anglo_maratha_war

[हिन्दवी – स्वराज के संस्थापक शिवाजी और उनके उत्तराधिकारी पुस्तक से] (अध्याय 15)

सूर्य ढलने लगा अब हिंदवी स्वराज्य का।
हृदय को छलने लगा फूट का वह राज था।।
आघात अपने आप दे आप को छलने लगे।
तीर शकुनिवाद के अपनों पर चलने लगे।।

मराठों ने भारत से मुगलिया सत्ता को सदा-सदा के लिए उखाड़ फेंकने का गौरवपूर्ण कृत्य किया था। शिवाजी के द्वारा स्थापित किए गए मराठा साम्राज्य के महान सेनानायकों ने मुगलिया सत्ता को इतना क्षीण कर दिया कि वह अस्ताचल के अंक में जा समाई। जब इस मराठा साम्राज्य के पतन का समय आया तो इस के भीतरी सत्ता-संघर्ष ने इसको भी भीतर से खोखला कर दिया था। जिसका राजनीतिक लाभ उठाने में अंग्रेज सफल हो गए। मराठा साम्राज्य के योद्धाओं ने अंग्रेजों को दीर्घकाल तक चुनौती दी और उनकी शक्ति को बहुत सीमा तक क्षीण भी किया। इतिहास के इस सत्य को यदि इस प्रकार देखा जाए कि अंग्रेजों से स्वतंत्रता का संग्राम 1857 की क्रांति से भी पूर्व सन् 1775 में हुए अंग्रेजों और मराठों के पहले युद्ध से मराठों द्वारा प्रारंभ किया गया था, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यद्यपि इस काल में कई ऐसे क्षण भी आए जब मराठों की ओर से सत्ता स्वार्थ ऊपर हो गया और राष्ट्रहित पीछे रह गया।

इतिहास का यह भी एक कटु सत्य है कि 1857 की क्रांति में भी नाना साहेब द्वितीय एक महानायक के रूप में कार्य कर रहे थे, जो इसी मराठा साम्राज्य के उत्तराधिकारी के रूप में इस क्रांति में सम्मिलित हुए थे। इस प्रकार 1775 से 1857 की क्रांति तक मराठा साम्राज्य इन विदेशी सत्ताधारियों को यहाँ से भगाने के लिए सक्रिय रहा। यद्यपि 1775 से लेकर मराठा साम्राज्य के पतन तक का सारा काल मराठों के अपकर्ष का काल कहा जाता है, जिससे कुछ सीमा तक हम भी सहमत हैं, परंतु यह तथ्य भी अपने आप में विचारणीय है कि इस अपकर्ष के काल में भी मराठा विदेशी सत्ताधारियों से लोहा लेते रहे। जब सन् 1818 में मराठा साम्राज्य का सूर्यास्त हो गया तो उसके पश्चात भी मराठे यत्र-तत्र विदेशी सत्ताधारी अंग्रेजों को यहाँ से भगाने के लिए सक्रिय रहे। इतिहास का यह कितना रोचक तथ्य है कि इस देश का रक्त चूसने वाले विदेशी सत्ताधारी मुगलों के वंशजों को तो आज तक खोजने का प्रयत्न इतिहासकार करते हैं, परंतु भारत के लिए संघर्ष करने वाले मराठा साम्राज्य के उत्तराधिकारियों को 1818 के पश्चात इतिहास से ऐसे विदा कर दिया गया जैसे कि इस वंश ने कुछ किया ही नहीं हो? जबकि 1857 की क्रांति और उसके बाद के स्वतंत्रता संग्राम में इन लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।

