ध्यान का प्रपंच और भोली -भाली जनता* *भाग-१*

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विशेष : ये लेख मला ५ भागों में है ,जो वैदिक विद्वानों के लेख और विचारों पर आधारित है। जनहित में आपके सम्मुख प्रस्तुत करने मेरा उद्देश्य है , इसलिए कृपया शेयर करे।
डॉ डी के गर्ग

पिछले कई वर्षोंसे मेरे पास अलग लग गुरुओं के शिष्य आ रहे है और उनके बाबा गुरु द्वारा चलाये जा रहे ध्यान केंद्र या ध्यान शिविर में ले जाकर ध्यान की बात करते है। जिनमें गुरु माँ ,श्री रविशंकर , ओशो ,ब्रह्माकुमारी का सहज योग,विपसना केंद्र , अमृता माता ,और ना जाने कितने अनगिनत केंद्र हैं।
इनमें से कुछ ध्यान केंद्रों में मैं गया और कुछ शिविर में भी भाग लिया। सभी शिविर में फीस दी गयी थी और ये भी महसूस किया ये ये बाबाओं के धन कमाने और भोली भली जनता को मुर्ख बनाने और अपने गुरु प्रथा के लिए चेले चपटे तलाश करने का सुगम रास्ता है।
दरअसल आजकल हर कोई शांति की तलाश में भटक रहा है ,गरीब को धन चाहिए और धनी को और अधिक चाहिए तथा धन को बचाये रखना एक और चुनौती उनके सामने है। विद्यार्थी को परीक्षा में अच्छे अंक लेकर अच्छी नौकरी चाहिए फिर अच्छी प्रमोशन भी , फिर दफ्तर की राजनीती उस पर हावी होती है और साथ में परिवार को स्थिर रखने की जिम्मेदारी भी।
इसका लाभ ये ध्यान लगवाने वाले बाबा उठाते हैं।
ध्यान क्या है ? पहले ये समझ लेते है की ध्यान क्या है। गणित की संख्याओं को जोड़ने के लिए भी ‘योग’ शब्द का प्रयोग किया जाता है, परन्तु आध्यात्मिक पृष्ठ भूमि में जब ‘ योग’ शब्द का प्रयोग किया जाता है, तब उसका अर्थ आत्मा को परमात्मा से जोड़ना होता है। वस्तुतः परमात्मा हर स्थिति में व हर समय आत्मा को प्राप्त होता है, आवश्यकता तो बस इस तथ्य को अनुभव करने की है। जिस स्थिति में आत्मा परमात्मा को अनुभूत कर सकता है, उस स्थिति को प्राप्त करने के लिए महर्षि पंतजलि ने आठ अङ्गों का विधान किया है। यही अंग योग अथवा अष्टांग योग के नाम से प्रसिद्ध है।
आश्चर्य की बात यह है की इनमें से अधिकांश को ये ही नहीं पता की ध्यान किसे कहते हैं, योग किसे कहते हैं और ध्यान की परिभाषा क्या है। म्यूजिक के साथ १०-२० मिनट आँखे बंद करके शांत बैठा दिया ,पीछे से कुछ ना कुछ बोलते रहे ,संगीत बजा दिया , किसी तरह से मनोरंजन कर दिया , उपदेश दे दिए ,अब दोनों हाथों से आँखे मसल लो , लो हो गया ध्यान,ये है बेवकूफ बनाने की कला बजी। इस विषय में विस्तार से चर्चा करते है।

पतंजलि के योग सूत्र योग के आठ अंग हैं: यम (संयम), नियम (पालन), आसन (योग मुद्राएँ), प्राणायाम (श्वास नियंत्रण), प्रत्याहार (इंद्रियों को वापस खींचना), धारणा (एकाग्रता), ध्यान (ध्यान) और समाधि (अवशोषण)।”

नीचे योग के भिन्न-भिन्न अंगों के अर्थों को बताने का प्रयास किया गया है-

योग का पहला अंग है -यम जिसमे यम के पांच विभाग है –

१ अहिंसा 2. सत्य 3. अस्तेय 4. ब्रह्मचर्य 5. अपरिग्रह
ज्यादा विस्तार से लिखने के बजाय सभी पर संक्षेप में लिखते है।

