आर्य जगत के मूर्धन्य विद्वान स्वामी विवेकानंद परिव्राजक जी का जीवन परिचय

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मेरा संक्षिप्त जीवन परिचय
समय-समय पर कुछ सज्जन मेरा संक्षिप्त जीवन परिचय लिखने के लिए मुझे प्रेरित करते रहे हैं। वे कहते थे, कि “आपके जीवन में हमें कुछ विशेष गुण दिखाई देते हैं। हम भी उन गुणों से प्रेरणा लेना चाहते हैं। इसलिए आप अपना संक्षिप्त जीवन परिचय लिखें. इससे दूसरे लोगों को भी अच्छे काम करने तथा जीवन में उन्नति करने की प्रेरणा मिलेगी।” अतः कुछ सज्जनों के बार बार आग्रह एवं अनुरोध पर, “जीवन के कल्याण के लिए लोगों को कुछ प्रेरणा मिले,” इस उद्देश्य से, मैं यह अपना संक्षिप्त जीवन परिचय लिख रहा हूं। आशा है, आप लोग इससे लाभ उठाएंगे।
मेरा जन्म 22 दिसंबर सन् 1959 को भारत की राजधानी दिल्ली के एक छोटे से भाग में हुआ, जिसका नाम ‘आदर्श नगर’ है। बाल्यकाल में मेरा नाम विवेक भूषण आर्य था। मेरी माता जी का नाम “श्रीमती शांति देवी जी आर्या” था। मेरे पिताजी का नाम “श्री श्रीकृष्ण शास्त्री जी” था। वे गुरुकुल के स्नातक, संस्कृत भाषा के अध्यापक तथा आर्य वैदिक प्रचारक थे। गृहस्थ आश्रम के कर्तव्य पूरे होने के बाद मेरी माता जी ने वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश किया, और मेरे पिताजी भी वानप्रस्थी होकर संन्यासी हो गए। तब उनका नाम “स्वामी जीवनानन्द जी सरस्वती” हो गया। उन्होंने भी पूरा जीवन वेद प्रचार कार्य किया।
हमारे घर में संभवतः 70 / 80 वर्षों से प्रतिदिन यज्ञ और आर्य वैदिक परम्पराएं चल रही हैं। हम चार भाई हैं। मैं उनमें सबसे छोटा हूं। बचपन से ही हम सब भाइयों को आर्य समाज के वैदिक संस्कार माता-पिता और गुरुजनों से मिले। जब से मैंने होश संभाला, अर्थात लगभग 5 वर्ष की आयु से ही मैंने देखा, कि हमारे घर में लगभग गुरुकुलीय दिनचर्या चलती थी। जैसे कि रात को हम सब परिवार के लोग 10:00 बजे सो जाते थे। हमारे माता-पिता सुबह 4:00 बजे प्रतिदिन उठ जाते थे। और हम छोटे बच्चे थे, इसलिए हमें उनसे 1 घंटा अधिक सोने के लिए मिलता था। क्योंकि हमारे घर में प्रतिदिन सुबह 6 बजे यज्ञ होता था, इसलिए हमें सुबह 5:00 बजे उठा दिया जाता था। हम सब लोग नहा धोकर तैयार होकर सुबह 6:00 बजे तक यज्ञ में उपस्थित हो जाते थे। समय का पालन करना पिताजी ने हमें बचपन से ही सिखा दिया था। हमें रात को 10:00 बजे के बाद कभी जागने नहीं दिया गया और सुबह 5:00 बजे के बाद कभी भी सोने नहीं दिया गया। रविवार हो या सोमवार, स्कूल की छुट्टी हो या न हो, प्रतिदिन सोने जागने का समय यही रहता था।
हमारे घर में प्रतिदिन सुबह यज्ञ होता था। और नियम यह था, कि “जो सुबह यज्ञ हवन नहीं करेगा, उसको नाश्ता नहीं मिलेगा। जो शाम को संध्या नहीं करेगा, उसे रात का भोजन नहीं मिलेगा।” लगभग 70 / 80 वर्षों से यह नियम हमारे घर में चल रहा है। इस प्रकार से बचपन से ही हम सब भाई, पिता जी के कठोर अनुशासन में रहकर बड़े हुए।
