रचना: स्व0 पं0 चन्द्रभानु आर्योपदेशक
संस्थापक व आद्य सम्पादक शांतिधर्मी
आजाद पिता भारत माता दौलतखाना लन्दन में।
उन बेटों का क्या जीना, जिनकी माता बंधन में।।
विलायत में भेज दिया भारत का सोना चाँदी।
भारतीय नेताओं की ये कैसी आँखें बाँधी।
मेरे देश की जनता बिल्कुल समझ लई है आँधी।
मार गिरा दें गोरों को ये नहीं मानते गाँधी।
थोड़ी सी क्रान्ति होते ही, वो बैठें अनशन में ।।1।।
1857 में म्हारी बहुत हुई बरबादी।
बलिदान हो गए तुलाराम, तांत्या टोपे आदि।
झाँसी की रानी को पकड़ लो, कर के कहा मनादी।
और हजारों वीरों ने करी मौत के संग में शादी।।
तोप के मुँह के बाँध हजारों, उड़वा दिए गगन में ।।2।।
इस्ट इण्डिया कम्पनी ने की म्हारे साथ चालाकी।
ऊँगली पकड़कर पहुँचा पकड़ा, ये कितनी नालायकी।
चाफेकर बंधुओं को मार दिया कसर कौन सी राखी।
खून चूस लिया अंग्रेजों ने अस्थि पिंजर बाकी।।
लूटो, फूंको मारो काटो, कई बर आवै मन में ।।3।।
12 बेंत मँगाए गए और पानी में भिगवाए गए।
दो घंटे के बाद बेंत वे जल्लादों को पकड़ाए गए।
हाथ-पैर उस बालक के टकटकी के बँधवाए गए।
बे रहमी के साथ बैंत सब बालक पे बरसाए गए।
‘चन्द्रभान’ कहे रोष फैल गया भारतीय जन-जन में ।।4।।

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