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मॉरीशस में डी0ए0वी0 जैसी संस्थाएं भारत के वैज्ञानिक वैदिक चिंतन के प्रचार प्रसार के कार्य में लगी हुई हैं। जहां पर भारत के वैदिक ऋषियों का चिंतन आधुनिक भाषा शैली में बच्चों के कोमल मन मस्तिष्क में स्थापित किया जाता है। इसके लिए अनेक अध्यापक अध्यापिकाएं अपना जीवन समर्पित किए हुए हैं। उन सबके भीतर भारत की वैज्ञानिक वैदिक परंपरा और रीतियों को संसार के लोगों के पथ प्रदर्शन के लिए समर्पित करने की एक सद्भावपूर्ण इच्छा शक्ति परिलक्षित होती है।
यहां स्थित डी0ए0वी0 कॉलेज में हमारे भारतीय प्रतिनिधिमंडल का विदाई समारोह रखा गया था। जिसकी बहुत ही सुंदर व्यवस्था विद्यालय के प्रबंधन तंत्र द्वारा डॉक्टर मंगू जी के माध्यम से कर दी गई थी। मुझे यह देखकर बहुत ही आनंद की अनुभूति हुई कि यहां के प्रबंधन तंत्र, अध्यापक और अध्यापिकाओं के द्वारा हिंदी का एक बहुत सुंदर गीत स्वागत के लिए तैयार किया गया था। जिसे अध्यापक व अध्यापिकाओं के द्वारा बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया। जब ये लोग हमारे स्वागत के लिए इस प्रकार का गीत प्रस्तुत कर रहे थे, तभी संयोग से मैंने भी बैठे-बैठे एक गीत तैयार किया, जिसकी पंक्तियां इस प्रकार थीं :-

बहुत याद आओगे बंधु ! कविता मेरी गाती है…..

तर्ज: फूल तुम्हे…

मॉरीशस की पावन धरती गीत वेद के गाती है।
बड़ी मनोरम प्यारी प्यारी सबके मन को भाती है।।

युग युगों से भारत माता वेदों का संदेश लिए,
मानवता के हित से पूरित कितने ही उपदेश किए।
मॉरीशस चला उसी राह पर सभा यही बतलाती है….

डी ए वी की टीम धन्य है धन्य हुआ परिवेश यह,
दयानन्द की चर्चा सुनकर हृदय हुआ मेरा गदगद,
ऋषि का ऋण नहीं चुका सकेंगे छोटी सी जिंदगानी है….

पवित्र हृदय आप सभी का मानव का निर्माण करे।
पवित्र प्रार्थना वेद की होती हर जन का कल्याण करे।।
मानव का निर्माण करो, वेद ऋचा बतलाती है ……

गंगू जी का स्नेह बरसता, आप सभी का प्यार मिला।
आतिथ्य भाव देख आपका, मेरे मन का सुमन खिला।।
बहुत याद आओगे बंधु ! कविता मेरी गाती है…..

मैंने यह गीत डी0ए0वी0 कॉलेज में आयोजित किए जा रहे  भारतीय प्रतिनिधिमंडल के उस विदाई समारोह के अवसर पर प्रस्तुत किया। जिसमें मॉरीशस के आर्य नेता उदय नारायण गंगू जी, आचार्य जितेंद्र पुरुषार्थी जी सहित भारतीय प्रतिनिधिमंडल में सम्मिलित रहे सभी प्रतिनिधि गण और विद्यालय का प्रबंधन तंत्र अध्यापक /अध्यापिकाएं और वहां के छात्र, छात्राएं उपस्थित रहे। सभी को मेरे इस गीत की प्रस्तुति बहुत ही पसंद आई।

 इस अवसर पर डी0ए0वी0 कॉलेज के प्रबंधन तंत्र की ओर से विदेशी प्रतिनिधिमंडल के विद्वान सदस्यों का विदाई समारोह के रूप में अभिनंदन भी किया गया। विद्यालय की रेक्टर श्रीमती संगीता संपत के द्वारा स्वागत भाषण प्रस्तुत करते हुए सभी विदेशी अतिथियों का वाचिक सत्कार किया गया।  इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए आर्य नेता डॉ. उदय नारायण गंगू ने कहा कि भारत की वैचारिक संपदा पर मॉरीशस का उतना ही अधिकार है जितना भारत के लोगों का है। हम अपने विदेशी अतिथियों को अपने बीच पाकर गदगद हैं । उन्होंने स्वामी दयानंद जी महाराज की 200 वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित किए गए अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन के कार्यक्रमों को इस विदाई समारोह में समेटते हुए कहा कि भारत की वैदिक विचारधारा वैश्विक परिवेश को सुंदर और सुव्यवस्थित कर सकती है। उसे एक पारिवारिक परिवेश दे सकती है। जिससे वसुधैव कुटुंबकम के आदर्श को प्राप्त किया जा सकता है।