मेरा बचपन दिल्ली में ही बीता। मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बीकॉम प्रथम वर्ष तक पढ़ाई की, फिर उसमें रुचि न रहने के कारण छोड़ दी। हमारे घर में सभी लोग संगीतज्ञ थे। वे ईश्वर भक्ति के भजन आदि गाते और संगीत के वाद्ययंत्रों हारमोनियम ढोलक आदि को बजाते थे। भजन प्रवचन आदि का कार्यक्रम भी हमारे घर में चलता था। मैंने भी बचपन में लगभग 18 वर्ष तक गीत संगीत गाया बजाया और दूसरों को सिखाया। और वैदिक भजनों के माध्यम से देश भर में घूम-घूम कर आर्य समाज के सिद्धांतों का प्रचार किया।
तब मेरी आयु केवल 18 वर्ष की थी। उन्हीं दिनों में भजनों के माध्यम से वेद प्रचार करते-करते संभवतः सन् 1977 में गुरुकुल सिंहपुरा रोहतक में पूज्य स्वामी सत्यपति जी महाराज से मेरा परिचय हुआ। तब उन्होंने मुझे आजीवन ब्रह्मचारी बनने की प्रेरणा दी। मैंने उस पर लगभग 6 मास तक चिंतन मनन किया, और मुझे उनकी बात जंच गई। मैंने विवाह न करने और आजीवन ब्रह्मचारी रहकर देश धर्म समाज की सेवा करने एवं मोक्ष प्राप्ति करने कराने का संकल्प लिया।
फिर मैंने लगभग चार वर्ष तक घर छोड़ने और गुरुकुल जाने की तैयारी की। उन चार वर्षों में मैंने आध्यात्मिक और सांसारिक जीवन का तुलनात्मक अध्ययन किया। कुछ छोटे-छोटे काम धंधे व्यापार भी किए। संगीत का प्रशिक्षण भी दिया। एक संगीत विद्यालय चलाया। और अनेक स्कूलों में बच्चों को संगीत गाना बजाना भी सिखाया। इसका उद्देश्य यही था, मैं यह जानना चाहता था, कि “सांसारिक जीवन जीने में अधिक लाभ है, अथवा आध्यात्मिक जीवन जीने में।” चार वर्ष में इस प्रकार से तुलनात्मक अध्ययन करने पर, पक्की तरह से मेरा निर्णय हो गया, कि “आध्यात्मिक जीवन जीना ही अधिक लाभकारी है।” इसलिए मैंने पूरी तैयारी करके 22 वर्ष की आयु में सन् 1981 में घर छोड़ दिया, तथा गुरु जी के साथ हो गया। “और अब घर छोड़े हुए मुझे लगभग 43 वर्ष हो गए हैं। मैं अपने घर परिवार वालों से कोई सांसारिक संबंध नहीं रखता। न घर जाता, न घर परिवार की बातें करता।”
1981 में घर छोड़ने के बाद मैं और पूज्य गुरुदेव स्वामी सत्यपति जी महाराज लगभग 5 वर्ष तक भारत देश भर में भ्रमण करते रहे। मेरे साथ कभी-कभी दो-तीन ब्रह्मचारी आचार्य ज्ञानेश्वर जी, आचार्य वीरेंद्र जी आदि भी होते थे। ऐसे 5 वर्ष तक देश भर में घूम घूम कर हम वैदिक दर्शन शास्त्रों को पढ़ते पढ़ाते रहे, और साथ साथ वेद प्रचार तथा योग शिविरों का संचालन भी करते रहे।
5 वर्षों में अर्थात सन् 1981 से 1986 तक देश भर में घूम-घूम कर गुरु जी से मैंने योग सांख्य वैशेषिक न्याय और वेदान्त ये पांच दर्शन और 11 उपनिषद पढ़ लिए थे। फिर छठा मीमांसा दर्शन पढ़ने का कार्य उपस्थित हुआ। उसके लिए गुरुजी ने कहा कि “अब यात्राएं बंद करके किसी एक स्थान पर जमकर बैठेंगे, इन दर्शन शास्त्रों को फिर से पढ़ेंगे पढ़ाएंगे और योगाभ्यास में विशेष परिश्रम करेंगे।”
तब 10 अप्रैल 1986 को आर्य वन विकास फार्म, गांव रोजड़, जिला साबरकांठा, गुजरात में “दर्शन योग महाविद्यालय” की स्थापना हमारे गुरु जी पूज्य स्वामी सत्यपति जी महाराज ने की।” “दो ढाई वर्षो में मैंने योग सांख्य आदि पांच दर्शन फिर से पढ़े और गुरु जी के आदेश से अपने कुछ साथियों को पढ़ाये भी। और छठा मीमांसा दर्शन भी पढ़ लिया।”
