शौर्य के बल पर स्थापित व्यसन मुक्त अद्वितीय, अपूर्व गांव ‘मिरगपुर’ जनपद सहारनपुर एक रिपोर्ट

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लेखक – आर्य सागर 

भारत राज्यों का संघ हैं लेकिन भारत की आत्मा भारत के 6 लाख से अधिक गांवों में बसती है भारत के संत महात्माओ ने इस आत्मा को समय-समय पर जागृत किया है। यूं तो प्रत्येक गांव के बसने की, भिन्न-भिन्न भूभाग आंचल के अनुसार प्रत्येक गांव की सांस्कृतिक सामाजिक परंपराओं में कुछ ना कुछ भिन्नता व विशेषता होती हैं लेकिन कुछ मिरगपुर सरीखे इकलौते गांव ऐसे होते हैं जो सनातन उच्च आहार व्यवहार विचार का मानदंड सदियों से स्थापित किए हुए हैं, मानव मूल्यों के पतन के इस काल में भी उसे संरक्षित कर रहे हैं पीढ़ी दर पीढ़ी । आजादी के बाद से भारत की संघीय व राज्य सरकारें जो नहीं कर पाई वह कार्य उत्तर प्रदेश के जनपद सहारनपुर के देवबंद ब्लॉक के मिरगपुर गांव के वासियों ने कर दिखाया। वैधानिक शक्ति से भी सर्वोपरि आध्यात्मिक शक्ति होती है । मिरगपुर गांव इसका जीवंत प्रमाण है ।यह सिद्ध है की कानून का भय दिखाकर व्यापकता से समाज को आज तक भी किसी व्यक्ति को नशीले पदार्थ के सेवन से मुक्त नहीं कर पाए युवको में नशे की व्यापक प्रवृत्ति को रोकने में कानून वैधानिक संस्थान असफल प्रतीत होते है विविध रिपोर्ट इसमें प्रमाण है। जब-जब प्राचीन वैदिक कालीन रामायण कालीन या ऋषि संस्कृति के भारत की बात होती है राम राज्य की अवधारणा पर चिंतन होता है तो उसके विषय में यही कहा जाता है कि उस काल में कोई भी व्यक्ति शराबी मांसाहारी धूम्रपान करने वाला नहीं था सभी का जीवन रोगों से रहित आनंद से परिपूर्ण था। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने रामायण के इसी आदर्श के विषय में अपनी एक कविता में कुछ इस प्रकार से कहा है।

स्वस्थ शिक्षित श्रेष्ठ उद्योगी सभी।
बाह्य भोगी, आंतरिक योगी सभी।।

भारत के ऋषियो वैदिक मनुष्यों का यह चिंतन रहा है की आहार शुद्धि से भी विचारों की शुद्धि होती है यदि हमारा आहार तामसिक बुद्धिनाशक है तो हमारे विचार भी तामसिक हो जाएंगे विचारों के तामसिक होने से हमारा शारीरिक मानसिक आत्मिक विकास बाधित हो जाता है। उपनिषदों में भी अन्न का मन पर क्या प्रभाव पड़ता है तो वही गीता में भी आहार से विचार शुद्धि विचार से बुद्धि की शुद्धि से ध्रुव स्मृति की बात की गई है। जिसकी बुद्धि स्थिर शांत हो जाती है फिर उसकी आत्मिक मानसिक शारीरिक उनकी को कोई नहीं रोक सकता।

आधुनिक वैज्ञानिक शोधों से यह सिद्ध है शराब तंबाकू आदि नशा मांसाहार के सेवन से शरीर में हार्मोन के स्तर पर ही नहीं अनुवांशिक स्तर पर भी गंभीर विकृति आती हैं।

ऋषियों के इसी चिंतन को सार्थक कर 16वीं शताब्दी में भक्तिकाल के सुधारवादी संत बाबा फकीरादास जी की आज्ञा गुरु उपदेशों पर चलकर गांव मिरगपुर को स्थापित करने वाले इसके आदि पूर्वज खूबड पंवार वंश के बाबा मोलड सिंह गुर्जर ने अपने कुटुंबियों गांव वासियों के लिए 36 से अधिक वस्तुओं का प्रयोग वर्जित कर दिया। विषयांतर करते हुए में खूबड पंवार वंश के विषय में कुछ कहना चाहूंगा यह वंश राजा भोज परमार से जुड़ा हुआ है । 11वीं शताब्दी में जब महमूद गजनवी के भांजे सलार मसूद गाजी ने अजमेर से चलकर पंजाब हरियाणा से पश्चिमी उत्तर प्रदेश होते हुए बहराइच पर हमला किया था तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसी पवार वंश ने उसकी सेना को मारकर आधा कर दिया था मंदिरों को ध्वस्त करने वाले लूटने वाले उस आक्रांता को गहरी क्षति पवार वंश के योद्धाओ ने पहुंचाई रही सही कसर उसके ताबूत में आखिरी कील ठोकर वीर महाराजा सुहेलदेव ने पुरी कर दी बहराइच के युद्ध में।

