PM-modi-kejriwal-delhi-election

– डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है)

दिल्ली चुनाव परिणाम केजरीवाल के खिलाफ आए हैं। केजरीवाल पिछले 11 वर्ष से जिस प्रकार दिल्ली की जनता का मूर्ख बना रहे थे, झूठे वादे कर लोगों को भ्रमित कर रहे थे, विकास के नाम पर दिल्ली जिस प्रकार पिछड़ती जा रही थी, मुफ्त की रेवड़ियां बांटने की घातक परंपरा के कारण दिल्ली का समुचित विकास नहीं हो पा रहा था, उससे अब दिल्ली को मुक्ति मिल गई है। प्रदेश की जनता ने जितने आत्मविश्वास के साथ सत्ता आम आदमी पार्टी से छीनकर भारतीय जनता पार्टी को दे दी है, उससे स्पष्ट होता है कि दिल्ली के मतदाता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक विशेष अवसर देना चाहते हैं। वास्तव में केजरीवाल के कुशासन से दिल्ली के मतदाता दु:खी हो चुके थे। जिन सीटों पर आम आदमी पार्टी को सफलता मिली है, यदि वहां पर मुस्लिम मतों को हटा दिया जाए या मुस्लिम मतदाता भी वहां विकास और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों को लेकर निष्पक्ष होकर मतदान करते तो आम आदमी पार्टी की झाड़ू का अपने आप ही सफाई हो गया होता।

पिछले 5 वर्ष के अपने शासनकाल में केजरीवाल अपनी कट्टर ईमानदार की छवि को गंवाकर कट्टर बेईमान की छवि को मजबूत करते चले गए। वह जितना ही पद से चिपकने का प्रयास कर रहे थे, उतना ही जनता उनसे दूर होती जा रही थी। वह सोच रहे थे कि यदि तुझे सत्ता से अलग कर दिया गया तो प्रदेश की जनता तुझसे दूर हो जाएगी, जबकि ऐसा नहीं था। यदि वह अपने ऊपर आरोप लगने पर पद त्याग करके जेल जाते तो लोगों की स्वाभाविक सहानुभूति उनके साथ उसी प्रकार जुड़ सकती थी, जिस प्रकार झारखंड के मुख्यमंत्री के साथ जुड़ी। उन्होंने कट्टर ईमानदार की अपनी छवि को अपने आप क्षतिग्रस्त किया। वह अपने कर्मफल की ओर अपने आप बढ़ते चले गए और यह उनके साथ ही नहीं, हर व्यक्ति के साथ होता है। इसी को कभी-कभी हम यह कह दिया करते हैं कि जब सयार का अंतिम समय आता है तो वह गांव की ओर अपने आप भाग लेता है। केजरीवाल जिस दिशा में भाग रहे थे , उधर ही उनकी अंतिम परिणति थी। इस प्रकार आज का दिन केजरीवाल ने अपने लिए अपने आप लिखा और अपने आप अपने सही गंतव्य स्थल पर आ पहुंचे।

यह छोटी बात नहीं है कि केजरीवाल स्वयं तो चुनाव हार ही गए ,उनके अति प्रिय मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन भी चुनाव हार गए। जब पापों की सजा मिलती है तो व्यक्ति को मुंह छिपाना भी कठिन हो जाता है।
आज यही स्थिति केजरीवाल और उनकी चांडाल चौकड़ी की बन चुकी है। नौटंकियों से राजनीति को जोड़ना या नौटंकियों के स्तर पर राजनीति को ले आना कोई केजरीवाल से ही सीख सकता है । देश के राजनीतिक मूल्यों का जितना क्षरण और हनन केजरीवाल की ‘ नौटंकी संस्कृति ‘ ने किया है , उतना किसी अन्य ने नहीं किया । उन्होंने जितना ही अपने आप को आम आदमी के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया , उतना ही अधिक उनके शीशमहलों की चर्चा उभर कर सामने आने लगी और साथ ही लोगों को परेशान भी करने लगी । इन चुनाव परिणामों के माध्यम से लोगों ने आज अन्ना हजारे के साथ गद्दारी करने वाले एक व्यक्ति को नहीं एक विचार को सजा दी है । लोगों ने आम आदमी से ऊपर उठकर अति विशिष्ट व्यक्ति के रूप में शीशमहल तैयार करने वाले एक नौटंकीबाज व्यक्ति को सजा दी है। लोगों ने आज झूठे वादे करने वाले एक व्यक्ति को भी सजा दी है। लोगों ने भ्रष्टाचारियों को भी सजा दी है ।।लोगों ने उस व्यक्ति को भी सजा दी है, जो लोगों को शराब के नशे में धुत्त कर उन्हें अपने स्वास्थ्य को नष्ट करने की प्रेरणा देता रहा, इसके साथ ही उन्हें अपने धन को गलत जगह नष्ट करने के लिए भी नीतियां बनाता रहा। यह व्यक्ति एक ओर मुफ्त की रेवड़ियां बांट रहा था तो दूसरी ओर लोगों के स्वास्थ्य के साथ भी खिलवाड़ कर रहा था। हम सभी जानते हैं कि जब कोई व्यक्ति शराब पीता है तो उसके बाद वह चरित्रहीनता की स्थिति में भी आता है। इस प्रकार दिल्ली के युवाओं को स्वास्थ्य भ्रष्ट और धर्मभ्रष्ट अर्थात चरित्र भ्रष्ट करने के लिए भी केजरीवाल को सजा मिली है । इन सब बातों पर विचार करें तो केजरीवाल को जितनी सजा मिली है, वह बहुत छोटी है। अभी इस व्यक्ति को ईश्वर के दरबार में सजा मिलनी शेष है। किसी भी शासक के लिए यह आवश्यक है कि वह नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ न करे। उन्हें शिक्षा देने और सुसंस्कृत नागरिक बनाने का हर संभव प्रयास करे। ऐसा नहीं होना चाहिए कि आप अपनी आबकारी नीति से भ्रष्टाचार करते हुए अपने लिए भी कमाएं और इसी लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करते हुए इसी कमाई से प्रदेश को चलाने का नाटक भी करें। दिल्ली के मतदाताओं ने समझ लिया कि पिछले 11 वर्ष में उनके साथ कितना बड़ा धोखा हुआ है ?

