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Dr D K Garg

छठ पर्व छठ या षष्ठी पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को मनाया जाने वाला एक पर्व है। सूर्योपासना का यह लोक पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। कहा जाता है यह पर्व बिहारियों का सबसे बड़ा पर्व है ये उनकी संस्कृति है। धीरे-धीरे यह त्योहार प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ विश्वभर में प्रचलित हो गया है।
छठ पूजा को लोक आस्था का पर्व भी कहा जाता है। ये दीपावली के बाद ठीक छठवें दिन पड़ता है। लोगों का मानना है कि छठपूजा करने से माँ छठी प्रसन्न होती है और लोगों को सन्तान सुख की प्राप्ति होती है।
छठ षष्ठी का अपभ्रंश है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली मनाने छह दिन के बाद मनाये जाने के कारण ये नाम पड़ा या कहे कि कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को यह व्रत मनाये जाने के कारण इसका नाम छठ व्रत पड़ा। छठ पूजा साल में दो बार होती है एक चैत्र्र मास में और दूसरी कार्तिक मास, शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि, पंचमी तिथि, षष्ठी तिथि और सप्तमी तिथि तक मनाया जाता है।
छठ मैया का नाम जोड़ने के लिए एक काल्पनिक देवी का नाम जोड़ दिया गया है । इसलिए पर्व के नामकरण पर विचार करना चाहिए जिसका विवरण इसी लेख में आगे दिया है।
इस चार दिवसीय त्योहार की शुरुआत नहाये-खाये की परम्परा से होती है। यह त्योहार पूरी तरह से श्रद्धा और शुद्धता का पर्व है। इस व्रत को महिलाओं के साथ ही पुरुष भी रखते हैं। चार दिनों तक चलने वाले लोकआस्था के इस महापर्व में व्रती को लगभग तीन दिन का व्रत रखना होता है जिसमें से दो दिन तो निर्जला व्रत रखा जाता है।

प्रचलित कहानियांः- छठ महापर्व मनाने की परंपरा ?
1. एक कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्यमंदिर में छठी मैया की आराधना की थी। तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न, तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान् जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलायी। कहा जाता है कि उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और छठ का प्रचलन भी शुरू हो गया।
2. एक और मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान् राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्य देव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्य देव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।
3. महाभारत के नाम पर एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान् सूर्य के परम भक्त थे। वह प्रतिदिन घण्टों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य देव को अघ्र्य देते थे। सूर्य देव की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे। कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लम्बी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं।
4. एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनायी गयी खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परन्तु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गये और पुत्रवियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त ब्रह्माजी की मानस कन्या देव सेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूँ। हे! राजन् आप मेरी पूजा करें तथा लोगों को भी पूजा के प्रति प्रेरित करें। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी।
5. राजा प्रिय व्रत की कथा छठ पूजा से जुड़ी एक और मान्यता है। एक बार एक राजा प्रियव्रत और उनकी पत्नी ने संतान प्राप्ति के लिए पुत्रयेष्टि यज्ञ कराया लेकिन उनकी संतान पैदा होते ही इस दुनिया को छोड़कर चली गई। संतान की मौत से दुखी प्रियव्रत आत्म-हत्या करने चले गए तो षष्ठी देवी नेप्रकट होकर उन्हें कहा कि अगर तुम मेरी पूजा करो तो तुम्हें संतान की प्राप्ति होगी राजा ने षष्ठी देवी की पूजा की जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई कहते हैं इसके बाद से ही छठ पूजा की जाती है।
6. कुंत कर्णकथा कहते हैं कि कुंती जब कुंवारी थीं तब उन्होंने ऋषि दुर्वासा के वरदान का सत्य जानने के लिए सूर्य का आह्वान् किया और पुत्र की इच्छा जताई कुंवारी कुंती को सूर्य ने कर्ण जैसा पराक्रमी और दानवीर पुत्र दिया एक मान्यता ये भी है कि कर्ण की तरह ही पराक्रमी पुत्र के लिए सूर्य की आराधना का नाम है।
7. एक कथा के अनुसार, महाभारत काल में जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत किया। इससे उनकी मनोकामनाएं पूर्ण हुई तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया।