इन सभी ऐतिहासिक वीरता के तथ्यों से बाबा फकीरादास परिचित थे वह एक सोची समझी महान योजना को लेकर राजस्थान से पंजाब होते हुए यमुना पार कर काली नदी के पास मिरगपुर गांव में आए जो उन दिनों अफगानिस्तान के भाड़े के सैनिकों रोहिल्ला पठानों के आतंक से त्रस्त था जिन्हें वहा मुगल शासको की संरक्षण में बसाया गया था हिंदुओं पर अत्याचार व मनमाना कर वसूलने के लिए। अत्याचारी सनकी शराबी अय्याश अफीमची मुगल सम्राट जहांगीर के काल में तो यह अत्याचार अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया जिसने सिक्खों के गुरु अर्जुन देव का शीश कटवाया था। बाबा फकीरा दास के ओजस्वी तेजस्वी उपदेशों को सुनकर बाबा मोलड सिंह व उनके कुटुंब के अन्य वीर पुरुषों ने रातों-रात अत्याचारी पठानों को जन्नत भेज दिया इन सभी घटनाक्रमों का पूरा उल्लेख बाबा फकीरा दास के आध्यात्मिक धार्मिक प्रवचनों का संग्रह उनकी पुस्तक’ सत् साहिब साखी’ में उपलब्ध है।

बाबा फकीरा दास ने जब उस क्षेत्र में शांति स्थापित हो गई तो बाबा मोलड सिंह से वचन लिया कि आज से तुम इसी गांव में आबाद रहो गाव का कोई भी व्यक्ति शराब तंबाकू भांग गांजा लहसुन प्याज मांस शलजम सिरका आदि वस्तुओं का सेवन नहीं करेगा अगर किसी ने इन निषेधो का पालन नहीं किया तो उसका सर्वनाश निश्चित है। तब से लेकर आजतक मिरगपुर में आहार की शुचिता की यह सुपरंपरा है। गांव का कोई भी व्यक्ति अपने खाने में लहसुन प्याज सिरका शलजम बंद गोभी का भी कोई सेवन नहीं करता गांव का कोई भी व्यक्ति शराब गांजा भांग तंबाकू आदि किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थ का सेवन नहीं करता । गांव में कोई नशीले पदार्थों की खरीद बिक्री तो दूर उसकी बात भी करता है तो उसकी भी कठोर शब्दों में निंदा की जाती है। मिरगपुर गांव की आज आबादी लगभग 15000 तो वही 5500 के लगभग इस गांव में मतदाता है।

गांव के 86 वर्षीय वृद्ध चौधरी धनपाल जी ने हमें बताया मिरगपुर गांव ही नहीं मिरगपुर गांव से निकले हुए पड़ोसी दो गांव दुगचेडी ,परौली में भी कोई नशा आदि नहीं करता। उनके अनुसार जब हम रिश्तेदारी में जाते हैं या गांव की बारात किसी अन्य गांव में जाती है तो वहां भी विशेष लहसुन प्याज से रहित भोजन तैयार किया जाता है यदि कभी कभार हम किसी रिश्तेदारी से दूसरी रिश्तेदारी में जाते हैं जिन्हें हमारे गांव के की इन आदर्श परंपराओं के विषय में पता नहीं होता तो वहां हम केवल मिष्ठान आदि खाकर ही निर्वाह कर लेते हैं।

