ऋषि दयानन्द ने आर्य भाषा हिंदी को ऋषियों की भाषा होने का गौरव प्रदान किया है

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।
संसार में अनेक भाषायें हैं। इनकी संख्या लगभग एक हजार व उससे कुछ कम हो सकती है। संस्कृत संसार की सबसे प्राचीनतम भाषा है। संस्कृत का आविर्भाव सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर से वेद ज्ञान के प्रादुर्भाव के साथ हुआ था। संस्कृतेतर सभी भाषायें समय समय पर उत्पन्न होती रही जिसमें संस्कृत की मातृ भाषा के समान भूमिका रही है। संस्कृत के शब्दों में विकृतियां व उच्चारण दोष सहित भौगोलिक कारणों से भाषा में परिवर्तन होकर नई भाषायें व बोलियों का आविर्भाव होता है। सृष्टि की आदि भाषा संस्कृत रही है यह इस बात से स्पष्ट है कि ईश्वरीय ज्ञान वेद की भाषा संस्कृत ही है। इस आधार पर हम यह भी कह सकते हैं कि ईश्वर की अपनी भाषा ही संस्कृत ही है जो कि वेदों में दी हुई है। तुलनात्मक दृष्टि से भी वैदिक संस्कृत भाषा ही संसार की सर्वश्रेष्ठ भाषा है। संस्कृत के शब्दों से ओत-प्रोत व संस्कृत के शब्दों का सबसे अधिक जिस भाषा में शुद्ध व किंचित पाठ व उच्चरण भेद से प्रयोग किया जाता है वह भाषा हिन्दी ही है। हिन्दी संसार की सबसे सरल व सुबोध भाषा है। चैकोस्लोवाकियां के भारत में एक राजदूत महोदय ने वर्षों पूर्व कहा था कि हिन्दी संसार की सरलतम भाषा है जिसे कुछ ही घंटों में सीखा जा सकता है।

सृष्टि के आरम्भ से भारत में सभी ऋषियों की भाषा संस्कृत रही है। सभी वैदिक वांग्मय संस्कृत में लिखा गया और ऋषि दयानन्द के आविर्भाव तक केवल संस्कृत भाषाविद ही वेद एवं वैदिक साहित्य दर्शन, उपनिषद, मनुस्मृति, रामायण एवं महाभारत आदि से लाभ उठा सकते थे। ऋषि दयानन्द (1825-1883) के आविर्भाव के समय संस्कृत केवल कुछ विद्वानों की भाषा बन जाने वा अति सीमित हो जाने के कारण इसके वैदिक साहित्य की पहुंच साधारण मनुष्यों तक नहीं थी। इस बात को ऋषि दयानन्द ने समझा था और इसी कारण जन-जन तक वेद एवं वैदिक सिद्धान्तों को पहुंचाने के लिये उन्होंने अपने उपदेश एवं ग्रन्थों को, संस्कृत के उच्च कोटि वक्ता, विद्वान, लेखक व उपदेशक होने पर भी, हिन्दी में प्रस्तुत कर उन्होंने पहली बार वेद, मनुस्मृति एवं योगसूत्रों को हिन्दी भाषा के माध्यम से प्रस्तुत किया था। ऋषि दयानन्द यदि ऐसा न करते तो आज संसार में वेदों की जो प्रतिष्ठा एवं लोकप्रियता है वह कदापि न होती। वेद, वैदिक धर्म और संस्कृति की रक्षा में भी ऋषि दयानन्द के वेदों के प्रचार वा उपदेशों सहित सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, गोकरूणानिधि, आर्योद्देश्यरत्नमाला, व्यवहारभानु आदि ग्रन्थों का महत्वपूर्ण योगदान है। ऋषि दयानन्द ने हिन्दी को, जिसे उन्होंने आर्यभाषा का नाम दिया था, अपना कर हिन्दी को जो गौरव दिया उसी का परिणाम था कि आर्यसमाज ने अविभाजित भारत में हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया था जिसके फलस्वरूप हिन्दी को देश के सभी भागों में समझा व बोला जाने लगा था। देश की आजादी के बाद देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी को राष्ट्र भाषा व राजभाषा का गौरव मिला है। इसका श्रेय भी यदि किसी एक व्यक्ति व संस्था को दिया जा सकता है तो वह ऋषि दयानन्द और उनके द्वारा स्थापित संस्था आर्यसमाज ही है।

