इतिहास की पड़ताल पुस्तक से -अजेय रहा है कुंभलगढ़ का किला (अध्याय – 6)

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कुम्भलगढ़ का दुर्ग भारत के गौरवशाली इतिहास को अपने अंक में समाहित करने वाले महान् किलों में से एक है। इसका गौरवशाली इतिहास भारत के स्वर्णिम इतिहास एक उज्ज्वल पृष्ठ है। विदेशी तुर्क आक्रमणकारियों से भारत की स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने की कहानी की साक्षी देता यह किला राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित है। इसकी कहानी इतनी महान् और गौरवपूर्ण है कि यदि उस पर अनुसंधान किया जाए तो पूरा एक ग्रंथ तैयार हो सकता है।

गौरव कुंभल देश का गौरवमयी इतिहास। अजेय रहा इतिहास में शत्रु किया निराश ।।

हिंदू राजाओं द्वारा निर्मित होने के कारण और हिंदू इतिहास की कई परतों से पर्दा उठाने वाला किला होने के कारण कुंभलगढ़ के दुर्ग का स्वतंत्र भारत की सरकारों द्वारा अधिक ध्यान नहीं रखा गया। देश के इतिहासकारों की कलम संभवतः इस पर इसलिए नहीं चल पाई कि जिसका अतीत हिंदू वीर शासकों से जुड़ा हुआ है, जो भारत की स्वाधीनता के लिए अपने समय में लड़ते रहे थे। यदि इसका संयोग किसी मुगल बादशाह से बना होता तो निश्चय ही यह आज अति महत्त्वपूर्ण किले के रूप में जाना जाता। यही कारण है कि कुंभलगढ़ के किले में लिए गए निर्णयों से बनने वाले इतिहास को भी उपेक्षित कर दिया गया है।

इस किले का निर्माण महाराणा कुंभा जैसे महान् वीर और योद्धा शासक के द्वारा करवाया गया था। महाराणा कुंभा की वीरता और शौर्य की कहानियाँ संपूर्ण राजस्थान के लिए ही नहीं बल्कि भारतवर्ष के लिए भी गौरव प्रदान करने वाली हैं। जिन्होंने विदेशी सत्ताधारियों के विरुद्ध आजादी का बिगुल फूंके रखा और उनके सामने शीश झुकाना पूरे जीवन भर उचित नहीं समझा। जिस किले में ऐसा शौर्यसंपन्न, स्वाधीनता प्रेमी, हिंदूवीर शासक रहा हो उसे हिंदुओं के द्वारा भी उपेक्षित करके रखना सचमुच दुर्भाग्य का विषय है। महाराणा कुंभा ने इस किले के निर्माण के उपरांत जो सिक्के ढलवाए थे उन पर दुर्ग और उसका नाम भी अंकित कराया था। राजा ने दुर्ग को इस प्रकार बनवाया था कि शत्रु के लिए इस दुर्ग पर विजय प्राप्त करना सर्वथा असंभव हो जाए।

दुर्गम जाना दुर्ग में दुर्ग की है पहचान।
प्रजा जन आनंद करें शत्रु की ले जान।।

विकिपीडिया के अनुसार वास्तुशास्त्र के नियमानुसार बने इस दुर्ग में प्रवेश द्वार, प्राचीर, जलाशय, बाहर जाने के लिए संकटकालीन द्वार, महल, मंदिर, आवासीय इमारतें, यज्ञ वेदी, स्तम्भ, छत्रियाँ आदि बने हैं। यह किला यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में सम्मान प्राप्त कर चुका है।

