देश के लिए जनसंख्या नीति की आवश्यकता

जनसंख्या नियन्त्रण के लिए तत्कालीन केन्द्रीय स्वास्थ्य एवम् परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नबी आजाद ने एक बार कहा था कि सरकार देश में कानून बनाकर या बलात् जनसंख्या नियन्त्रण के पक्ष में नही है। 5 मई 2010 को मातृत्व और बच्चे के स्वास्थ्य के लिए परिवार कल्याण पर आयोजित कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए केन्द्रीय मंत्री श्री आजाद ने कहा था कि लोगों को परिवार कल्याण के लिए उपलब्ध सुविधाओं के विषय में जानकारी देकर जागरूक किया जायेगा। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री की यह टिप्पणी ऐसे समय पर आयी थी जब देश में जनगणना का कार्य प्रारम्भ हो चुका था और देश के बुद्घिजीवियों, चिन्तकों एवम् प्रबुद्घ वर्ग में जनसंख्या नियन्त्रण को लेकर बहस चल रही थी। देश की स्थिति बड़ी दयनीय थी। ऐसे में केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री का यह कथन कि ...

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गाय के प्रति हमारा राष्ट्रधर्म-भाग-2

गतांक से आगे.... गाय के दूध की दही को अथवा तक्र में मिले गेंहू के दलिया के सेवन से गरमी के दिनों में भी मनुष्यों को प्यास नही सताती। व्यक्ति बड़े सहज ढंग से भरी गरमी में कार्य कर सकता है। उसकी रोग निरोधक क्षमता सुदृढ़ होती है। शरीर में कीटाणुओं का नाश होता है। हृदय स्वस्थ रहकर अपना कार्य करता है। किसी प्रकार की चिड़चिड़ाहट या घबराहट नही होती है। यहां तक कि सिर के बाल भी काले बने रहते हैं। गौ मूत्र के सेवन में बुढ़ापा आक्रमण नही करता। कब्ज, खाज, कोढ़, खुजली, एग्जिमा, पथरी, दीर्घज्वर, पीलिया, सूजन, खांसी, जुकाम, दमा, पाण्डुरोग, बच्चों की सूखी खांसी, बांझपन, उदर विकार, नेत्रविकार, तपेदिक, बाल झडऩा, रक्तचाप, कैंसर, जलोदर, कान का दर्द, नारियों के मासिक धर्म की अनियमितता, रक्त प्रदर, श्वेत प्रदर, कमर ...

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गाय के प्रति हमारा राष्ट्रधर्म-भाग-1

गाय हमारी संस्कृति की प्रतिनिधि है। संस्कृति का अर्थ है-संस्कारोतीति य: संस्कृति: अर्थात जो हमें संस्कारवान बनाए, हमारा नित नया संस्करण (पहले कुसंस्कारों को मारकर परिमार्जित स्वरूप) निकाले, वह संस्कृति है। संस्कृति के समक्ष सभ्यता बहुत बौनी है। उसका कद बहुत छोटा है। संसार में रहना-सहना सभ्यता का अंग है। किंतु रहा कैसे जाए? यह हमें संस्कृति सिखाती है। संस्कृति हमारी परिमार्जित उन्नतावस्था का नाम है। पश्चिमी जगत ने नारी के नंगेपन को, निर्वस्त्रावस्था को उसकी सभ्यता बताया और यह भ्रम की स्थिति उत्पन्न की कि यही संस्कृति है। जबकि भारत ने लज्जा को नारी  का आभूषण बताया। उसके शील की रक्षा के लिए पहले पिता, फिर भाई, पति और सर्व समाज को प्रहरी नियुक्त किया। जिससे समाज उन्नति को प्राप्त कर सके। इससे सुसंस्कृत समाज का निर्माण संभव हो ...

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जातीय सामंजस्य का सूत्र

भारतीय समाज में वर्तमान काल में जाति-व्यवस्था पहले से भी अधिक उग्र हो गयी है। इसे राजनीतिक लोगों ने अधिक हवा दी है। जिस व्यवस्था के अभिशाप को स्वातंत्रयोपरांत समाप्त कर दिया जाना चाहिए था-उसे आरक्षण के नाम पर, जातीय वोटों के नाम पर और दलितों-शोषितों, अगड़ों-पिछड़ों के नाम पर हमने जीवित किये रखा, यह दुर्भाग्य का विषय है। वोट के सौदागरों ने वोट प्राप्ति के लिए जाति-व्यवस्था और तदजनित भारतीय समाज में बने दलित, शोषित, अगड़े-पिछड़े के वर्गीय द्वंद का भरपूर लाभ उठाने का प्रयास किया है। इसके लिए किसी ने मनु को कोसना आरंभ कर दिया है, तो किसी ने मनु प्रतिपादित वर्ण व्यवस्था को वर्ग संघर्ष की जनक बताकर उसे ‘ब्राह्मणवादी व्यवस्था’ तक कहना आरंभ कर दिया है। ऐसा कहने वाले लोग ये भूल जाते हैं कि इससे वे ...

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उगता भारत समाचार

आदर्श ग्राम योजना

आदर्श ग्राम योजना को लागू करने में पाटिल ने मिसाल कामय की

नवसारी। स्मार्ट सिटी, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, सांसद आदर्श ग्राम योजना जैसी योजनाएं, योजना मात्र नहीं हैं, बल्कि देश को बेहतर […]