हमारे जीवन के कुछ प्रमुख दिवंगत एवं जीवित आर्यमित्र

ओ३म्
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हमारा जन्म एक अल्प शिक्षित पिता श्री भगवानदीन तथा अपढ़ माता श्रीमती रामकली जी से 26 जुलाई, सन् 1952 को हुआ था। हमारे पिता एक श्रम से जुडे स्किल्ड श्रमिक का कार्य करते थे और अपनी तकनीकी योग्यता के कारण जीवन के अन्तिम दिनों दिसम्बर, 1978 तक कार्य करते रहे। हमारी प्रारम्भिक शिक्षा एक अंग्रेजी-हिन्दी माध्यम के स्कूल ‘एस.पी. कालेज, ओंकार रोड, देहरादून’ में हुई जहां हम एल.के.जी. से कक्षा पांच तक पढ़े। इसके बाद कक्षा 6 से कक्षा 12 तक हम देहरादून के ‘श्री गुरुनानक पब्लिक ब्वायज इण्टर कालेज’ में पढ़े। यह विद्यालय हमारे घर से कुछ ही दूरी पर था। यहां हमने हाईस्कूल में अपने स्कूल में शीर्ष प्रथम स्थान प्राप्त किया था। इण्टर में हमने विद्यालय की मेरिट सूची में द्वितीय स्थान प्राप्त किया था। इसी विद्यालय में हमारे एक पड़ोसी श्री धर्मपाल सिंह जी भी कला वर्ग में पढ़ते थे। हमारी शिक्षा हाईस्कूल व इण्टर विज्ञान वर्ग में हुई। पता नहीं कैसे, अब स्मरण नहीं है, सन् 1970 के आसपास हमारी आपस में मित्रता हो गई। दोनों लगभग 17-18 वर्ष आयु के थे। श्री धर्मपाल सिंह जी आर्य परिवार के किशोर थे। वह प्रतिदिन सायंकाल हमसे मिलते और हमें अपने साथ भ्रमण करने ले जाते थे। उन दिनों यदि आसपास कहीं किसी विद्वान व विदुषी महिला की धार्मिक कथा व प्रवचन आदि होते थे तो वह हमें वहां ले जाते थे। हमने उन्हीं के साथ इस प्रकार से सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाना आरम्भ किया था। कुछ समय बाद वह हमें आर्यसमाज में भी ले जाने लगे थे।