राजस्थान भारतवर्ष का एक ऐसा प्रांत है जो अपनी वीरता, साहस और शौर्य के लिए इतिहास में अपना सम्मान पूर्ण स्थान रखता है। इस प्रांत में अनेकों ऐसे किले और भवन आपको देखने को मिलेंगे जो हिंदुओं के तीर्थ स्थल से कम नहीं हैं। वास्तव में शस्त्र और शास्त्र दोनों की पूजा करने वाले भारत के लिए शास्त्रों का गुणगान करने के लिए बनाए जाने वाले मंदिरों के साथ-साथ वीरों का गुणगान अर्थात् शस्त्र की प्रशंसा करने वाले किलों को भी तीर्थ स्थल के रूप मान्यता प्रदान करनी चाहिए। शस्त्र और शास्त्र दोनों की पूजा करने वाले भारत को विश्व गुरु तभी बनाया जा सकता है जब शस्त्र और शास्त्र के मध्य इस प्रकार का सम्मानपूर्ण संबंध स्थापित करने के प्रति सरकार ध्यान देंगी।

कुंभलगढ़ जैसे दुर्ग यह बताते हैं कि हमारे वीर पूर्वज किस प्रकार अपने सम्मान के लिए लड़ते थे? भारत के सम्मान को बचाने के लिए उनकी कैसी नीति और रणनीति होती थी? कितनी बहादुरी और शौर्य के साथ शत्रु का सामना करने के लिए वह अपने आप को प्रस्तुत करते थे? किलों की बनावट और उनके भीतर की सजावट दोनों ही यह बताती हैं कि हमारे पूर्वज किले को बनाते समय न केवल उसकी भौगोलिक स्थिति का ध्यान रखते थे बल्कि वह प्रजा के लिए आपातकाल में सुरक्षा का सहज स्थान भी बन जाए, इस बात का भी ध्यान रखते थे। जहाँ तक सजावट की बात है तो इनकी नक्काशी/चित्रकारी सब देखते ही बनती हैं। जो भारत की उत्कृष्ट स्थापत्य कला और चित्रकला को प्रकट करती हैं।

इस किले के विषय में हमें समझ लेना चाहिए कि यह भारत की वीरता की छाती और थाती दोनों है। हमारे अनेकों वीरों ने उस समय तुर्कों के सामने अपनी छाती तान कर उनके घातक हथियारों का सामना किया था, लेकिन अपनी स्वाधीनता को आँच नहीं आने दी थी। अनेकों छातियाँ भारत की स्वाधीनता के लिए बलिदान हुईं तो अनेकों ने गहरे गहरे जख्म खाये लेकिन शत्रु के समक्ष शीश नहीं झुकाया। वीरता और रोमांचभरी उस कहानी को यदि इस किले से पूछा जाए तो हर देशभक्त हिंदू वीर की छाती गर्व से चौड़ी हो जाएगी। आप कल्पना करें जिस किले की सुरक्षा दीवार 36 मील लंबी हो, उस पर एक साथ कितने वीर योद्धा सैनिक पहरा देते होंगे और युद्ध के समय कितनी बड़ी संख्या में उन्होंने अपने बलिदान दिए होंगे? उन नाम-अनाम बलिदानियों की गौरव गाथा किले की यह दीवार हमें बहुत बेहतरीन ढंग से बता सकती है।

