राजनीति: उच्च शिक्षा में बढ़ती खाई

भारत सरकार ने विश्वविद्यालय में शिक्षा हासिल करने वाले शिक्षार्थियों की संख्या 2030 तक बढ़ा कर तीस प्रतिशत करने का लक्ष्य तय कर रखा है। जबकि भारत में सिर्फ बारह प्रतिशत लोगों को ही विश्वविद्यालयों में प्रवेश मिल पाता है। वर्तमान में भारत में दूरस्थ शिक्षा (डिस्टेंस लर्निंग) यानी घर बैठे पढ़ाई करने वालों की तादाद पैंतीस लाख है। चिंताजनक बात यह कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने छात्रों और अभिभावकों से उच्च शिक्षा के लिए मुक्त तथा दूरस्थ शिक्षा के पाठ्यक्रमों के चुनाव में सावधानी बरतने को कहा है। आयोग ने खुद माना है कि दूरस्थ शिक्षा संस्थानों में कई पाठ्यक्रम बिना उसकी अनुमति से संचालित हो रहे हैं और उनकी कोई मान्यता नहीं है। ऑनलाइन शिक्षा की बढ़ती लोकप्रियता के बीच आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी विश्वविद्यालय या संस्थान को अब तक ऑनलाइन कोर्स चलाने की अनुमति नहीं दी गई है। दरअसल, नियामक संस्था ...

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मनुष्य मरने से डरता क्यों है?

मनुष्य मरने से डरता क्यों है? यह प्रश्न इस लिए विचारणीय है कि हम सभी इस दुःख से यदा-कदा त्रस्त होते रहते हैं। कई बार मनुष्य को कोई रोग हो जाता है तो उसके मन में भय उत्पन्न होता है कि हो न हो, मैं जीवित रहूंगा या मर जाउगां? जब तक चिकित्सक व जांच रिपोर्ट से पुष्टि न हो जाये कि यह रोग ठीक हो सकता है, रोगी की सन्तुष्टि नहीं होती। यदि मनुष्य को कोई भयंकर रोग होता है तो चिकित्सक व परिवार जन उसे बताते ही नहीं कि कहीं भय के कारण यह जल्दी न मर जाये? वृद्धावस्था आने पर मृत्यु की तिथि पास आने लगती है। सभी यह कहते सुने जाते हैं कि एक दिन सभी को जाना है परन्तु अपने बारे में विचार करने पर डर लगता है। अपने बारे में इस प्रश्न को सभी टाले रहते हैं। मृत्यु का यह डर सभी को लगता ...

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लोकतंत्र में मीडिया धर्म-भाग-2

लोकतंत्र में मीडिया धर्म-भाग-2

ऐसी प्रवृति को देखकर लगता है कि ये टीवी चैनल वाले लोग जनता के साथ कितना अशोभनीय उपहास करते हैं? इनके इस प्रकार के उपहास के भी कुछ कारण होते हैं, यथा-अधिकतर ऐसा होता है कि जो एंकर होता है उसे स्वयं भी पता नही होता कि उसे जो विषय दिया गया है उसकी गंभीरता क्या है? उसे वही करना होता है जो उसके लिए पहले से ही निश्चित होता है। इसमें हम राजनीतिक चर्चाओं को रख सकते हैं। एंकर जिस राजनीतिक विचारधारा का मानने वाला होता है वह उसी विचारधारा से प्रेरित होकर चर्चा को अपने अनुसार मोडऩे का प्रयास करता रहता है, या उस पर टीवी चैनल के स्वामी का जैसा दबाव होता है, या वह टी वी चैनल जिस किसी राजनीतिक पार्टी या विचारधारा से प्रवाहित होता है उसी के अनुसार चर्चा को मोड़ लिया जाता है। जबकि यही चर्चा यदि भारतीय धर्म, संस्कृति और इतिहास पर ...

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दलित भेदभाव की जड़ें

उदित राज जातीय भेदभाव और लिंग विभाजन राष्ट्रीय मुद्दे क्यों नहीं बनते? क्यों शोषित जातियां ही अपने भेदभाव के खिलाफ खड़ी हों, पूरा देश क्यों नहीं? क्या ये भेदभाव करने वाले दूसरे देश के हैं? लिंगभेद से कहीं बड़ा मुद्दा हमारे समाज में लिंग विभाजन का है, जिसे अभी तक पूरी मान्यता नहीं मिली है। अक्सर लिंगभेद पर चर्चा होती है, जबकि यह लिंग विभाजन का उत्पाद है। पुरुष बाहर का काम करें और औरतें घर का, ऐसी हमारे समाज की बनावट और सोच है। पुरुष बाहर की दुनिया से जूझते-जूझते मजबूत हो जाता है और आर्थिक ताकत भी उसी के हाथ होती है। यह अवसर महिलाओं को नहीं मिलता, इसलिए पुरुषों पर आश्रित रहना पड़ता है। घर का कर्ता भी पुरुष होता है। जातीय भेदभाव और महिला उत्पीडऩ की आवाज तभी तेज होती है जब कोई घटना घट जाए। रोहित वेमुला की आत्महत्या से देश में उबाल आ गया। जो विरोध ...

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ईश्वर से क्या व कैसी प्रार्थना करें?

प्रार्थना अपने से अधिक सामथ्र्य व क्षमतावान सत्ता से किसी आवश्यक व उपयोगी वस्तु को मांगने व याचना करने को कहते हैं।  मनुष्य शिशु के रूप में माता-पिता से इस पृथिवी पर जन्म लेता है। उसे अपने शरीर का समुचित विकास और ज्ञान व बुद्धि सहित सत्कर्मों की प्रेरणा की अपेक्षा रहती है जिससे वह अपने उद्देश्य, लक्ष्य व उनकी प्राप्ति के उपायों को जान सके। इस कार्य में उसके माता-पिता व आचार्य सहित ऋषि महर्षियों के पूर्ण विद्या व अज्ञान से रहित ग्रन्थ सहायक होते हैं। हमारे माता-पिता, आचार्य व सभी ऋषि-मुनि भी वेदों वा ईश्वर से ही ज्ञान प्राप्त करते थे। ईश्वर एक सत्य, चित्त, आनन्दस्वरुप, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सृष्टि की रचना, पालन व लय करने वाली सत्ता है जो हमारे इस जीवन व अनेकानेक पूर्व जीवनों से पूर्व से ही हमारे साथ है और हर पल व हर क्षण हमारे साथ रहती है व रहेगी। अतः ...

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