1.अहिंसा –यह मान्यता है कि किसी को कष्ट, पीड़ा व दुख देना हिंसा है।इसके विपरीत अहिंसा है। यदि इस मान्यता को स्वीकार किया जाये, तो माता-पिता, शिक्षक, अधिकारी आदि सुधारने के लिए हमारी त्रुटियों का दण्ड देते हुए हमें कष्ट देते हैं, क्या उनका यह कर्म हिंसा हो जायेगा? और तो और ईश्वर जो की कर्मफल प्रदाता है ,अपने श्रेष्ठ न्याय से सर्वाधिक कष्ट देता है। क्या ये हिंसा है ? वेद में तो ईश्वर को पूर्ण अहिंसक स्वीकारा है। इसलिए हिंसा की ठीक परिभाषा है की लोभ, क्रोध और मोह से प्रेरित होकर शरीर, वाणी अथवा मन से किए गए कर्म हिंसा करने वाले होते हैं। इसके विपरीत शरीर, वाणी अथवा मन से किए गए कर्म, जो लोभ, क्रोध और मोह से प्रेरित होकर नहीं किए जाते, उन्हें ‘अहिंसा’ की कोटि में रखा जाता है।
विशेष यह भी है की यदि स्वयं हिंसा न कर और दूसरों के द्वारा हिंसा किए जाने को मूक द्रष्टा बन देखते रहना भी हिंसा ही है। हिंसा का मूल ‘अन्याय’ है। दूसरों पर होते अन्याय का उचित प्रतिरोध न करना हिंसा का समर्थन करना ही है। इसलिए यह आवश्यक है कि अहिंसा का व्रत लेने वाला व्यक्ति स्वयं हिंसा न करने के साथ-साथ दूसरों द्वारा हिंसा किए जाने के विरोध में आवाज़ भी उठाए। हाँ, इस व्यक्ति का दूसरों द्वारा हिंसा किए जाने के विरोध में आवाज़ उठाना, उतना ही सार्थक होगा, जितना वह स्वंय दूसरों के प्रति हिंसा नहीं करता होगा।इस विषय में जैन और बौद्ध समाज द्वारा हिंसा को फिर से परिभाषित करना होगा ।