नाम अनाम बलिदानों की गाथा यहाँ पर बोल रही।

जिनके कारण हम जिंदा हैं उनके जज्बे खोल रही ।।

इस किले की दुर्गमता और अजेयता के दृष्टिगत इसे ‘अजयगढ़’ भी कहा जाता था। विकिपीडिया के अनुसार इस किले के इतिहास में केवल एक बार ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण समय आया था जब इस पर शत्रु पक्ष विजय प्राप्त करने में सफल हो गया था, अन्यथा अनेकों आक्रमणों के उपरांत भी यह किला शत्रु के द्वारा कभी जीता नहीं जा सका था। इस किले में महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप, अपने पुत्र चंदन का बलिदान देने वाली अप्रतिम वीरांगना गूजरी माता पन्नाधाय और राणा उदय सिंह जैसे इतिहासनायकों के जीवन की अनेकों घटनाएँ जुड़ी हुई हैं। जिससे इसका ऐतिहासिक महत्त्व बढ़ जाता है। संभवतः भारतवर्ष का कोई अन्य किला ऐसा नहीं होगा जिसमें एक साथ ऐसे कई महान् इतिहास पुरुषों ने अपना समय व्यतीत किया हो? कांग्रेसी शासन काल में कम्युनिस्टों के द्वारा लिखे गए इतिहास में इस किले के उपरोक्त वर्णित इतिहासनायकों को विस्मृति के गहरे गड्ढे में डाल दिया गया, जिससे यह किला भी उपेक्षित कर दिया गया। इसका कारण केवल एक था कि इस किले पर हिंदू वैभव से भरे इतिहास का साया था ना कि किसी मुगल बादशाह की किसी मुमताज या नूरजहाँ के किस्से इससे जुड़े हुए थे। सचमुच छद्म धर्मनिरपेक्षता ने भारतवर्ष की हिंदू वैभव गाथा को बहुत अधिक क्षतिग्रस्त किया है।

यदि इस किले पर स्वाधीन भारत की सरकारों की नजरें गई होतीं और इसके गौरवपूर्ण अतीत को देखते हुए इससे कुछ शिक्षा लेने के लिए आज की पीढ़ी को प्रेरित करने की मनोभावना सरकारों की रही होती तो निश्चय ही स्वाधीन भारत की सभी सरकारें इस किले के सच्चे इतिहास को प्रकट करने वाले इस तथ्य को विश्व इतिहास में लिखने के लिए विश्वमंचों पर आवाज उठातीं कि चीन की प्रसिद्ध दीवार के पश्चात् संसार में यदि कोई दूसरी बड़ी दीवार है तो वह इस किले की 36 मील लंबी दीवार है, जो इसको और उस समय की यहाँ की प्रजा को सुरक्षा कवच प्रदान करती थी।

छद्मधर्मनिरपेक्षता के चलते हमारे छद्म धर्मनिरपेक्ष नेता विश्व नेता बनने के चक्कर में इतना भी साहस नहीं कर पाए कि वे अपने इस किले की इस 36 मील लम्बी दीवार को विश्व इतिहास में सम्मान पूर्ण स्थान दिला पाते।

हम सबके लिए यह प्रसन्नता का विषय है कि यह किला यूनेस्को की सूची में सम्मिलित है। हमारा यह भी मानना है कि यूनेस्को की सूची में सम्मिलित हो जाना ही इस किले के लिए पर्याप्त नहीं है, इससे अलग भी ऐसा बहुत कुछ है जिसे भारत सरकार अपनी ओर से अपनाकर इसकी ऐतिहासिक महत्ता में चार चाँद लगा सकती थी। जिस काल में इस किले को बनाया गया था, उस समय भारत वर्ष में तुर्क मुसलमानों का आतंक छाया हुआ था। हिंदू शक्तियों का दलन और दमन करते हुए उनकी तलवार निर्ममता, निर्दयता और अत्याचार के कीर्तिमान स्थापित कर रही थी। हिंदुओं पर सर्वत्र ऐसे ऐसे अत्याचार किए जा रहे थे कि जिन्हें लिखने में लेखनी भी असमर्थ है। उस आतंक, दलन और दमन के प्रतीक शासकों का सामना करने के लिए उस समय जैसे किलों की आवश्यकता थी, वैसी ही अपेक्षाओं के अनुरूप इस किले को बनाया गया।

आश्चर्यों का देश है भारत इसमें कोई संदेह नहीं किसी देश के पास जगत में राजा जनक विदेह नहीं।

हमने दुनिया को शिक्षा देकर ज्ञान नीर से सींचा है, हमसे न कोई ज्ञान लिया जग में ऐसा कोई देश नहीं।।