स्वयं मैंने अपने उपरोक्त गीत के अतिरिक्त कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में डी0ए0वी0 संस्थाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जिससे भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को वैश्विक विरासत बनाने में बहुत अधिक सफलता प्राप्त हुई है। इस अवसर पर ब्रिटेन से उपस्थित रही डॉ. अरुणा ने अपने संदेश में कहा कि स्वामी दयानंद जी महाराज की चिंतन धारा को महात्मा हंसराज जी के द्वारा डी0ए0वी0 संस्थाओं के माध्यम से प्रसारित करने का संकल्प लिया गया। मुझे बहुत खुशी है कि इस विचारधारा और संकल्प यात्रा को आगे बढाते हुए मॉरीशस में ये संस्थान महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमें अपनी भाषा के साथ-साथ अन्य भाषाओं को सीखने की भी आवश्यकता है। ऐसा अपने ज्ञान वर्धन के लिए भी आवश्यक है, परंतु इसके उपरांत भी अपनी हिंदी भाषा और संस्कृति पर हमें गर्व होना चाहिए क्योंकि संसार की सभी भाषाओं की जननी संस्कृत ही है।
सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ मृदुल कीर्ति ने अपने संदेश में कहा कि वेद और वैदिक संस्कृति ही संसार को वास्तविक शांति का बोध कराने में सफल हो सकते हैं। उन्होंने उपनिषदों और वेदों की ओर लौटने का संदेश देते हुए कहा कि वेद मंत्रों के माध्यम से ही सांसारिक विषय वासनाओं की आग में जलते तपते मानव को वास्तविक शांति प्राप्त हो सकती है। संसार से वैराग्य की भावना हमें उपनिषदों से प्राप्त हो सकती है। उन्होंने इस अवसर पर महात्मा हंसराज जी का स्मरण करते हुए कहा कि उन्होंने स्वामी दयानंद जी महाराज के बाद डी0ए0वी0 संस्थाओं को खड़ा कर शिक्षा के क्षेत्र में एक क्रांति पैदा करने का काम किया था। इसलिए आज डी0ए0वी0 संस्थाओं के माध्यम से हमें वैदिक संस्कृति के साथ जुड़कर चलने की आवश्यकता है। इसी से भारत की वैश्विक विरासत को एक पहचान मिल सकती है।
इस अवसर पर मुनेंद्र नाथ वर्मा पुस्तकालय का उद्घाटन भी किया गया। जिसे रविंद्र नाथ टैगोर यूनिवर्सिटी भोपाल से उपस्थित रहे वहां के वाइस चांसलर श्री संतोष चौबे द्वारा संपन्न किया गया। अपने महत्वपूर्ण संबोधन में डॉ0 चौबे ने कहा कि पुस्तक व्यक्ति का निर्माण करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पुस्तकों के माध्यम से हम ज्ञान के खजाने को ज्ञान की गंगा के रूप में छात्र-छात्राओं के मन मस्तिष्क में बहाने में सफलता प्राप्त कर सकते हैं । उन्होंने वैदिक साहित्य की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि वेद का संदेश ही मानवता को बचा सकता है और इसके माध्यम से ही हम वैश्विक शांति स्थापित कर सकते हैं। इसलिए इन संस्थानों में वैदिक साहित्य का प्रचलन होना हम सबके लिए गर्व और गौरव का विषय है।
इस विदाई समारोह कार्यक्रम में संस्थान के प्रबंधन तंत्र के साथ-साथ अध्यापक अध्यापिकाओं ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया और जीत की सुंदर प्रस्तुति देकर विदेशी अतिथियों का अभिनंदन किया। महान साहित्यकार श्री मुनेंद्र नाथ वर्मा के सुपुत्र बैरिस्टर यतिन वर्मा ने इस अवसर पर सभी आगंतुकों का धन्यवाद ज्ञापित किया।
मैंने अनुभव किया कि डॉ गंगू जी प्रत्येक पल को सजीवता प्रदान करने की विशेषता रखते हैं । उन्होंने विदाई समारोह के इस कार्यक्रम को भी सजीव बना दिया। लोगों के मन मस्तिष्क में इसकी स्मृतियां सदा ताजी बनी रहें, इसके लिए जिस प्रकार कार्यक्रम को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित किया गया, उसके लिए विद्यालय का प्रबंधन तंत्र भी बधाई का पात्र रहा। विद्यालय के छात्र-छात्राओं ने भी अपने आप को अनुशासित बनाए रखकर अपने शिष्ट संस्कारों का परिचय दिया।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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