2. सत्य ;- जो चीज़ जैसी है, उसे वैसा ही जानना व मानना सत्य कहलाता है। उदाहरण के तौर पर सांप को सांप जानना व मानना सत्य कहलाएगा और सांप को रस्सी जानना व अन्यथा रस्सी को सांप जानना असत्य कहलाता है।
इस विषय में ओशो ने एक भरती फैलाई है कि जिस झूठ से किसी का भला होता हो, उसे बोलना कोई गलत नहीं। यह ठीक नहीं।
एक उदाहरण — एक अपराधी आपके घर में शरण लेने आया है। कुछ लोग उसको तलाश कर रहे है ,आपने पूछताछ करने पर सच नहीं बोले या मौन रहें क्योकि आपको लगा की यदि उस आदमी के बारे में पूछने पर आपने सच बता दिया, तो वह आदमी मारा जाएगा। ऐसी अवस्था में आपका झूठ बोलना शायद उस आदमी को बचा दे। और ये झूठ उस किसी प्राणी को क्षणिक, एक घंटे तक, एक दिन तक, एक वर्ष तक या ज़्यादा से ज़्यादा एक जन्म तक लाभ तो पहुँचा सकता है, परन्तु आपका झूठ बोलना दो तरह से दण्डनीय होगा । आपके दण्डनीय होने का पहला कारण तो होगा आपका झूठ बोलना व दूसरा कारण होगा एक अपराधी को बचाना।
कहा गया है – सत्य बोलो, प्रिय बोलो। ऐसा बहुत कम होता है कि कोई विषय सत्य भी हो और अप्रिय भी न हो। ऐसे समय में स्वयं का आत्मा ही निर्णायक होता है कि अप्रिय सत्य को बोला जाए या ना। हां, यदि किसी को प्रिय रूप में बोला सत्य भी कठोर लगता है, तो यह उसका दोष है। कुछ विद्वान ऐसा भी मानते हैं कि अपवाद स्वरूप झूठ भी बोला जा सकता है परन्तु, यह नितान्त आवश्यक है कि झूठ बोलने वाले की मनोवृति सात्विक हो। इस बात का कि अपवाद रूप में किसी की भलाई के लिए झूठ बोल लेना चाहिए, सहारा लेकर हम साधारण परिस्थितियों में भी अपने आप को झूठ बोलने से नहीं रोक पाते। साधारण परिस्थितियों में हमें सत्य ही बोलना चाहिए। राष्ट्र हित व विश्व हित के मामलों को ही केवल असाधारण परिस्थितियां माना जाना चाहिए।
सत्य दो प्रकार के होते हैं। संसारिक वस्तुओं में समयानुसार व परिस्थितिवश बदलाव आता रहता है। उदाहरणार्थ, आज बनी गाड़ी, बीस वर्ष पश्चात समान नहीं रहेगी। गाड़ी को आज जानना, उसे बीस वर्षों के पश्चात जानने के समान नही हो सकता। हम पहले कह आए हैं कि जो जैसा है, उसे वैसा ही जानना व मानना सत्य कहलाता है। इस अनुसार गाड़ी के आज के सत्य ज्ञान व बीस वर्ष पश्चात के सत्य ज्ञान में फर्क होना स्वभाविक है। दूसरा सत्य वह होता है, जिसमें समयानुसार व परिस्थितिवश अन्तर नहीं आता। ईश्वर विषयक ज्ञान इसी श्रेणी में आता है। जो सत्य ज्ञान कभी नहीं बदलता, उसे ऋत कहा जाता है। हमारे जीवन का ध्येय होना चाहिए कि हमारी आत्मा में अवस्थित सत्य ऋत के समीप होता जाए। जो चीज़ जैसी है, उसे वैसी ही जानने के लिए महर्षि दयानन्द जी ने निम्नलिखित मापदंड सुझाए हैं –

