भारतीय राजनीति में तीसरे मोर्चे की उपादेयता

तीसरा मोर्चा का भारत की राष्ट्रीय राजनीति में एक विलक्षण सा अस्तित्व है। भारत में मुख्यत: दो ही प्रमुख राजनीतिक पार्टियां रही हैं। समय- समय पर बाकी दलों ने इक_े होकर मजबूत रूप से एक तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश करते हैं ।कई बार सफल हुआ और कई बार असफल। सफल इसलिए कि समय- समय पर तीसरे मोर्चा सरकार बनाने में सफल रहा । असफल इसलिए कि यह मोर्चा कभी भी लंबे समय तक नहीं चला। अभी तक हर बार अस्थायी ही साबित हुआ। बिना किसी स्पष्ट विजन के दो बार संसदीय राजनीति में तीसरे मोर्चा की सरकार तो बनी लेकिन स्वहित व जोड़ -तोड़ की राजनीति से आपस में राजनीतिक वर्चस्व की टकराहट हुई । जिससे कोई भी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी द्य तीसरे मोर्चे की ...

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संतों की दोगली रिपोर्ट

महाभारत में संन्यासी के विषय में कहा गया है कि-‘‘जो युक्त चित्त होकर मोक्षोपयोगी कर्म श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि के द्वारा समय व्यतीत करता हुआ निराधार और रूठे काठ की भांति स्थिर रहता है उसको मोक्षरूप सनातन धर्म प्राप्त होता है।’’ ‘‘संन्यासी किसी एक स्थान में आसक्ति न रखे, एक ही ग्राम में न रहे तथा नदी के किसी एक ही किनारे पर सर्वदा शयन न करे। उसे सब प्रकार की आसक्तियों से मुक्त होकर स्वच्छंद विचरना चाहिए।’’ ‘‘वह धर्मत: प्राप्त अन्न का ही भोजन करे। कामनापूर्वक कुछ भी न खाये। रास्ता चलते समय वह दो हाथ आगे तक की भूमि पर ही दृष्टि रखे और एक दिन में एक कोस से अधिक न चले।’’ ‘‘शीत-उष्ण आदि द्वंद्वों से निर्विकार रहे किसी के आगे गिड़गिड़ाये नही, सांसारिक सुख और परिग्रह से दूर रहे। ...

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भारत का राजधर्म और श्री मोदी

मनुस्मृति के सातवें अध्याय के दूसरे श्लोक का अर्थ करते हुए महर्षि दयानंद सरस्वती जी महाराज सत्यार्थ प्रकाश में कहते हैं-‘‘जैसा परम विद्वान ब्राह्मण होता है वैसा विद्वान सुशिक्षित होकर क्षत्रिय को योग्य है कि इस सब राज्य की रक्षा न्याय से यथावत करे।’’ अभिप्राय है कि राजा ब्राह्मण के समान ही परम विद्वान और तपस्वी न्यायप्रिय होना चाहिए। वह किसी के अधिकारों का हन्ता ना हो, और ना ही किसी वर्ग, समुदाय या सम्प्रदाय के साथ अन्याय करने वाला हो ‘‘सबका साथ और सबका विकास’’ उसके जीवन की तपश्चर्या हो, उद्देश्य हो। मनु महाराज को उद्घृत करते हुए ही महर्षि दयानंद आगे लिखते हैं कि-‘‘यह सभेश राजा इंद्र अर्थात विद्युत के समान शीघ्र ऐश्वर्यकत्र्ता, वायु के समान सबको प्राणवत प्रिय और हृदय की बात जानने वाला, यम-पक्षपात रहित न्यायाधीश के समान ...

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अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस: नई कार्य योजना

पुरानी भारतीय-आध्यात्मिक पद्धति:- योग 5,000 साल पुरानी भारतीय शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक पद्धति है, जिसका लक्ष्य मानव शरीर और मस्तिष्क में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। योग परम्परा और शास्त्रों का विस्तृत इतिहास रहा है। जिस तरह राम के निशान इस भारतीय उपमहाद्वीप में जगह-जगह बिखरे पड़े है उसी तरह योगियों और तपस्वियों के निशान जंगलों, पहाड़ों और गुफाओं में आज भी देखे जा सकते है। माना जाता है कि योग का जन्म भारत में ही हुआ। गीता में श्रीकृष्ण ने एक स्थल पर कहा है ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ (कर्मो में कुशलता को योग कहते हैं)। स्पष्ट है कि यह वाक्य योग की परिभाषा नहीं है। कुछ विद्वानों का यह मत है कि जीवात्मा और परमात्मा के मिल जाने को योग कहते हैं। बौद्धमतावलंबी भी योग शब्द का व्यवहार करते और ...

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