1857 की क्रांति के समय सम्राट बहादुर शाह के ऐलान

क्रांति के प्रारंभ में, दिल्ली के स्वाधीन होते ही, सम्राट बहादुर शाह की ओर से एक ऐलान सारे भारत में प्रकाशित किया गया, जिसके कुछ वाक्य इस प्रकार थे-ऐ हिंदोस्तान के फरजंदो! अगर हम इरादा कर लें, तो बात की बात में दुश्मन का खात्मा कर सकते हैं हम दुश्मन का नाश कर डालेंगे और अपने धर्म और अपने देश को, जो हमें जान से भी ज्यादा प्यारा है, खतरे से बचा लेंगे।
कुछ समय बाद सम्राट की ओर से एक दूसरा ऐलान प्रकाशित हुआ, जिसकी प्रतियां सारे भारत के अंदर, यहां तक कि दक्षिण के बाजारों और छावनियों में भी हाथों हाथ बंटती हुई पाई गयी। इस ऐलान में लिखा था
तमाम हिंदुओं और मुसलमानों के नाम हम महज अपना धर्म समझकर जनता के साथ शामिल हुए हैं। इस मौके पर जो कोई कायरता दिखलाएगा या भोलेपन के कारण दबागाज फिरंगियों के वायदों पर ऐतबार करेगा, यह जल्दी ही शर्मिंदा होगा और इंगलिस्तान के साथ अपनी वफादारी का उसे वैसा ही इनाम मिलेगा, जैसा लखनऊ के नवाबों को मिला। इसके अलावा इस बात की भी जरूरत है कि इस जंग में तमाम हिंदू और मुसलमान मिलकर काम करें और किसी प्रतिष्ठित नेता की हिदायतों पर चलकर इस तरह का अपना रूतबा और उनकी शान बड़े। जहां तक मुमकिन हो सके, सबको चाहिए कि इस ऐलान की नकलें करके आम जगहों पर लगा दें।
एक और तीसरा ऐलान बहादुर शाह की तरफ से बरेली में प्रकाशित हुआ जिसमें लिखा था-
हिंदुस्तान के हिंदुओं और मुसलमानों उठो, भाईयो उठो, खुदा ने जितनी बरकतें इंसान को अता की हैं, उनमें सबसे कीमती बरकत आजादी है। क्या वह जालिम नाकस, जिसने धोका दे-देकर यह बरकत हमसे छीन ली है, हमेशा के लिए हमें उससे महरूम रख सकेगा? क्या खुदा की मर्जी के खिलाफ इस तरह का काम हमेशा जारी रह सकेगा? नही, नही फिरंगियों ने इतने जुल्म किए हैं कि उनके गुनाहों का प्याला लबरेज हो चुका है। यहां तक कि अब हमारे पाक मजहब को नाश करने की नापाक ख्वाहिश भी उनमें पैदा हो गयी है। क्या तुम अब भी खामोश बैठे रहोगे? खुदा अब यह नही चाहता कि तुम खामोश रहो, क्योंकि उसने हिंदुओं और मुसलमानों के दिलों में अंग्रेजों को अपने मुल्क से बाहर निकालने की ख्वाहिश पैदा कर दी है और खुदा के फजल और तुम लोगों की बहादुरी के प्रताप से जल्दी ही अंग्रेजी को इतनी कामिल शिकस्त मिलेगी कि हमारे इस मुल्म हिंदोस्तान में उनका जरा भी निशान न रह जाएगा। हमारी इस फौज में छोटे और बड़े की तमीज भुला दी जाएगी और सबके साथ बरारी का बर्ताव किया जाएगा, क्योंकि इस पाक जंग में अपने धर्म की रक्षा के लिए जितने लोग तलवार खीचेंगे, वे सब एक समान यश के भागी होंगे। वे सब भाई भाई हैं, उनमें छोटे बड़े का कोई भेद नही। इसलिए मैं फिर अपने तमाम हिंदी भाईयों से कहता हूं, उठो और ईश्वर के बताए हुए इस परम कर्त्तव्य को पूरा करने के लिए मैदाने-जंग में कूद पड़ो।
गोहत्या पर कड़ा दंड:
सम्राट बहादुर शाह अक्सर हाथी पर बैठकर शहर में निकला करता था और जनता तथा सिपाहियों को प्रोत्साहित करता था। ऐलान किया जा चुका था कि जो भी आदमी गोहत्या के अपराध का भागी होगा, उसके हाथ काट लिए जाएंगे या उसे गोली से उड़ा दिया जाएगा। गोहत्या के बारे में इस तरह की आज्ञा सम्राट बाबर के समय से चली आ रही थी। कट्टर या अदूरदर्शी औरंगजेब तक ने इस हितकर आज्ञा पर अमल कायम रखा था। किंतु दिल्ली और उसके आसपास के इलाके में कंपनी का राज जमने के समय से गोरी सेना का पेट भरने के लिए फिर से गोहत्या शुरू हो गयी थी। ऊपर एक अध्याय में लिखा जा चुका है कि मथुरा और दोआब के इलाके में इसके कारण भयंकर असंतोष पैदा हो गया था। यही कारण था कि सम्राट बहादुर शाह को वास्तविक सत्ता में हाथ में लेते ही फिर एक बार उस तीन सौ साल पुरानी आज्ञा को दोहराना पड़ा।
(भारत में अंग्रेजी राज खण्ड-2 से)

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