आर्यसमाज वेदज्ञान से युक्त शुद्ध आचरण करने वाले मनुष्य का निर्माण करता है

वेदमंत्रों के उपदेश

देश और समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि सभी मनुष्यों की बुद्धि व शरीर के बल का पूर्ण विकास कर उन्हें शुद्ध ज्ञान व शक्ति सम्पन्न मनुष्य बनाया जाये। ऐसे व्यक्ति ही देश व समाज के लिये उत्तम, चरित्रवान, देशभक्त तथा परोपकार की भावना से युक्त होते हैं व देश व समाज के लिए लाभदायक होते हैं। यह कार्य करता हुआ कोई संगठन दीखता नहीं है। सृष्टि के आरम्भ काल से ही यह कार्य वेद व वैदिक जीवन पद्धति के द्वारा होता आया है। महाभारत युद्ध के बाद वेदों के विलुप्त हो जाने के बाद से यह कार्य होना अवरुद्ध हो गया था। महाभारत युद्ध के बाद देश व विश्व में जो मनुष्य उत्पन्न हुए वह शुद्ध ज्ञान की दृष्टि से न्यून प्रतीत होते हैं। यदि वह शुद्ध वेदज्ञान से पूरी तरह से युक्त होते तो संसार में अविद्या, अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड, कुरीतियां आदि प्रचलित न हुई होती। इसके साथ ही कहीं कोई अविद्यायुक्त मत-मतान्तर, पन्थ, सम्प्रदाय स्थापित व प्रचलित न होता। इसके विपरीत शुद्ध ज्ञान-विज्ञान पर आधारित एक ही मत, पन्थ व संगठन विश्व में होता जैसा कि सृष्टि के आरम्भ से महाभारत युद्ध तक पूरे विश्व में वैदिक धर्म वा वैदिक मत का संगठन था जिसे संसार के सभी लोग मानते थे और वेदों के अनुयायी ऋषि मुनि इस वैदिक धर्म का देश देशान्तर में प्रचार करते हुए उच्च चारित्रिक नियमों का पालन करते-कराते हुए समाज को सभी प्रकार के अज्ञान व पाखण्डों से मुक्त रखते थे।

आर्यसमाज कोई नया संगठन नहीं है। नाम नया कह सकते हैं परन्तु यह वही कार्य करता है जो महान वेदों के ज्ञानी तथा ईश्वर का साक्षात्कार किए हुए ऋषि, मुनि व विद्वान किया करते थे। आर्यसमाज व इसके संस्थापक ऋषि दयानन्द सरस्वती ने वेदों के सभी मन्त्रों, सिद्धान्तों व मान्यताओं की परीक्षा की थी और उन्हें ईश्वरप्रदत तथा ज्ञान-विज्ञान के सिद्धान्तों के सर्वथा अनुकूल पाया था। आज भी यही स्थिति है। वैदिक सिद्धान्तों का पालन करने से मनुष्य को अभ्युदय एवं निःश्रेयस की प्राप्ति होती है। ऐसा अन्य किसी मत व जीवन पद्धति से प्राप्त होता सम्भव प्रतीत नहीं होता। आर्यसमाज अपनी सभी मान्यताओं की परीक्षा व विवेचना करता है और सभी मान्यताओं को तर्क के आधार पर प्रतिष्ठित होने पर ही उन्हें स्वीकार कर उनका जन-जन में प्रचार करता है। आर्यसमाज का अपना एक मत-पुस्तक है जिसकी सब मान्यतायें वेदों से ली गई हैं और जो सृष्टि को बने हुए 1.96 अरब वर्ष बाद आज भी सर्वथा प्रासंगिक एवं व्यवहारिक हैं। संसार में वेद सबसे पुराने व आद्य ग्रन्थ हैं। वेदों के ज्ञान के अनुकूल उनकी व्याख्याओं से युक्त ज्ञान ऋषियों के ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है। वैदिक साहित्य के समान सत्य पर आधारित निर्दोष-ज्ञान मत-मतान्तरों की पुस्तकों में उपलब्ध नहीं होता। सभी मतों के पुस्तकों में वेद विरुद्ध कथन विद्यमान हैं। वेद सत्य व अहिंसा का पालन करने व कराने वाले आदर्श ग्रन्थ है। सभी मत-मतानतरों के ग्रन्थों का सर्वथा वेदानुकूल होना आवश्यक एवं अनिवार्य है। ऐसा होने पर ही संसार में सर्वत्र सुख व शान्ति स्थापित होकर मनुष्य परस्पर सौहार्द के साथ रहते हुए अभ्युदय व निःश्रेयस को प्राप्त हो सकते हैं। अतः आर्यसमाज द्वारा वेदों को अपनाना सारे संसार के लिये एक आदर्श उदाहरण है जिसे वेदेतर सब मतों के आचार्यों को जानकर अपने-अपने मत को भी विश्व के मनुष्य समुदाय के हित के लिए लाभकारी बनाने का प्रयत्न करना चाहिये।

