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इतिहास का विकृतिकरण और नेहरू

इतिहास का विकृतिकरण और नेहरू (अध्याय – 13)

  • डॉ. राकेश कुमार आर्य

(डिस्कवरी ऑफ इंडिया की डिस्कवरी) पुस्तक से …

वेद मानव द्वारा निर्मित

वेदों को लेकर भारतीय ऋषियों की मान्यता रही है कि यह सृष्टि प्रारंभ में ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है। जो कि सृष्टि को सुव्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए दिया गया। इनमें धर्म की व्यवस्था है। भारतीय ऋषियों की इस मान्यता के विपरीत नेहरू जी सृष्टि प्रारंभ में ईश्वर द्वारा प्रदत्त अर्थात अपौरुषेय ग्रंथ नहीं मानते थे। इस प्रकार सृष्टि की आदि व्यवस्था में उनका वेद संगत विश्वास नहीं था। इसका अभिप्राय हुआ कि सृष्टि दुर्घटनावश बनी। इसके बनाने में कोई सुनियोजित योजना नहीं थी। इसका कोई बनाने वाला नहीं था। बनने के पश्चात धीरे-धीरे व्यवस्था बननी आरंभ हुई। जिसके बनने में बहुत लंबा समय लगा। नेहरू जी की मान्यता थी कि वेदों को बहुत बाद में बुद्धिमान लोगों ने बनाया। नेहरू जी ने वेदों के विषय में किससे क्या सीखा? यह तो हम नहीं कह बता सकते, परंतु इतना अवश्य है कि उनसे वेदों के बारे में लोगों ने बहुत कुछ सीखा। क्योंकि उनकी द डिस्कवरी ऑफ इंडिया ने बहुत लोगों का बौद्धिक संतुलन बिगाड़ दिया।

नेहरू जी पृष्ठ 88 पर हमें बताते हैं कि- “आज के ज्यादातर विद्वानों ने ऋग्वेद की ऋचाओं के संबंध में जो प्रमाण माने हैं, वे उसे ईसा से 1,500 वर्ष पुराना बताते हैं। (अभिप्राय है कि नेहरू जी अब से लगभग 3,500 वर्ष पहले वेदों की उत्पत्ति के संबंध में विद्वानों की मान्यता को यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके पश्चात वह थोड़ा परिवर्तन करते हुए लिखते हैं कि) लेकिन मोहनजोदड़ो की खुदाई के बाद इन धर्म-ग्रंथों को और पुराना साबित करने की तरफ रुझान रहा है। इस साहित्य की ठीक तिथि जो भी हो, यह संभावित है कि यह यूनान या इजरायल के इतिहास से पुराना है। (ऐसा लिखकर नेहरू जी ने एक और नई धारणा को जन्म दे दिया कि भारत के वेद यूनान और इजरायल के इतिहास से बहुत पुराने हैं। जबकि यूनान और इजराइल का मूल वैदिक धर्म ही रहा है। इसे यदि वे यूं कहते हैं कि वेद सृष्टि के प्रारंभ में ईश्वर द्वारा प्रदान किए गए तो इससे न केवल भारतीय मत की पुष्टि होती अपितु वेद ही सृष्टि प्रारंभ में मानव की सृष्टि व्यवस्था को आगे सुचारु रूप से चलाने के लिए ईश्वरीय संविधान के रूप में मानवता को प्रदान किए गए इस सिद्धांत को सारे संसार से मनवाने में भी सहायता प्राप्त होती।) और सच बात तो यह है कि मनुष्य मात्र के दिमाग की सबसे पुरानी (कितनी पुरानी?) कृतियों में है। मैक्स मूलर ने कहा है कि आर्य जाति के मनुष्य द्वारा कहा गया यह पहला शब्द है। (यहां पर नेहरू जी इस बात के तो निकट पहुंचे कि वेद संसार की सबसे पहले कृति है, परंतु इसे ईश्वर द्वारा प्रदत्त किए गए ज्ञान के रूप में स्वापित न करके उन्होंने यह कह दिया है कि मनुष्य मात्र के दिमाग की सबसे पुरानी कृतियों में है।)

