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भारतीय संस्कृति

दाम्पत्य : जहां एक और एक का योग भी एक ही होता है

-राकेश कुमार आर्य

सार में किसी भी व्यक्ति से पूछा जाए कि एक और एक मिलकर कितने होते हैं? उत्तर आएगा कि दो होते हैं। कई लोग इसे ग्यारह भी बताते हैं। उनके ग्यारह बताने का भी विशेष अर्थ है। परंतु वैदिक गृहस्थाश्रम का गणित एक और एक के मिलन को न तो दो कहता है और ना ही ग्यारह कहता है, अपितु वह बहुत सुंदर उत्तर देता है, और ऐसा उत्तर कि जो वैज्ञानिक भी हैं और तार्किक भी। वह कहता है कि (पाणिग्रहण के अवसर पर) एक और एक अर्थात वरवधू दोनों की पवित्रात्माएं मिलकर एक हो रही हैं।

अन्य मतावलंबी इस मिलन को ‘कपल’ कहते हैं, युगल कहते हैं, या जोड़ा कहते हैं। परंतु वेद इन्हें दम्पती कहता है। कपल में, युगल में या जोड़ा में दो का भाव है, दूरियां मिटी सी नही लगती हैं, अपितु दो के अस्तित्व का भान होता है, परंतु दम्पती कहते ही ये दो का भाव एक में सिमट गया। दूरियां मिट गयीं। एक हल्का सा पर्दा मात्र भी बीच में नही रहा। भारतीय आदर्श विवाह पद्घति का आदर्श इतना पवित्र है। सात फेरे क्या ले लिए सात जन्मों तक साथ रहने की मानो सौगंध ही उठा ली yoअग्नि के समक्ष लिए गये फेरों के समय तीन फेरों में पत्नी आगे रहती हैं और चार फेरों में पति आगे रहता है। पति के पास मानो विदेश मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार है इसलिए उसे नेतृत्व करने का एक फेरा अधिक दे दिया जाता है, अन्यथा तो सब जगहों में कौन कब कौन से का नेतृत्व करने लगे, कुछ नही कहा जा सकता? ऐसे बहुत से अवसर हैं जहां पति को पत्नी का नेतृत्व स्वीकार करना ही पड़ता है, यथा जब पत्नी मायके में हो, तो वहां बच्चे भी उसी के कहे जाते हैं और पति चुपचाप सुनता रहता है। दूसरे पुत्र पुत्री के विवाह के समय सामान्यत: पत्नी का नेतृत्व रहता है, तीसरे बच्चों की शिक्षा आदि के प्रबंध में भी सामान्यत: पत्नी की ही चलती है, घर में कोई भी समारोह पत्नी की स्वस्थ सहमति और सम्मति के बिना संपन्न नही हो सकता, इत्यादि।

पत्नी लक्ष्मी है

लक्ष्मी वह होती है जो लक्ष्य प्राप्ति में सहायक हो, जो धन लक्ष्य प्राप्त कराता हो उसे ही लक्ष्मी कहा जाता है, परंतु जो धन लक्ष्य से भटकाए, व्यक्ति को बौरा दे-वह धन निधन बन जाता है। वेदों ने ही नही, अपितु संपूर्ण वैदिक वांग्मय में नारी को गृह लक्ष्मी कहा गया है। वास्तव में नारी ही धन को लक्ष्मी बनाती है, सुघड़ नारी आज भी घर की सारी व्यवस्था को सुंदर ढंग से देखती है, इसीलिए वह अपने गुणों से घर का नेतृत्व स्वयं ले लेती है और बहुत से पति उसके गुणों को देखकर उसे घर का नेतृत्व सौंप भी देते हैं। ऐसी व्यवस्था से आज भी इस देश में करोड़ों दम्पती अपनी जीवन नौका को चला रहे हैं। इस देश में आज भी गृह लक्ष्मियों का राज है और वो गृहलक्ष्मी ही अधिक संख्या में हैं अपेक्षाकृत उन अपवादों के जो किन्हीं भी कारणों से न्यायालयों में खड़ी हैं, और यह निष्पक्षता से कहा जा सकता है कि न्यायालयों में वही नारियां या पुरूष खड़े हैं जिन्होंने स्वयं को संविदा के दो पक्ष माना है, एक दूसरे का प्रतियोगी माना है, युगल माना है, जोड़ा माना है, कपल माना है, जिन्होंने आत्मीय धरातल पर एक दूसरे को अपना मान लिया वो तो दंपत्ति के अर्थ को समझ गये और वह नरश्री (आश्रय दाता) और नारी श्रीमति (आश्रय प्रदात्री) बन गयी। भारतीय विवाह पद्घति का अंतिम लक्ष्य यही है। यहां विवाह होता है, जैसे तैसे मिलकर ‘निर्वाह’ नही होता है।

