पिछले पांच हजार वर्षों में दयानन्द के समान ऋषि नहीं हुआ

rishi dayanand

महाभारत का युद्ध पांच हजार वर्ष से कुछ वर्ष पहले हुआ था। महाभारत युद्ध के बाद भारत ज्ञान-विज्ञान सहित देश की अखण्डता व स्थिरता की दृष्टि से पतन को प्राप्त होता रहा। महाभारत काल के कुछ ही समय बाद ऋषि जैमिनी पर आकर देश से ऋषि परम्परा समाप्त हो गई थी। ऋषि परम्परा का आरम्भ सृष्टि के आरम्भ से ही हुआ था। सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने जिन चार पवित्र आत्माओं को वेदों का ज्ञान दिया था वह चारों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा नाम वाले ऋषि थे। इन चार ऋषियों ने एक-एक वेद का ज्ञान ईश्वर से अपनी आत्माओं में प्रेरणा द्वारा प्राप्त कर जिन ब्रह्मा जी को ज्ञान दिया था वह भी ऋषि थे। ब्रह्मा व अग्नि ऋषि से आरम्भ ऋषि परम्परा महाभारत काल के बाद जैमिनी ऋषि पर समाप्त हो गई। जैमिनी जी के कुछ शिष्य अवश्य रहे होंगे परन्तु इतिहास में इनका नाम नहीं मिलता। जैमिनी ऋषि के पांच हजार वर्षों बाद ऋषि दयानन्द का आविर्भाव हुआ। ऋषि दयानन्द ने आरम्भ के वर्षों में किसी एक गुरु का शिष्यत्व प्राप्त कर ऋषित्व को प्राप्त नहीं किया अपितु आयु के 22वें वर्ष में गृहत्याग से लेकर सन् 1863 में प्रज्ञाचक्षु गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी से अध्ययन समाप्त करने तक वह 17 वर्षों की अवधि तक निरन्तर ज्ञान की खोज व विद्या की प्राप्ति के कार्य में एक सच्चे जिज्ञासु के रूप में प्रयत्नशील रहे। वह देश के प्रमुख धार्मिक तीर्थ कहे जाने वाले स्थानों सहित हिमालय पर्वत के अनेक आश्रमों व वहां योगियों की खोज में गये और उन विद्वानों से जो व जितना ज्ञान प्राप्त हो सकता था, प्राप्त किया। उन्होंने योग के गुरुओं से योग भी सीखा था और इससे उन्हें 18 घंटो तक समाधि अवस्था में ईश्वर का ध्यान करते हुए आनन्द का भोग करने की दक्षता प्राप्त हुई थी। सन् 1860 से पूर्व गुरु विरजानन्द जी से मिलने तक उनमें अर्जित विद्या से और अधिक विद्या प्राप्ति की अभिलाषा थी जो मथुरा में ढाई वर्ष तक गुरु आचार्य स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी से विद्या प्राप्त कर सन् 1863 में पूरी की। स्वामी विरजानन्द जी ने अपने शिष्य दयानन्द जी को देश वा संसार से अविद्या दूर करने की प्रेरणा की थी जिसका उन्होंने आदर्श रूप में पालन किया। ऋषि दयानन्द आदर्श ब्रह्मचारी थे। ब्रह्मचर्य विषयक सभी शास्त्रीय नियमों का भी उन्होंने पूरा पालन किया था। उनका पूर्ण ब्रह्मचर्ययुक्त जीवन ही मुख्य कारण था जिससे वह वेदज्ञान व योग समाधि द्वारा ऋषित्व को प्राप्त हो सके।