यह अचानक और मात्र संयोग से नहीं हो गया था कि 1857 की क्रांति में मराठे विदेशी सत्ताधारी अंग्रेजों से भिड़ गए थे। उसके पीछे लंबा इतिहास था और वह मूल संस्कार कार्य कर रहा था जो विदेशी सत्ताधारी मुगलों को इस देश की धरती से भगाने के लिए मराठा साम्राज्य की स्थापना करने के समय व्यक्त किया गया था। आज विदेशी सत्ताधारी अंग्रेज के रूप में काम कर रहे थे, जिन्हें निकाल भगाने के लिए मराठा शांत नहीं बैठ सकते थे, क्योंकि उनके रक्त में वही संस्कार बीज कुलबुला रहा था, जो कभी शिवाजी के भीतर मुगलों के प्रति कुलबुलाया था।

अंग्रेजों और मराठों के बीच 1775 से लेकर 1819 तक कुल 3 युद्ध हुए। ये युद्ध ब्रिटिश सेनाओं और ‘मराठा महासंघ’ के बीच हुए थे। इन युद्धों के परिणामस्वरुप भारत से मराठा साम्राज्य सदा सदा के लिए समाप्त हो गया और अंग्रेज अपना राज्य स्थापित करने में सफल हुए। हम इस तथ्य के साथ-साथ यह भी स्थापित करना चाहेंगे कि अंग्रेज चाहे मराठा साम्राज्य को उखाड़ने में सफल हो गए हों, परंतु वे हमारे मराठा भाव अर्थात महारथी भाव के उस मौलिक संस्कार बीज को समाप्त करने में सफल नहीं हुए जो प्रत्येक क्षत्रिय भारतीय के भीतर जमा हुआ था। उसी संस्कार बीज का देश, काल, परिस्थिति के अनुसार अब मराठा नेतृत्व कर रहे थे। इतिहास के बारे में हमें यह तथ्य सदा याद रखना चाहिए कि इतिहास विज्ञान के इस नियम पर काम करता है कि क्रिया के पश्चात प्रतिक्रिया अवश्य होती है। आप तनिक कल्पना करें, जिस समय 28 जनवरी, 1851 को बाजीराव द्वितीय का देहांत हुआ तो उस समय उसका अंतिम संस्कार उसके दत्तक पुत्र पेशवा नानासाहेब द्वितीय ने पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ किया। यद्यपि 1851 से 32 वर्ष पहले अंग्रेज पेशवा बाजीराव द्वितीय को सत्ताच्युत कर चुके थे। परंतु पेशवा का जिस प्रकार राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया, वह नानासाहेब द्वितीय के भीतर छिपे हुए उस स्वाभिमानी भाव को प्रकट करता है जो उन्हें आज भी अपने आप को पेशवा से कम नहीं मानने दे रहा था। इतना ही नहीं नानासाहेब द्वीतीय ने स्वयं को यह पेशवा घोषित करने का कभी गंभीर प्रयास किया था। जिसे अंग्रेजों ने छल बल से रुकवा दिया था। यद्यपि इसके उपरांत भी नानासाहेब को इतिहास में पेशवा नानासाहेब के नाम से ही ख्याति प्राप्त है। इसका अभिप्राय है कि जिस पेशवा पद और मराठा साम्राज्य को अंग्रेज 1818 में समाप्त कर चुके थे, उसका मराठा भाव हमारे मराठा वीरों के मराठा मन मस्तिष्क में 1857 की क्रांति और उसके पश्चात भी बना रहा। इससे उन्हें न केवल आत्म गौरव की अनुभूति होती थी, अपितु सत्ताधारी अंग्रेजों से लड़ने की प्रेरणा भी मिलती थी।

नाना साहेब द्वितीय का हाव-भाव और स्वाभिमानी व्यक्तित्व हमें यह बताता है कि वह अपने पेशवा पद पर अपना न केवल अधिकार मानते थे, अपितु अंग्रेजों को भारत से बाहर खदेड़ने के लिए भी संकल्पित थे, क्योंकि उनके भीतर यह भाव था कि भारत हमारा है और हम ही भारत पर राज्य करने के अधिकारी हैं। इतिहास सदा ही बीते हुए कल के खण्डहरों पर वर्तमान में भवन तैयार कर उसे भविष्य के लिए सौंपा करता है। अतः यदि अंग्रेज मराठा साम्राज्य को उखाड़ फेंकने में सफल हुए तो उसकी प्रतिक्रिया भी यह होनी ही थी कि मराठा भी अंग्रेजों को उखाड़ने के लिए सक्रिय हो जाते और ऐसा ही हुआ भी।

