आर्य समाज का दसवां नियम

आर्य समाज

लेखक – आर्य सागर

‌आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने आर्य समाज के संगठन के मार्गदर्शन के लिए 10 नियमों का निर्माण किया। यह समस्त नियम महर्षि के गहन गंभीर ज्ञान सिंधु विलक्षण प्रतिभा के द्योतक है। समय-समय पर बहुत से विद्वानों ने इन नियमों की पक्ष विपक्ष बनाकर व्याख्या या चर्चा की है, यह सभी नियम विस्तृत व्याख्येय हैं । इन नियमों की गहन व्याख्या करने वाले विद्वानों में निम्न नाम शामिल है पंडित गंगा प्रसाद उपाध्याय,पंडित युधिष्ठिर मीमांसक ,महान योगी स्वामी सत्यपति जी महाराज रोजड, प्रोफेसर रतन सिंह जी वर्तमान में वैदिक दार्शनिक विद्वान श्रद्धेय मुनि सत्यजीत जी रोजड भी आदि आदि शामिल है। हम आर्य समाज के 10 वें नियम की बात करें तो इस नियम को नियमों का भी नियम कहा जाता है, इस नियम में दो बार नियम शब्द आया है।

यह नियम इस प्रकार है –

प्रत्येक मनुष्य को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतंत्र रहना चाहिए, प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतंत्र रहे

आदरणीय सज्जनों नियमों के पालन में स्वतंत्रता व परतंत्रता का अंतिम परिणाम हम मनुष्यों का हित ही होता है। इस नियम में जो सर्वहितकारी पद आया है यह समस्तपद है यह शब्द सब मनुष्यों का नहीं हितकारी शब्द का विशेषण है अर्थात समस्त हितकारी नियम क्योंकि पूर्व में सामाजिक शब्द है इस शब्द में ही सब मनुष्य का ग्रहण हो जाता है। वही इस नियम के दूसरे भाग या वाक्य में जो प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतंत्र रहे यह वाक्य आया है इसमें प्रत्येक शब्द मनुष्य का नहीं प्रत्येक शब्द से प्रत्येक हितकारी अर्थात प्रति एक हितकारी नियम ऐसा ग्रहण करना चाहिए वह नियम हमारे जीवन में असंख्य हो सकते हैं खाना पीना सोना जागना कपड़े पहनना आदि आदि वही हितकारी शब्द के साथ स्वयं शब्द भी हमें लगा लेना चाहिए क्योंकि कुछ लोगों को शंका हो जाती है हितकारी से किसका ग्रहण करें अर्थात किसके लिए हितकारी क्योंकि नियम के पहले भाग में सामाजिक शब्द है लेकिन यहां हितकारी शब्द से किसका ग्रहण लें तो हितकारी शब्द से स्वयं अपना इस शब्द का ग्रहण करना चाहिए अर्थात जो स्वयं के लिए हितकारी है।

बहुत से लोग प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतंत्र है इस वाक्य पर शंका उठाकर कहते हैं की स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि कोई व्यक्ति किसी कार्य को करें या ना करें या अन्यथा करें यह स्वतंत्रता मानी जाती है क्योंकि महर्षि पाणिनि ने भी कर्ता को स्वतंत्र माना है । इस शंका या तर्क के अनुसार क्या मनुष्य प्रत्येक हितकारी नियम के पालन करने या ना करनें में स्वतंत्रत है अर्थात वह कपड़ा पहने या ना पहने उसमें स्वतंत्र हैं क्या यह अर्थ लेना चाहिए लेकिन ध्यान रहे यह अर्थ ऋषियों महर्षि दयानंद आदि की विचार दृष्टि से विरोधी है यहां स्वतंत्र शब्द से हितकारी अर्थ का ही ग्रहण करना चाहिए उसके न करने या विपरीत करने के भाव में हमें नहीं जाना चाहिए हितकारी नियम का पालन करना ही चाहिए यह अर्थ लेना चाहिए । कपड़ा पहना भोजन करना हितकारी नियम है तो हमें स्वतंत्रता के नाम पर यह अधिकार नहीं है हम भोजन का त्याग कर दें या नग्न घूमें हां लेकिन भोजन के क्रम में पहले कौन से पदार्थ खाएं पहले मीठा खाए या खट्टा कितनी मात्रा में खाएं आदि आदि यह करने में हम स्वतंत्र हैं भिन्न भिन्न ऋतु के अनुसार गर्म ठंडे वस्त्र पहने इसमें भी हम स्वतंत्र हैं लेकिन हम वस्त्र ही ना पहने इसमें हम स्वतंत्र नहीं है।

बहुत से विद्वानों ने इस दसवें नियम की बहुत आदर्श अर्थापत्ति भी निकाली है इस नियम के शब्दों को पलट कर स्वयं महर्षि दयानंद जी की भी यह विशेष शैली रही है वह अर्थापत्ति से भी सिद्धांतों या विषय को श्रोताओं व जिज्ञासुओं को सरलता से अवगत कराते थे।

दसवें नियम का अर्थापत्ति नियम यह होगा – प्रत्येक मनुष्य को सामाजिक सर्व अहितकारी नियमों के ना पालने में स्वतंत्र रहना चाहिए , प्रत्येक अहितकारी नियम के ना पालने में सब परतंत्र रहे

यहां नकारो का प्रयोग होगा। यह अर्थापत्ति भी दसवें नियम के ही समान है इसे ऐसे समझते हैं यह आवश्यक नहीं है की समाज में निर्मित सभी नियम सभी के लिए सर्वहितकारी होते हैं । कभी-कभी समाज में गलत लोग अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए चाल बाजी से अहितकारी नियम भी बना देते हैं तो ऐसे अहितकारी नियमों के ना पालने में सब स्वतंत्र होने चाहिए, ना कि परतंत्र। ऐसे ही ठीक प्रत्येक अहितकारी नियम के ना पालने में सब परतंत्र होने चाहिए ठीक ऐसे इस नियम के दूसरे भाग के संबंध में कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि वह अहितकारी नियम के पालने में परतंत्र है अर्थात कोई व्यक्ति दिन में चार सिगरेट पीता है शराब पीता है तो वह यह नहीं कह सकता कि वह इन अहितकारी नियमों के अधीन है परतंत्र है अहितकारी नियमों के पालने में कोई भी परतंत्र नहीं रह सकता उनके ना पालने में ही परतंत्र रहना चाहिए वह परतंत्रता वेद व ऋषियों के नियमों की है वेद में नशा आदि न करने का विधान है यह परतंत्रता हमारे हित में है । अंत में इतना कहना चाहूंगा आर्य समाज के यह 10 नियम केवल आर्य समाज के लिए ही उपयोगी नहीं है यह नियम सार्वभौमिक सार्वजनीन है मनुष्य मात्र के लिए प्रत्येक संगठन के लिए परम हितकारी है। महर्षि दयानंद ने गहन विश्लेषण चिंतन के उपरांत इन्हें बनाया था। आर्य जनों को विवाह आदि के अवसर या अन्य मंगल अवसरों पर कार्ड प्रकाशन या प्रचार आदि सामग्री में इन 10 नियमों को अवश्य छपवाना चाहिए हो सके तो इनकी विशेष व्याख्या भी छपवानी चाहिए। ‌

आर्य सागर
अध्यक्ष आर्य भाषा प्रचारिणी सभा गौतम बुद्ध नगर।

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