8. एक किंवदंती के अनुसार, ऐतिहासिक नगरी मुंगेर के सीता चरण में कभी मां सीता ने छह दिनों तक रह कर छठ पूजा की थी।
पौराणिक कथाओं के अनुसार 14 वर्ष वनवास के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे थे तो रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूर्य यज्ञ करने का फैसला लिया। इसके लिए मुग्दल ऋषि को आमंत्रण दिया गया था, लेकिन मुग्दल ऋषि ने भगवान राम एवं सीता को अपने ही आश्रम में आने का आदेश दिया। ऋषि की आज्ञा पर भगवान राम एवं सीता स्वयं यहां आए और उन्हें इसकी पूजा के बारे में बताया गया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता को गंगा जल छिड़क कर पवित्र किया एवं कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। यहीं रहकर माता सीता ने छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान् की पूजा की थी।
पर्व की समीक्षाः

विभिन्न कथाओं के अध्ययन से ये तो स्पष्ट है कि उपरोक्त कोई भी कथा एक दूसरे से मेल नहीं खाती। सब तुकबाजी है। इसलिए किसी कथा को इस पर्व के लिए स्वीकार करना संभव नहीं है। और ये पर्व कब से और क्यों शुरू हुआ इसका भी कहीं कोई प्रमाण नहीं मिलता है।
कुछ लोगांे का ये भी कहना है कि ये पर्व वैदिक काल से शुरू हुआ परन्तु वैदिक साहित्य इसका कोई उल्लेख नहीं है और मैंने काफी प्रयास किया परंतु रामायण, महाभारत, गीता में इसका कहीं भी वर्णन नहीं है। ये सभी कथाएं सिर्फ काल्पनिक कथायें ही है। जिनका इतिहास में कोई उल्लेख नहीं मिलता है।
प्रचलित पूजा पद्धति का विश्लेषण:
छठ पूजा में सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इस पूजा में कोई भी मूर्ति शामिल नहीं होती है हिन्दू धर्म की अन्य सभी पूजा पाठ में हम देखते हैं कि कोई न कोई मूर्तियाँ, फोटो शामिल होती है।
2. छठ पूजा से संतान की प्राप्ति होना केवल भ्रान्ति है क्यांेकि मेडिकल साइंस ने साफ कर दिया है कि संतान की प्राप्ति होना या ना होना बहुत कारणों पर निर्भर करता है। इसके लिए चिकित्सा की जरूरत है, स्वस्थ दिनचर्या और अच्छे स्वास्थ्य की जरूरत है।
3. छठ पूजा में छठी माता को अर्क देते हैं क्योंकि छठी माता को कोई सूर्य भगवान् की बहन तो कोई कुछ बोलते हंै। ज्यादातर लोगों को ये बात मालूम नहीं कि सूर्य क्या है? इसका आकार कितना है, और ताप कितना है? भारतीय काव्य को देखे तो कवियों ने सूर्य की किरणों को अनेकों उपमाएं दी हैं और किसी ने इसकी पत्नी, सहेली, पुत्री तक कहा है।
4. सूर्य पुल्लिंग है जबकि छठ मईया स्त्रीलिंग फिर सूर्य-पूजन का नाम छठ मईया होना क्यांे और कैसे सम्भव है ?
5. कुछ लोगों का मानना है कि छठ मैया सूर्य की बहन है। भला सूर्य की कोई बहन कैसे हो सकती है? हाँ सूर्य का पिता ईश्वर जरुर है जिसने उसको उत्पन्न किया है और वह है परमपिता परमेश्वर। सब मनुष्यों को उसी की पूजा अर्थात् उपासना योगाभ्यास द्वारा करनी चाहिए।
6. गुरुनानक देव ने जब हर की पौड़ी पर सूर्य की तरफ पीठ करके अंजुली में पानी उठाकर पश्चिम की तरफ फेंकना शुरू किया तो हरिद्वार के पंडों ने उन्हें मूर्ख बताकर पूर्व में उगते हुए सूर्य की तरफ पानी डालने के लिए कहा। गुरुनानक देव ने कहा कि मैं तो लाहौर के पास अपने खेतों को पानी पहुंचा रहा हूँ। उस पर पंडों ने कहा तुम्हारे यहाँ से पानी देने पर लाहौर कैसे पहुंचेगा? गुरुनानक देव ने जवाब दिया जब तुम्हारा जल करोड़ों मील दूर सूरज तक पहुंच सकता है तो लाहौर के खेत तो नजदीक हैं वहाँ क्यों नहीं पहुंच सकेगा? अतः छठ पूजा में लगे सभी लोगों से निवेदन है कि वे अपनी आस्था को सही दिशा दें। अपनी ऊर्जा को सौर ऊर्जा के दोहन में लगाएं और वैज्ञानिक चिंतन के द्वारा सब अन्धविश्वास पाखंड को दूर करने में सहयोग करें।
7. बिहार में कहा जाता है कि छठ मईया साल में दो बार आती है। प्रश्न उठता है कि बाकी के पूरे साल वह कहाँ चली जाती है? उनके आने जाने की सूचना सर्वप्रथम किसे मिली थी और प्रत्येक वर्ष आने-जाने की सूचना किस को मिलती है? अगर सच में छठ मईया से माँगी हुई मन्नत पूरी होती है तो ये लोग आतंकवादियों की मौत और उनके ट्रेनिंग सेन्टरों की बर्बादी क्यों नही मांगते, रिश्वत खोर और भ्रष्टाचार करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियांे के लिए सजा क्यांे नही मांगते? गौ हत्या करने वालों के लिए प्राण दंड क्यों नही मांगते? काले धन रखने वालों के लिए मौत क्यांे नही मांगते? क्या ये लोग किसी शुभ मुहूर्त का इन्तजार कर रहे हंै।
वास्तविकता का आधार:
सूर्य क्या है और सूर्य पूजा का वेदों में क्या प्रावधान है और कैसे सूर्य की आराधना करें ?