जहां तक कांग्रेस और उसके नेताओं की बात है तो कांग्रेस ने यह चुनाव मनोयोग से लड़ा ही नहीं था। यह पार्टी आत्महत्यारी है । इसके नेता राहुल गांधी की सोच रही कि आपसे बड़ी शत्रु उसके लिए भारतीय जनता पार्टी है। जिसे सत्ता में आने से रोकने के लिए उन्होंने अपना मौन समर्थन आम आदमी पार्टी को दिया। देश के आतंकवादियों के साथ मिलकर काम करने वाले केजरीवाल में उन्हें एक राष्ट्रभक्त दिखाई दिया और आम आदमी पार्टी के नेता केजरीवाल के ऊपर जब कांग्रेस ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए, उनकी जांच करने के लिए केंद्र सरकार से मांग की तो उस पर कार्यवाही करने वाली मोदी सरकार राहुल गांधी को किरकिरी की भांति चुभने लगी। क्या पर्दे के पीछे चोर चोर मौसेरे भाई थे या फिर जो आरोप लगाए जा रहे थे वह केवल राजनीति करने के लिए लगाए जा रहे थे। वास्तव में राहुल गांधी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी से भी अधिक खतरनाक उनके लिए उनके पास बैठे हुए अरविंद केजरीवाल, तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव जैसे लोग हैं । जो उन्हें धीरे-धीरे मार रहे हैं और उनके जनाधार को छीनकर अपनी ओर करते जा रहे हैं। राहुल गांधी और उनकी पार्टी कांग्रेस को चुन चुनकर प्रदेशों से साफ किया जा रहा है और राहुल अहंकार की दारू पिए यह सब कुछ होने दे रहे हैं । कांग्रेस की इस मतिभंग की स्थिति ने ही उसे गतिभंग की स्थिति तक पहुंचा दिया है।

अब आते हैं भाजपा की ओर। भाजपा को दिल्ली के मतदाताओं ने अपना जनादेश 27 वर्ष पश्चात दिया है। यानी 14 वर्ष रामचंद्र जी के वनवास के और 12 वर्ष ज्ञात और 1 वर्ष के अज्ञातवास की अवधि अर्थात कुल 13 वर्ष के पांडवों के वनवास को जोड़ा जाए तो 27 वर्ष बनते हैं । इतने काल के पश्चात यदि भाजपा के ‘ राम’ और ‘ धर्मराज’ अपनी नगरी में लौट आए हैं तो भाजपा को यह सिद्ध भी करना होगा कि अब वह रामराज और धर्मराज स्थापित करके दिखाएगी । उनके समक्ष बहुत बड़ी चुनौती है । उस चुनौती पर खरा उतरना भाजपा की प्राथमिकता होना चाहिए । राजनीति में किसी भी प्रकार का अहंकार बने बनाए खेल को बिगाड़ देता है। इसलिए जनता के साथ जुड़कर परिश्रम, पुरुषार्थ और उद्योग करना भाजपा की प्राथमिकता होनी चाहिए।

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