थे और एक ही मन थे। सारा वितण्डावाद साम्प्रदायिक (मजहबी) लोगों ने कालांतर में खड़ा किया।  वैदिक व्यवस्था का भद्दा अनुकरण करते हुए जब अंग्रेजों ने विश्व साम्राज्य का जंजाल बुनना आरंभ किया तो उन्होंने अपनी भाषा को विश्व पर लादने का प्रयास किया इसी प्रकार मुस्लिम शासकों ने अपनी-अपनी भाषाओं को अपने अपने साम्राज्यों में आरोपित करने का भरपूर प्रयास किया। यद्यपि अंग्रेजों का और मुस्लिम शासकों का यह प्रयास भय और आतंक के आधार पर किया गया था, जबकि भारतीय वेद व्यवस्था का सारा प्रयास सहज दिशा में स्वाभाविक रूप से किया गया था यहां हमें केवल ये देखना है कि जब किसी विचार को, किसी भाषा को, किसी आंदोलन को राजकीय संरक्षण मिल जाता है तो उसका विस्तार कितनी तेजी से होता है। भारत में स्वतंत्रता के उपरांत अंग्रेजी को राजकीय संरक्षण कुछ इस प्रकार मिला कि उसे देश में संपर्क भाषा के रूप में स्थापित किया जाए। परिणाम स्वरूप देश में धर्म परिवर्तन की घटनाएं बढ़ीं और अंग्रेजों के काल से भी अधिक पिछले 65 वर्षों में ही भारत में लोगों का अंग्रेजीकरण और ईसाईकरण इतना हो गया है कि लार्ड मैकाले स्वर्ग में भी खुश हो रहा होगा। हमने अपनी अकर्मण्यता और प्रमादता का इतना अधिक प्रदर्शन किया है कि हम अपनी हिंदी को संपर्क भाषा नही बना पाए। हमें डराया गया कि यदि हमने अपनी हिंदी का पक्ष लिया तो दक्षिण के लोग बिगड़ जाएंगे-इसलिए मत हिंदी की बात करो और मत कन्नड़, तेलगू या तमिल आदि की बात करो। जब तक तुम में ये समझौता हो कि कौन सी भाषा सही है और तुम्हारे लिए कौन सी अपनी भाषा संपर्क भाषा बन सकती है? तब तक बाहरी भाषा अंग्रेजी से काम चला लो। अत: हमारी तकरार का लाभ अंग्रेजी को मिल गया। अब वह पटरानी बनी बैठी है और सारे भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी सहित अन्य भाषाएं अंग्रेजी की चाकरी कर रही हैं। भाषा परिवर्तन के इस कारण को हममें से आज तक किसी ने भी इंगित नही किया है। जबकि यह बड़ा महत्वपूर्ण कारण है। भाषा हमारे सामने ही परिवर्तित हो रही है, विचार परिवर्तित हो रहे हैं, जीवन शैली परिवर्तित हो रही है और हम भाषा परिवर्तन के इस भयानक दौर को निश्चिंत भाव से देख रहे हैं। हम साक्षी हैं एक दुर्घटना के और उस दुर्घटना को अपने लिए एक शुभ संयोग मानकर स्वीकार कर रहे हैं-अपने राष्ट्रीय मूल्यों, अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान और देश की निजता को उपेक्षित करने की इस प्रवृत्ति को भी क्या भाषा परिवर्तन के कारणों में सम्मिलित नही किया जाना चाहिए? हमारा मानना है कि निश्चय ही सम्मिलित किया जाना चाहिए।

हमें आत्मबोध नही रहा है

प्राथमिक पाठशाला में कभी आचार्य के हाथों में रहने वाले दण्ड (डण्डे) को सण्टी शब्द सुना करते थे, इसी प्रकार गांधीजी के हाथ के दण्ड को सोटी और कॉलिज में प्रिंसीपल के हाथों दण्ड को Stick शब्द सुना था।  अब ये सण्टी, सोटी और स्टिक आए कहां से हैं? तो ज्ञात हुआ कि संस्कृत के याष्टिक शब्द से इन सबकी उत्पत्ति हुई है। यदि बच्चों को याष्टिक शब्द मूल रूप में बताया समझाया जाए तो विकार से उत्पन्न दुष्ट शब्दों का लोप स्वयं ही हो जाएगा। लेकिन सच तो ये है कि हममें ही आत्मबोध का अभाव हो गया है, इसलिए परिणाम आशानुरूप न आकर विपरीत आ रहे हैं, और हम सण्टी, सोटी, स्टिक के मकड़जाल में अपने याष्टिïक को भूले जा रहे हैं।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betvole giriş
betvole giriş
fenomenbet
betvole giriş
betkanyon
betvole giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betvole giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
timebet giriş
timebet giriş
realbahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
timebet giriş
timebet giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
vaycasino giriş
kulisbet giriş
mariobet giriş
realbahis giriş
vaycasino giriş
grandbetting giriş
hititbet giriş
norabahis giriş
grandpashabet giriş
betvole giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
damabet
betnano giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betvole giriş
betpark giriş
betvole giriş
betpark giriş
celtabet giriş
betpipo giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
superbahis giriş
perabet giriş
perabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
betpark giriş
betnano giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpas giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
mariobet giriş
betvole giriş
mariobet giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
mariobet giriş
betpas giriş
hititbet giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
dedebet
betkanyon
radissonbet
casinofast
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
norabahis giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
betnano giriş