उसके बाद पूज्य गुरु जी ने मुझे वहीं दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ गुजरात में ही दर्शन शास्त्र पढ़ाने और योगाभ्यास में और अधिक परिश्रम एवं कठोर तपस्या करने का निर्देश दिया। तब 1986 से लेकर 2006 तक लगभग 20 वर्ष तक मैंने दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ गुजरात में बहुत से विद्यार्थियों को दर्शन उपनिषद और कुछ वेदादि शास्त्र पढ़ाए। कठोर तपस्या करते हुए महर्षि पतंजलि जी के अष्टांग योग का स्वयं भी क्रियात्मक रूप से अभ्यास किया, और अपने विद्यार्थियों को भी सिखाया।
जिन विद्यार्थियों को मैंने योग सांख्य आदि दर्शन पढ़ाए, तथा वैदिक अष्टांग योग सिखाया, और उन्हें वैदिक विद्वान बनाया, उनमें से कुछ मुख्य मुख्य नाम इस प्रकार से हैं। ये विद्वान आज देश विदेश में वैदिक विद्या के प्रचार प्रसार में बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं। जैसे कि स्वामी विश्वङ् जी, स्वामी ब्रह्मविदानंद जी, स्वामी आशुतोष जी, स्वामी ध्रुवदेव जी, स्वामी शांतानन्द जी, स्वामी मुक्तानंद जी, स्वामी वेदपति जी, स्वामी सत्येन्द्रानन्द जी, आचार्य आशीष जी, आचार्य संदीप जी, आचार्य सत्यजित् मुनि जी, आचार्य दिनेश जी, आचार्य ईश्वरानन्द जी, आचार्य प्रियेश जी, इत्यादि।
पूज्य गुरुदेव स्वामी सत्यपति जी महाराज के निर्देशानुसार लगभग 20 वर्ष तक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ गुजरात में दर्शन अध्यापन एवं योग साधना आदि कार्य संपन्न करने के पश्चात्, सन् 2006 में पूज्य गुरुदेव स्वामी सत्यपति जी महाराज ने मुझे संन्यास की दीक्षा दी। और भारत देश में घूम घूम कर वेद प्रचार करने का निर्देश दिया। “सन 2006 से अब तक लगभग 18 वर्ष हो गए, मैं भारत देश भर में घूम-घूम कर वेद प्रचार करता हूं। विशेष रूप से स्कूलों कॉलेजों विश्वविद्यालयों हॉस्टलों कार्यालयों बैंकों न्यायालयों आदि स्थानों पर जा जाकर, तथा डॉक्टर इंजीनियर पायलट उच्च तथा सर्वोच्च न्यायालय के वकीलों और न्यायाधीशों गुजरात विधानसभा सचिवालय के अधिकारियों तथा दिल्ली संसद भवन सचिवालय के अधिकारियों इसरो के वैज्ञानिकों IPS IAS अधिकारियों आदि बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों में दर्शन उपनिषद् आदि शास्त्रों का अध्यापन, वेद मंत्रों की व्याख्या, वैदिक प्रवचन, आध्यात्मिक शंका समाधान और महर्षि पतंजलि जी के अष्टांग योग का प्रचार प्रशिक्षण आदि कार्य कर रहा हूं।” “Whatsapp तथा Facebook पर भी दैनिक सुविचार भेज कर लोगों को उत्तम व्यवहार एवं अध्यात्म की ओर प्रेरित करता हूं।”
एक विशेष बात — पूज्य गुरुदेव स्वामी सत्यपति जी महाराज ने मुझे और अन्य भी अनेक ब्रह्मचारियों को वैदिक अष्टांग योग सिखाया। वे सभी विद्यार्थियों को ऐसा कहते थे, कि जब तक समाधि प्राप्त न हो जाए, तब तक योग साधक को किसी एक जीवित शरीरधारी वैदिक विद्वान योग्य गुरु के आधीन रहना चाहिए। अपनी इच्छा और योजना से सब कार्य नहीं करने चाहिएं। क्योंकि विद्यार्थी का ज्ञान और अनुभव कम होने से उसके योग मार्ग से भटकने की आशंका बनी रहती है।” फिर कहा करते थे, कि “यदि आप अपने जीवन में और वैदिक योगाभ्यास में सफल होना चाहते हैं, ईश्वर साक्षात्कार तक पहुंचना चाहते हैं, मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं, तो मुझसे पूछे बिना अपने जीवन की कोई भी योजना नहीं बनाना।