ऋषि दयानन्द ने वेदों के सभी सिद्धान्तों व मान्यताओं का जन-जन में प्रचार करने के लिये आर्यभाषा हिन्दी में जिस प्रचार ग्रन्थ की रचना की है उसका नाम ‘सत्यार्थप्रकाश’ है। सत्यार्थप्रकाश की भूमिका में अपने ग्रन्थ की रचना का प्रयोजन बताते हुए वह लिखते हैं कि ‘मेरा इस ग्रन्थ के बनाने का मुख्य प्रयोजन सत्य-सत्य अर्थ का प्रकाश करना है, अर्थात् जो सत्य है उस को सत्य और जो मिथ्या है उस को मिथ्या ही प्रतिपादन करना सत्य अर्थ का प्रकाश समझा है। वह सत्य नहीं कहाता जो सत्य के स्थान में असत्य और असत्य के स्थान में सत्य का प्रकाश किया जाय। किन्तु जो पदार्थ जैसा है, उसको वैसा ही कहना, लिखना और मानना सत्य कहाता है। जो मनुष्य पक्षपाती होता है, वह अपने असत्य को भी सत्य और दूसरे विरोधी मतवाले के सत्य को भी असत्य सिद्ध करने में प्रवृत्त होता है, इसलिए वह सत्य मत को प्राप्त नहीं हो सकता। इसीलिए विद्वान् आप्तों (ऋषि व योगी जो सब समय ईश्वर को प्राप्त होकर उसी के चिन्तन तथा लोक कल्याण के कार्यों में संलग्न रहते हैं) का यही मुख्य काम है कि उपदेश वा लेख द्वारा सब मनुष्यों के सामने सत्य असत्य का स्वरूप समर्पित कर दें, पश्चात वे स्वयम् अपना हित अहित समझ कर सत्यार्थ का ग्रहण और मिथ्या अर्थ का पत्यिाग करके सदा आनन्द में रहें।’

ऋषि दयानन्द ने उपर्युक्त पंक्तियों में जो लिखा है व अकाट्य सत्य व व्यवहारिक ज्ञान है। सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन करने पर सत्यार्थप्रकाश सहित ऋषि दयानन्द के सभी ग्रन्थ विद्या के ग्रन्थ सिद्ध होते है जो अज्ञान व अन्धविश्वासों से सर्वथा रहित है। सत्यार्थप्रकाश में सभी मत-मतान्तरों के साथ निष्पक्षता व न्याय का अनुसरण करते हुए सबकी अविद्यायुक्त बातों का प्रकाश किया है जिनसे समाज में अशान्ति उत्पन्न होती है और जो मनुष्य के जीवन में ज्ञान व सद्कर्मों की उन्नति में बाधक बनते हैं। अतः देश व समाज में सुख, शान्ति व कल्याण के विस्तार के लिये मत-मतान्तरों की सभी मान्यताओं की परीक्षा व समीक्षा की आवश्यकता है और उन्हें सत्य पर स्थिर व स्थित किया जाना भी समय की आवश्यकता है। यही कार्य ऋषि दयानन्द ने अपने समय में आरम्भ किया था और यही कार्य सृष्टि के आरम्भ से महाभारत काल तक हमारे समस्त ऋषि-मुनि, विद्वान व आप्त पुरुष किया करते थे। जब तक यह कार्य किया जाता रहा भारत विश्व में चक्रवर्ती राज्य व ऐश्वर्य को प्राप्त था और जब से वेदों से पृथक व दूर हुआ है, तभी से देश व समाज में अशान्ति, दुःख, पराधीनता, अन्धविश्वास आदि वृद्धि को प्राप्त हुए और हमें अपमानित होना पड़ा है।

