चीन, सिंगापुर, मलयेशिया का राष्ट्रवाद भारत के लिए प्रेरणादायी

पिछले दिनों में चीन, सिंगापुर और मलयेशिया की यात्रा करके लौटा हूं। मुझे कुछ चीजों ने इन देशों में इतना प्रभावित किया है कि उन्हें आपके लिए लिखा जाना अनिवार्य मान बैठा हूं। जैसे चीन में हर व्यक्ति अपनी राष्ट्र भाषा चीनी से असीम स्नेह करता है। वह हर विदेशी से अपेक्षा करता है कि वह भी उन लोगों से उन्हीं की चीनी भाषा में ही बात करें। दूसरी भाषा में और विशेषत: अंग्रेजी में बात करने से चीनियों को असुविधा ही नही, अपितु घृणा भी होती है। flag;sचीनियों का अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति ऐसा लगाव देखकर मुझे अच्छा लगा और अनायास ही अपने देश में बढ़ते विदेशी भाषा अंग्रेजी के प्रति लगाव की याद भी मुझे आती रही। यदि भारत के बारे में ही विचार करें तो यहां की जनता तो राष्ट्रप्रेमी है, परंतु शासन और नौकरशाही में यह भावना नही है। इस बात का सुबूत मुझे इन देशों में भारतीय खाने में चिकन और बिरयानी को भारतीय बताने में मिला। अहिंसा प्रेमी और जहां अधिकांश लोग शाकाहारी हैं वहां का प्रमुख खाद्य पदार्थ चिकन और बिरयानी देखकर व सुनकर मुझे दुख पूर्ण हैरानी हुई। हमारे यहां तो आपको हर होटल में, हर स्टेशन पर और हर सार्वजनिक स्थल पर अंग्रेजी का वर्चस्व दीखता है, पर चीन में ऐसा नही है। हां, चीन अहिंसा प्रेमी बौद्घ धर्मी होकर भी हिंसा प्रेमी है। वहां शायद ही कोई जीवधारी हो जिसे मारकर खाने की परंपरा ना हो। संभवत: यह स्थिति वहां कम्युनिस्ट शासन की देन है। सिंगापुर छोटा सा देश है, पर वहां की सफाई व्यवस्था ने मुझे अत्यधिक प्रभावित किया। कोई छोटा सा कागज भी आपको वहां सार्वजनिक स्थलों पर या सड़कों व गली मौहल्लों में पड़ा नही मिल सकता। पूरा देश सफाई के प्रति समर्पित था। मलयेशिया में भी यही स्थिति थी। वहां अधिकारी स्तर के भी लोग आपको टैक्सी के ड्राइवर के रूप में छुट्टी के दिन काम करते मिल जाएंगे। उन लोगों का कहना है कि कर्मशीलता हमारा राष्ट्रीय नारा है। हर व्यक्ति कर्मशील और सक्रिय रहना चाहता है। जबकि भारत में स्थिति इसके विपरीत है। यहां कर्मचारी निष्क्रिय रहना चाहता है और उसका अधिकारी सरकारी धन से मौज मस्ती करना चाहता है। मुझे यह सोचकर हैरानी हो रही थी कि इन छोटे छोटे देशों ने हमसे पीछे आजाद होकर अपने राष्ट्रीय चरित्र का इतनी सुंदरता से निर्माण किया है और हम उस राष्ट्रीय चरित्र को विकसित ही नही कर पाए? हमारे नेता और अधिकारी सिंगापुर जैसे छोटे देशों में जाते हैं और वहां मौजमस्ती करके चले आते हैं पर वहां की कोई अच्छी परंपरा को भारत के लिए लेकर नही आते। हम इसीलिए पिछड़ते जा रहे हैं। हमारे नेता और अधिकारी अपनी अच्छी चीजों को देश में ही नही अपितु विदेशों में भी अच्छे ढंग से पेश नही कर पाते हैं। यहां की अंग्रेज भक्त नौकरशाही आज भी भारत के प्रति आज अच्छा दृष्टिकोण नही रखती है। ये छोटे छोटे देश लगता है शायद अपने स्वरूप स्वयं गढ़ रहे हैं और हम शायद अपने गढ़ गढ़ाए स्वरूप को ही विकृत करते जा रहे हैं। वो विकास की ओर बढ़ रहे हैं तो हम विनाश की ओर बढ़ते जा रहे हैं। मुझे इन देशों में अपने देश के प्रति प्यार ही देखने को नही मिला, अपितु लोगों में आपसी प्रेम भी देखने को मिला। विदेशियों से पैसा ऐंठने की परंपरा भी यहां भारत से सर्वथा विपरीत थी। वहां आपके विदेशी होने की जानकारी होने पर आपसे कम पैसे चार्ज किये जाते हैं, जबकि वहां के स्थानीय लोगों से अधिक पैसे लिए जाते हैं। गरीबी नाम की चीज सिंगापुर में नही। कोई भी व्यक्ति बिना मकान के नही है। यदि किसी के पास मकान नही है, तो उसे सरकार मकान बनाकर देती है। लेकिन भारतीयों की तरह सरकारी मकान को लोग अपनी शान का प्रतीक न मानकर अपमान का प्रतीक मानते हैं। क्योंकि सरकारी मकान मिलने से उन्हें गरीब माना जाता है। जबकि भारत में अमीर लोग भी सरकारी मकान पाने के लिए और यहां तक कि सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों से सस्ती चीजें खरीदने के लिए जुगाड़ बाजी करते रहते हैं। हमारी सोच ऐसी बन गयी है कि जैसे भी हो दूसरों के हक का पैसा, धन, जमीन, जायदाद मिल जाएं वैसे ही ठीक है। यहाँ झूठे गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने के बी.पी.एल. कार्ड बनवाने के लिए अच्छे संपन्न व्यक्ति भी प्रयास करते हैं और कितने ही पात्र व्यक्तियों के हिस्से को खा जाते हैं। ऐसा ही सरकारी फ्लैट्स या मकानों के लिए होता है। जो लोग सरकार की आंखों में धूल झोंकने में संपन्न हो जाए, उसे ही अच्छा और जुगाड़ बाजी में फिट माना जाता है।
सचमुच मेरा तो आपसे भी कहना है कि आप इन देशों में अवश्य जाएं और वहां की अच्छी बातों को भारत में लागू कराने का प्रयास करें। भारत को अपना राष्ट्रीय चरित्र निर्माण की दिशा में ध्यान केन्द्रित करना होगा। जो देश या लोग हमसे शिक्षा लेते रहे हैं आज हम उन्हीं से शिक्षा पाने की स्थिति में आ गये हैं, तो इसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि निश्चय ही कहीं न कहीं भयंकर गलती हुई है।
(स्वामी चक्रपाणि)

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