कुंभलगढ़ के इस गौरवशाली किले को ‘मेवाड़ की आँख’ के नाम से भी जाना जाता है। यह दुर्ग कई घाटियों और पहाड़ियों को मिलाकर बनाया गया है। इस प्रकार की भौगोलिक स्थिति ने इस किले को प्राकृतिक सुरक्षात्मक आधार प्रदान किया है। ऐसी भौगोलिक स्थिति के कारण ही यह किला कभी किसी तुर्क या मुगल शासक द्वारा जीता नहीं गया। किले को बनाते समय इसकी भव्यता व सौंदर्य का पूरा ध्यान रखा गया। किले के भीतर ऊँचे और समतल दोनों प्रकार के स्थलों का भी बहुत ही शानदार ढंग से उपयोग किया गया है। जहाँ ऊँचे स्थानों पर अनेकों मंदिरों और आवासीय भवनों का निर्माण किया गया वहीं समतल भूमि का उपयोग कृषि भूमि के लिए किया गया। ऊँचे स्थलों से सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा जाता था। सुरक्षा सैनिक ऊँचाई पर खड़े होकर शत्रु की गतिविधियों पर अच्छा ध्यान रख सकते थे।

किले के भीतर जल संग्रहण के लिए भी अच्छी व्यवस्था की गई है। जलाशयों में न केवल किले के भीतर के लोगों के लिए जल की व्यवस्था होती थी अपितु आपातकाल में प्रजा के लोगों के लिए भी जल की कोई कमी ना रहे , इस बात का पूरा ध्यान रखा गया था। इस प्रकार के जलाशयों के निर्माण से हमारे राजाओं के लीक कल्याणकारी चिंतन का पता चलता है। साथ ही यह भी ज्ञान होता है कि हमारे हिंदू राजाओं द्वारा निर्मित किले स्वावलंबी होते थे।

इस दुर्ग के भीतर एक और गढ़ कटारगढ़ है। यह गढ़ सात विशाल द्वारों व सुदृढ़ प्राचीरों से सुरक्षित है। इस गढ़ के शीर्ष भाग में बादल महल है व कुम्भा महल सबसे ऊपर है। इस प्रकार यह गढ़ हमारे इन दोनों इतिहास पुरुषों के स्मारक स्थल के रूप में सुरक्षित है। यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि आज की पीढ़ी को बादल और कुंभा के बारे में विशेष जानकारी ना होने के कारण यह कटार गढ़ का किला उपेक्षित हुआ पड़ा है।

 इस किले का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और उज्जवल पक्ष यह है कि महाराणा प्रताप का जन्म भी इसी कुंभलगढ़ में हुआ था। इस प्रकार महाराणा प्रताप का यहाँ बचपन बीतने के कारण उनकी स्मृतियाँ भी इस किले के साथ जुड़ी हुई हैं। इस किले की गौरवशाली परंपराओं तथा शौर्य और वीरता की प्रतीक एक- एक ईंट ने महाराणा प्रताप का निर्माण किया। इन ईंटों ने अपने मूक संवाद से महाराणा प्रताप को यह संदेश दिया कि जैसे यह किला अजेय है, वैसे ही जीवन में आप भी अजेय बनना। हमारे सम्मान और गौरव को सुरक्षित रखने के लिए कभी किसी भी विदेशी शक्ति या शत्रु के समक्ष झुकना नहीं। इस मौन संवाद ने महाराणा प्रताप को ऐसा ही अजेय बनाया। व्यक्ति के निर्माण में दीवारें भी अपना सहयोग देती हैं। यदि गौरवपूर्ण परिवेश में या जिस महल या भवन में उसका निर्माण हुआ होता है तो वे उसके भीतर आत्मगौरव का भाव भरती हैं। तभी तो यह देखा जाता है कि जैसे परिवेश में बच्चे का निर्माण होता है वैसे ही संस्कार उस पर जीवन भर प्रकट होते रहते हैं।