ईश्वर को वेदों में सूर्य भी कहा गया है क्योंकि सूर्य को बनाने वाला ईश्वर इसका पिता है और ईश्वर का तेज सूर्य से भी ज्यादा है, वह सर्वव्यापी है और पूरी दुनिया के समस्त जीवधारियों को प्रकाश देता है। सूर्य को भी बनाने वाले ईश्वर का प्रकाश/तेज सभी चारों दिशाओं में ही नहीं बल्कि भूमि के नीचे और आकाश में भी है। ईश्वर को सूर्य इसलिए कहा गया है जिसकी उपासना का वर्णन वेदो में है।
उसी सूर्य रुपी ईश्वर को छठ की संज्ञा दी गयी है लेकिन बाद में इस पर्व का गलत अर्थ गलत परंपरा से निकलता चला गया। यह विडम्बना ही है कि उस एक सर्वव्यापी परमात्मा की उपासना वेदादि शास्त्रों का स्वाध्याय छोड लोग नानाप्रकार के काल्पनिक देवी देवताओं की पूजा पुराण आदि अनार्ष ग्रन्थों को अधिक महत्व देने लगे हंै। साल मंे दो चार दिन भूखा रहने से कुछ नहीं होने वाला है।
पर्व विधि:
दिवाली के ६ दिन बाद मनाये जाने वाला पर्व छठ अवैज्ञानिक नहीं है, हाँ वर्तमान में इसको मनाने का स्वरूप अवैज्ञानिक हो सकता है। इस दिन छठ पूजा के माध्यम से लोग डूबते और उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं और सभी लोग स्वस्थ रहें ऐसी सूर्य देव से मंगल कामना करते हंै।
सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा (प्रातःकाल) और प्रत्यूषा उज्ज्वल सुबह हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। आयुर्वेद में सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पायी गयी है। शायद इसलिए ही ऋषि-मुनियों ने अपने अनुसंधान के क्रम में किसी खास दिन इसका प्रभाव विशेष पाया और सम्भवतः यही छठ पर्व के उद्भव की बेला रही हंै।
1. इस पर्व में सूर्य रुपी ईश्वर की उपासना पर जोर दिया गया है। सूर्य पूजा का वेदों में क्या प्रावधान है और कैसे सूर्य की आराधना करें ?