सृष्टि के आरम्भ से महाभारतकाल और ऋषि दयानन्द के प्रादुर्भाव तक लगभग 1.96 अरब वर्षों में हमारे समस्त ऋषियों ब्रह्मा से जैमिनी पर्यन्त की भाषा संस्कृत थी। जैमिनी ऋषि के बाद ऋषि दयानन्द हुए जिन्होंने ऋषि परम्परा को जीवित कर विलुप्त वेद और वेद ज्ञान का पुनरुद्धार किया था। ऋषि दयानन्द गुजरात में उत्पन्न हुए थे। उनकी मातृ भाषा गुजराती थी। अपनी आयु के 22 वें वर्ष तक वह गुजराती का ही प्रयोग करते थे। गुजराती भाषा पर उनका अधिकार रहा होगा, ऐसा हम स्पष्ट अनुमान कर सकते हैं। 22 वर्ष व उसके बाद वह देश भर में घूमें और धर्म व संस्कृति के विद्वानों के सम्पर्क में आये। उनसे उन्होंने वार्तालाप करने सहित उपदेश ग्रहण किये और उपलब्ध साहित्य का अनुशीलन किया। गुजरात में रहते हुए ही वह संस्कृत पढ़ते रहे थे और उन्हें यजुर्वेद भी स्मरण था। वह एक सिद्ध योगी भी बन गये थे और घंटो तक समाधि लगाने की योग्यता उनको प्राप्त हो चुकी थी। इस पर भी उन्हें और अधिक विद्या की प्रप्ति के प्रति गहरा अनुराग था। वह एक उच्च कोटि के वेदों के विद्वान से विद्याध्ययन करना चाहते थे। इसी क्रम में उन्हें स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती जी से ज्ञात हुआ था कि उनके एक शिष्य स्वामी विरजानन्द सरस्वती मथुरा में रहते है। वह स्वामी दयानन्द की विद्या सम्बन्धी सभी आवश्यकताओं, आशंकाओं को दूर कर व पूरा करके उन्हें विद्या विषयक सभी साध्य विद्याओं में निपुण कर सकते हैं। ऋषि दयानन्द सन् 1860 में गुरु विरजानन्द जी के पास मथुरा पहुंचे थे और उनसे विद्यादान की प्रार्थना कर उनके सान्निध्य में लगभग तीन वर्ष रहकर उनसे वेदांगों का अध्ययन किया था। उन्हें अपने गुरु से समस्त विद्यायें व सत्यासत्य को परखने व उसका निर्णय करने की कसौटी प्राप्त हुई थी। उन्हीं की प्रेरणा से स्वामी दयानन्द ने देश व संसार से अविद्या को दूर कर विद्या का प्रचार करने व उस विद्या व सिद्धान्तों को उनके सही स्थान पर प्रतिष्ठित करने का संकल्प लिया था। स्वामी विरजानन्द जी के साथ स्वामी दयानन्द की गुरुदक्षिणा की यह घटना सन् 1863 में घटी थी। इसके बाद स्वामी दयानन्द ने अपना समस्त जीवन वेदों के प्रचार प्रसार सहित अवैदिक असत्य व अविद्यायुक्त मत-मतानतरों के खण्डन में व्यतीत किया। उन्होंने सन् 1875 में विश्व की वेदों में पूर्ण आस्था रखने वाली सर्वोत्तम संस्था आर्यसमाज की स्थापना की थी जिसका उद्देश्य देश व विदेशों में वेद प्रचार करना था। स्वामी दयानन्द जी ने समाज में व्याप्त व प्रचलित सभी अन्धविश्वासों व सामाजिक कुप्रथाओं का भी अध्ययन किया था और इसका वेद एवं शास्त्रीय प्रमाणों, तर्क एवं युक्तियों से खण्डन कर उनका उन्मूलन करने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया था।

अपने संकल्पों को पूरा करने के लिये ऋषि दयानन्द को व्याख्यान वा उपदेशों की आवश्यकता थी। वैदिक मान्यताओं के प्रचार व प्रसार के लिये ग्रन्थ लेखन का कार्य भी आवश्यक था। इन सभी कार्यों में उन्होंने अपनी संस्कृत विद्या में अपनी विद्वता का मोह व परम्पराओं को छोड़कर देश, समाज व जन-जन का कल्याण करने के लिये हिन्दी भाषा को अपनाया था। आज उनके कार्यों के परिणामस्वरूप ही हिन्दी राष्ट्र भाषा व राजभाषा के गौरवपूर्ण स्थान पर प्रतिष्ठित है। विश्व में भी हिन्दी की पहचान है। देश का सौभाग्य है कि वर्तमान में इसे एक हिन्दी प्रेमी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी प्राप्त हैं जो अपनी सभी विदेश यात्राओं में विदेशी राज्याध्यक्षों के साथ हिन्दी में ही वार्तालाप करते थे। इससे हिन्दी का गौरव बढ़ा है। सयुंक्त राष्ट्र संघ में भी वर्तमान में भारत के प्रमुख प्रतिनिधि प्रधानमंत्री व विदेश मंत्री हिन्दी का ही प्रयोग करते हैं। इस सबसे हिन्दी का गौरव बढ़ रहा है। आज पूरे विश्व में भारत की पहचान है जिसका कारण व आधार हमारी भाषा हिन्दी और इस देश का प्राचीन वैदिक ज्ञान है। आज पूरे विश्व ने वैदिक संस्कृति की देन योग को अपना लिया है। 26 जून का दिन विश्व में योग दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस योग दिवस ने भी भारत को पूरे विश्व में सम्मान दिलाया है। अन्य मत-मतान्तरों के पास योग जैसी न तो उपासना पद्धति है और न ही यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि जैसी शरीर व आत्मा को सुदृण करने वाली व परमात्मा से मिलाने वाली विद्या है। जिन देशों व मत-मतानतरों में थोड़ा कुछ अच्छा ज्ञान है भी, वह सब वेदों से ही वहां पहुंचा है। अतः वेद एवं वैदिक साहित्य सहित योगदर्शन एवं ऋषि दयानन्द के ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश आदि का महत्व निर्विवाद है।