वेद को मनुष्य मात्र के मस्तिष्क की सबसे पुरानी कृति मानकर जहां नेहरू जी ने एक वितंडा को जन्म दिया, वहीं उन्होंने एक नई बात कह कर एक नये विवाद को भी जन्म दिया कि “वेद आर्यों के उस समय के भावोदगार हैं जबकि वह हिंदुस्तान की हरी-भरी भूमि पर आए।” इसका अभिप्राय यह हुआ कि जब आर्यजन भूमंडल के किसी अन्य भाग से चलकर भारत पहुंचे तो यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर उनके मन में पधात्मक शैली में लिखने का विचार आया और उन्होंने इसके पश्चात वेदों की रचना की। ऐसा कहना पूर्णतया भ्रतिमूलक है। लेखक ने अपनी अज्ञानता को छुपाने के लिए कई प्रकार की भ्रांतियों को जन्म दे दिया। लगता है वे स्वयं भ्रांतियों के शिकार हैं। भ्रांतियों पर भ्रांति फैलाना नेहरू जी की लेखन शैली की अद्भुत कला है। वह एक नई भ्रान्ति को स्थापित करते हुए वे लिखे जाते हैं कि-

“वे (अर्थात आर्य लोग अपने पुराने स्थान से चलकर जब भारत पहुंचे तो) अपने कुल के विचारों को अपने साथ लाए। उस कुल के जिसने ईरान में अवेस्ता की रचना की और हिंदुस्तान की जमीन पर उन्होंने अपने विचारों को विस्तार दिया। वेदों की भाषा भी अवेस्ता की भाषा से अद्भुत रूप में मिलती-जुलती है और यह बताया जाता है कि वेद अवेस्ता के जितने नजदीक हैं, उतने खुद इस देश के महाकाव्यों की संस्कृति के नजदीक नहीं हैं।”

इसका अभिप्राय है कि आर्य लोग ईरान से चलकर भारत पहुंचे। ईरान के अवेस्ता ग्रंथ से वेदों का तारतम्य स्थापित करना इस दृष्टिकोण से उत्तम हो सकता है कि ईरान के इस ग्रंथ पर भारत के वेदों की भाषा का अद्भुत प्रभाव दिखाई देता है। जबकि यहां नेहरू जी इसके उल्टा करते दिखाई देते हैं।

भारतीय मान्यता है कि वेद सृष्टि के सबसे पहले काव्य का नाम है। सृष्टि के प्रारंभ में परमपिता परमेश्वर ने अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा नाम के ऋषियों को वेद का ज्ञान दिया था। नेहरू जी की भांति कई अन्य लोगों ने भी भारत के ही नहीं, संपूर्ण भूमंडल के ज्ञान के आदि स्रोत वेद के ईश्वर का ज्ञान न होने के आक्षेप लगाए हैं। जिन लोगों ने वेद पर इस प्रकार के आक्षेप लगाए हैं वे अपने धर्म ग्रंथों को तो ईश्वरीय ज्ञान मानते हैं, पर वेद को नहीं। वास्तव में इस प्रकार का आक्षेप भारतीय धर्म और संस्कृति की वैज्ञानिकता को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए लगाया गया है। भारत के सत्य सनातन वैदिक धर्म की वैज्ञानिकता को न समझने वाले अज्ञानी और भारत से घृणा करने वाले इतिहास लेखकों ने अपने इस आक्षेप के समर्थन में कहा है कि जब परमपिता परमेश्वर के कोई आंख, नाक, मुंह आदि नहीं हैं तो वह वेदों का ज्ञान किसी ऋषि को कैसे दे सकता है? इस कुतर्क को भारत के नए नास्तिक कम्युनिस्टों ने पकड़कर भारत की संस्कृति के विरुद्ध झूठा प्रचार करना आरंभकिया। यह आश्चर्यजनक बात है कि ये अज्ञानी लोग इस बात पर तो सहमत हो जाते हैं कि अल्लाह ने बिना हाथ, पैर, नाक, मुंह आदि के होते हुए भी सारी सृष्टि को बना दिया। परंतु वेदों का ज्ञान भी ईश्वर ने दिया होगा, इस बात को हंसी में उड़ा देते हैं। इसका प्रभाव यह हुआ है कि कई सनातनी भी उनकी बात पर विश्वास करते देखे जाते हैं और अपने ही पूर्वजों का मजाक उड़ाने लगते हैं।