हमें आर्यसमाज की बातें तो अच्छी लगती थी परन्तु, पौराणिक ठीक हैं या आर्यसमाज, आरम्भ में कुछ महीनों व दो तीन वर्ष तक हम निर्णय नहीं कर पाये थे। निरन्तर आर्यसमाज के सत्संगों में जाने, उनकी लघु पुस्तकों में उपलब्ध साहित्य के अध्ययन सहित विद्वानों के प्रवचनों तथा सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थ का यह प्रभाव हुआ कि हम आर्यसमाज के सिद्धान्तों को समझने लगे और कुछ समय बाद आर्यसमाज के सदस्य बन कर आर्यसमाज में विद्वानों के सभी प्रवचनों में उपस्थित होते तथा उन्हें ध्यान से सुनते थे। इस स्वभाव के कारण ही ज्ञानवृद्धि हेतु हमने आर्य विद्वानों की पुस्तकों का क्रयण करना और उन्हें पढ़ना भी आरम्भ कर दिया था। श्री धर्मपाल सिंह बहुत स्वाध्यायशील युवक थे और उन्हें आर्यसमाज के सिद्धान्तों की गहरी समझ थी। हम प्रतिदिन आपस में मिलते तो किसी विषय पर तर्क वितर्क करते थे। इस प्रकार हम आर्यसमाज के सदस्य के रूप में, स्वाध्यायकर्ता तथा यज्ञ करने कराने वाले एक युवक के रूप में तथा पुस्तकों के द्वारा आर्यसमाज का प्रचार करने वाले एक कनिष्ठ सामान्य कार्यकर्ता बने। यह भी बता दें कि हमने वेद प्रचार करने के लिये एक वेद प्रचार समिति भी बनाई थी जिसके माध्यम से हम प्रत्येक सप्ताह पारिवारिक सत्संग किया करते थे। इस कार्य में सबसे अधिक सहयोगी तो हमारे पड़ोसी मित्र स्वर्गीय श्री शिवनाथ आर्य थे तथा इनके साथ स्व0 श्री सत्यदेव सैनी एवं स्व0 श्री धर्मपाल सिंह का भी विशेष योगदान था। एक शर्मा दम्पती भी हमारे इस वेदप्रचार में सक्रिय योगदान देते थे। इन पति-पत्नी के नाम अब याद नहीं है। अब यह दोनों दिवगंत हो गये हैं, ऐसा हमारा अनुमान है। आज हम अपने कुछ मित्रों की चर्चा इस लेख में कर रहे हैं जिनसे हमारा गहरा सम्बन्ध रहा है तथा जिनसे हमें आर्यपथ पर चलने में विशेष प्रेरणा सहित सहयोग प्राप्त हुआ। इन मित्रों में श्री धर्मपाल सिंह तथा श्री शिवनाथ आर्य सहित श्री सत्यदेव सैनी, प्रा. अनूप सिंह, श्री धर्मेन्द्रसिंह आर्य, श्री ईश्वर दयालु आर्य, श्री राजेन्द्र कुमार काम्बोज एडवोकेट, श्री चन्द्रदत्त शर्मा, श्री भोलानाथ जी तपोवन, श्री राम अवतार गर्ग, श्री ललितमोहन पाण्डेय, श्री प्रीतम सिंह आर्य आदि प्रमुख हैं। वर्तमान में हम गुरुकुल पौंधा के आचार्य धनंजय जी, आर्य भजनोपदेशक पं. सत्यपाल सरल जी, वैदिक साधन आश्रम तपोवन के मंत्री श्री प्रेम प्रकाश शर्मा जी, आर्य विद्वान डा. कृष्णकान्त वैदिक शास्त्री आदि विद्वानों से जुड़े हुए हैं। यहां हम अपने पुराने कुछ मित्रों व सहयोगियों का संक्षिप्त परिचय व संस्मरण प्रस्तुत कर रहे हैं।

श्री धर्मपाल सिंह जी

श्री धर्मपाल सिंह जी हमारे पड़ोसी थे तथा वह हाई स्कूल व इण्टर में हमारे स्कूल के ही छात्र रहे। हम दोनों समान आयु के थे तथा एक ही कक्षा में पढ़ते थे। वह कलावर्ग के विद्यार्थी थे और हम विज्ञान वर्ग के। उनसे सन् 1970 में मित्रता होने पर उन्होंने ही हमें आर्यसमाज का मार्ग दिखाया। उनकी मृत्यु पर्यन्त हमारे दोनों परिवारों के सम्बन्ध बने रहे व अब भी हैं। विद्यार्थी जीवन व उसके बाद हम दोनों के दो अन्य घनिष्ठ मित्र हुआ करते थे जिनके नाम थे श्री प्रेमसिंह वम्र्मा एवं श्री अनूप मेहरा। यह दोनों मित्र हमारे वर्तमान में भी मित्र हैं और यदाकदा मिलते रहते हैं। श्री धर्मपाल सिंह जी को स्वाध्याय और पुस्तक खरीदने का बहुत शौक था। हमने उनके लिये आर्य प्रकाशकों से अनेक पुस्तकें डाक से भी मंगाई और जब हम उत्सवों आदि पर जाते थे तो उनके लिये पुस्तक विक्रेताओं से पुस्तकें लाते थे। आज भी स्व. धर्मपाल सिंह जी से हमारे निकट सम्बन्ध हैं और एक दूसरे के विवाह आदि आयोजनों में हम एक दूसरे से मिलते रहते हैं। हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि हमें यदि धर्मपाल सिंह जी आर्यसमाज का मार्ग न दिखाते तो भटकने के अतिरिक्त हमें जीवन में विशेष उपलब्धि प्राप्त न होती। आज भी हमें उनका अभाव कष्ट देता है।

