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भारतीय संस्कृति

● वेद – आस्तिक्य – यज्ञ – यास्क – वैदिक-भाषा – दयानन्द – आर्यसमाज ● —

● वेद-विमर्श ●

  • स्वामी (डॉ.) सत्यप्रकाश सरस्वती

[4 नवम्बर 1983 को महर्षि दयानन्द निर्वाण शती समारोह में आयोजित वेद सम्मेलन में दिए गए अध्यक्षीय भाषण के संकलित अंश । संकलनकर्ता : भावेश मेरजा]
1. अपौरुषेय रचनाओं में जिसकी आस्था है, उसे ही आस्तिक कहते हैं । भौतिक निर्मितियों में भी दो प्रकार की निर्मितियां हैं – पौरुषेय और अपौरुषेय । मिट्टी, कांच, धातु आदि के बनाए गए खिलौने पौरुषेय और घास, फल, फूल, पत्ते – ये अपौरुषेय रचनाएं हैं । समस्त वैज्ञानिक अपौरुषेयत्व में पूर्ण आस्था रखते हैं, अत: वे सब आस्तिक हैं । यही बात साहित्य की भी है – जो वेद के अपौरुषेयत्व को स्वीकारता है, वह आस्तिक है । सम्भवतया इसी अर्थ में कहा गया है कि – ‘नास्तिको वेदनिन्दक: ।’… वेद ईश्वरीय हैं और वेद में इस अर्थ में सब विज्ञानों और शास्त्रों या विद्याओं का बीज है । इस मौलिक सिद्धान्त को समझ लेने पर ऋषि दयानन्द वाली आस्थाएं स्पष्ट हो जाती हैं ।
2. सभ्यता और संस्कृति को लोकोपयोगी, हितकर और कल्याणकारिणी बनाने में मनुष्य ने जो श्रेष्ठतम कर्म किए, उन्हीं का नाम दयानन्दर्षि के शब्दों में ‘यज्ञ’ है ।
3. 110 (आज से 143) वर्ष पहले यह अनुमान लगाना भी कठिन था कि महर्षि दयानन्द का वेदभाष्य एक नए मार्ग को प्रशस्त करेगा और मध्यकालीन परम्परा के अन्य भाष्यों से मुक्ति दिलाएगा । निश्चय है कि यदि वेदों में निष्ठा स्थिर रहती है, तो महीधर, उवट, वेंकट या सायण के भाष्यों के आधार पर नहीं, केवल उन भाष्यों और अनुवादों के आधार पर जिनमें महर्षि की शैली और महर्षि की आस्थाओं को स्वीकारा गया है ।
4. स्वामी दयानन्द के वेदों के सम्बन्ध में वे ही विचार हैं, जो उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रन्थों और षड्दर्शनों के हैं । ये सभी ग्रन्थ वेदों को अपौरुषेय, स्वत: प्रमाण और इस अर्थ में सर्ग के आरम्भ का मानते हैं । वेद से पूर्व का कोई भी वाङ्मय मनुष्यों को प्राप्त नहीं है । वेद में इतिहास नहीं, वेद के बाद मनुष्य की सभ्यता और
संस्कृति का इतिहास चलता है ।
5. आप यास्क के निघण्टु को देखें । यास्क ने स्वतः यह मार्के की खोज की है कि वेद के मन्त्रों में ही एक शब्द कहीं किसी अर्थ में प्रयुक्त होता है और कहीं किसी दूसरे अर्थ में । इन अर्थों को अलग-अलग देखकर उन्होंने कहीँ-कहीं यह भी खोज निकाला कि नाम-शब्द आख्यातज हैं और एक ही आख्यात के कई अर्थ होते हैं । वैदिक भाषा के शब्दों के सम्बन्ध में ऐसी खोजें न्यूटन और आइन्स्टाइन की भौतिक जगत् की खोजों से कम न थीं ।
6. मैं यास्क को सबसे बड़ा वेदाचार्य मानता हूं, जिसकी दिव्य दृष्टि में ऋग्वेद का समस्त विस्तृत शब्द-भण्डार सहज रूप में नाचता-सा था और इस गरिमा को लेकर उसने निघण्टु और निरुक्त की रचना की । उसने मानो घोषित किया कि शब्दों के जो अर्थ मूल आख्यात के जितने निकट होंगे, जितने यौगिक होंगे, उतने ही वे वेद के मूल एवं व्यापक भाव को अधिक व्यक्त करेंगे । वेद इस दृष्टि से ऋषि या आचार्यों के बनाए शास्त्रों से भिन्न हैं । वेद मन्त्रों के शब्दों के रूढ़ि अर्थ करना पाप है और इसके विपरीत शास्त्रों में शब्दों के यौगिक अर्थ करना अनौचित्य माना जाएगा ।
7. अगर हम हिन्दुओं से पूछें कि तुम महीधर को मानोगे या सायण को, तो उनके सामने समस्या उत्पन्न हो जाएगी । हिन्दुओं के सामने यह परिस्थिति इसलिए नहीं उठती क्योंकि उन्होंने तो वस्तुतः वेद को छोड़ ही रखा है । यह मनोरंजक बात है । भारतीय जनता में वेदों के प्रति उपेक्षा नास्तिक दर्शनों के समय से हो गई थी और वेदों की प्रतिष्ठा पर शंकर ने भी ध्यान नहीं दिया । वेदों के प्रति आस्था केवल मीमांसकों या रूढ़िवादी याज्ञिकों में ही सीमित रह गई ।
8. आर्यसमाज को इस बात के लिए गर्व है कि उसने वेदों की ओर जनता का ध्यान आकर्षित किया है – आस्तिकता की दृष्टि से, सम्प्रदायवाद को मिटाने की दृष्टि से, दार्शनिक सिद्धान्तों की दृष्टि से और जीवन की समस्त व्याख्या की दृष्टि से ।…वेद को जनसामान्य तक पहुंचाने का जो काम आर्यसमाज ने किया है, वह और किसी व्यक्ति या संघटन ने नहीं किया ।
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