दहेज प्रथा व दहेज उन्मूलनरत संगठनों के सम्बन्ध में गांधी जी की विचार दृष्टि

dahej-dowry
  • लेखक – आर्य सागर 

महात्मा गांधी जी का राजनीतिक सामाजिक आर्थिक वैचारिक दर्शन बहुत ही व्यापक स्पष्ट था । जिसमें अहिंसा,धर्म, नैतिकता, ग्राम स्वराज, स्वच्छता , स्वदेशी ग्राम उद्योग , अहिंसक समाजवाद, वेश्यावृत्ति मद्यपान नशाखोरी जैसे विषय ही शामिल नहीं थे भारत की आधी आबादी महिलाओं की समस्या स्त्री अशिक्षा ,दहेज प्रथा, बाल विवाह पर्दा प्रथा जैसी सामाजिक समस्याओं का कारण व निवारण भी व्यापकता से शामिल था।

भारत में प्रचलित दहेज जैसी कुप्रथा के संबंध में महात्मा गांधी जी ने अखबार यंग इंडिया में 1933 में एक लघु आलेख प्रकाशित किया। अखबार ही नहीं गांधीजी के पत्र व्यवहार व सार्वजनिक व्याख्यानों सभा आदि में भी महिलाओं से जुड़े यह संवेदनशील मुद्दे शामिल रहते थे। गांधी जी इन मुद्दों को लेकर हमेशा ही संवेदनशील भावुक रहते थे। गांधी जी के विमर्श के यह महत्वपूर्ण मुद्दे थे।

उपरोक्त सभी विषयों पर गांधीजी के व्याख्यानों पत्रों का संकलन उनकी पुस्तक मेरे सपनों का भारत (इंडिया ऑफ माय ड्रीम्स) में प्रकाशित हुआ।

गांधी जी के दहेज की प्रथा दहेज जैसी प्रथा के विरुद्ध कार्य कर रहे संगठनों को संबोधित करते हुए एक आलेख लिखा था गांधी जी के शब्दों में मैं वह आलेख यथावत आप सभी की समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं आशा है आप गांधी जी के अभिप्राय मंतव्य को व्यापक दृष्टि खुले हृदय से समझेंगे।

दहेज की प्रथा के सम्बन्ध में गांधीजी के विचार

” यह प्रथा नष्ट होनी चाहिये। विवाह लड़की -लड़के के माता-पिता द्वारा पैसे ले देकर किया हुआ कठिन सौदा नहीं होना चाहिए। इस प्रथा का जाति प्रथा से गहरा संबंध है। जाए। इस सब का मतलब है चरित्र की ऐसी शिक्षा जो देश के युवकों और युवतियों के मानस में आमूल परिवर्तन कर दे।

कोई भी ऐसा युवक जो दहेज को विवाह की शर्त बनाता है अपनी शिक्षा को कलंकित करता है अपने देश को कलंकित करता है और नारी जाति को अपमानित करता है

देश में आजकल बहुतेरे युवक आंदोलन चला रहे हैं। मैं चाहता हूं कि वे आंदोलन इस किस्म के सवालों को अपने हाथ में ले। ऐसे सुधारक संगठनों को किसी ठोस सुधार कार्य का प्रतिनिधि होना चाहिए और यह सुधार कार्य उन्हें अपने अंदर से ही शुरू करना चाहिये।
लेकिन देखा गया है कि इस तरह के सुधार कार्य के प्रतिनिधि होने की बजाय वे अक्सर आत्म प्रशंसा करने वाली समितियां का रूप ले लेते हैं

दहेज की नीचे गिराने वाली प्रथा के खिलाफ बलवान लोकमत पैदा करना चाहिए और जो युवक इस पाप के सोने से अपने हाथ गंदे करते हैं, उनका समाज से बहिष्कार किया जाना चाहिए। लड़कियों के माता-पिताओं को अंग्रेजी डिग्रियों का मोह छोड़ देना चाहिए और अपनी कन्याओं के लिए सच्चे और स्त्री जाति के प्रति सम्मान की भावना रखने वाले योग्य वरो की खोज में किसी भी तंग दायरे के बाहर जाने में संकोच नहीं करना चाहिए।” महात्मा गांधी, यंग इंडिया 5-11-1933