नारी दासी नही साम्राज्ञी है

अथर्व वेद (14/1/43) में आया है–

त्वं सम्राज्ञयेधि पत्यिुरस्तम परेत्य।

सचमुच नारी दासी नही अपितु वह घर की साम्राज्ञी है। यजु. (6/25) में पति कहता है:-

हृदे त्वा मनसे त्वा=अर्थात मैं तुम्हें हृदय में रखने के लिए ग्रहण करता हूं। कहने का अभिप्राय है कि तुम्हें अपने हृदय में बसाता हूं उसमें आश्रय देता हूं।

ऋग्वेद एक और एक को एक बनाते हुए अनूठी घोषणा करता है :-

‘समञ्जन्तु विश्वे देवा: समायो हृदयानि नौ।’ (10/85/46)

अर्थात हम दोनों के हृदय ऐसे एक हो जाएं जैसे दो पात्रों का पानी एक साथ मिलकर एक हो जाता है। एक और एक मिलने से एक बनने की बात को सिद्घ करने का इससे सुंदर प्रमाण नही हो सकता। संसार का कोई भी यंत्र ऐसा नही है, जो दो पात्रों के जल के मिलन के पश्चात यह कह सके या सिद्घ कर सके  कि अमुक जलराशि अमुक पात्र की है और अमुक जलराशि अमुक पात्र की है। इसलिए आदर्श परिवारों में आज भी बहू को पराई नही माना जाता, उसे पराए पात्र का जल नही माना जाता है, अपितु अपने ही पात्र का जल माना जाता है।

गृह पताका है पत्नी

पताका के सम्मान के लिए मर मिटना भारत की प्राचीन परंपरा है। रामायण और महाभारत काल में भी पताकाओं के उल्लेख मिलते हैं। पताका के प्रति गौरव का भाव प्रत्येक योद्घा का होता था। यदि पताका झुक गयी तो पतन हो गया मान लिया जाता था और आज भी यही स्थिति है। हर व्यक्ति अपनी पताका को लिए फिर रहा है-उसके यश और कीर्ति में जैसे ही कहीं अपयश का दाग लगता है वैसे ही पतन हुआ मान लिया जाता है।

नारी को वेद (ऋग 10/159/2) में अहम केतुरहं मूर्धा-कहकर घर की पताका कहा गया है। पताका की रक्षा के लिए, उसके सम्मान के लिए पुरूष का मिटना लाजिम है, परंतु वह अपनी पताका को दूसरे को नही दे सकता। इस भाव से पुरूष वर्ग नारी के सम्मान और सुरक्षा के लिए स्वयं को समर्पित करता है। इसलिए पत्नी को घर की पताका, गृहाश्रम रूप शरीर का मस्तक कहा गया है।

ऋषि दयानंद कहते हैं…..