महाराणा प्रताप ने इस किले का गौरव बढ़ाने के लिए इसे अपनी आपातकालीन राजधानी के रूप में मान्यता दी थी। इस प्रकार अकबर जैसे हिंदू उत्पीड़क बादशाह के विरुद्ध रणनीति बनाने और उसे पराजित करने की योजनाओं पर अनेकों निर्णय इस किले में बैठकर महाराणा प्रताप द्वारा लिए गए। उन गौरवपूर्ण पलों की साक्षी चाहे इतिहास से कितनी ही क्यों नहीं मिटा दी गई हो, पर इस किले की दीवारें तो आज भी यह बताती ही हैं कि भारत के वीर पुरुष महाराणा प्रताप और उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों ने यहाँ पर बैठकर देश की रक्षा के लिए महान् कार्य किया था। इसके लिए कि यह मौन दीवारें खड़ी खड़ी हमें पुकार रही हैं कि हमारा इतिहास सुन लो और उसे संजोकर रख लो, न जाने किस तूफान में हमारा विनाश हो जाए और फिर आपको हमारे इतिहास को बताने वाला भी कोई ना रहे?

दीवार की एक एक ईंट बोलती राज खोलती गहरे है। सम्मान देश का रखने को यहाँ वीर धनुर्धर रहते हैं।। गौरव का भास कराने को यहाँ मीठी खुशबू बसती है। पानी बिकता महँगा है पर लहू की कीमत सस्ती है।।

इस किले में महाराणा कुम्भा से लेकर महाराणा राज सिंह के समय तक मेवाड़ पर हुए आक्रमणों के समय राजपरिवार रहता रहा। किले की चाक-चौबंद व्यवस्था के कारण ही इसे यह सौभाग्य मिला कि अनेकों बार राज परिवार ने यहाँ पर सुरक्षित रह कर शत्रु का सामना किया। इसी किले ने कुँवर पृथ्वीराज और राणा संग्राम सिंह का बचपन अपनी बाहों में झुलाने का सौभाग्य भी प्राप्त किया। उनकी बचपन की किलकारियाँ और बाल लीलाएँ देखीं। यह एक स्वाभाविक सत्य है कि जिस स्थान पर हमारा बचपन बीता होता है, जिस स्थान पर हम चलना सीखते हैं और अपनी बाल लीलाएँ संपन्न करते हैं, वह स्थान हमारे लिए आजीवन तीर्थ स्थान के रूप में हमारे मन मस्तिष्क में अंकित हो जाता है। इस प्रकार राणा परिवार के कई वीर राजाओं और उनके वंशजों के लिए यह किला तीर्थ स्थान जैसा सम्मान प्राप्त कर गया।

  उड़वा राजकुमार कुँवर पृथ्वीराज की छतरी भी इस दुर्ग में रखी है। इसी किले में गूजरी माता पन्नाधाय के द्वारा महाराणा प्रताप के पिता और महाराणा संग्राम सिंह के पुत्र उदयसिंह का लालन-पालन किया गया था। राणा उदय सिंह का पालन पोषण करना और फिर उसकी प्राण रक्षा के लिए अपने पुत्र चंदन का बलिदान समय आने पर दे देना एक बहुत गौरवपूर्ण इतिहास का शानदार पृष्ठ है। यदि गूजरी माता पन्नाधाय ऐसा नहीं करती तो राणा वंश के सबसे प्रतापी शासक महाराणा प्रताप सिंह हमें कभी प्राप्त नहीं होते, जिन्होंने अकबर के सामने कभी पराजय स्वीकार नहीं की थी। जब महाराणा प्रताप सिंह और अकबर के बीच हल्दीघाटी का युद्ध जून 1576 में हुआ तो उसके पश्चात् महाराणा प्रताप सिंह ने इसी किले में रहकर अपना समय व्यतीत किया था।

