क्या भारत के सभी नागरिक राष्ट्रवादी नहीं होने चाहिए ? गणतंत्र दिवस पर विशेष

ओ३म्

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भारत संसार का सबसे प्राचीन देश है। इसका धर्म सनातन वैदिक धर्म है। यह धर्म सृष्टि की उत्पत्ति के साथ परमात्मा द्वारा अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न मनुष्यों के द्वारा ईश्वर की प्रेरणा व वेदों के ज्ञान, ऋग्वेद-यजुर्वेद-सामवेद-अथर्ववेद, की प्राप्ति से आरम्भ हुआ था। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, सर्वान्तर्यामी एवं निराकार आदि अनन्त गुणों वाला है। ईश्वर मनुष्य की हृदयस्थ जीवात्मा के भीतर भी व्यापक वा अन्तर्यामी है। वह चेतन होने के कारण जीवात्मा को प्रेरणा करता है। सृष्टि के आरम्भ में वह सृष्टि के सभी मनुष्यों को ज्ञान देता है और वेदों का ज्ञान उस ज्ञान के ग्रहण करने में सर्वथा समर्थ, योग्य व पात्र चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को देता है। यह चार ऋषि ही अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न अन्य युवा स्त्री पुरुषों को वेदों का ज्ञान वेदों की भाषा संस्कृत में प्रदान करते हैं। परमात्मा प्रदत्त वह वेदज्ञान ही समस्त सृष्टि काल 4.32 अरब वर्षों के लिये सभी मनुष्यों का धर्म होता है। वेद ज्ञान लुप्त न हो इसके लिये वेदों के ज्ञानी ऋषियों व विद्वानों का होना आवश्यक होता है। यदि वेदज्ञानी ऋषि व विद्वान समाज में नहीं होंगे तो वेदज्ञान लुप्त हो सकता है जिससे लोगों में भ्रान्तियों उत्पन्न होकर अविद्या फैलती है। ऐसा ही आजकल देखा जा रहा है। यह भी सम्भव हो सकता है कि भ्रान्त लोग अपनी क्षमता व ज्ञान सहित अपने स्वभाव व आकांक्षाओं के अनुरूप मत, मतान्तर व गुरुडम को चलायें व फैलायें। यह भी आजकल देखने को मिलता है। स्वामी दयानन्द जी ने इस विषय में अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के माध्यम से इस विषय में लोगों का मार्गदर्शन किया है।

पांच हजार वर्ष पूर्व देश में महाभारत का युद्ध हुआ था जिसमें अनेक क्षत्रिय राजा व राजपुरुषों सहित ऋषि व विद्वान भी मारे गये थे। वेदाध्ययन की परम्परा अव्यवस्थित व स्थगित हो गई थी। इसी कारण से कालान्तर में देश में अविद्या का प्रचार व प्रसार हुआ और अविद्यायुक्त मत-मतान्तरों की देश देशान्तरों में उत्पत्ति वा आविर्भाव हुआ। समय के साथ यह क्रम बढ़ता गया। इससे मनुष्यों की बुद्धि जड़ व रुढ़ियों से ग्रस्त हो गई। यही कारण है कि ऋषि दयानन्द (1825-1883) द्वारा अपने समय में ईश्वरीय ज्ञान वेद का अन्वेषण, अनुसंधान एवं अध्ययन किया। उन्होंनेयोग-समाधि अवस्था को प्राप्त होकर ईश्वर का साक्षात्कार किया। ईश्वर के साक्षात्कार सहित उन्होंने वेदमन्त्रों के अर्थों का साक्षात्कार भी किया और सत्य वेदार्थ को प्राप्त होकर उसका देश देशान्तर में प्रचार किया। उनके समय के लोग अपनी बुद्धि की जड़ता, अज्ञानता, पात्रताहीनता सहित लोभ आदि स्वार्थों के कारण वेदों के ज्ञान का लाभ नहीं ले सके। देश व समाज में अविद्या व मत-मतान्तरों से उत्पन्न असंगठन, जीवन शैली एवं रीतिरिवाजों में अनेकता आदि कारणों से देश आठवीं शताब्दी में आततायी मुगलों का गुलाम हो गया। तलवार की जोर पर यहां के लोगों का धर्मान्तरण कर जनसंख्या को बढ़ाया गया और वैदिक धर्मियों पर विदेशियों द्वारा शासन किया गया। ऋषि दयानन्द की प्रेरणा से देश की स्वतन्त्रता व स्वराज्य के लिये ईसा की उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आन्दोलन आरम्भ हुआ। कालान्तर में अंग्रेजों ने देश का विभाजन किया और देश को आंशिक स्वतन्त्रता प्रदान की। इस विभाजन में मुसलीम लीग की अनुचित मांग सहित कुछ हिन्दू नेताओं की अदूरदर्शितापूर्ण कृत्रिम अव्यवहारिक नीतियां भी सम्मिलित थीं। देश को दिनांक 15 अगस्त, 1947 को खण्डित आजादी मिली। देश का संविधान बना और यह 26 जनवरी सन् 1950 से लागू हुआ। इसी दिन को विगत 70 वर्षों से गणतन्त्र दिवस के रूप में मनाया जा रहा है।