प्रा. अनूप सिंह जी

प्रा. अनूप सिंह जी मुजफफर नगर के रहने वाले थे। वह देहरादून के आर्य इण्टर कालेज में राजनीति शास्त्र के शिक्षक थे। श्री अनूप सिंह जी सन् 1975 में आर्यसमाज धामावाला देहरादून के मंत्री रहे। उनका व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक एवं प्रभावशाली था। वह आर्यसमाज के विद्वान थे और सुदूर बंगलौर, कोलकत्ता, सुजानगढ़, हैदराबाद, दिल्ली सहित मसूरी आदि अनेक स्थानों पर आर्यसमाज के उत्सवों में व्याख्यान देने जाते थे। राजनीतिक दलों में भी उनका विशेष प्रभाव था। उन्होंने विधायक का चुनाव भी लड़ा था। पं. प्रकाशवीर शास्त्री जी, पं. शिवकुमार शास्त्री तथा श्री कैलाश नाथ सिंह आदि आर्य नेताओं एवं विद्वानों के भी वह अति निकट थे। इन प्रथम आर्य नेताओं के सांसद आदि चुनावों में वह प्रचारक एवं वक्ता के रूप में जाते थे। हमने उनके अनेक व्याख्यान सुने हैं। उनके कुछ व्याख्यानों की आडियो कैसेट में रिकार्डिगं भी की थी। उनके व्याख्यान बहुत ही प्रभावशाली होते थे। एक अधिक बार अपने मित्रों के यहां पारिवारिक सत्संगों में भी हमने उनके व्याख्यान कराये तथा उन्हें स्थानीय व आर्यसमाजी पत्रों में प्रकाशित कराया था। सन् 1975 के बाद हमने देहरादून का कोई आर्यसमाजी विद्वान उनके जैसा प्रभावशाली व्याख्यान देता नहीं देखा व सुना। हम उनके साथ आर्यसमाज के कार्यों से दिल्ली, लखनऊ एवं मसूरी आदि स्थानों पर भी गये थे। कई वर्षों तक वह देहरादून के पल्टन बाजार में आर्यसमाज के उच्च कोटि के व्याकरण के विद्वान पं. चन्द्रमणि विद्यालंकार जी की दुकान ‘हिन्दी साहित्य सदन’ में सायं एक दो घण्टे बैठते थे। अपनी मृत्यु से कुछ समय पूर्व तक वह वहां बैठते रहे। हम भी अपने कार्यालय से लौटते समय उनके पास पहुंच जाते थे। उन दिनों हमारे पास जो नई पुस्तकें आर्य प्रकाशकों से डाक से आती थीं तथा जो आर्यसमाज की पत्र-पत्रिकायें नियमित रूप से आती थीं, वह सब हम उनको देते थे जिसे वह एक दो दिन में पढ़कर वा देखकर लौटा देते थे। उनके घर पर भी हमारा आना जाना होता रहता था। आज भी उनके परिवार से हमारे निकट संबंध हैं।

प्रा. अनूप सिंह जी की मृत्यु पंत अस्पताल, दिल्ली में दिनांक 21-6-2001 को कमर में कैंसर रोग से हुई थी। उनकी चिकित्सा व रोग के दिनों में भी हम उनसे मिलते रहे। उनकी पीड़ा देखी नहीं जाती थी। हमने उनको अस्वस्थता की स्थिति में अनेक बार देखा था। मृत्यु से पूर्व उन्होंने हमें कहा था कि मृत्यु होने पर मुझे एक छोटी गाड़ी में हरिद्वार ले जाकर गंगा के तट पर वैदिक विधि से अन्त्येष्टि कर देना। यह बात उन्होंने मृत्यु से एक या दो सप्ताह पहले कही थी। यह कहते हुए उनको कितनी पीड़ा हुई होगी, हम उसका अनुमान कर सकते हैं। उनकी इच्छा की पूर्ति उनके परिवार ने की थी। वर्तमान में उनकी पत्नी श्रीमती इन्दुबाला जी बीजेपी की नेत्री हैं। उनके दोनों पुत्र मनु एवं प्रशान्त संस्कारित एवं अनेक आर्यगुणों को धारण किये हुए हैं। यह परिवार हमें अपना मानता है और बहुत सत्कार करता है। हम इसे अपना सौभाग्य मानते हैं। हम आर्यसमाजी बनेे, इसमें श्री अनूप सिंह का भव्य एवं आकर्षक व्यक्तित्व तथा उनके उच्च कोटि के ज्ञानवर्धक व्याख्यान वा उपदेश कारण थे। इसके साथ ही उन दिनों हमने आर्यसमाज में श्री अनूप सिंह जी सहित महात्मा अमर स्वामी, स्वामी डा. सत्यप्रकाश सरस्वती, पं. ओम् प्रकाश शास्त्री खतौली, ओम् प्रकाश त्यागी पुरुषार्थी, पं. रुद्रदत्त शास्त्री, आचार्य बृहस्पति शास्त्री, पं. विश्वनाथ वेदोपाध्याय आदि अनेक विद्वानों के प्रभाशाली भाषण एवं भजनोपदेशकों के भजनों को भी सुना था। अतः प्रा. अनूप सिंह का सान्निध्य हमारे व्यक्तित्व में निर्माण में प्रमुख साधन रहा है। हम उन्हें सदैव गुरुजी कहा करते थे। वह अपने मन की बहुत सी बाते हम से साझा करते थे।