जब हम ग्राम में भ्रमण कर रहे थे तो उपदेश कुमार निवासी गांव देदपूरा नकूड सहारनपुर से हमारी भेंट होती है उपदेश कुमार के सुपुत्र उदय संगम जो फार्मेसी ग्रेजुएट है कि मिरगपुर के आदेशपाल पंवार जी की सुपुत्री अंशु से जो पोस्ट ग्रेजुएट है उनका एक महीने पहले विवाह हुआ है अर्थात नई-नई रिश्तेदारी है। उपदेश कुमार ने बताया जब से इस गांव परिवार की बेटी हमारे घर में गई है हमने भी स्वेच्छा से लहसुन प्याज का सेवन त्याग दिया है, हम बहुत मानसिक तौर पर शांत सुखी अनुभव कर रहे हैं। गांव के चौधरी सुरेशपाल जी ने हमें बताया हमारे गांव की बेटियां जब किसी दूसरे गांव में विवाहित होकर जाती है तो वह गांव की इस आदर्श परंपरा को वहां भी स्थापित करने का सदप्रयास करती हैं व्यक्तिगत तौर पर तो इसका पालन करती ही है यदि दुर्भाग्य से किसी परिवार में नशे का प्रचलन होता है उन परिवारों को भी नशा मुक्त कर देती हैं।जब कोई रिश्तेदार जब हमारे गांव में प्रवास करता है तो वह भी लहसुन प्याज आदि का सेवन नहीं करता नशा करना तो दूर की बात।

हमने पूरे मिरगपुर गांव में कोई हुक्का नहीं देखा वहीं कुछ किसान बिरादरी इस हुक्के को अपनी शान समझती है जबकि यह मुगलों की खतरनाक सौगात है।

गांव के ही सुनत कुमार जी ने हमें बताया अब गांव वाले इस कार्ययोजना पर विचार कर रहे हैं कि गांव में जो विवाह आदि होते हैं भोजन बनाने पकाने व परोसने के के बर्तन बाहर से टेंट हाउस आदि से न मंगा कर गांव में ही उनकी व्यवस्था की जाए जिससे आहार की शुचिता की हमारी यह परंपरा और अधिक पवित्र अक्षुण्ण बनी रहे।

मिरगपुर निवासी प्राइमरी स्कूल के हेड मास्टर पद से रिटायर मास्टर कुंवरपाल जी जिनके आवास पर पिछले 13 अप्रैल से 20 अप्रैल 2025 तक आरोग्य भारती पश्चिम उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में ग्राम मिरगपुर के फकीरा दास मंदिर पर हो रही राम कथा की कथा व्यास मंडली ठहरी हुई थी ने हमें बताया कि हमारे गांव में फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को बाबा फकीरा दास जी की स्मृति में एक दिवसीय मेले का आयोजन होता है जिसमें सहारनपुर ही नहीं आसपास के जनपदों के साथ साथ उत्तर भारत के दूरदराज के गांवों के बाबा फकीरा दास के हजारों अनुयायी आते हैं । मेले से महीनों पहले ही ग्रामवासी आयोजन की तैयारी में जुड़ जाते हैं। बहुलता से गांव के प्रत्येक घर में बिना जाति मत पंथ के भेदभाव के अतिथियो भक्तों के भोजन आवास की व्यवस्था रहती है ।अतिथि देवो भव: की परंपरा का इससे अनूठा उदाहरण आप किसी अन्य गांव में नहीं देख सकते।

इस प्रबंध में गांव की महिला मातृशक्ति शक्ति की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस गांव की महिलाएं नित्य प्रति सवेरे 4:00 बजे उठ जाती हैं उठकर घर ही नहीं गांव के सार्वजनिक रास्तों की भी स्वेच्छा से सफाई करती हैं। गांव की सफाई व्यवस्था इसकी सूचक है।

मिरगपुर गांव के लोग अपनी सहज सुलभ क्षत्रिय वृत्ति के अनुसार हथियार रखने के भी बहुत शौकीन है गांव में बताया जाता है 1200 से अधिक अधिकृत शस्त्र लाइसेंस है। किसी भी व्यवस्था में अपवाद तो हर जगह मिल जाता है लेकिन एक संत के उपदेशों शिक्षाओं पर चलकर यह गांव अन्य गांवों की अपेक्षा व इस गांव के ग्रामीणों का शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत अधिक उत्तम है नशा मांसाहार खराब दिनचर्या से जुड़ी बीमारियां डायबिटीज हाइपरटेंशन कोरोनरी आर्टरी डिजीज, त्वचा रोग आदि इस गांव में नाम मात्र को है।

गांव के लोग प्रगतिशील पशुपालक व किसान भी हैं प्रत्येक घर में अच्छी नस्ल का पशुधन तैयार है खेती के लिए विशेष तौर पर गन्ने की ढुलाई के लिए ट्रैक्टर ट्राली आदि के साथ-सा आज भी नागौरी नस्ल के बैलों का प्रयोग होता है ।पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शेष गांवों की तरह गन्ना प्रमुख फसल है पॉपुलर आदि की भी बागवानी होती है। काली नदी के लो लाइंग एरिया से लेकर गांव के चारों ओर का परिवेश काफी हरा भारत स्वच्छ है वायु गुणवत्ता भी अच्छी है भूजल की गुणवत्ता व उपलब्धता अच्छी स्थिति में।