पूज्य गुरुदेव की बात 100% सत्य है। सन् 1981 से लेकर सन् 2021 तक (जब तक पूज्य गुरुदेव जीवित रहे) लगभग 40 वर्ष पूरा जीवन मैं पूज्य गुरुदेव के समर्पित रहा। “मैंने सदा उनके आदेश निर्देश का पूरा पालन किया, उन्हें पूरा समर्पण किया, और उनसे पूछे बिना अपने जीवन की कभी भी कोई भी योजना नहीं बनाई, और न ही कोई कार्य उनकी इच्छा या स्वीकृति के विरुद्ध किया। उससे मुझे इतना अधिक लाभ हुआ, जिसका अनुभव मैं स्वयं ही कर सकता हूं। इसका वर्णन करना असंभव है।”
मुझे मेरे जीवन में जो भी और जितनी भी सफलताएं मिली, उसमें ईश्वर की कृपा के अतिरिक्त, मेरे माता-पिता द्वारा बचपन में दिया गया प्रशिक्षण और आशीर्वाद, तथा पूज्य गुरु जी के निर्देश आदेश का बहुत बड़ा हाथ (सहयोग) रहा है। मैं अन्य आध्यात्मिक लोगों से तथा नये पुराने सभी ब्रह्मचारियों और योग साधकों से भी यह बात बहुत बलपूर्वक कहना चाहता हूं, कि यदि वे भी अपने जीवन में उन्नति और सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, तो तन मन धन से अपने-अपने गुरु जी के समर्पित रहें। कम से कम एक शरीरधारी वैदिक विद्वान योग्य व्यक्ति को अपना गुरु मानकर चलें। इसके बिना उन्हें जीवन और योगाभ्यास में सफलता नहीं मिलेगी।” गुरु मानने का अर्थ है, कि “चाहे संसार में किसी और व्यक्ति की बात मानें, या न मानें, परंतु वे अपने गुरुजी की बात को नहीं टालेंगे। उनके निर्देश आदेश का पालन अवश्य करेंगे।”
पूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि इस अध्यात्म मार्ग में सफलता प्राप्त करने के लिए योगाभ्यासी को पूरी तरह से योग्य गुरुजी और ईश्वर के समर्पित होना पड़ता है। इसके बिना किसी को कोई सफलता न आज तक मिली, और न आगे मिलेगी। जैसे महर्षि दयानंद जी योग्य गुरु की खोज में वर्षों तक भटकते रहे। अंत में उन्हें एक योग्य गुरुजी “स्वामी विरजानन्द जी महाराज” के रूप में मिल गए, और उन्होंने पूरी तरह से अपने आप को गुरुजी के समर्पित कर दिया। तभी उनका कल्याण हुआ। “अतः जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए ईश्वर समर्पण तो करना ही है, परन्तु उस से पहले, महर्षि दयानंद सरस्वती जी के समान, योग साधक को अपने जीवित शरीरधारी गुरु जी के प्रति पूर्णतया समर्पित होना चाहिए। तभी सफलता मिलेगी, अन्यथा नहीं।”
जो लोग अपने मिथ्या अभिमान के कारण योग्य व्यक्तियों को अपना गुरु स्वीकार करना नहीं चाहते। और बहाना यह बनाते हैं कि “कोई योग्य गुरु है ही नहीं।” यह उनका बहाना है। वे लोग ईमानदारी से सोचें, कि क्या यह नहीं हो सकता कि योग्य गुरु तो हो, परंतु उनमें गुरु को पहचानने की क्षमता कम हो। अथवा पहचान कर भी अपने मिथ्या अभिमान के कारण योग्य व्यक्ति को अपना गुरु स्वीकार करना नहीं चाहते? ऐसा भी होता है। इसलिए यह कहना हेत्वाभास है, कि “कोई योग्य गुरु है ही नहीं.”