श्री शिवनाथ आर्य

हमारे प्रमुख मित्रों में एक नाम स्व0 श्री शिवनाथ आर्य का भी है। श्री आर्य बिजनौर निवासी थे। वहां से देहरादून आकर इन्होंने दर्जी का काम कर अपने परिवार का भरण-पोषण किया। आप आर्यसमाज के प्रचारार्थ दिन में ही निकल जाते थे। आप के परिवार में आपकी धर्मपत्नी सहित चार पुत्र एवं दो पुत्रियां हैं। सभी को आपने स्नातक समकक्ष शिक्षा दी। अब सभी बच्चे विवाहित होकर अपने अपने स्वतन्त्र व्यवसाय कर रहे हैं। परिवार में सम्पन्नता है और वह आर्यसमाज के उत्सवों आदि में जाते हैं। पं. शिवनाथ आर्य महर्षि दयानन्द और आर्यसमाज के दिवाने थे। प्रा. अनूप सिंह जी की मृत्यु के अगले दिन 22-6-2001 को रात्रि में ही आपकी मृत्यु हृदयाघात से हुई थी। आप अनूप सिंह जी की अन्त्येष्टि में हरिद्वार भी गये थे। वहां दिन में भी उनको हृदय में दर्द वा हृदयाघात हुआ था। प्रातः भी ऐसी ही तकलीफ हुई थी फिर भी वह अन्त्येष्टि में हरिद्वार चले गये। वहां से आकर रात्रि के समय सोने से पूर्व परिवार व कुछ बाहर से आये अतिथियों के साथ बातें करते हुए आपको असहनीय हृदयाघात हुआ था। आपको सरकार अस्पताल ले जाया गया था परन्तु चिकित्सा आरम्भ होने से पूर्व ही आपकी मृत्यु हो गई थी। श्री शिवनाथ आर्य आर्यसमाज के रविवारीय सत्संगों में आते थे। आपको एक बार बसपा पार्टी के संस्थापक श्री काशीराम जी ने कहा था कि आप अपने नाम के साथ आर्य लगाना छोड़ दे। इसका उत्तर देते हुए श्री शिवनाथ जी ने हमें बताया था कि उन्होंने उन्हें कहा कि आप अपने नाम में लगा राम शब्द हटा दें तो मैं आपके सुझाव पर विचार करुंगा। श्री शिवनाथ आर्य जी पहले अपढ़ थे परन्तु अपनी लगन से उन्होंने अपने बच्चों से हिन्दी पढ़ने व लिखने की योग्यता प्राप्त कर ली थी। बिजनौर की किसी आर्यसमाज में संयोगवश किसी विद्वान का प्रवचन सुनकर उन पर ऐसा प्रभाव हुआ था कि वह ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज के भक्त बन गये थे। यह घटना एकाधिक बार उन्होंने हमें सुनाई थी। हम उनके परिवार से यदा कदा मिलते रहते हैं। आज भी उनकी याद आती हैं। हमारे सुख दुःख के सच्चे साथी थे श्री शिवनाथ आर्य जी। हमारी माताजी का भी वह बहुत आदर करते थे। एक बार अत्यन्त आग्रहपूर्वक हमारी माता जी को वह अपने घर भोजन कराने ले गये थे। श्री शिवनाथ आर्य के साथ हमने सन् 1995 में लखनऊ और लगभग उसी के आसपास महात्मा नारायण स्वामी सरस्वती जी की कर्मभूमि नैनीताल के निकट रामगढ़ तल्ला के आश्रम के उत्सव के समय यात्रायें कीं थीं। वह न केवल हमारे मित्र व सहयोगी थे अपितु हमारे एक रक्षक के समान थे। वह हमारी ही आयु व उससे कुछ बड़े थे। वेद प्रचार समिति, देहरादून के मंत्री के रूप में उन्होंने उत्साह से कार्य किया था। स्व. ई. श्री सत्यदेव सैनी समिति के प्रधान थे। दोनों में गहरा आत्मीय भाव था। पारिवारिक सत्संगों में सैनी जी, शिवनाथ जी, धर्मपाल सिंह जी आदि का सक्रिय योगदान होता था। श्री शिवनाथ आर्य जी ने अनेक बार पार्षद का चुनाव भी लड़ा। एक बार हमने भी उनके चुनाव अभियान में भाषण के द्वारा सेवायें दी थीं।