ऋषि दयानन्द ने हिन्दी को अपने प्रचार-प्रसार व लेखन की भाषा बनाकर इसको संस्कृत के समान व उससे भी अधिक गौरव प्रदान किया है। ऋषि दयानन्द ने ही अपने समय में हिन्दी को राजभाषा बनाने के लिये अंग्र्रेज सरकार द्वारा गठित हण्टर कमीशन के समक्ष करोड़ों लोगों के हस्ताक्षरों से युक्त ज्ञापन देने का एक आन्दोलन भी चलाया था। ऋषि दयानन्द के अनुयायी चाहे उर्दू प्रधान क्षेत्र पंजाब में हों या देश के किसी अन्य भाग में, वह जहां भी रहे हैं वहां उन्होंने आर्यभाषा हिन्दी का ही प्रयोग किया। आर्यसमाज ने देश भर में डी0ए0वी0 स्कूल व कालेज सहित गुरुकुलों की स्थापना की और अपनी सभी संस्थाओं में हिन्दी को अनिवार्य भाषा के रूप में स्थान दिया था। आज भी आर्यसमाजों का सभी कार्य हिन्दी भाषा में ही किया जाता है। यह सब ऋषि दयानन्द की प्रेरणा से ही होता आया है व हो रहा है। ऋषि दयानन्द की एक देन यह भी है कि विदेशियों ने भी हिन्दी भाषा का अध्ययन किया था। ऋषि दयानन्द का एक ग्रन्थ है ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका। यह ग्रन्थ चारों वेदों के ऋषि दयान्न्द के संस्कृत व हिन्दी भाष्य का भूमिका ग्रन्थ है। इसमें ऋषि दयानन्द ने संस्कृत व हिन्दी दोनों भाषाओं का प्रयोग किया है। इसका यह लाभ हुआ है कि जो विद्वान संस्कृत जानते थे व हिन्दी नहीं जानते थे, वह भी भूमिका ग्रन्थ के माध्यम से हिन्दी से परिचित हो गये। इसका कारण यह था संस्कृत व हिन्दी दोनों भाषाओं की लिपि एक है। संस्कृत पढ़कर हिन्दी को पढ़ा जा सकता है और दोनों पाठ पढ़ने पर हिन्दी समझ में आ जाती है। प्रो0 मैक्समूलर ने तो यहां तक कहा है कि वैदिक साहित्य का आरम्भ ऋग्वेद से और समाप्ति ऋषि दयानन्द की ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पर होती है। मैक्समूलर के इस वचन को ऋषि दयानन्द के वैदिक साहित्य में योगदान के लिये निष्पक्ष प्रमाण के रूप में जाना व माना जा सकता है। यह बात सत्य है कि प्रो0 मैक्समूलर अपने जीवन के आरम्भ के वर्षों में वेदों व वैदिक धर्म के प्रति पक्षपात रखते थे। वह ईसाई मत व बाइबिल को वेदों से श्रेष्ठ मानते थे परन्तु ऋषि दयानन्द की ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका को पढ़ने के बाद उनके विचारों में परिवर्तन आया था और अनेक अवसरों पर वह वेद की प्रशंसा करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। इसे हम ऋषि दयानन्द का जादू कह सकते हैं।

ऋषि दयानन्द को भारत की ऋषि परम्परा का प्रथम ऋषि होने का गौरव प्राप्त है जिसने संस्कृत व हिन्दी को अपनाया और अपने ग्रन्थों को ही हिन्दी में नहीं लिखा अपितु वेदों का संस्कृत व हिन्दी में भाष्य करने का कार्य भी किया। वह यदि न आते तो हम देश की दुर्दशा की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। उन्होंने मृत प्रायः वैदिक धर्म एवं संस्कृति जिसे विधर्मियों ने हिन्दू धर्म नाम दिया था, उसकी रक्षा की और उसे संसार का सर्वोत्तम धर्म व संस्कृति सिद्ध किया। आज हिन्दी दिवस पर हम ऋषि दयानन्द को उनके हिन्दी के प्रति योगदान के लिये सादर स्मरण करते हैं और उनको नमन करते हैं। ओ३म् शम्।

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