डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने क्यों की थी जन गण मन में बदलाव की मांग

रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिखे गए भारत के राष्ट्रगान पर पहले भी विवाद होता रहा है. अब बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने प्रधानमंत्री मोदी को खत लिखकर इसमें कुछ बदलाव किए जाने की मांग की है. क्या मोदी सरकार बदलेगी राष्ट्रगान?

जिस जन गण मन को गाकर हम बचपन से ही देशभक्ति के भावों से ओत-प्रोत होते रहे हों अगर उसमें बदलाव कर दिया जाए तो कैसा लगेगा? शायद इससे राष्ट्रगान के रूप में हमारे सीने में दर्ज हो चुके अहसासों में से कुछ छिन जाने या खालीपन सा अहसास होगा!

रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिखे गए भारत के राष्ट्रगान पर पहले भी विवाद होता रहा है. अब बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने प्रधानमंत्री मोदी को खत लिखकर इसमें कुछ बदलाव किए जाने की मांग की है. आइए जानें क्या है देश के राष्ट्रगान से जुड़ा विवाद और इसमें किस बदलाव की मांग की जा रही है.

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा था राष्ट्रगानः

रवीद्रनाथ टैगोर ने भारत के राष्ट्रगान की रचना की थी. शायद कम ही लोगों को पता होगा की बांग्लादेश के राष्ट्रगान ‘आमार सोनार बांग्ला’ की रचना भी रवींद्रनाथ टैगोर ने ही की थी. भारत के राष्ट्रगान जिसे आज हम राष्ट्रगान के रूप में गाते हैं उसे रवींद्रनाथ टैगोर ने 11 दिसंबर 1911 में लिखा था. इसे पहली बार कांग्रेस के 27वें वार्षिक अधिवेशन में कलकत्ता में गाया था. टैगोर ने मूल गीत की रचना बांग्ला भाषा में की थी. भले ही इसे 1911 में लिखा गया हो लेकिन अगले कई वर्षों तक देश के ज्यादातर लोग इसके बारे में नहीं जानते थे. मूल गीत में पांच पैरा हैं जिनमें से पहले पैरा को ही भारत के राष्ट्रगान के तौर पर अपनाया गया है.

1919 में टैगोर ने जब इस गीत का बांग्ला से अंग्रेजी में अनुवाद किया और फिर मारग्रेट (जोकि पश्चिमी संगीत की जानकार थीं) के साथ मिलकर इसकी धुन भी तैयार की. यही धुन आज तक देश के राष्ट्रगान के तौर पर प्रयोग की जाती है. इस गीत के अंग्रेजी अनुवाद और धुन ने इसे जबर्दस्त लोकप्रियता दिलाई और बाद में वंदे मातरम और जन गण मन में से किसी एक को जब देश का राष्ट्रगान चुनने की बारी आई तो संविधान सभा ने जन गण मन को चुना. इसे 24 जनवरी 1950 को देश के राष्ट्रगान के तौर पर अपनाया गया.

दरअसल टैगोर का यह गीत तब लिखा गया था जब भारत ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन था. 1911 में जब ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम भारत आए तो 26 दिसंबर 1911 को कलकत्ता में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में उनके लिए आयोजित स्वागत समारोह के दौरान ही पहली बार टैगोर द्वारा लिखित ‘जन-गण-मन’ को गाया गया. यही इस विवाद की वजह है. इसे बदलने की मांग करने वाले कहते रहे हैं कि राष्ट्रगान की शुरुआत में ही प्रयोग किए गए शब्दों-जन-गण-मन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता’ में ‘अधिनायक’ और ‘भारत भाग्य विधाता’ का प्रयोग ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम की तारीफ करने के लिए प्रयोग किया गया था और इसे आजाद भारत के राष्ट्रगान के तौर पर अपनाया जाना गलत है और इसलिए इसमें बदलाव किए जाने की जरूरत है.

इस गीत से जुड़ा विवाद तब की अंग्रेजी मीडिया की देन है. जिसने बिना गीत को समझे ही यह लिख दिया कि टैगोर ने जॉर्ज पंचम की तारीफ में गीत लिखा. इसकी वजह शायद उसी कार्यक्रम में जन-गण-मन के तुरंत बाद रामानुज चौधरी द्वारा जॉर्ज पंचम की तारीफ में समर्पित गीत का गाया जाना भी हो सकती है. अंग्रेजी अखबार द स्टेट्मसैन ने 28 दिसंबर 1911 को लिखा, ‘बांग्ला कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने सम्राट का स्वागत करने के लिए अपने द्वारा रचित एक गीत गाया.’

बांग्ला अखबार बंगाली ने इसके उलट इस अंतर को साफ तौर पर स्पष्ट करते हुए 28 दिसंबर 1911 में लिखा था, ‘कांग्रेस का वार्षिक समारोह महान बांग्ला कवि रवींद्रनाथ टैगौर द्वारा रचित गीत को गाए जाने के साथ शुरू हुआ. इसके बाद राजा जॉर्ज के प्रति वफादारी प्रकट करने वाला प्रस्ताव पास किया गया. इसके बाद राजा के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए लड़को-लड़कियों के एक ग्रुप ने एक गीत गाया.’

टैगोर ने खुद ही बताया था सचः

जॉर्ज पंचम की तारीफ में गीत लिखने के आरोपों से टैगोर खुद भी बहुत आहत हुए थे. उन्होंने जॉर्ज पंचम की तारीफ में गीत लिखने से इनकार करते हुए 1937 में पुलिन बिहारी सेन को लिखे खत में लिखा, ‘राजा की सेवा में उच्च पद पर नियुक्त मेरे एक दोस्त ने मुझे राजा के स्वागत समारोह के लिए गीत लिखने का निवेदन किया. उनके इस निवेदन ने मुझे हैरान कर दिया. इससे मेरे हृदय में गहरी पीड़ा हुई. इस जबर्दस्त मानसिक आशांति की प्रतिक्रिया में मैने जन-गण-मन में भारत के उस भाग्य विधाता (God of destiny) की विजय के बारे में लिखा जिसने हर उत्थान और पतन और उबाड़-खाबड़ रास्तों में भी भारत के रथ की बागडोर को दृढ़ रखा. वह भाग्य विधाता, वह चिरस्थाई नेतृत्वकर्ता कभी भी जॉर्ज पंचम, जॉर्ज षष्ठम या और कोई जॉर्ज नहीं हो सकता.’ टैगोर का यह खत प्रभात कुमार चटर्जी द्वारा लिखी गई उनकी जीवनी ‘रवींद्रजीवनी’ में भी छपा है. टैगोर की देशभक्ति पर सवाल उठाने वालों की बात इसलिए भी गलत लगती है क्योंकि टैगोर ने वर्ष 1919 में जलियांवाला बाग में अंग्रेजो द्वारा किए गए नृशंस हत्याकांड के बाद अंग्रेजी हुकूमत की ओर से उन्हें दी गई नाउटहुड यानी सर की उपाधि लौटा दी थी.

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