श्री धर्मेन्द्र सिंह आर्य, पूर्व मंत्री व प्रधान आर्य प्रतिनिधि सभा, उ0प्र0

श्री धर्मेन्द्र सिंह आर्य आर्यसमाज के यशस्वी नेता तथा ऋषिभक्त थे। वह पं. प्रकाशवीर शास्त्री जी तथा अमेठी के राजा रणंजय सिंह जी के समय में आर्य प्रतिनिधि सभा, उत्तर प्रदेश के मंत्री रहे। उनके कार्यकाल में आर्यसमाज की स्थापना का शताब्दी समारोह मेरठ में मनाया गया था। इस आर्य महासम्मेलन में नैपाल के राजा मुख्य अतिथि वा सभापति थे। एक भव्य स्मारिका का प्रकाशन भी हुआ था। यह हमारे पास थी परन्तु अब वर्षों से दिखाई नहीं दी। आर्यसमाज धामावाला देहरादून में भी हमने मिलकर काम किया। श्री धर्मेन्द्र सिंह आर्य आर्यसमाज के एक भजनोपदेशक के सुपुत्र थे। हमारे निवास से 5 मिनट की पैदल की दूरी पर उनका निवास था। हम प्रायः उनसे मिलने उनके निवास पर जाते थे और वैदिक धर्म और आर्यसमाज विषयक चर्चायें करते थे। चीन के भारत पर सन् 1962 में आक्रमण के अवसर पर आप आर्यसमाज देहरादून के मंत्री थे। आपने अथक प्रयत्न कर एवं अन्य सभी अधिकारियों से सहयोग से भारत के रक्षामंत्री जी को सोने की एक तलवार जिसका भार 1008 ग्राम था, बनवाकर भेंट की थी। वर्तमान में उसका मूल्य तीस लाख से ऊपर आता है। इस सोने की तलवार को भेंट करने वह दिल्ली गये थे। उस अवसर का एक चित्र भी उपलब्ध होता है। वह चित्र श्री आर्य की बैठक में भी हम लगा देखते थे। देहरादून के निकटवर्ती स्थानों पर ईसाई मिशनरियों द्वारा किये जाने वाले धर्मान्तरण को रोकने में भी आपने आर्यसमाज के विद्वानों को बुलाकर वहां प्रचार कराया था और ईसाईयों को शास्त्रार्थ की चुनौती भी दी थी। श्री धर्मेन्द्र सिंह आर्य जी ने दो या तीन विद्यालयों की स्थापना भी की थी। आज यह इण्टर कालेज के रूप में चल रहे हैं। आप पंजाब नैशनल बैंक में उच्च अधिकारी थे। बैंक यूनियन के अधिकारी व नेता भी रहे। हरिद्वार मे गंगा के तट के निकट का बहुमंजिला व वृहद आर्यसमाज मन्दिर भी आपने पं. प्रकाशवीर शास्त्री जी द्वारा दिलाये गये आर्थिक सहयोग से उनके साथ मिलकर बनवाया था। भारत के आर्यसमाजी प्रधानमंत्री श्री चरणसिंह जी के साथ भी आपका निकट सम्बन्ध था। चैधरी चरण सिंह एक बार लखनऊ में उ0प्र0 विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता होते हुए भी देहरादून आर्यसमाज के वार्षिकोत्सव में पधारे थे। श्री धर्मेन्द्र सिंह आर्य देहरादून में कन्याओं के महाविद्यालय के वर्षों तक प्रबन्धक रहे। उनके कार्यकल में ही इस विद्यालय ने प्राइमरी व मिडल स्कूल से महाविद्यालय वा स्नात्कोत्तर का स्वरूप धारण किया था। श्री धर्मेन्द्र सिंह आर्य से पहले शीर्ष आर्य विद्वान डा. सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार इस विद्यालय के प्रबन्धक रहे। श्री धर्मेन्द्र सिंह आर्य के बाद उनके सहयोगी श्री ईश्वर दयालु आर्य भी वर्षों तक इस महाविद्यालय के प्रबन्धक पद पर आसीन रहे। यह स्नात्कोत्तर महाविद्यालय उत्तराखण्ड राज्य का कन्याओं का सबसे बड़ा विद्यालय है। मृत्यु से काफी समय पहले श्री धर्मेन्द्र सिंह जी का दिल्ली में एक एक्सीडेण्ट हुआ था। उस दुर्घटना में उनके सिर में चोटें लगी थी। उससे पहले एक बार उन्हें हृदयाघात भी हुआ था। उनकी मृत्यु दिनांक 10-10-1996 को भी हृदयाघात से हुई थी। हम उनकी अन्त्येष्टि में सम्मिलित हुए थे जो देहरादून के श्मशान घाट पर हुई थी। उनके एकमात्र पुत्र श्री सुरेन्द्र सिह आर्य हैं। वह हमसे फेसबुक जुड़े हुए हैं। आर्य गुरुकुल पौंधा से भी वह जुड़े हैं। गुरुकुल के वार्षिकोत्सव पर सपरिवार पधारते हैं। श्री धर्मेन्द्र सिंह आर्य जी की धर्मपत्नी की मृत्यु कुछ वर्ष पूर्व हुई है।