२. हमारे पूर्वजांे ने बदलते मौसम का अनुसार स्वयं को ढाल लेने और स्वस्थ्य रहने के उपाय खोज लिए थे, आयुर्वेद की खोज की, शरीर में उत्पन्न होने वाले विकार को तीन भागांे में बाँट दिया वात, पित्त और कफ।
आयुर्वेद में सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पायी गयी है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए रोजाना प्रातः उठना, नहाना ईश्वर की अराधना करना, ब्रह्म यज्ञ कहलाता है, जिसका वेदों मेंउल्लेख है। लेकिन ये सिर्फ महिलाआंे के लिए ही नहीं बल्कि बच्चे पुरुष बड़े सभी के लिए है।
अतः इस दिन परिवार के सभी सदस्य संकल्प ले कि हमेशा ब्रह्म यज्ञ करेंगे ।
३. कार्तिक स्नानःकार्तिक महीने में सूर्योदय से पहले शीतल जल का स्नान करना सबसे उत्तम है। विज्ञान के दृष्टिकोण से कार्तिक स्नान को स्वास्थ्यवर्धक बताया गया है। बारिश के दिनों में धरती पर असंख्य हानिकारक जीव पनप जाते हैं। कार्तिक मास में वर्षा समाप्त होने के बाद धरती पर सूर्य की तेज किरणें पहुंचती है, जिससे हानिकारक जीवाणुओं का नाश होता है, वायु शुद्ध होती है और इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
कार्तिक स्नान के लिए सूर्योदय से पूर्व उठ जाना चाहिए। नित्यकर्म से निवृत्त होकर पवित्र नदी, तालाब या कुंड के जल में प्रवेश करना चाहिए। शरीर का आधा हिस्सा जल में डूबा रहे इस तरह खड़े होकर स्नान करना चाहिए।
ओ३म् आयमगन्त्संवत्सरः पतिरेकाष्टके तव ।
सा न आयुष्मतीं प्रजां रायस्पोषेण सं सृज ।। अथर्ववेद 03/10/08
आज से हम ऊषा-जागरण का व्रत लें और निश्चय करें कि अपने जीवन को उत्तम बनाकर हम सन्तानों को दीर्घजीवी व सम्पन्न बनाने के लिए यत्नशील होंगे ।
४. ईश्वर को सूर्य की संज्ञा देते हुए कुछ वेद मंत्र यज्ञ में बोले जाते हंै जो इस प्रकार हैं:
एक वेद मंत्र है।
सूर्यआत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा।
इस यजुर्वेद के वचन से जो जगत् नाम प्राणी चेतन और जड़ अर्थात् जो चलते फिरते हैं।
तस्थुषः अप्राणी अर्थात् स्थावर जड़ अर्थात् पृथ्वी आदि हैं, उन सबके आत्मा होने और स्व-प्रकाशरूप सब के प्रकाश करने से परमेश्वर का नाम सूर्य है।
वेदांे में जो सूर्य शब्द ईश्वर के लिए प्रयोग हुआ है उसका उच्चारण यज्ञ में होता है। सूर्य के नाम से वेदमंत्र द्वारा ईश्वर की पूजा अर्थ सहित इस प्रकार है।
ओम् सूर्यो ज्योतिज्र्योतिः सूर्यः स्वाहाः ।।१।।
ओम् सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा ।।२।।
ओम् ज्योतिः सूयर्ः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा ।।३।।
ओम् सजूर्देवेन सवित्रा सजूरूषसेन्द्रवत्या जुषाणः सूर्या वेतू स्वाहा ।।४।।
मन्त्रार्थ- सर्वरक्षक सर्वगतिशील सबका प्रेरक परमात्मा प्रकाश स्वरूप है और प्रत्येक प्रकाश स्वरूप वस्तु या ज्योति परमेश्वर से व्याप्त है। उस परमेश्वर अथवा ज्योतिष्मान उदय कालीन सूर्य के लिए मैं यह आहुति देता हूं। ।।१।।
मन्त्रार्थ- सर्वरक्षक सर्वगतिशील और सबका प्रेरक परमात्मा तेजस्वरूप है। जैसे प्रकाश तेजस्वरूप होता है। उस परमात्मा अथवा तेजः स्वरूप प्रातःकालीन सूर्य के लिए मैं यह आहुति देता हूँ ।।२।।
मन्त्रार्थ- सर्वरक्षक ब्रह्मज्योति ब्रह्मज्ञान परमात्म मय है परमात्मा की द्योतक है पर आत्मा ही ज्ञानका प्रकाशक है। मैं ऐसे परमात्मा अथवा सबके प्रकाशक सूर्य के लिए यह आहुति प्रदान करता हूं। ।।३।।
मन्त्रार्थ- सर्वरक्षक, सर्वव्यापक, सर्वत्र गतिशील परमात्मा सर्वोत्पादक प्रकाश एवं प्रकाशक सूर्य से प्रीति रखने वाला तथा ऐश्वर्यशाली, प्रसन्न्ता, शक्ति तथा धनैश्वर्य देने वाली प्राणमयी उषा से प्रीति रखने वाला है अर्थात् प्रीति पूर्वक उनको उत्पन्न कर प्रकाशित करने वाला है। हमारे द्वारा स्तुति किया हुआ वह परमात्मा हमें प्राप्त हो हमारी आत्मा में प्रकाशित हो। उस परमात्मा की प्राप्ति के लिए मैं यज्ञाग्नि में आहुति प्रदान करता हूँ। अथवा सबके प्रेरक और उत्पादक परमात्मा से संयुक्त और प्रसन्नता शक्ति ऐश्वयर्युक्त उषा से संयुक्त प्रातःकालीन सूर्य हमारे द्वारा आहुति दान का भक्षण करें और उनको वातावरण में व्याप्त कर दें जिससे यज्ञ का अधिकाधिक लाभ हो। ।।४।।

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