आर्यसमाज वेद, वैदिक साहित्य और सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के आधार पर मनुष्य का निर्माण करता है। वेद उच्च चारित्रिक मापदण्डों के पोषक हैं जिसका प्रचार व पोषण आर्यसमाज करता है। आर्यसमाज अपने सभी सदस्यों व अन्यों को भी ईश्वर व आत्मा विषयक सत्य ज्ञान उपलब्ध कराता है। ईश्वर व आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर सभी मनुष्य ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना व भक्ति में प्रवृत्त होते हैं। इससे अविद्या दूर होती है तथा मनुष्य को ईश्वर की कृपा, सहाय व आश्रय प्राप्त होता है। मनुष्य के दुर्गुण, दुव्र्यस्न व दुःख दूर हो जाते हैं। आत्मा की उन्नति होती है। ईश्वर से आत्म बल व सद्प्रेरणायें प्राप्त होती हैं। दान व परोपकार की प्रवृत्ति वृद्धि को प्राप्त होती है। मनुष्य असत्य व अज्ञान से दूर होता है तथा स्वाध्याय, सत्संग व चिन्तन-मनन-ध्यान से अपने ज्ञान को बढ़ाता व उसे प्रवचन व प्रचार द्वारा पुष्ट करता है। उपासना, अग्निहोत्र-यज्ञ, वेदाध्ययन सहित वैदिक साहित्य के अध्ययन तथा समाजोत्थान के कार्यों से उसका यश व गौरव बढ़ता है। वह श्रेष्ठ चरित्रवान बनता है। ‘मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्। आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः।।’ (नीतिसार) अर्थात् दूसरी सभी स्त्रियां माता के समान तथा दूसरों का धन मिट्टी के समान है। सभी प्राणी अपनी आत्मा के समान हैं। इस नीतिसार के वचनों का वैदिक धर्मी पालन करते है। वैदिक धर्मी पुरुषार्थी बनता है। देश भक्ति से सम्पन्न होता है। देश के लिये बलिदान की भावनाओं से युक्त होकर समाज में एक आदर्श उपस्थित करता है। स्वदेशी संस्कृति, परम्पराओं व धार्मिक मान्यतायें, जो सत्य पर आधारित हैं, उनके प्रति समर्पित होता है। वह विदेशी अपसंस्कृति तथा वहां से मिलने वाले प्रलोभनों का शिकार नहीं होता। वह अपनी संस्कृति को विदेशियों द्वारा प्रवर्तित मत व परम्राओं को अच्छा न मानकर अपने महान पूर्वजों वेद व ऋषि-मुनियों की परम्पराओं को मानता है व सत्य की दृष्टि से आवश्यक होने पर उसी में सुधार करता है।

आर्यसमाज द्वारा स्वदेशी पर्वों व महापुरुषों की जयन्तियों को मनाने की परम्परा को पुष्ट व प्रचारित किया जाता है। शिक्षा व ज्ञान का प्रचार तथा अविद्या व अन्धविश्वासों का खण्डन किया जाता है। समाज में विद्यमान अवैदिक व अनुचित परम्पराओं का आर्यसमाज विरोध व सुधार करता है। ऐसा करने से ही एक शुद्ध ज्ञानवान तथा शुद्ध कर्मयोगी व पुरुषार्थी मनुष्य का निर्माण होता है। इस कार्य को आर्यसमाज ने अपने 150 वर्षों के इतिहास में बहुत उत्तमता से किया है। देश में वेद व सद्धर्म विरोधी शक्तियों के सहयोग न करने सहित धर्मान्तरण जैसी प्रवृत्तियों को गुप्त रूप से प्रवृत्त करने तथा अपने अपने-अपने मत की संख्या बढ़ा कर देश का सांस्कृतिक स्वरूप बिगाड़ने के प्रयत्न होते देखे जाते हैं। आर्यसमाज इस स्थिति से अपने जन्म काल से ही परिचित व सतर्क है। उसे अपने बन्धुओं से सहयोग की आवश्यकता है तभी आर्यसमाज शुद्ध मनुष्य बनाने के अपने मिशन में सफल हो सकता है। यही देश व विश्व में सुख व शान्ति स्थापित करने की सबसे प्रभावशाली योजना है। मानव के जीवन व चरित्र का सुधार किया जाये और उसे शुद्ध ज्ञान व परोपकार के कार्यों को करने में प्रवृत्त किया जाये। यह कार्य वेद व आर्यसमाज को अपनाने पर ही हो सकता है। इस पर देश के बुद्धिजीवियों व मनीषियों को विचार करना चाहिये। आर्यसमाज को भी अपने भीतर आयी निष्क्रियता व संगठन की दुर्बलताओं पर विचार कर उसे ओजस्वी व तेजस्वी बनाने पर विचार करना चाहिये एवं कमियों व अन्य खामियों को दूर करना चाहिये। वेद व आर्यसमाज देश व विश्व को सुखी व सम्पन्न बनाने सहित सबको न्याय प्रदान कर उन्नत बनाने की एक निर्दोष व सम्पूर्ण व्यवस्था है। सबको आर्यसमाज को अपनाना चाहिये व आर्यसमाज से सहयोग करना चाहिये। ओ३म् शम्।

– मनमोहन कुमार आर्य

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