यजुर्वेद (8/43) में एक मंत्र आया है :–

इडेरन्ते हव्ये काक्येचन्द्र ज्योते अदिते सरस्वती महि विश्रुति।

एवाते अघ्न्ये नामानि देवेभ्यो मा सुकृतं ब्रूतात्।।

महर्षि दयानंद ने इस मंत्र में एक आदर्श, सुसंस्कृत और विदुषी पत्नी के विविध गुण निम्नवत गृहीत किये हैं:-इडा नाम से उसकी स्तुति योग्यता, रन्ति नाम से रमणीयता, हव्या से आह्वान योग्यता, काम्या से कमनीयता, चंद्रा से आहलाद कारकता, ज्योता से सुशीलतादि से द्योतमानता, अदिति से आत्म रूप अविनाशिता, सरस्वती से प्रशस्त विज्ञान शालिता, मही से पूज्यता, विश्रुति से बहुश्रुतता और अघन्या से तिरस्कार की अनौचित्यता ग्रहण की है। इन गुणों में से आधे गुण भी जिस नारी में आज भी हैं वह आज भी वंदनीया और नमनीया समझी जाकर पूजी जा रही है। अपनी ऊर्जा को नकारात्मकता में प्रवाहित करने वाले लोग तनिक सकारात्मकता की ओर बढ़ें तो सही देखने से पता चल जाएगा कि नारी के निर्माण में भारतीय संस्कृति का और इस संस्कृति के निर्माण में नारी का कितना प्यारा और अन्योन्याश्रित संबंध है।

पुत्र पुत्री को वेद प्रजा कहता है

वेदों में ऐसे कितने ही मंत्र हैं जिनमें वर-वधू को परस्पर मिलकर प्रजा उत्पत्ति करने का उपदेश निर्देश या संदेश दिया गया है। प्रजा का अभिप्राय पुत्र और पुत्री दोनों से है। उसका अर्थ केवल पुत्र की इच्छा से ही नही लिया जा सकता। फिर भी वेदों में ऐसे भी कई स्थल हैं, जहां पुत्री की कामना की गयी है। जैसे-

मम पुत्रा: शत्रुहणो अथो में दुहिता विराट।

ऋग (10/159/3) अर्थात मेरे पुत्र शत्रुहन्ता हों और पुत्री भी विशेष तेजस्विनी हों।

ऋग्वेद (8/31/8) में आया है कि यज्ञ करने वाले पति पत्नी, पुत्रों और पुत्रियों वाले होते हैं।

युजुर्वेद (22/22) के सुप्रसिद्घ मंत्र जिसे कि वैदिक राष्ट्रीय प्रार्थना और वैदिक राष्ट्रगान कहा जाता है-आब्रहमन् ब्राहमणो ब्रह्म वर्चसती जायताम्…..में जहां सभ्य योद्घा और यजमान पुत्रों के होने की बात कही गयी है वहीं पुत्रियों के सुभग, बुद्घिमती होने की प्रार्थना राष्ट्र के लिए की गयी है।

अत: वेद का राष्ट्रगान उस कमी को पूरा करता है जिसे आज का राष्ट्रगान नही कर पाया। आज के राष्ट्रगान में बलवान सभ्य, योद्घा और यजमान पुत्रों के तथा बुद्घिमती नारियों के होने की प्रार्थना नही की गयी है। जबकि राष्ट्र निर्माण के लिए इन दोनों का ऐसा होना अनिवार्य है। नारी की समानता की वैदिक संस्कृति के चप्पे चप्पे से सुगंध निकल रही है-सुनने वालों की और सूंघने वालों की आवश्यकता है। संगीत तो प्यारा है। परंतु सुनाया जाए बहरों को तो उसका लाभ क्या? पर जब ठीक ठाक सुनने वाले भी बहरे बने बैठे हों तो क्या कहा जाएगा?

दोष कहां से आया?

वेदों की पवित्रता में दोष कहां से लगा? यह बात विचारणीय है। इसके लिए राजनीतिक व्यवस्था का पतनोन्मुख हो जाना अधिक उत्तरदायी है। जब तक जनकल्याण राजव्यवस्था का मुख्य ध्येय रहा तब तक वैदिक व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रही, परंतु जब राजाओं ने अपनी अपनी राजकीय सीमाओं के विस्तार के लिए और अपने अहम् की तुष्टि के लिए युद्घों का आश्रय लेना आरंभ कर दिया तो स्थिति पलट गयी। युद्घों में पुरूष यानि पुत्र ही काम आते हैं-इसलिए पुत्रों की इच्छा को प्रेरित करने वाली प्रार्थनाएं अधिक होने लगीं। युगधर्म का यह तकाजा देश की संस्कृति पर कलंक बनकर लग गया और हम हैं कि इसे धोने का नाम ही नही ले रहे हैं। इसे ‘बाबा की सोटी’-पूर्वजों की देन मान लिया है और आंखें बंद करके इसकी पूजा करते जा रहे हैं। जिन्हें दीवार पर लिखा साफ समझ में आ रहा है वो भी अंधों के शहर में आइने बेचने का काम किये जा रहे हैं। कलंकों को धोना अच्छा होता है, उन्हें ढोना नही चाहिए। आईना बेचो पर वेद का आईना बेचो-अंधों को भी दीखने लगेगा। तीव्र प्रकाश को आने दो, बहने दो समीर को-रोको मत-परंपराओं के नाम पर रूढ़ियों को गले मत लगाओ। खुली हवाओं के झोंके यदि रोके गये तो अभीष्टï नही अनीष्टï ही हाथ आएगा।