क्या महर्षि दयानंद जी ने ऐसा कोई बहाना बनाया, कि कोई योग्य गुरु है ही नहीं। वे वर्षों तक ढूंढते रहे, और उन्हें योग्य गुरुजी मिल गए। इसलिए योग साधको! सावधान। बहाने मत बनाइए। योग्य गुरु ढूंढने से मिल जाते हैं। अपने मिथ्या अभिमान को दूर करके योग्य व्यक्तियों को अपना गुरु स्वीकार करें। अन्यथा जीवन यूं ही व्यर्थ चला जाएगा, और हाथ में कुछ नहीं आएगा। तब जीवन के अंत में बहुत पश्चाताप होगा।
ज़रा गंभीरता से विचार कीजिए, “जो विद्यार्थी आंखों से प्रत्यक्ष दिखने वाले स्वार्थ रहित साक्षात उपकारी अपने गुरु जी को समर्पित नहीं हो सकता, वह आंखों से न दिखने वाले अप्रत्यक्ष सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान न्यायकारी आनन्दस्वरूप ईश्वर को तो क्या समर्पित हो पाएगा?” इस प्रकार से गुरुजी एवं ईश्वर को पूरा समर्पण किए बिना किसी की उन्नति नहीं हो सकती।
यह कितने आश्चर्य की बात है, कि आधुनिक स्कूल कॉलेजों में गणित भूगोल विज्ञान आदि पढ़ने वाले विद्यार्थी, अपने योग्य अध्यापकों व गुरुजनों के प्रति पूरी तरह समर्पित होकर विद्या पढ़ते, उनके आदेश निर्देश का पालन करते, और अपने-अपने विषय में उच्च स्तर के वैज्ञानिक और विद्वान बन जाते हैं। *परंतु शोक की बात यह है, कि “आध्यात्मिक क्षेत्र में विद्यार्थी लोग, अपने मिथ्या अभिमान और अविद्या राग द्वेष आदि दोषों के कारण, अपने योग्य गुरुओं तथा ईश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पित नहीं होते। यही उनकी असफलता का सबसे बड़ा कारण है।
यद्यपि मैं एक वैराग्यवान् संन्यासी हूं। पिछले 43 वर्षों से मैं अपने घर नहीं जाता, अपने परिवार वालों से कोई सांसारिक संबंध नहीं रखता। मुझे अपने परिवार वालों आदि से कोई मोह नहीं है। फिर भी लोगों को कुछ प्रेरणा मिले, लोग अपने परिवारों में वैदिक धर्म की स्थापना करें। अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देवें। उन्हें भी वैदिक धर्मी बनाएं, जैसे हमारे परिवार वालों ने हमें बनाया। इस दृष्टि से मैं यह सूचना लिख रहा हूं, कि हमारे परिवार में चार संन्यासी हुए और तीन वानप्रस्थी। हमारे परिवार से कुल मिलाकर 7 लोग, वेदों के प्रचार प्रसार, समाज सेवा और परोपकार आदि कार्यों के लिए घर छोड़कर चले गये, और वैदिक धर्म को समर्पित हुए। उन 7 लोगों में, मेरे माता-पिता, मेरे दादा दादी, मेरे पिताजी के ताऊजी, मेरे मामा जी की एक बेटी, तथा सातवां मैं स्वयं हूं।” “हमारे परिवार में और भी मामा चाचा भाई आदि अनेक वेद प्रचारक हुए हैं, उनकी संख्या कुल मिलाकर लगभग 15 से भी अधिक होगी, जिन्होंने वैदिक धर्म का प्रचार किया और अभी भी कर रहे हैं।
मुझे जीवन में जो भी सफलताएं प्राप्त हुई, उनमें मेरे माता पिता गुरुजनों ऋषियों और ईश्वर का बहुत बड़ा योगदान और आशीर्वाद है। मैं इन सब का बहुत बहुत ऋणी हूं, कृतज्ञ हूं और बहुत विनम्रतापूर्वक इन सब का धन्यवाद एवं आभार व्यक्त करता हूं।
यह मेरा संक्षिप्त जीवन परिचय है। आप लोग इसे पढ़कर अनेक प्रकार की प्रेरणाएं ले सकते हैं। इसी उद्देश्य से मैंने यह अपना संक्षिप्त जीवन परिचय लिखा है। आशा है, आप लोग इससे लाभ उठाएंगे। इस लेख से प्रेरणा लेकर कोई अपने घर में यज्ञ करना आरंभ कर सकता है। कोई ईश्वर की उपासना करना आरंभ कर सकता है। कोई ब्रह्मचारी बनना चाहे, तो ब्रह्मचारी बन सकता है। कोई तपस्वी बने, विद्वान बने, देश धर्म की सेवा करे, योगी बने, कोई मोक्ष को लक्ष्य बनाकर तपस्या करे, और मोक्ष प्राप्त करे। जैसी जिसकी इच्छा हो, और जैसी वह इस लेख से प्रेरणा प्राप्त करे, वह वैसा कर सकता है। धन्यवाद जी। 🙏🙏🙏
सब का शुभचिंतक —
स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ गुजरात।
4.10.2024

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