वह वस्तु अथवा घटना, ईश्वर के गुणों के अनुकूल होनी चाहिए। उदाहरणार्थ, क्योंकि, किसी व्यक्ति को बगैर उसके अन्याय के दोषी होने के मार दिया जाना ईश्वर के गुण न्यायकारिता व दयालुता के विरुद्ध है, इसलिए, इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता।
किसी वस्तु अथवा घटना की सत्यता व असत्यता पर जो निर्णय प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों द्वारा हो, उसे स्वीकारें।
वह वस्तु अथवा घटना, सृष्टि नियमों के विरुद्ध नहीं होनी चाहिए। उदाहरणार्थ, यह मानना कि किसी शरीरधारी का शरीर मृत्यु को प्राप्त नहीं होता, सृष्टि नियमों के विरुद्ध होने से असत्य है।
हमें आप्त पुरुषों के वचनों को प्रमाण के रूप में मानते हुए सत्य का निर्धारण करना चाहिए। आप्त पुरुष वे हैं, जिनका व्यवहार वेदोक्त होता है।
जो वस्तु व घटना, हमारी आत्मा की प्रवृति के अनुरूप हो, वो सत्य और जो आत्मा की प्रवृति के विरुद्ध हो, वो असत्य। आत्मा की प्रवृति है कि उसे सुख प्रिय और दुख अप्रिय लगता हे। जो वस्तु हमें प्रिय व अप्रिय लगती है, उसे अन्य आत्माओं के लिए भी वैसे ही जानें। जैसे अन्याय हमें अप्रिय लगता है।
कुछे विद्वानों का मानना है कि यमों में उल्लेखित सत्य का अर्थ यह है कि जैसा व्यक्ति के ज्ञान में हो, वैसा ही कहना। यदि व्यक्ति के ज्ञान में यथार्थ से भिन्न कोई बात है, तो उसको कहना भी सत्य ही कहलाएगा। यह और बात है कि जब तक वह यथार्थ को नहीं जान लेता, तब तक उसकी योग में प्रगति सम्भव नहीं। इन विद्वानों के अनुसार यमों में उल्लेखित सत्य का अर्थ यह ही है कि व्यक्ति अपने व्यवहार में अपनी आत्मा के प्रति ईमानदार रहे और अपने व्यवहार में इस ईमानदारी को लाने के पश्चात योग-पथ पर आगे बढ़ने के लिए वस्तु के वास्तविक स्वरूप को भी जाने।
परन्तु, अधिकतर विद्वानों का मानना है कि किसी वस्तु आदि के वास्तविक स्वरूप को अपनी आत्मा के अनुसार कहना ही सत्य कहलाता है और वस्तु के वास्तविक स्वरूप को बिना प्रमाणों से परीक्षा करने के नहीं जाना जा सकता।
हमारा सत्य को अपने जीवन में धारण न कर पाने का बहुत बड़ा कारण यह है कि हमने अपने जीवन का लक्ष्य जड़-पदार्थों को प्राप्त करना बनाया है। भौतिक पदार्थों की प्राप्ति को वास्तविक लाभ समझ कर भौतिक पदार्थों को प्राप्त करने पर भी आत्मतृप्ति नहीं मिल रही है, यह बात भौतिक पदार्थों के स्वामी अंदर से स्वीकार करते हैं। हमें उनके अनुभव का तिरस्कार नहीं करना चाहिए।
सत्य का पालन अहिंसा की सिद्धि के लिए ही किया जाता है। झूठ बोलने से भी हिंसा होती है। कैसे? हिंसा का अर्थ है-अन्याय पूर्वक पीड़ा, दुख, कष्ट देना। जब बालक माँ से झूठ बोलता है, तो माँ को इससे अतीव कष्ट होता है। आप दुकानदार हैं, तो ग्राहक को झूठ बोलकर पीड़ा पहुँचा रहे हो। आप नौकरी के प्रत्याशी हैं, आपने झूठ बोल कर नौकरी ली, तो जिसे नौकरी मिलनी थी, आपके कारण वह वंचित हो गया है, उसे वंचित होने पर दुख मिला, यह हिंसा है।
सत्य के धारण करने से भले ही कुछ भी चला जाये, परन्तु आत्मा का कल्याण इसी में है। जिस माँ के लिए झूठ बोलते हैं, वह तो एक दिन जायेगी ही। पिछले जन्मों में न जाने कितनी माताओं, पिताओं, पुत्रों, पत्नियों, बेटियों तथा अन्यान्य परिवार जनों को छोड़कर हम इस जन्म में वर्त्तमान हैं। ऋषि कहते हैं कि तुम्हारा कहना कि असत्य के बिना काम नहीं चलता, गलत है।किसी के लिए भी असत्य नहीं बोलना है, मर जाओ, सब कुछ समाप्त हो जाये, इस सर्वप्रिय शरीर को ही समाप्त करना पड़े, किन्तु सत्य को न छोड़ें।

3. अस्तेय
‘अस्तेय’ का शाब्दिक अर्थ है, चोरी न करना। किसी दूसरे की वस्तु को, अन्याय से पाने की इच्छा करना मन द्वारा की गई चोरी है। शरीर से अथवा वाणी से तो दूर, मन से भी चोरी न करना। किसी की कार को देखकर अन्याय से उसे पाने की इच्छा करना, किसी सुन्दर फूल को देखकर अन्याय से उसे पाने की चाह करना आदि चोरी ही तो है।
जैसे– कपड़ा बेचने वाला, ग्राहक के सामने ही उसे धोखा देता है। ग्राहक पांच मीटर कपड़े का मूल्य चुकाकर उतने कपड़े का स्वामी बन जाता है, किन्तु दुकानदार माप में धोखा देकर उसे पांच मीटर से कम कपड़ा देता है। वह उसी के सामने उसके सामान का चालाकी से हरण कर लेता है।

4.ब्रह्मचर्य– शरीर के सर्वविध सामर्थ्यों की संयम पूर्वक रक्षा करने को ब्रह्मचर्य कहते हैं।