विधवा की स्थिति

वैदिक समाज में विधवा की स्थिति भी सम्माननीय रही है। पर जब वेद विरूद्घ अविद्या का प्रचार प्रसार देश में बढ़ा तो स्थिति पलट गयी। विधवा को सती करने की या कराने की परंपरा वेद विरूद्घ थी। पर इस कुरीति पर विचार करना आवश्यक है कि यह आयी क्यों? प्रथम कारण तो यही था कि वेद विरूद्घ अविद्या का प्रचार प्रसार यहां बढ़ा, दूसरा कारण यह था कि मुस्लिम काल में जब राजपूत राजा मुस्लिमों से जब किन्हीं कारणों से युद्घ हार जाते थे तो उनकी पत्नियों, पुत्रियों और माताओं के साथ जो अमानवीय अत्याचार मुस्लिम विजेताओं के द्वारा किये जाते थे उन्हें देखकर रोंगटे खड़े हो जाते थे। इसलिए उन अत्याचारों से बचने के लिए भी कई बार देवियां स्वयं ही मृत्यु का आलिंगन कर लिया करती थीं, इसी से राजपूतों में जौहर की परंपरा का प्रचार हुआ।

हम देखते हैं कि 1857 की क्रांति के समय दिल्ली में जब अंग्रेजों ने प्रतिशोध में जलते हुए लोगों पर अमानवीय अत्याचार करने आरंभ किये तो अंग्रेज लेखकों ने ही लिखा कि कुंओं में कूद कूदकर महिलाओं ने अपना प्राणान्त कर लिया था। पति के पश्चात मिलने वाले अत्याचार के भय से सती प्रथा की कुरीति भारत में फैली। जब इसका आपद धर्म का महिमामंडन हुआ तो कई महिलाओं ने स्वेच्छा से तो कईयों को पुरूष समाज की निर्ममता ने सती होने के लिए प्रेरित किया।

यह स्थिति सीधे सीधे अत्याचार थी। इसी अत्याचार ने महर्षि दयानंद और राजा राममोहन राय जैसे लोगों को सती प्रथा के विरूद्घ आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया। बास्तव में यह स्थिति आपद धर्म था, जो तूफान के समय अपना लिया जाता है, पर तूफान के निकल जाने पर इसे त्यागना ही उचित होता है।

नारी को पति के साथ सहमरण के लिए सायण जैसे लोगों ने भी प्रेरित किया। जिन्होंने वेदों के रहस्यों को न समझकर उल्टी व्याख्याएं कीं। उसने एक स्थल पर लिखा है:- स्मृति पुराण आदि में प्रसिद्घ सहमरण रूप धर्म का परिपालन करती हुई यह नारी पति लोक को, अर्थात जिस लोक में पति गया है उस स्वर्ग लोक को प्राप्त करना चाहती हुई तुझ मृत के पास पहुंच रही है। अगले जन्म में इसे पुत्र पौत्रादि प्रजा और धन प्रदान करना। स्पष्टत: सायण की इस व्यवस्था में ढोंग और पाखण्ड का पुट है। नारी को पुत्र पौत्रादिक और धन का लालच दिया गया है और उसे मृत्यु  कष्ट को झेलने के लिए पति के प्रति आत्मिक प्रेम के झांसे में डलकर ‘बलि का बकरा’  बनाने का प्रयास किया गया है। जबकि वेदों का अभिप्राय ऐसा कहीं पर भी नही रहा है।