देश के संविधान बहुत सी अच्छी बातें हैं। संविधान बनाने वाले मनुष्य होते हैं जो सभी अल्पज्ञ होते हैं। जीव अल्पज्ञ होता है, यह सिद्धान्त अनेक तर्कों से सिद्ध है। परमात्मा पूर्ण एवं सर्वज्ञ है तथा सभी जीवात्मा व मनुष्य अल्पज्ञ अर्थात् अल्प-ज्ञान वाले अपूर्ण होते हैं। यही कारण है कि देश का संविधान लागू होने के 70 वर्षों से कम अवधि में ही इसमें 100 से अधिक बार संशोधन करने पड़े। वर्तमान में भी कुछ अच्छे संशोधन किये गये हैं और अभी भी अनेक संशोधनों की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। देश की जनसंख्या बढ़कर 130 करोड़ से भी अधिक हो गयी है। देश की आजादी के समय यह मात्र 35 करोड़ थी। इस बारे में हमारे संविधान निर्माताओं ने सोचा भी नहीं था इस कदर जनसंख्या में वृद्धि होगी। इसी के कारण आज देश में अशान्ति, बेरोजगारी, अभाव, अन्याय, अशिक्षा, रोग, कानून व्यवस्था के पालन की समस्यायें आदि अनेक समस्यायें उत्पन्न हुई हैं। देश के संसाधन निरन्तर कम हो रहे हैं और जनसंख्या बढ़ नही है। वायु एवं जल प्रदुषण का एक प्रमुख कारण भी जनसंख्या में वृद्धि होना है। लोगों के अन्दर लोभ की प्रवृत्ति के कारण कुछ धनाड्य लोगों के पास इतना धन इकट्ठा हो गया है कि देश की लगभग आधी जनता को दो समय का भरपेट भोजन यथा साधारण दाल रोटी व सब्जी भी नसीब नहीं होता। इसे हमारी व्यवस्था पर एक कलंक ही कह सकते हैं कि देश अपने सभी नागरिकों को दो समय का भोजन भी उपलब्ध नहीं करा सकता।

इसी प्रकार देश के नागरिकों की शिक्षा, चिकित्सा, वस्त्र एवं आवास आदि की भी समस्यायें हैं। वर्तमान व्यवस्था से इन पीड़ित व अभावग्रस्त लोगों को कभी न्याय मिलेगा, इसकी कोई सम्भावना दृष्टिगोचर नहीं होती। देश के धनाड्य लोग अपने ही अभावग्रस्त व दुःखी लोगों की चिन्ता नहीं करते और विलासिता एवं भोग से पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं। देश के कुछ राजनीतिज्ञों, क्रिकेट के खिलाड़ियों, अभिनेताओं, बड़े व्यवसायियों के पास अथाह धन इकट्ठा हो गया है। दूसरी ओर देश में लोग प्रतिवर्ष लाखों लोग भूख व रोग से मर जाते हैं। देश में विगत 70 वर्षों में जो वैज्ञानिक उन्नतियां हुई है, देश में विद्यमान गरीबी और अशिक्षा उसकी महत्ता को नगण्य सिद्ध करती हैं। आजादी के बाद देश में अब तक अनेक दलों की सरकारें आयी हैं जिन्हें संविधान की सीमा में रहकर काम करना होता है। कुछ ने इमानदारी से काम भी किये और कुछ ने सत्ता में बने रहने पर अधिक ध्यान दिया। वर्तमान स्थिति यह है कि आज भी देश के गरीबों की भूख व शिक्षा आदि की समस्यायें हल नहीं हुई। देश में आरम्भ से ही साम्प्रदायिकता की भी समस्या है जिसे वर्तमान की देश की व्यवस्था हल करने में सफल नहीं हुई अपितु यह समस्या अत्यधिक उलझती जा रही है। देश में बहुत से लोग हैं जो अपने ही देशवासियों से स्वयं को असुरक्षित अनुभव करते हैं। कुछ लोग अपने प्रभाव व संगठन के कारण दूसरों को गुप्त रूप से डराते भी हैं और लोग उनसे डरते भी हैं। ऐसे प्रश्नों का समाधान वर्तमान व्यवस्था से नहीं हो पा रहा है।