ऋषि वेदमन्त्रों के यथार्थ अर्थों के द्रष्टा को कहते हैं। ऋषि दयानन्द ने न केवल वेदमन्त्रों के यथार्थ अर्थ ही किये हैं अपितु पूर्व के वेदभाष्यकारों यथा सायण एवं महीधर आदि के वेदभाष्यों की समालोचना कर उनमें त्रुटियों व उनके मिथ्यार्थों पर प्रकाश भी डाला है और उनकी सयुक्तिक तार्किक समालोचना की है। ऋषि दयानन्द के वेदों के अर्थ सही हैं इसके लिये उन्होंने अनेक प्रमाणों से युक्त वेदभाष्य किया है जो निरुक्त के प्रणेता महर्षि यास्क के निर्वचनों, नियम व सिद्धान्तों के अनुकूल है। वेदमन्त्रों के जो अर्थ ऋषि दयानन्द ने किये हैं वह बुद्धि एवं तर्क संगत हैं तथा ज्ञान व विज्ञान की कसौटी पर भी सत्य हैं। ऋषि दयानन्द के वेदभाष्य का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में हमारे ऋषियों व उसके बाद के लोगों के विचार, मान्यतायें व सिद्धान्त क्या थे व क्या रहे होंगे? सृष्टि के आदिकाल का वह समय वस्तुतः मानव जाति के इतिहास का स्वर्णिम काल था जब आज की तरह का प्रदुषित वातावरण एवं सुविधायुक्त जीवन नहीं था। उस समय लोग कृषि से प्राप्त अन्न, वनस्पति, फल व गोदुग्धादि का शाकाहारी व शुद्ध भोजन करके अपने जीवन का निर्वाह करते थे। ईश्वर, जीवात्मा व सृष्टि के विषय में चर्चा करने के साथ ईश्वर के गुणों का चिन्तन, ध्यान व यज्ञ अग्निहोत्रादि करके वह अपने जीवन को व्यतीत करते थे। वेद का ज्ञान सर्वोत्कृष्ट है साथ ही इसकी भाषा भी सब भाषाओं में उत्तम है। कहा जाता है कि संस्कृत भाषा का ज्ञान प्राप्त करने पर अनन्त आनन्द की अनुभूति होती है। यह बात सर्वथा सत्य है। ऋषि दयानन्द जी के जीवन को देखकर इस तथ्य की पुष्टि होती है।

ऋषि दयानन्द सच्चे ब्रह्मचारी, योगी तथा वेदों के सर्वोत्कृष्ट ऋषि व विद्वान थे। उन्होंने मनुस्मृति में बताये गये धर्म के दस लक्षणों को धारण किया हुआ था। योग के पांच यम एवं पांच नियमों को भी उन्होंने धारण किया था। उनके जैसा महापुरुष व योगी इतिहास में दूसरा नहीं हुआ है। उनसे पूर्व के महापुरुषों में अविद्या को दूर करने का दृण संकल्प तथा वैदिक साहित्य का अध्ययन व धर्म प्रचार का वैसा कार्य अन्य किसी विद्वान ने नहीं किया जैसा कि ऋषि दयानन्द ने किया है। ऋषि दयानन्द ने ही आर्यों वा हिन्दुओं के आलस्य प्रमाद तथा विधर्मियों के छल, प्रलोभन एवं अन्य अशुभ उद्देश्यों व कार्यों से विलुप्त व नष्ट हो रही सनातन वैदिक धर्म व संस्कृति की रक्षा की। यदि वह न आते और वेदों का प्रचार न करते तो हम अनुमान से कह सकते हैं कि आज वैदिक धर्म व संस्कृति के दर्शन होने भी असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य होते। ऋषि दयानन्द ने न केवल वैदिक धर्म और संस्कृति की रक्षा ही की है अपितु वेदों पर आधारित वैदिक धर्म को विश्व का सबसे श्रेष्ठ धर्म और संस्कृति भी सिद्ध किया है। सभी मत-पन्थ वा धर्मों का आधार ऐतिहासिक पुरुष व महापुरुष हैं जबकि वैदिक धर्म का प्रादुर्भाव ईश्वर व उसके यथार्थ स्वरूप के ज्ञाता व समाधि अवस्था में उसका साक्षात्कार करने वाले ऋषि हैं। ऋषि दयानन्द ने एक महत्वपूर्ण कार्य यह भी किया है कि उन्होंने वेद एवं सभी शास्त्रों के प्रमाणों से युक्त वैदिक धर्म के व्यापक स्वरूप पर सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, व्यवहारभानु, गोकरुणानिधि, पंचमहायज्ञविधि जैसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे हैं। उनके लिखे सभी ग्रन्थ जन-जन की भाषा हिन्दी में है जिसे देवनागरी अक्षरों व हिन्दी भाषा का ज्ञान रखने वाला एक साधारण मनुष्य जान व समझ सकता है। वेदों के मन्त्रों के यथार्थ अर्थ करने की योग्यता रखने व जीवन के अन्तिम समय तक वेद प्रचार व वेदभाष्य आदि का कार्य करने के कारण वह सच्चे वेदार्थद्रष्टा-ऋषि, श्रेष्ठ महापुरुष व योगी थे।