दहेज की प्रथा के संबंध में यह उपरोक्त गहन गंभीर विचार चिंतन महात्मा गांधी जी का है। जिसे गांधी जी के ही शब्दों में यथावत अंकित किया गया है।

उपरोक्त आलेख से अनेक श्रुत अर्थापक्ति निकाली जा सकती हैं।

प्रथम निष्कर्ष तो यही है दहेज प्रथा कोई आजकल की प्रथा नहीं है यह भारत की अनेक सदियों की समस्या है। गांधी जैसे विचारक समाज वैज्ञानिक भी इसको लेकर चिंतित थे। 1933 में लिखा गया यह आलेख इसका प्रमाण है। दहेज प्रथा के विरोध में उन दिनो भी सामाजिक संगठन कार्य कर रहे थे जिनमें बहुलता युवकों की थी यह एक सुखद तथ्य है आज जो संगठन इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं उनमें युवकों की सहभागिता बहुत कम है प्रायः देखा जाता है प्रौढ़ या अधेड़ आयु के स्त्री पुरुष ही प्राय इन कार्यों को हाथ में लेते हुए देखे जाते हैं लेकिन काल व्यय कोई भी हो जब तक किसी भी संगठन में कथनी करनी एक नहीं होगी धरातल पर ठोस कार्य नहीं होगा ऐसे में वह संगठन और संगठन के सदस्य आत्मप्रचार आत्ममुग्धता के शिकार हो जाएंगे गांधी जी ने इस संबंध में तल्ख टिप्पणी की है।

दहेज प्रथा के विरोध में आज भी कार्य कर रहे अधिकांश संगठन भी इस बुराई से अछूते नहीं है जब केवल सुधार कार्य सामाजिक सुधार के लिए ना होकर संगठन प्रचार प्रसिद्धि के लिए होता है तो संगठन के कार्यदायी सकारात्मक परिणामों पर ग्रहण लग जाता है। मैंने सामाजिक संगठनों के इन गुण दोषो को निकटता से देखा व अनुभव किया है।

ऐसा कर हम उस संगठन में अपनी सामर्थ्य प्रतिभा के साथ न्याय नहीं करते।

सुधार के कार्यों में भी जब सुधार का उद्देश्य केवल प्रचार व प्रसिद्धि पाना हो जाता है तो वह सुधार कृत्रिम होता है इसका प्रभाव अस्थायी होता है। कृत्रिमता से एक न एक दिन समाज का मोह भंग हो ही जाता है।

गांधी जी दहेज लेने को एक सामाजिक बुराई ही नहीं पाप की श्रेणी में गिनते हैं दहेज लेने वाले व्यक्ति या युवक के सामाजिक बहिष्कार की बात करते हैं। एक सदी पश्चात आज भी समाज दहेज लोभियों दहेज लेने वाले युवको को या उनके माता-पिताओं का बहिष्कार तो दूर उनकी सार्वजनिक निंदा का भी साहस एकत्रित नहीं कर पाया है। जिस समाज में दोषों को सह लिया जाता है वह समाज शीघ्र ही नष्ट हो।

गांधी जी के आलेख के संबंध में विभिन्न निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

अंत में मैं इन सूक्तियों वचनों के साथ अपने इस लेख को समाप्त करता हूं ।

हम सुधरेंगे, जग सुधरेगा।
हम बदलेंगे जग बदलेगा।।

सुधार स्वयं से चलता है।

– आर्य सागर
तिलपता, ग्रेटर नोएडा
लेखक सूचना का अधिकार व सामाजिक कार्यकर्ता है

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