जब हम अपने गायत्री मंत्र में ‘भूर्भुवः स्वः’ बोलते हैं तो उसका अभिप्राय यही होता है कि वह परमपिता परमेश्वर इस जगत का उत्पादक है, वही इस सृष्टि का संचालक है और वही इस सृष्टि का अंत में नाश करता है। ईश्वर की इन्हीं तीनों शक्तियों को इंग्लिश में जनरेटर, ऑपरेटर और डिस्ट्रॉयर कहा गया है। इन्हीं तीनों के शुरुआती तीनों अक्षरों को लेकर GOD शब्द बना है। जो ईश्वर बिना शरीर के जनरेटर, ऑपरेटर और डिस्ट्रॉयर की भूमिका निभा सकता है और उसे ईसाई समाज के लोग GOD कह सकते हैं तो वह अपने इन कार्यों का संपादन तभी करता है जब वह ज्ञान का एकमात्र स्रोत होगा। वह ज्ञान का आदि स्रोत होने के कारण मानव के अंतःकरण में ज्ञान का प्रकाश करने में तो अपने इन तीनों कामों की अपेक्षा और भी अधिक शक्तिशाली है।

हमें ध्यान रखना चाहिए कि ईश्वर सभी जीवधारियों के भीतर विराजमान है। वह आत्मा के साथ मिला हुआ है और आत्मा उसके साथ मिला हुआ है। परमपिता परमेश्वर इतना सूक्ष्म है कि वह आत्मा के भी अंदर निवास कर आत्मा का भी आत्मा होने से परमात्मा कहलाता है। बात स्पष्ट है कि आत्मा का भी आत्मा परमात्मा चुपचाप बिना करण उपकरणों के होते हुए भी आत्मा से सब कुछ कह देता है। यह सूक्ष्म जगत का विषय है। ब्रह्म विद्या का की भाषा को अवश्य समझ लेता है। आत्मा परमात्मा गंगे बहरे तो विषय है। बहुत कम लोग गूंगे की भाषा को जानते हैं। पर गूंगा गूंगे नहीं हैं, पर इस बात को सही संदर्भ में समझकर उनके वार्तालाप के ढंग को समझा जा सकता है।

भाषा और शब्द स्थूल जगत के विषय हैं। सूक्ष्म जगत में सब कुठ बीज रूप में होता है। वहां भाषा और शब्द गौण हो जाते हैं।

इस सब के उपरांत भी वहां बहुत बड़ा लेनदेन चुपचाप हो जाता है। इस बात को ज्ञानी लोग ही समझ पाते हैं। यह उन लोगों का विषय है जो योग में निष्णात हो जाते हैं। जिन मूखौं ने भारत के योग की परंपरा को जाना तक नहीं, वह आन्तरिक जगत की और अंतःकरण की गुत्थियों को खोलने की मूर्खता करें तो उनसे बड़ा मूर्ख कौन हो सकता है? इसलिए भारत के लोगों को अपने ऋषियों के उस सूक्ष्म आध्यात्मिक ज्ञान को और ब्रह्म विद्या को समझना चाहिए जो आज तक शेष जगत के लिए रहस्य बनी हुई है।