श्री सत्यदेव सैनी, इंजीनियर, आवास विकास परिषद, उ.प्र.

हमारे एक प्रमुख मित्र सत्यदेव सैनी थे। आप देहरादून में आवास विकास परिषद में सिविल इंजीनियर थे। लगभग 1975-80 के मध्य हमारा आर्यसमाज धामावाला में ही उनसे परिचय हुआ था। आप कट्टर ऋषिभक्त एवं आर्यसमाज के सिद्धान्तों के पोषक थे। आपका जीवन आर्य सिद्धान्तों का मूर्त रूप था। आपके परिवार में प्रतिदिन यज्ञ होता था। देहरादून से स्थानान्तरित होकर आप लखनऊ चले गये थे। वहां गोमती नगर में आपने अपना निवास भी बनवाया था। दो बार हमें उनके लखनऊ निवास में जाने का अवसर मिला। आपके दो पुत्र पंकज सैनी एवं नीरज सैनी हैं एवं दो पुत्रियां हैं। एक पुत्री का नाम अंजना है। आप स्थानान्तरण के बाद जब भी देहरादून आते थे तो हमसे व सभी मित्रों से मिलते थे। आप वेद प्रचार समिति, देहरादून के प्रधान थे और हम समिति के द्वारा आयोजित पारिवारिक सत्संगों की व्यवस्था आदि करते थे। हमारे व सैनी जी के देहरादून स्थित निवास पर कुछ-कुछ दिनों के मध्य बैठकें हुआ करती थी। इस समिति के द्वारा हमने देहरादून के उस समय के प्रमुख अस्पताल ‘दून अस्पताल’ में एक वृहद यज्ञ भी कराया था। देहरादून के भारतीय जीवन बीमा निगम के नये भजन का उद्घाटन भी समिति के द्वारा यज्ञ करके हुआ था। समिति ने एक बार सम्भवतः सन् 1985 में आर्यसमाज धामावाला में वृहद योग शिविर का आयोजन भी किया था। समाज मन्दिर का सभागार प्रशिक्षणार्थियों से भर जाता था। स्वामी सोम्बुद्धानन्द जी योग प्रशिक्षक थे। सैनी जी योग के सभी आसन कर लेते थे। आपका शरीर स्वस्थ एवं सुडौल था। योग शिविर में आप सभी आसन करके दिखाते थे जिसे देखकर अन्य स्त्री व पुरुष आसन करते थे। लखनऊ जाने के बाद आपने वहां जमकर प्रचार किया। आप वहां जिला आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान भी रहे। आपने पद प्राप्ति के लिये कभी कोई अनुचित कार्य नहीं किया। उन्होंने आर्यसमाज का पद तभी लिया जब उन्हें इसके लिये बाध्य किया गया। अपने विभाग के उच्च अधिकारियों के घरों में भी वह यज्ञों का आयोजन कर वेद प्रचार करते थे। एक बार उन्होंने हमें दो बोरियां भर कर यज्ञ कुण्ड के आकार की समिधायें प्रदान की थी। श्री सत्यदेव सैनी जी से हमारी बहुत सी स्मृतियां जुड़ी हुईं हैं। विगत वर्ष जनवरी 2019 में उनकी मृत्यु हुई है। अस्वस्थ होने के कारण हम वहां जा नहीं सके थे। आज भी उनकी स्मृतियां सजीव हो रही हैं। हम उनके परिवार के प्रति अपनी सद्भावनायें व्यक्त करते हैं।