शूरवीर महाराणा कुम्भा इसी दुर्ग में अपने राज्य पिपासु पुत्र ऊदासिंह द्वारा मारे गए थे। ऊदा सिंह का यह कुकृत्य भारतीय हिंदू इतिहास के गौरवपूर्ण और आत्माभिमानी मस्तक पर एक कलंक है, इतना ही नहीं इस किले के गौरवपूर्ण इतिहास के लिए भी यह बहुत दुर्भाग्य का विषय है कि ऐसा पैशाचिक कृत्य इसी किले के अंदर संपन्न हुआ। इसके उपरांत भी हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी कंस के किसी कुल विशेष में उत्पन्न हो जाने से कुल की शोभा को ग्रहण तो लगता है, परंतु इसके उपरांत भी जो नजरें पारखी होती हैं वे कंस को कंस जैसा और अन्य महान् वंशजों को उनके अपने व्यक्तित्व को गौरवान्वित करने वाला सम्मान प्रदान करती हैं। यही कारण है कि ऊदासिंह अपने कुकृत्य के कारण इतिहास में एक उपेक्षित नाम के रूप में पड़ा हुआ है। वैसे भी हमारी भारतीय परंपरा रही है कि जो कोई व्यक्ति गलत कार्य करता है उसका अधिक उल्लेख कहीं नहीं किया जाता।

इस किले की ऊँचाई के संबंध में अबुल फजल ने लिखा है कि “यह दुर्ग इतनी बुलंदी पर बना हुआ है कि नीचे से ऊपर की तरफ देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती है।”

कर्नल जेम्स टॉड ने दुर्भेद्य स्वरूप की दृष्टि से चित्तौड़ के बाद इस दुर्ग को रखा है तथा इस दुर्ग की तुलना (सुदृढ़ प्राचीर, बुर्जी तथा कंगूरों के कारण) ‘एट्स्कन’ से की है।

दुर्ग की प्राचीर 36 मील लम्बी व 7 मीटर चौड़ी है जिस पर 5 घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं। इसलिए इसे भारत की महान् दीवार के नाम से जाना जाता है। विकिपीडिया के अनुसार किले के उत्तर की तरफ का पैदल रास्ता ‘टूट्या का होड़ा’ तथा पूर्व की तरफ हाथी गुढ़ा की नाल में उतरने का रास्ता ‘दाणीवहा’ कहलाता है। किले के पश्चिम की तरफ का रास्ता ‘हीराबारी’ कहलाता है, जिसमें थोड़ी ही दूर पर किले की तलहटी में महाराणा रायमल के ‘कुँवर पृथ्वीराज की छतरी’ बनी है, इसे ‘उड़‌याँ राजकुमार’ के नाम से जाना जाता है। पृथ्वीराज स्मारक पर लगे लेख में पृथ्वीराज के घोड़े का नाम ‘साहण’ दिया गया है। किले में चूसने के लिए आरेठपील, हल्लापोल, हनुमानपोल तथा विजयपोल आदि दरवाजे हैं। कुम्भलगढ़ के किले के भीतर एक लघु दुर्ग कटारगढ़ स्थित है जिसमें ‘झाली रानी का मालिया’ महल प्रमुख है।

देश प्रदेश की सरकारों को इस किले के बारे में विशेष ध्यान देना चाहिए। जिससे कि यह वर्तमान भारत की युवा पीढ़ी के लिए एक तीर्थ स्थल के रूप में स्थापित हो सके। हमारा मानना है कि जिन जिन महापुरुषों का इस किले से नाम जुड़ा है उन उनकी प्रतिमाएँ इस किले के भीतर स्थापित होनी चाहिए।

कब जागेगा शासन अपना प्रश्न बड़ा गंभीर खड़ा, हर देशभक्त के मानस को जज्बा बन झकझोर रहा।

भेद भरे चेहरों के हाथों बंधु। देश नहीं बढ़ पाएगा,

पटेल सुभाष का नारा देकर देश उन्हीं को खोज रहा ।।
क्रमशः

डॉ राकेश कुमार आर्य

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