1972 में गांव के सबसे पहले एमएससी वनस्पति शास्त्र की परीक्षा पास करने वाले पश्चात में गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज भोज डिग्री कॉलेज दादरी, गौतम बुद्ध नगर में बॉटनी के प्राध्यापक रहे वयोवृद्ध सी. पी. सिंह पंवार गुरु जी ने हमें बताया सदियों से नशा आदि व्यसनों से दूर रहने के कारण इस गांव को काफी शारीरिक आत्मिक सामाजिक आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ है।

हरियाणा पंजाब दिल्ली एनसीआर आदि राज्य के शहरों व गांवों में जहां किसानों में नशा का प्रचलन है लोग आर्थिक चुनौतियों का सामना करते हैं तो वही यह गांव इस मामले में आदर्श है गांव का धन नशे में खर्च नहीं होता लोगों का स्वास्थ उत्तम हुआ है यही कारण है गांव मिरगपुर के किसानों की जमीन आज आसपास के 10 गांवों में है । जिनमें निम्न गांव शामिल हैं मानकी, अमरपुर, चदपुर ,दुकचडा- दुकचडी , सुनेहटी ,साधारणपुर, तलेहडी, रणसूरआ, दुद्धली आदि गांव शामिल हैं।

इतना ही नहीं बाबा फकीरा दास मंदिर स्थल के नाम भी 150 बीघा से अधिक की भूमि है । जो गांव के तीन भिन्न स्थलों पर स्थित है। हमने जब इन स्थलों का भ्रमण किया तो एक विषय चिंताजनक पाया उस भूमि पर वर्तमान में कोई खेती नहीं हो रही यदि उस भूमि पर जैविक खेती की जाए और उससे उत्पन्न जैविक उत्पादों को प्रचारित किया जाए बाबा फकीरा दास से जुड़े हुए भक्त यदि उत्पादों की खरीद करते हैं इससे स्थायी आमदनी की व्यवस्था धार्मिक स्थल के लिए हो जाएगी लेकिन वैधानिक ट्रस्ट के अभाव के कारण यह कार्य नहीं हो पा रहा।

गांव में प्रवेश करते ही बाबा फकीरा दास को समर्पित धार्मिक स्थल काली नदी से निर्मित एक उच्चे टीले पर बना हुआ है वहीं के बीचो-बीच बाबा फकीरा दास से जुड़ा हुआ एक स्मृति स्थल बना हुआ है जिस गांव के लोग गुरुद्वारा कहते हैं जिसमें बाबा फकीरा दास के अलावा किसी अन्य देवी देवता की कोई प्रतिमा नहीं है मुख्य मंदिर में भी बाबा फकीरा दास व उनके हाथ का स्मृति चिन्ह जिसे ग्रामीण’ पंजा साहिब’ कहते हैं स्थापित है। वहीं गांव को बसने वाले आदि पूर्वक बाबा मोलड सिंह की एक प्रतिमा है गांव के प्रत्येक घर पर ‘सत् साहिब’ यह वाक्य लिखा हुआ आपको मिलेगा ।गांव के लोग बात बात में अपने भाषागत व्यवहार में गुरु जी महाराज का स्मरण करते हैं यह उनकी अपने गुरु के प्रति अनूठी श्रद्धा का ही सूचक है गुरु जंभेश्वर बिश्नोई आदि पंथ की तरह। बाबा फकीरा दास का भी एक अपना अनूठा पथ है जिसके मूल में सत्य सनातन वैदिक धर्म के ही आदर्श निहित है। गांव मिरगपुर इस पंथीय भावना का आज अनूठा प्रतिनिधि है। गांव के लोग बताते हैं मुस्लिम काल में जब मुसलमान शासक राम का नाम भी नहीं लेने देते थे तो बाबा फकीरा दास ने यह गुरु मंत्र दिया ‘सत् साहिब ‘साहिब शब्द का अर्थ है शखा, सत् का अर्थ है सच्चा अर्थात ईश्वर ही हमारा सच्चा सखा है। वेदों में भी ईश्वर आत्मा का सच्चा शाखा है ऐसे अनेक मंत्र मिलते हैं।