श्री ईश्वर दयालु आर्य पूर्व प्रशासनिक अधिकारी न्यायविभागएवं प्रबन्धक महादेवी महाविद्यालय

हमारे एक वयोवृद्ध आर्यमित्र श्री ईश्वर दयालु आर्य हैं। वह वर्तमान में लगभग 85 वर्ष के मध्य आयु के हैं। आपका व आपके परिवार का हमारे प्रति असीम स्नेह है। आपकी धर्मपत्नी माता यशवन्ती देवी जी कुछ वर्ष पूर्व परलोकगामी हुई हैं। उनका भी हमारे पूरे परिवार पर असीम स्नेह था। श्री ईश्वर दयालु आर्य भी आर्यसमाज धामावाला देहरादून से जुड़े रहे। प्रा. अनूप सिंह एवं श्री धर्मेन्द्रसिंह आर्य जी से आपका घनिष्ठ सम्बन्ध था। जब प्रा. अनूप सिंह जी रुग्ण थे तो हम साप्ताहिक तौर पर उनके निवास पर उनके दर्शन करने जाते थे। मृत्यु के समय भी हम दोनों दिल्ली के पंतनगर अस्पताल में पहुंच थे जहां ऋषिभक्त प्रा. अनूप सिंह जी की मृत्यु हुई थी। श्री दयालु जी न्याय विभाग की सेवा में प्रशासनिक अधिकारी के पद से सेवानिवृत हुए। आपका स्वाध्याय अति विस्तृत है। आर्यसमाज के पुराने भजनोपदेशक यशस्वी पं. ओम्प्रकाश वर्मा उनके हार्दिक मित्र हैं। आप आर्यसमाज धामावाला देहरादून के मंत्री रहे हैं। आर्य संस्था महादेवी स्नात्कोत्तर कन्या महाविद्यालय के आप वर्षों तक मुख्य प्रबन्धक रहे। आपसे हमें अनेक वर्षों तक महीने में कई बार उनके ही घर पर वार्तालाप करने का अवसर मिलता रहा। मई 2019 में हमारी अस्वस्थता के बाद से भेंट करने में कुछ बाधा आई है। आप वर्तमान में भी आर्य साहित्य का अध्ययन करते हैं। फेसबुक पर सक्रिय रहते हैं। हमारे लेखों को पढ़कर हमारा उत्साहवर्धन करते हैं। आपने देवबन्द व उत्तराखण्ड के कुछ पर्वतीय स्थानों पर अपने सेवाकाल में आर्यसमाज की गतिविधियों में भाग लेकर प्रचार किया है। हमें आपका आशीर्वाद मिलता रहता है जिसके लिये हम उनके हृदय से आभारी हैं।

हम अपने सभी मित्रों का इस लेख में परिचय नहीं दे पाये। लेख का अधिक विस्तार इसका कारण है। बाद में कुछ अन्य मित्रों का परिचय भी देने का प्रयास करेंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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