ऋषि दयानन्द द्वारा संस्कृत व हिन्दी में वेदभाष्य करने सहित सत्यार्थप्रकाश एवं ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका जैसे महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना करने से ही ऋषि सिद्ध हो जाते हैं। उन्होंने यह कार्य तो किया ही, इसके साथ ही उन्होंने समाज सुधार, देश की एकता व अखण्डता सहित देश की पराधीनता को दूर कर इसे आर्यों का स्वतन्त्र देश बनाने का स्वप्न भी देखा था। विदेशी अंग्रेज शासकों से पराधीन आर्यावत्र्त व स्वदेश भारत में वेदों का साहस एवं निर्भीकतापूर्वक प्रचार करना, अन्य मतों के अनुयायियों की शुद्धि कर वैदिक धर्म में सम्मिलित करना, देश की स्वतन्त्रता की बातें करना और स्वराज्य का मन्त्र देना उनकी भारत देश को विशेष देने हैं। उनके यह कार्य इतिहास में अपूर्व व अन्यतम हैं। ऋषि दयानन्द जी की हमें यह भी विशेषता प्रतीत होती है कि उन्होंने अपने व्यक्तित्व से रक्तसाक्षी स्वामी श्रद्धानन्द, रक्तसाक्षी पं. लेखराम, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज, स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती, पं. चमूपति आदि अनेक उच्च कोटि के ईश्वर, वेद और देशभक्त विद्वान् दिये हैं। इन ऋषि दयानन्द के प्रमुख शिष्यों ने धर्म प्रचार सहित शिक्षा जगत, समाज सुधार एवं देश की स्वतन्त्रता सहित विधर्मियों के षडयन्त्रों को निर्मूल करने में भी बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हम यह भी अनुभव करते हैं कि ऋषि दयानन्द ने शास्त्रीय वचनों के आधार पर सत्यार्थप्रकाश के नवम् समुल्लास में जिस मोक्ष वा मुक्ति का वर्णन किया है, उन्हें आवागमन से रहित वह मोक्षावस्था भी प्राप्त हुई है। यदि उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ न मानें तो लगता है कि फिर मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी महाभारत काल के बाद कोई भी व्यक्ति व महापुरुष नहीं हुआ और सम्भवतः भविष्य में भी नहीं होगा। इसका कारण यह है कि जिस वैदिक धर्म का पालन करने से मोक्ष प्राप्त होता है उसका ऋषि दयानन्द से उत्तम पालन वा आचरण कोई मनुष्य नहीं कर सकता है। ऋषि दयानन्द को यह श्रेय भी प्राप्त है कि उन्होंने देश व विश्व की जनता को सृष्टिकर्ता तथा जीवों के जन्म-मरण के आधार ईश्वर के सच्चे स्वरूप, गुण-कर्म-स्वभाव व उपासना की विधि प्रदान की और वायु को शुद्ध करने सहित रोगरहित, दीर्घायु प्रदान करने वाले व सुखी जीवन के आधार अग्निहोत्र यज्ञ की विधि देकर सर्वत्र उसे प्रचारित एवं प्रचलित किया। ऋषि दयानन्द का जन्मना जातिवाद समाप्त करने, फलित ज्योतिष को पराधीनता व पतन का कारण बताने सहित स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन व उन्हें समाज में समानता का अधिकार दिलाने में भी सबसे अधिक योगदान है।

ऋषि दयानन्द ने आर्य साहित्य का निर्माण करने सहित वेदभाष्य का कार्य भी किया और वेद वचन ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ से हमें परिचित कराया। हमें गायत्री मन्त्र व इसका यथार्थ अर्थ भी उन्होंने बताया। कृण्वन्तो विश्वमार्यम् का अर्थ पूरे विश्व वा संसार को श्रेष्ठ गुणों से युक्त करना है जिससे संसार में कोई नास्तिक न हो, कोई अन्धविश्वासी न हो, कोई वेद विरुद्ध आचरण करने वाला न हो तथा कोई ऐसा न हो जो मातृ-पितृ-आचार्यों का आदर व सम्मान न करता हो। ऐसा भी कोई मनुष्य न हो जो मूक पशु-पक्षियों की हत्या कर व करवा कर उनके मांस का भक्षण करता हो, मद्यपान, धूम्रपान, अण्डों का सेवन करता हो तथा ब्रह्चर्यरहित जीवन व्यतीत करने वाला हो। ऋषि दयानन्द जी का हम व समस्त संसार जितना भी गुणगान करें उतना ही कम है। हम समझते हैं कि महाभारतकाल के बाद के पांच हजार वर्षों में ऋषि दयानन्द के समान वेदों के ज्ञान से प्रकाशमान व महापुरुषों के दिव्य गुणों से युक्त ऋषि व महर्षि उत्पन्न नहीं हुआ। ऐसे सर्वतो-महान् महर्षि देव दयानन्द को हम कोटिशः सादर नमन करते हैं। ओ३म् शम्।

– मनमोहन कुमार आर्य

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