सायण ने झूठ बोला कि नारी यदि सहमरण करती है तो मृत्यु के पश्चात अगले जन्म में भी उसे वही पति मिलेगा। पाखण्डी लोगों ने इस व्याख्या का जमकर प्रयोग किया और राजनीतिक कारणों से देश में नारी के सहमरण  का जो आपद धर्म फैला उसे इन व्याख्याओं ने धार्मिक आवरण में लोगों के सामने प्रस्तुत करने का काम किया। जबकि अथर्ववेद के 18वें काण्ड का तीसरा मंत्र विधवा के पुनर्विवाह की साक्षी देता है।

महर्षि दयानंद जी महाराज ने तो द्वीवर का अर्थ देवर किया है और देवर को किसी भी आपद काल में वधू का दूसरा वर कहा है। प्रथा भी यही थी और उचित भी यही है कि यदि पति मर जाए तो देवर के साथ पुनर्विवाह कर दिया जाए। अब यदि देवर पहले से ही विवाहित है और वधू अभी युवती है तो उस परिस्थिति में वह अन्यत्र भी पुनर्विवाह करने की अधिकारिणी है। कुल मिलाकर वेद किसी नारी को विधवा होने की अवस्था में भी उत्पीड़ित और उपेक्षित करने का समर्थन नही करते। वेद ने तो नारी को यज्ञ का, वेद के पठन पाठन का और प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़कर अपनी बौद्घिक शक्तियों के पूर्ण प्रदर्शन का अवसर प्रदान किया है। वेद (ऋग. 8/33/17) में आया है:-

इन्द्रश्चिद धा तदब्रवीत स्त्रिया अशास्यं मन:।

उतो अह क्रतुं रघुम् ।।

अभिप्राय है कि स्त्री के मन पर शासन या अंकुश नही रखा जाना चाहिए, पुरूष के समान उसे भी विचारों की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। उसके भीतर भी जो प्रतिभा है, आभा है और वैचारिक शक्ति का प्राबल्य है उसका लाभ परिवार को, समाज को और राष्ट्र को मिलना चाहिए। तभी तो पाणिग्रहण संस्कार के समय वर वधू के प्रति संकल्प लेते हुए कहता है :-

इषेराये रमस्व सइसे द्युम्न ऊर्जे अपत्याय।

सम्राइसि स्वराइसि सारस्वतौ त्वोत्सौ प्रावताम।।  (यजु 13/35)

अभिप्राय है कि हे देवी! तुम ज्ञान विज्ञान के लिए, धन के लिए, बल और साहस के लिए, पराक्रम के लिए, संतान के लिए पति गृह में रमो। तुम सम्राज्ञी हो। तु स्वकीय विद्या, बल आदि से देदीप्यमान हो। ऋक सामरूप तथा मनवाणी रूप प्रवाह तुम्हारी रक्षा करें।

बात स्पष्ट है कि वेद नारी को ज्ञान विज्ञान प्राप्ति की कामना, धन की चाहना, बल और साहस की प्रार्थना और पराक्रम की याचना पर प्रतिबंध नही लगाता, अपितु पति के गृह में जाकर इन सबको प्राप्त करने के लिए उसे प्रोत्साहित करता है। यही कारण है कि प्राचीन भारत में एक से बढ़कर एक सन्नारी हमें मिलती हैं, जिन्होंने किसी न किसी प्रकार से अपनी उत्कृष्ट प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

कुछ चीजों में फिर भी पत्नी पति से पीछे रहती है-क्योंकि उसे प्रकृति ने ही ऐसा बनाया है-इसमें प्रकृति ने उसके साथ न्याय ही किया है, वह प्रकृति का दोष नही है। नारी धर्म की अपनी मर्यादा है और पुरूष धर्म की अपनी मर्यादा है। कहने का अभिप्राय है कि नारी नारी है-पुरूष पुरूष है, बराबरी के नाम पर यदि इनमें प्रतिस्पर्द्घा की आग लगा दी तो संपूर्ण व्यवस्था ही धू धू करके जल उठेगी। इसलिए महिला अधिकारों की मांग करने वाले लोग थोड़ा विवेक और संयम प्रदर्शित करें। सच को समझें तो ही अच्छा है।

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