इतिहास का यह भी एक तथ्य है कि जहाँ रघुनाथराव ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से मित्रता करके पेशवा बनने का सपना देखा, और अंग्रेजों के साथ सूरत की सन्धि की, वहीं कायर बाजीराव द्वितीय ने बसीन भागकर अंग्रेजों के साथ बसौन की सन्धि की और मराठों की स्वतंत्रता को बेच दिया। 1775 से 1782 ई. तक पहला अंग्रेज मराठा युद्ध चला। यह युद्ध रघुनाथराव द्वारा महासंघ के पेशवा (प्रधानमंत्री) के दावे को लेकर ब्रिटिश समर्थन से प्रारम्भ हुआ था। 1779 की जनवरी में बड़गांव में अंग्रेजों को मराठों से पराजय का मुँह देखना पड़ा। परंतु इसके उपरांत भी वे मराठों से संघर्ष करते रहे, क्योंकि वह यह जानते थे कि शत्रु से भिड़े रहने से और भी कुछ नहीं तो शत्रु की शक्ति का क्षरण तो होता ही है। सन् 1782 में अंग्रेजों और मराठों के मध्य सालबाई की संधि हुई। इस संधि के अनुसार अंग्रेजों को मुंबई के पास सालसेत द्वीप पर अपना अधिकार स्थापित करने का अवसर मिल गया। इस संधि का उनके लिए यही सबसे बड़ा लाभ था।

परिस्थितियों के समक्ष विवश होकर 1818 ई. में बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेजों के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। इससे जहाँ मराठा साम्राज्य का अंत हो गया, वहीं अंग्रेजों के उत्साह में वृद्धि भी हुई। क्योंकि उन्होंने अब यह मान लिया कि भारतवर्ष में उन्हें चुनौती देने वाला अब कोई नहीं रहेगा। यह अलग बात है कि यह उनकी मात्र भ्रांति ही सिद्ध हुई, क्योंकि उन्होंने आग को ऊपर से दबाया मात्र था। जबकि वह भीतर ही भीतर सुलगती रही और 1857 में क्रांति के महाविस्फोट के रूप में जब बाहर आई तो अंग्रेजों को पता चल गया कि क्रिया की प्रतिक्रिया क्या होती है?

1818 में अंग्रेजों ने बाजीराव को बन्दी बनाकर बिठूर भेज दिया था, जहाँ 28 जनवरी 1851 ई. को उसकी मृत्यु हो गई। मराठों के पतन में मुख्य भूमिका अकेले बाजीराव की रही हो यह तो नहीं कहा जा सकता। इसके कई कारण थे। जिनमें एक कारण यह भी था कि पेशवा के पद को मराठा साम्राज्य में वंशानुगत कर दिया गया था। दूसरे, मराठा साम्राज्य के छत्रपति अब नाम के छत्रपति होकर रह गए थे। सारी शक्ति जब पेशवा के हाथों में आयी और पेशवा अल्पायु के बच्चों को भी बनाया जाने लगा तो पति शिवाजी महाराज द्वारा बड़े प्रयत्न से खड़ा किया गया साम्राज्य अंग्रेजों के छोटे से धक्का से भरभरा कर गिर गया।