खेती किसानी के अलावा आज मिरगपुर में शिक्षा का भी काफी प्रचार प्रसार है गांव के अनेक युवक युवति गृहस्थ दंपति इंजीनियर, डॉक्टर, शिक्षा ,पुलिस आदि सेवा में है गांव के अनेक परिवार नजदीकी उत्तराखंड के रूड़की शहर सहारनपुर सिटी देवबंद कस्बे मेरठ दिल्ली नोएडा गुरुग्राम फरीदाबाद आदि शहरों में भी रह रहे हैं। गांव से दूर रहने पर भी सभी की गुरु महाराज बाबा फकीरादास एवं उनकी शिक्षाओं में पूरी श्रद्धा निष्ठा है।

वही इसके ठीक उलट यमुना पार हरियाणा के हरियाणवी सॉन्ग कल्चर का भी प्रभाव धीरे-धीरे गांव मिरगपुर के युवाओं में आ रहा है यह एक चिंता का विषय हो सकता है। गांव की युवा शक्ति को इसमें स्वेच्छा से ही पहल करनी चाहिए अपने आदर्श बलिदानी पूर्वजों से प्रेरणा लेकर लेकिन गांव की यह युवा पीढ़ी नशा मांसाहार से आज भी कोसो दूर है। बाबा फकीर दास की स्मृति में गांव की पावन भूमि में एक पुस्तकालय , सामाजिक सांस्कृतिक शोध केंद्र , वरिष्ठ साइकैटरिस्टो की देखरेख में डी- एडिक्शन सेंटर, एजुकेशनल वेलफेयर ट्रस्ट की स्थापना होनी चाहिए इस गांव के अनूठे सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक दर्शन की भी स्थापना के लिए एक युवाओं का संगठन होना चाहिए कलम के इस युग में जो सोशल मीडिया आदि के माध्यम से इस गांव को आदर्श पर्यटन हब व सांस्कृतिक पर्यटन का केंद्र बनाया जाए विश्व पटल पर आज भी यह गांव स्थापित नहीं है जबकि आज के युग में ऐसे किसी नशा मांसाहार से दूर एक आदर्श गांव की तो बात दूर आदर्श परिवार का निर्माण करना भी टेढ़ी खीर है भारत की सरकारें संविधान के नीति निर्देशक तत्व व मौलिक कर्तव्य आदर्शों की स्थापना आज भी नहीं कर पाई है नशा मुक्त समाज आदि के निर्माण में तो वही यह गांव 500 वर्षों से इस आदर्श को अपने में सहज हुए हैं वही पीढ़ी दर पीढ़ी उसका संरक्षण संवर्धन कर रहा है। ऐसे में गांव मिरगपुर भारत का ही नहीं इस ब्रह्मांड का भी अनोखा गांव है जो प्राचीन वैदिक ऋषि संस्कृति का एकमात्र जीवित जीवंत प्रतिदर्श संवाहक है।

भगवान राम – कृष्ण को अपना पूर्वज मानने वाले प्रत्येक भारतवासी के लिए यह गांव आदर्श है। आरोग्य भारती पश्चिम उत्तर प्रदेश के सह क्षेत्र संयोजक आदरणीय विनोद जैन जी के आमंत्रण पर 20 अप्रैल को मुझे वरिष्ठ इतिहासकार रिसर्च स्कॉलर डॉक्टर राकेश कुमार आर्य जी, सेवानिवृत्त‌ उप निरीक्षक महावीर आर्य जी, सीआईएसफ इंस्पेक्टर महेंद्र आर्य जी एडवोकेट अजय आर्य जी के साथ इस गांव में भ्रमण करने तथ्यों के संकलन का अवसर मिला। डॉ राकेश कुमार आर्य के नेतृत्व में भारत को समझो अभियान समिति व भारतीय इतिहास पुनर्लेखन लेखन समिति, इतिहास लेखन की विधा के माध्यम से इस गांव के लिए निकट भविष्य में बहुत ही उल्लेखनीय कार्य करने जा रही है जिसमें हमें मिरगपुर वासियों के भावनात्मक वैचारी सहयोग की भी अपेक्षा होगी आप सभी पाठकों से अनुरोध है ऐसे पवित्र गांव में आप एक बार जरूर जाएं यदि नशे की आदत से कोई युवक झूझ रहा है तो ऐसे पवित्र स्थलों पर जाकर संकल्प अवश्य लेना चाहिए इससे आत्मबल मिलता है आखिर संकल्प से ही मनुष्य देव बनता है शथपथ ब्राह्मण आदि ग्रंथों में संकल्पहीन मनुष्य को मृत ही माना गया है।

लेखक आर्य सागर
तिलपता ग्रेटर नोएडा

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