हमारे राजनेता भी साम्प्रदायिकता आदि समस्याओं की उपेक्षा करते हैं। वर्तमान केन्द्र सरकार के आने के बाद देश में अनेकानेक अच्छे काम हुए हैं परन्तु अनेक समस्यायें हैं जिनके लिये व्यवस्था परिवर्तन की आवश्यकता सभी निष्पक्ष विद्वान व नेता अनुभव करते हैं। लोगों के पास सुझाव भी हैं परन्तु देश के कुछ लोग व राजनीतिक दल अपने-अपने मत व सम्प्रदाय के लाभ-हानि के संकीर्ण दृष्टिकोण से ही समस्याओं को देखते हैं और उनका साम्प्रदायिकीकरण व राजनीतिकरण हो जाता है जिससे वह समस्यायें हल होने की स्थिति में नहीं है। सभी समस्याओं के समाधान के लिये एक समाधान यह भी है कि देश में ऋषि दयानन्द प्रोक्त वैदिक व्यवस्था को लागू किया जाये। किसी भी नागरिक के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिये। पूरे देश में एक ही शिक्षा पद्धति हो जिसमें वैदिक मूल्यों की शिक्षा अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिये। इससे देश के सभी नागरिक एक मन, एक विचार, एक सुख-दुःख का अनुभव कर सकेंगे। देश में सत्य व असत्य मान्यताओं व सिद्धान्तों को लेकर बहस भी होनी चाहिये। इस संसार को बनाने व चलाने वाला ईश्वर एक ही है। वह दो या तीन अथवा एक से अधिक नहीं है। उसके सत्य स्वरूप पर परस्पर प्रीतिपूर्वक बहस होनी चाहिये और उसके अविवादित सत्यस्वरूप को सबको स्वीकार करना चाहिये।

जन्मना जातिवाद देश के लिये अभिशाप है इसको भी कानून बनाकर बन्द किया जाना चाहिये। मनुष्य के गुण, कर्म व स्वभाव के अनुसार ही सभी देशवासियों को मान-सम्मान व अधिकार मिलने चाहियें। भ्रष्टाचार दूर करने के लिये कड़े कानून होने चाहियें और उनका त्वरित न्याय व निस्तारण होना चाहिये। मानव अधिकारों पर भी चर्चा करनी चाहिये। क्या मानव अधिकार किसी एक समुदाय के ही होते हैं या यह सभी देशवासियों वा हिन्दुओं के भी होते हैं? क्यों किसी समुदाय के एक व्यक्ति की मृत्यु पर मानव अधिकार वाले प्रश्न करते हैं और बहुसंख्या में कश्मीर व अन्य स्थानों पर होने वाली हिंसा पर वह मौन रहते हैं? इन सब प्रश्नों का हल मिलना चाहिये। यदि ऐसा नहीं होतो तो मानव अधिकार की बात करना ही छोड़ देना चाहिये। पक्षपात किसी देशवासी के भी अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक हो, यह अन्याय की श्रेणी में आता है। अतः वर्तमान आधुनिक युग में हर बात पर न्यायपूर्वक विचार कर उसका निर्णय होना चाहिये। न्याय में अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक का भेद नहीं होना चाहिये। देश की जनंसख्या पर भी चर्चा होनी चाहिये कि यह अब इससे किंचित अधिक न बढ़े। इसके लिये सभी उपाय किये जाने चाहिये। इसमें लोगों व मतों की भावनाओं का कम परन्तु देश व समाज हित का अधिक ध्यान देना चाहिये। जब हम 130 करोड़ देशवासियों को दो समय का भोजन, वस्त्र व निवास सहित रोजगार नहीं दे पा रहे हैं तो देश की जनसंख्या को बढ़ने से रोकने का काम अनिवार्य, अत्यावश्यक एवं अपरिहार्य हो जाता है। ऐसे अनेकानेक प्रश्न हैं जिन पर विचार होना चाहिये और देश एवं भारत के प्राचीन गौरव के अनुरूप निर्णय किया जाना चाहिये।

यदि देश में किसी मनुष्य के साथ भेदभाव, पक्षपात, अन्याय व अत्याचार होता है तो फिर इस व्यवस्था की सराहना नहीं की जा सकती। देश में लोग अभावों, अन्याय व अत्याचारों से जूझें और मर जायें, यह देश एवं मानवता के लिये अपमानजनक होने सहित व्यवस्था पर कलंक होता है। अतः गणतन्त्र दिवस देश के नागरिकों में सभी प्रकार के अन्तर, भेदभाव, अन्याय, अत्याचार, पक्षपात, जनसंख्या नियंत्रण, देशविरोधियों व हिंसा करने वालों को कठोरतम दण्ड देने आदि कार्यों पर विचार करने तथा व्यवस्था में सुधार करने का निर्णय लेने का दिन भी है। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो आने वाला समय देश व देशवासियों के लिये सुखद नहीं होगा। हम इस बात की भी आवश्यकता अनुभव करते हैं कि देश के सभी नागरिकों एवं बुद्धिजीवियों सहित सभी राजनीतिक दलों के लोगों को कट्टर राष्टवादी होना चाहिये अन्यथा देश व इसके नागरिकों को सुख लाभ न होकर हानि होगी। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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