आधुनिक ढंग से जीवन व्यतीत करने वाले अनेकों की धारणा है कि वीर्य की रक्षा करना पागलपन है। अत: वे अपने शरीर को वीर्यहीन बना लेते हैं। शरीर को नाजुक, कमज़ोर, रोग ग्रस्त बना लेते हैं। शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति को घटाते हैं।इन्द्रियों पर जितना संयम रखते हैं, उतना ही ब्रह्मचर्य के पालन में सरलता रहती है। इन्द्रियों की चंचलता ब्रह्मचर्य के पालन में बाधक है। अपने लक्ष्य के प्रति सजग रहते हुए सदा पुरुषार्थी रहने से ब्रह्मचर्य के पालन में सहायता मिलती है। महापुरुषों, वीरों, ऋषियों, आदर्श पुरुषों के चरित्र को सदा समक्ष रखना चाहिए। मिथ्या-ज्ञान का नाश करते हुए शुद्ध-पवित्र-सूक्ष्म विवेक को प्राप्त करने से वीर्य रक्षा में सहायता मिलती है।

ब्रह्मचर्य की कितनी महिमा है। आज इस संसार में मृत्यु से कौन नहीं डरता? ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्यरूपी तपस्या से ऐसे गुणों को अपने अन्दर धारण करता है, कि उससे वह मृत्यु को यूँ उठाकर के फेंक देता है जैसे- तिनके को उठाकर के फैंकते हैं।
आचार्य कहते हैं- ये जो वीर्य व रज हैं, ये आहार का परम धाम हैं, उत्कृष्ट सार हैं, यदि तू वास्तव में अमृत पाना चाहता है तो इनकी रक्षा किया कर। यदि असंयम से तूने इनका क्षय कर लिया, तो देख लेना समझ लेना तू, दुनिया भर के रोग आ जायेंगे तुझे।
शास्त्रों की सूक्ष्म- बातें सूक्ष्म-बुद्धि से ही समझी जा सकती है। बुद्धि सूक्ष्म तब होती है, जब हमारे शरीर में भोजन का सार प्रचुरता से होगा। भोजन का सार सूक्ष्म तत्त्व है ‘शुक्र’। शुक्र सुरक्षित रहेगा ब्रह्मचर्य पालन से।
बहुत से लोग क्षण भर में ईश्वर साक्षात्कार कर लेना चाहते हैं। उनका आशय यह होता है कि उन्हें कुछ करना-धरना न पड़े और ईश्वर का साक्षात्कार हो जाए। उन्हें इस बात के महत्त्व का ज्ञान ही नहीं है। जिस बात के लिए ब्रह्मचारी ने अपना सर्वस्व झौंककर, रात-दिन एक करके अपना जीवन ही न्यौछावर कर दिया और अभी तक अपने प्रमाद-आलस्य को, अपनी न्यूनताओं को पूरी तरह दूर नहीं कर पाया और वे उसी ब्रह्म-तत्व को क्षण मात्र में प्राप्त करना चाहते हैं।
5. अपरिग्रह –मन, वाणी व शरीर से अनावश्यक वस्तुओं व अनावश्यक विचारों का संग्रह न करने को अपरिग्रह कहते हैं।
हम जितने अधिक साधनों को बढ़ाते जायेंगे, उतने ही अधिक हिंसा के भागी बनते जायेंगे। उदाहरणार्थ , कपास की खेती से वस्त्र निर्माण होने तक की प्रक्रिया में अनेक जीव पीड़ित होते व मरते हैं। परन्तु, हमें आवश्यकता के अनुसार कुछ न कुछ साधन तो चाहिए। हम मात्र उतने ही साधनों का प्रयोग करें। ऐसा न हो कि हमारे कारण दूसरे अपनी मूलभूत आवश्यकताओं से भी वंचित रह जायें।
अपरिग्रह का पालन भी अहिंसा की सिद्धि के लिए ही किया जाता है। परिग्रह सदैव दूसरों को पीड़ा देकर ही किया जाता है। अनावश्यक वस्तुओं का, अनावश्यक विचारों का, उचित-अनुचित स्थानों से निरुद्देश्य संग्रह करना परिग्रह है। इसके विपरीत ऐसा न करने को अपरिग्रह कहते हैं। यदि कभी अधिक संग्रह भी हो जाये, तो शेष को दान करते रहना चाहिए। इस दान से उपजे आत्म संतुष्टि के भाव का मूल्य संसार के मूल्यवान पदार्थों से भी अधिक ही रहेगा।

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