पं. देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय एवं पं. लेखराम रचित ऋषि दयानन्द जी के जीवन चरितों में से हमें पता चलता है कि एक दिन एक पण्डित जी ने स्वामी दयानन्द जी से प्रश्न किया कि सामवेद में भरद्वाज आदि ऋषियों के नाम आये हैं। इससे सन्देह होता है कि वेद ईश्वर के बनाये हुए न होकर ऋषियों के बनाये हुए हैं। महाराज दयानन्द जी ने इसका उत्तर दिया कि उन मन्त्रों में यह नाम ऋषियों के नहीं हैं, प्रत्युत उनके विशेष अर्थ हैं अर्थात् वेदों के वह शब्द व्यक्तिवाची संज्ञा न होकर उनके अर्थ उनसे भिन्न हैं। बाद के काल में वेद से इन शब्दों को लेकर ऋषियों के नाम रखे गये हैं। ऋषि दयानन्द जी ने पण्डित जी को कई वेद मन्त्रों जिनमें ऋषि नामी शब्द आये हैं, उनका अर्थ करके सुनाया।

जो लोग वेदों को अपौरुषेय मानते हैं, उनका उपहास उड़ाते हुए नेहरू जी लिखते हैं कि-

” इन मजहब वालों का (अर्थात वैदिक धर्म वालों का) यह ख्याल है कि इनका (वेदों का ज्यादातर हिस्सा दैवी प्रेरणा से प्राप्त हुआ है या नाजिल हुआ है। अगर हम उनकी (वेदों की) जांच पड़ताल या नुक्ताचीनी करते हैं और उन्हें आदमियों की रची हुई (जर्यात मनुष्य मात्र द्वारा निर्मित किए गए वेद) चीज बताते हैं तो कट्टर मजहबी लोग (अर्थात वैदिक धर्मी लोग) अक्सर इसमें बुरा मानते हैं। फिर भी उन पर विचार करने का कोई दूसरा तरीका नहीं है।

दरअसल उनके मुतालिक ईश्वर वाक्य होने के दावे का आमतौर पर यह नतीजा हुआ कि उनमें लिखी बातों के खिलाफ मेरे दिमाग ने जिद पकड़ ली है। उनकी तरफ मेरा ज्यादा खिंचाव तब होता है और उनमें मैं ज्यादा फायदा तब हासिल कर सकता हूं जब मैं उन्हें आदमियों की रचनाएं समझें। ऐसे आदमियों की जो बड़े ज्ञानी और दूरदर्शी हो गए हैं, लेकिन जो हैं साधारण नश्वर मनुष्य, न कि अवतार या ईश्वर की तरफ से बोलने वाले लोग। क्योंकि ईश्वर की कोई जानकारी या उसके बारे में निश्चय मुझे नहीं है।”

भारतीय विद्वानों द्वारा जब वेदों को सृष्टि का सबसे प्राचीन ग्रंथ घोषित किया जाता है तो इस पर नेहरू जी की असहमति का हाथ उठता है। भारतीय विद्वानों के इस प्रकार के मत का उपहास करते हुए वह पृष्ठ 88 पर लिखते हैं कि-

“यह एक विचित्र बात है कि अपनी पुरानी संस्कृति को महत्व देने के लिए हिंदुस्तानी उसे ज्यादा से ज्यादा पुरानी साबित करने की कोशिश में रहे हैं।”

क्रमशः

(आलोक – डॉक्टर राकेश कुमार आर्य के द्वारा 82 पुस्तकें लिखी व प्रकाशित की जा चुकी हैं। उक्त पुस्तक के प्रथम संस्करण – 2025 का प्रकाशन अक्षय प्रकाशन दिल्ली – 110052 मो० न० 9818452269 से हुआ है।
यदि आप उपरोक्त पुस्तक के माध्यम से पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा भारत के इतिहास के विकृतिकरण में दिए गए योगदान की सच्चाई जानना चाहते हैं तो आप हमसे 99111699 17, 8920613273 पर संपर्क कर उपरोक्त पुस्तक को मंगवा सकते हैं। उपरोक्त पुस्तक का मूल्य 360 रुपए है। परंतु आपके लिए डाक खर्च सहित ₹300 में भेजी जाएगी । – निवेदक : अजय कुमार आर्य कार्यालय प्रबंधक)

– डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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