हर दिन की संध्या होती है,
हर जीवन की भी होती शाम।

साम्राज्य भी ढल जाते हैं,
जब अपने करते उल्टे काम।।

क्या कारण था कि जिन शिवाजी महाराज के पास में एक इंच भूमि भी अपने साम्राज्य को खड़ा करने के लिए नहीं थी, उन्होंने फिर भी उस समय विशाल साम्राज्य खड़ा कर तत्कालीन औरंगजेब जैसे शक्तिशाली बादशाह का गर्व चकनाचूर कर दिया? अब उनके उत्तराधिकारी इतने अकर्मण्य हो गए कि वह उस विशाल साम्राज्य की भी रक्षा नहीं कर पाए जो 2800000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला हुआ था। इस विशाल साम्राज्य को भूमिसात करने में बाजीराव द्वितीय की इतनी ही भूमिका रही कि उसने अपनी कायरता और धोखेबाजी से सम्पूर्ण मराठों और अपने कुल को कलंकित किया था।

प्रथम अंग्रेज मराठा युद्ध के समय राघोवा (रघुनाथराव) ईस्ट इंडिया कम्पनी से सांठ-गांठ करके स्वयं पेशवा बनने का सपना देखने लगा था। वास्तव में सत्ता के लिए ऐसे स्वार्थ प्रेरित लोगों के कारण ही मराठा साम्राज्य का पतन हुआ था, क्योंकि इन लोगों की दृष्टि में राष्ट्र दूसरे स्थान पर और सत्ता प्राप्ति कर निजी महत्वाकांक्षा की संतुष्टि करना प्रथम स्थान पर आ गया था। राघोबा ने 1775 ई.
अंग्रेजों और मराठों के मध्य युद्ध में अंग्रेजों से सूरत की सन्धि की, जिसके अनुसार यह निश्चित किया गया कि बम्बई सरकार राघोवा से डेढ़ लाख रुपये मासिक खर्च लेकर उसे 2500 सैनिकों की सहायता देगी। इस सहायता के बदले देशद्रोही और संस्कृतिद्रोही राघोवा ने अंग्रेजों को बम्बई के समीप स्थित सालसेत द्वीप तथा बसीन को देने का वचन दिया। 1779 ई. में कम्पनी सेना की बड़गाँव नामक स्थान पर भंयकर हार हुई और उसे बड़गाँव की सन्धि करनी पड़ी। इस हार के बावजूद भी वारेन हेस्टिंग्स ने सन्धि होने तक युद्ध को जारी रखा था।

द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध

हिंदवी स्वराज्य अर्थात मराठा साम्राज्य के पतन के पश्चात अंग्रेजों के लिए भारत पर शासन करना सरल हो गया। जो लोग यह मानते हैं कि अंग्रेजों ने मुसलमानों से राज्य लेकर भारत को अपने अधीन किया था, उन्हें यह तथ्य पता होना चाहिए कि जिस समय अंग्रेज यहाँ पर अपनी सत्ता को स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहे थे, उस समय मराठा साम्राज्य भारत के 2800000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर शासन कर रहा था। धीरे-धीरे इसी साम्राज्य के क्षेत्रों पर अंग्रेज अपना अधिकार स्थापित करते चले गए। इस प्रकार अंग्रेजों ने सत्ता हिंदवी स्वराज्य अर्थात हिंदुओं से ली थी ना कि किसी मुस्लिम बादशाह से। अंग्रेज अब किसी भी स्थिति में भारत में पैर जमा कर भारत को विजित करने की तैयारी कर रहे थे। उनका प्रयास था कि जिस प्रकार कभी यहाँ मुगलों ने शासन किया था, उसी प्रकार वह भी शासन कर सकते हैं। इसके लिए वह यहाँ के सत्ता प्रेरित राजनीतिक लोगों के भीतर चल रहे मतभेदों को हवा देकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने की युक्तियाँ भिड़ाने लगे थे।

