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भ्रांति निवारण

प्रयागराज, तीर्थराज और त्रिवेणी संगम की वास्तविकता, भाग – 5

  • देवेंद्र सिंह आर्य

ज्योतिषपीठाधीश्वर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के विषय में हम सभी जानते हैं कि उन्हें स्वामी स्वरूपानंद जी की गद्दी उत्तराधिकार में अभी वैधानिक दृष्टिकोण से प्राप्त नहीं हुई है । इसके उपरांत भी वह अपने आप को शंकराचार्य लिखते हैं । उनकी पृष्ठभूमि भी कांग्रेस की रही है। कांग्रेस में रहते वे राजनीति में अपना स्थान स्थापित नहीं कर पाए तो आध्यात्मिक क्षेत्र में चले गए। वहां पर भी उन्होंने जिस प्रकार का वितंडावाद फैलाया, वह इसी बात से सिद्ध हो जाता है कि यद्यपि उन्होंने अपने आप को शंकराचार्य घोषित कर लिया है परंतु वह अभी कथित रूप से ही शंकराचार्य हैं । क्योंकि इस विषय को लेकर न्यायालय में उनके विरुद्ध केस दर्ज है।

अब हम इन कथित शंकराचार्य जी से पूछना चाहते हैं कि क्या मोक्ष इतना सुलभ है कि गंगा स्नान करने मात्र से ही नहीं बल्कि दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाएगा ? इस संदर्भ में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी का कहना है कि जो लोग गंगा के संगम पर आ नहीं सकते हैं वे अपने लिए घर रहते हुए ही गंगाजल मंगवा लें और उसी से स्नान कर लेने से उन्हें भी उतना ही पुण्य मिल जाएगा, जितना संगम पर जाने से मिलता है। ‌‌ इसी को इस्लाम में फतवा कहते हैं। शंकराचार्य जी के इस ज्ञान के चलते हमारे प्राचीन ऋषियों के की ज्ञान परंपरा पर क्या हमें तनिक भी विचार नहीं करना चाहिए ? विशेष रूप से तब जबकि इस विषय में अनेक ऋषियों ने हमारा उत्कृष्टतम मार्गदर्शन किया हो। महर्षि व्यास के अनुसार प्रज्ञा का निरंतर अभ्यास करने से योगी को वैराग्य होकर असंप्रज्ञात योग की सिद्धि होती है। प्रकृति और पुरुष के वास्तविक भेद को अनुभव करने और रूप विवेक की ख्याति ही उपाय है । जिस उपाय के निरंतर चिरकाल पर्यन्त अभ्यास करने से पुरुष अर्थात आत्मा को अपने स्वरूप का साक्षात्कार होने लगता है। यही साक्षात करने वाली बुद्धि समाधि प्रज्ञा कहलाती है। इस समाधि प्रज्ञा से मिथ्याज्ञान दग्धबीज होकर समस्त क्लेशादि( अर्थात पांचो क्लेश) नष्ट हो जाते हैं, और विवेकख्याति दृढ और अटल हो जाती है। जैसे चने को भाड़ में भूनने के पश्चात वह फिर अंकुरण क्षमता छोड़ देता है, वैसे ही जब विषय विकार तप की भट्टी में डालकर तपा दिए जाते हैं अर्थात भून दिए जाते हैं तो उनk अंकुरण की क्षमता भी समाप्त हो जाती है। इसी को दग्धबीज होना कहते हैं। ‌ समाधि प्रज्ञा प्राप्त योगी को सात प्रकार की प्रांतभूमि प्रज्ञा हो जाती है। प्रथम, जिज्ञासा का अंत अर्थात जो कुछ जानने योग्य था वह सब जान लिया, अब कुछ जानने के लिए शेष नहीं बचा। द्वितीय ,अविद्या अंत, इसका तात्पर्य है कि अविद्या आदि पांचों क्लेश छोड़ दिए, अविद्या के छोड़ देने से ही शेष चार क्लेश अपने आप छूट जाते हैं, क्योंकि शेष चार क्लेश अस्मिता, राग ,द्वेष और अभिनिवेश ये केवल अविद्या के कारण ही होते हैं। जैसे ही अविद्या छूटी शेष क्लेश अपने आप नष्ट हो जाते हैं।
तृतीय,प्रेक्षा का अंत,अब कुछ पाना शेष नहीं बचा, प्राप्त करने की समस्त इच्छाएं पूरी हो गईं, कोई ऐष्णा नहीं रही।

जो कुछ मांगन मैं चला सब कुछ मिल गया मोय।
क्या मांगू अब आपसे , गदगद मनवा होय।।

चतुर्थ, चिकिर्षा का अंत, अब कुछ करना बाकी नहीं बचा, पंचम बुद्धिसत्व की कृतकृत्यता, अर्थात मेरा बुद्धिसत्व कृतार्थ हो गया। षष्ठम ,बुद्धि रूप में बदले हुए गुण भी अपने मूल कारण (अर्थात प्रकृति )में लय हो गए। जैसे कि एक पहाड़ से लुढ़कता हुआ कच्चा पत्थर या मिट्टी का ढेला कहीं ठिकाना न पाने से टूटते – टूटते रेत बन जाता है। इसी प्रकार सत्व आदि तीनों गुण बुद्धिसत्व सहित लय को प्राप्त हो जाते हैं। यही वह स्थिति है। सप्तम ,आत्मा का अपने स्वरूप में भासना, अर्थात प्रकृति के गुणों से पृथक स्वरूप मात्रा में अवस्थित सत्य, चित् ,आत्मा केवली पुरुष(जीवात्मा )परमात्मा का साक्षात करेगा और कुछ बाकी नहीं रहा। सब कुछ प्राप्त हो गया। इसको योग दर्शन में “तज्जयात्प्रज्ञाआलोक: ” कहते हैं। अर्थात इसी से प्रज्ञा बुद्धि निर्मल हो जाती है। जो केवल संयम से प्राप्त होती है। संयम धारणा ,ध्यान और समाधि तीनों की स्थिति को कहते हैं। इससे आगे मोक्ष की स्थिति आती है। जब बुद्धि और जीवात्मा की शुद्धि एक जैसी हो जाती है तब कैवल्य (अर्थात अभ्युत्थान,मोक्ष, मुक्ति, नि:श्रेयस) प्राप्त होता है। ‌
महर्षि व्यास ने लिखा है कि बुद्धि में अब अविद्या समाप्त हुई तो शेष रोग (अर्थात क्लेश आदि )दूर हुए ।इनके दूर होने से काम (कर्म )छूटे और कर्म के छूटने से जन्म छूटा ,जन्म के छूटने से दुख छूटा और दुख के छूटने से मोक्ष हुआ। ‌ ‌ प्रज्ञा बुद्धि से ऋतंभरा बुद्धि अर्थात जहां बुद्धि केवल सत्य की गुण ग्राहक तथा किसी प्रकार का निर्भ्रम वाली हो जाती है । ऋतंभरा बुद्धि की विशेषता यह है कि इससे ईश्वर का साक्षात्कार होता है और ऋतंभरा बुद्धि से उत्पन्न हुआ संस्कार अन्य संस्कारों को हटाने वाला होता है। तथा ऋतंभरा से उत्पन्न संस्कारों के भी रोकने पर सबके सब रुक जाने से निर्बीज असंप्रज्ञातसमाधि योग सिद्ध हो जाता है । यही मानवीय जीवन का अंतिम ध्येय और यही मनुष्य की अंतिम गति है। ‌ ‌

योग दर्शन के उपयुक्त सूत्रों पर विचार करने से स्पष्ट हुआ कि ब्रह्म प्रताप या मोक्ष को प्राप्त करने के लिए तो इतनी कवायद करनी पड़ती है। प्रज्ञा बुद्धि से लेकर ऋतंभरा बुद्धि और असंप्रज्ञात समाधि तक की यात्रा जीवात्मा को करनी पड़ती है, जाना पड़ता है। इन ऋषियों , महर्षियों, मनीषियों ,व्याख्याकारों ने कहीं पर भी गंगा में स्नान करने से मोक्ष प्राप्त करने की स्थिति नहीं लिखी है। उनके व्याख्यान केवल सात्विक साधना पर प्रकाश डालते हैं। परम सत्य की खोज के लिए परम सत्य के अवलंब का मार्ग बताते हैं। विक्षेप का निक्षेप करने का ढंग बताते हैं। उसे संक्षेप करते-करते प्रक्षेप करने तक ले जाते हैं। कदाचित यही वह मार्ग है जिससे अन्य कोई दूसरा मार्ग उस परम पिता परमेश्वर तक जाता ही नहीं है। जब एक ही रास्ता उस सर्वनियंता के निकट ले जाने का है तो अनेक रास्तों, अनेक मतों ,अनेक पंथों में भटकने भटकाने की आवश्यकता कहां से आ गई ? ज्योतिष पीठाधीश्वर को हमारे इस प्रश्न का उत्तर देना ही होगा।

जो लोग इसके विपरीत कहते हैं वे इस विद्या को न तो जानते हैं न समझते हैं तथा न समझने देते हैं । वे बहकाए रखना चाहते हैं । जनता को भरमाए रखना चाहते हैं। गुमराह करके अपनी दुकानदारी चलाए रखना चाहते हैं। गंगा स्नान करने से बुद्धि कभी पवित्र नहीं होती। गंगा स्नान करने से कुसंस्कार और वासना कभी समाप्त नहीं होती। गंगा स्नान करने से कभी कर्म नहीं छूटेगा ।गंगा स्नान करने से कभी जन्म नहीं छूटता। गंगा स्नान करने से कभी क्लेश नहीं छूटेगा और गंगा स्नान करने से कभी दुख नहीं छूटेगा । गंगा स्नान करने से मुमुक्षु को अंतिम ध्येय तक नहीं पहुंचाया जा सकता।
वास्तव में यह मुमुक्षु का मार्ग है भी नहीं, यह तो मुमूर्षु का मार्ग है। ‌‌ ‌

(केनोपनिषद के आधार पर) ‌‌ ‌‌

‌ -देवेंद्र सिंह आर्य

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