ऐसी परिस्थितियों के मध्य द्वितीय-आंग्ल मराठा युद्ध 1803-1805 ई. तक चला। इस युद्ध के परिणामस्वरूप बाजीराव द्वितीय को अपने अधीन बनाने के पश्चात अंग्रेज इस बात के लिए प्रयत्नशील थे कि, वे होल्कर, भोंसले तथा महादजी शिन्दे को भी अपने अधीन कर लें। जिससे कि उन्हें भारत में पैर जमाने का अच्छा अवसर उपलब्ध हो सके और भारत की सभी राजनीतिक शक्तियों का विनाश हो सके। अपनी कूटनीति और राजनीति को सिरे चढ़ाने के लिए उन्हें यह अब अनुकूल अवसर मिला कि मराठा साम्राज्य के लोगों में पहले से ही पारस्परिक मतभेद थे और वहाँ पर सत्ता संघर्ष बहुत ही भयावह स्थिति में व्याप्त था। अंग्रेजों ने इस पारस्परिक कलह और फूट की भावना को अपनी ओर से प्रोत्साहित करने का कार्य करना आरंभ किया।

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध

तीसरा अंग्रेज मराठा युद्ध बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। इस युद्ध के माध्यम से अंग्रेजों ने मराठा साम्राज्य का समूल विनाश कर दिया। यह आंग्ल-मराठा युद्ध 1817-1819 ई. तक चला। यह युद्ध अन्तिम रूप से वारेन हेस्टिंग्स के भारत के गवर्नर-जनरल बनने के बाद लड़ा गया। अंग्रेजों ने नवम्बर, 1817 में महादजी शिन्दे के साथ ग्वालियर की सन्धि की, जिसके अनुसार महादजी शिन्दे पिंडारियों के दमन में अंग्रेजों का सहयोग करेगा और साथ ही चंबल नदी से दक्षिण-पश्चिम के राज्यों पर अपना प्रभाव हटा लेगा। इससे अंग्रेजों को भारत में अपना वर्चस्व स्थापित करने में बहुत सहायता मिली। अब अंग्रेजों के लिए यह स्पष्ट हो चुका था कि उन्हें चुनौती देने वाली कोई शक्ति भारत में शेष नहीं है। इसके बाद अंग्रेज भारत में अपना वर्चस्व एवं प्रभाव निरंतर बढ़ाते चले गए। यह अलग बात है कि अंग्रेजों की यह भ्रांति अधिक देर तक स्थापित न रह सकी कि उन्हें भारत में कोई चुनौती देने वाला नहीं है? जैसा कि हम ऊपर स्पष्ट कर चुके हैं, 1857 की क्रांति के अंगारे 1819 में ही इस मराठा साम्राज्य के तथाकथित विनाश के माध्यम से दबे थे। जिन्होंने जब क्रांति का रूप लिया तो अंग्रेज चाहे अपना राज्य स्थापित किये रखने में फिर भी सफल रहे, परंतु उनकी चूलें हिल गई और 1857 के पश्चात 1947 तक फिर वह कभी भी शांति से इस देश पर शासन नहीं कर पाए। इतिहास को इसी दृष्टिकोण से और इतिहास के इन्हीं तथ्यों के आलोक में भी पढ़ा जाएगा तो इतिहास इतिहास के रूप में हमें समझ में आ सकेगा।

जून, 1817 में अंग्रेजों ने पेशवा से पूना की सन्धि की, जिसके अंतर्गत पेशवा ने ‘मराठा संघ’ की अध्यक्षता त्याग दी।
क्रमशः

– डॉ राकेश कुमार आर्य

Comment:

betpark
mavibet giriş
grandpashabet
grandpashabet
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
betpark giriş
imajbet güncel
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
imajbet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
imajbet güncel
bettilt giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
imajbet güncel giriş
imajbet giriş
imajbet güncel
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
safirbet giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
holiganbet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano güncel
betnano güncel giriş
bettilt giriş
imajbet güncel
imajbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
imajbet güncel
casibom
casibom
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
imajbet güncel giriş
grandpashabet
grandpashabet
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
Grandpashabet giriş
safirbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş