वसुधैव कुटुंबकम के विनम्र संवाहक श्री इंद्रजीत शर्मा जी

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अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम् । 
उदारचरितानां तु वसुधैवकुटुम्बकम् ॥ (महोपनिषद्, अध्याय ६, मंत्र ७१)अर्थ – “यह मेरा अपना है और यह नहीं है अर्थात यह पराया है, इस प्रकार की गणना छोटे चित्त (सञ्कुचित मन या संकीर्ण मानसिकता ) वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों के लिए तो (सम्पूर्ण) धरती ही परिवार है।”

सचमुच भारत के ऋषियों का यह सार्वभौम और सार्वकालिक चिंतन हमको बहुत कुछ सिखाता और समझाता है । हमको बताता है कि सारी वसुधा के लोगों के प्रति अपनी संवेदनाएं जोड़ दो , अपने पंखों को इतना फैला दो कि सब आपको अपने दिखाई देने लगें , अपने हृदय की विशालता का परिचय दो , अपने आप को संकीर्णता के दायरे से बाहर निकालो, सब के साथ समन्वित होकर उदार मन से आगे बढ़ने का फैसला लो और फिर देखो कि सब आपके हैं और आप सबके हो । दूरियों को मिटा दो और सद्भाव का विस्तार करो। ऐसी स्थिति में पहुंचने पर आपको पता चलेगा कि जिन लोगों ने इस संसार को स्वार्थ की नगरी बनाकर रख दिया है ,वे स्वयं ही स्वार्थ की संकीर्णता के घेरे में फंसे रहे और संसार को अपने दृष्टिकोण से देखकर परिभाषित करते रहे।
वास्तव में ये संसार परमार्थ का एक ठिकाना है । इस परमार्थ की पवित्र भावना को जो लोग हृदयंगम कर लेते हैं वे संसार में अपने जीवन को, अपने माता-पिता के नाम को, अपने वंश और कुल की मर्यादा को आलोकित करते हैं।
कुछ ऐसे ही गुणों से विभूषित हैं आर्य मर्यादाओं को अपने जीवन का श्रृंगार बनाकर जीवन पथ पर आगे बढ़ने वाले से श्री इंद्रजीत शर्मा जी । जो कि भारत की मर्यादा पुरुषोत्तम राम की परंपरा को लेकर अपने पूज्य माता-पिता के नाम को भारत से हजारों किलोमीटर दूर न्यूयॉर्क में बैठकर भी रोशन कर रहे हैं। उनके पूज्य पिता स्वर्गीय तिलक राज शर्मा जी आर्य विचारधारा के ज्योति स्तंभ रहे। जिन्होंने अपने जीवन में महर्षि दयानंद जी महाराज की आर्य विचारधारा का भरपूर प्रचार प्रसार किया। पिताश्री का जीवन अनेक लोगों के लिए उद्धार और प्रेरणा का स्रोत बना। वेद की मर्यादा के पथिक पिताश्री पवित्र ह्रदय से संसार की सेवा में रत रहे। उन्होंने अपने आर्थिक संसाधनों को भी जगत के कल्याण में समर्पित किया। वेदों के प्रचार प्रसार के लिए संकल्प लिया । अपनी मानसिक शक्तियों का सदुपयोग करते हुए उन्हें संसार के लोगों के उत्थान में समर्पित कर दिया। उन्होंने दिव्यता को प्राप्त किया और भाव जीवन का श्रृंगार किया। सारे परिवार को संस्कार दिए और सारे संसार को वैदिक संस्कारों के प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित किया। आज उनका भौतिक शरीर तो इस संसार में नहीं है, पर उनका यश रूपी शरीर इस समय भी उनके सुपुत्र श्री इंद्रजीत शर्मा जी के माध्यम से लोगों का कल्याण कर रहा है । उनके यश रूपी शरीर की सुगंध भारत से बाहर उन सभी देशों में फैली हुई है जहां-जहां वेद धर्म के प्रति निष्ठा रखने वाले लोग रहते हैं और जहां श्री शर्मा अपने हितैषी लोगों के माध्यम से लोगों को वेद मार्ग पर लाने का कार्य कर रहे हैं।
यहां पर मैं एक अपना व्यक्तिगत अनुभव सांझा करने जा रहा हूं, जो श्री शर्मा जी की उदारता ,मानवता ,वेद धर्म के प्रति श्रद्धा, स्वामी दयानंद जी के विचारों के प्रचार प्रसार के प्रति उनकी लगनशीलता, उनके पुरुषार्थ, उनकी कर्मठता और अपनों के प्रति भावनात्मक रूप से जुड़ जाने की उनके अद्भुत व्यक्तित्व का परिचय देता है।
विगत 8 फरवरी को जब मैं दिल्ली अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के लिए शाम लगभग 5:30 बजे घर से निकला तो मुझे लग रहा था कि मुझे एयरपोर्ट पहुंचने में 2 घंटे लगेंगे और मैं उड़ान के निर्धारित समय अर्थात रात्रि 9:55 से 2 घंटे पहले एयरपोर्ट पर आराम से पहुंच जाऊंगा। पर रास्ते में निरंतर जाम मिलने लगा और एयरपोर्ट पर पहुंचने का मेरा समय सीमित होता चला गया। श्री शर्मा जी न्यूयॉर्क से मेरे साथ लगभग 6:00 बजे मोबाइल के माध्यम से जुड़ गए । मैं निरंतर जाम में फंसा हुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था और समय को खिंचते देखकर इस बात को लेकर चिंता में था कि शायद मेरी उड़ान छूट जाएगी, पर श्री शर्मा जी निरंतर मोबाइल पर बने रहकर मुझे प्रोत्साहित करते रहे और थोड़ी-थोड़ी देर में मेरी लोकेशन लेते रहे । उन्होंने कहा कि आपको मॉरीशस जाना जरूर है , इसके लिए चाहे बेशक मुझे आपका दूसरा टिकट कराना हो। यद्यपि मैं नहीं चाहता था कि वह मेरे लिए इतना कष्ट उठाएं। उनकी इस प्रकार की विनम्रता और उदारता को देखकर मैं आश्चर्यचकित था । साथ ही ईश्वर के लिए इस बात का धन्यवाद भी दे रहा था कि संसार में इस प्रकार के लोग भी हैं जो दूसरों के लिए इतनी गहन संवेदनाएं रखते हैं ? यह परमपिता परमेश्वर सब आपकी ही कृपा है, जो ऐसे साथियों, मित्रों और भाइयों को सही समय पर आप रक्षक और मार्गदर्शक बनाकर लोगों के साथ भेज देते हैं या जोड़ देते हैं।
गाड़ी में मैं स्वयं,मेरा सुपुत्र अमन और मेरी धर्मपत्नी श्रीमती ऋचा आर्या थे । जब दिल्ली में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की ओर मुड़ने का सही समय आया तो हम टर्मिनल 3 की ओर न मुड़कर भूल से आगे चले गए और जब आगे वाला मोड़ आया तो गलती से उसको भी छोड़ गए। अब हमारी मजबूरी थी कि हम जयपुर की ओर आगे बढ़ें और जहां से कट मिले वहां से गाड़ी को एयरपोर्ट की ओर मोड़कर लाएं। इस समय तक 8:30 बज चुके थे और अब मुझे विश्वास हो गया था कि अब मेरी फ्लाइट छूट जाएगी। पर इस समय तक श्री शर्मा जी का सुपुत्र मेरे साथ जुड़ चुका था, जो अपने पिता की भांति ही कर्तव्यशील और विनम्र स्वभाव का धनी है। हम गाड़ी को मोड़ कर जब टर्मिनल 3 तक पहुंचे तो उस समय तक 9:00 बजने में 10 मिनट रह गए थे। फिर भी मैं बोर्डिंग पास के लिए लाइन में जा लगा। वहां पर बोर्डिंग पास देने के लिए बैठी एक महिला कर्मचारी द्वारा मेरे से कह दिया गया कि आप बहुत अधिक देरी से यहां पहुंचे हैं। इसलिए अब आपकी को हम बोर्डिंग पास नहीं दे सकते। मैंने अनुनय विनय भी की परंतु कोई लाभ नहीं हुआ,
तब मैंने अपना सामान समेट कर उल्टा लौटने का मन बना लिया। तभी ईश्वरीय अनुकंपा हुई और बोर्डिंग पास देने के लिए दूसरे काउंटर पर बैठी एक महिला कर्मचारी ने मुझे संकेत किया और मेरी सहायता करते हुए मुझे बोर्डिंग पास दे दिया। तब जाकर मुझे कुछ तसल्ली हुई । पर इस दौरान जैसे ही मैंने अपनी फ्लाइट छूटने की सूचना बाहर मेरी प्रतीक्षा में खड़े श्री शर्मा जी के सुपुत्र को मोबाइल के माध्यम से दी तो उन्होंने मेरे लिए दूसरी फ्लाइट ढूंढना आरंभ कर दिया। पिता जैसी ही पवित्र भावना के बेटे को देखकर मुझे असीम प्रसन्नता हुई। जिस सद्भाव और संवेदना के साथ पिता श्री न्यूयॉर्क से मेरे साथ जुड़े थे , उस पवित्र भावना के साथ साक्षात रूप में मेरे सामने उनका सुपुत्र भी खड़ा था।
मैंने श्री शर्मा जी के पूज्य पिताजी को तो नहीं देखा, पर आज इन दोनों पिता पुत्रों को देखकर दोनों के पूर्वज के प्रति मेरा हृदय अनायास ही श्रद्धा भावना से भर गया। निश्चित रूप से उनका व्यक्तित्व बहुत ही उत्कृष्ट ,सुंदर और लोगों के प्रति सद्भाव से भरा हुआ रहा होगा, जिनके वंश की अगली दो पीढ़ियां दूसरों की सहायता करने के लिए इस प्रकार खड़ी हुई थीं ? मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह चमत्कार में दो आर्य भद्र पुरुषों के हृदय में देख रहा था या यह ईश्वर की कृपा का साक्षात दर्शन मुझे हो रहा था , जो किसी भी प्रकार के तनाव के क्षणों में किसी न किसी रूप में हमारी सहायता करने के लिए कहीं ना कहीं आ उपस्थित होते हैं ?
सचमुच अपनी मॉरीशस यात्रा के इस चरण में श्री इंद्रजीत शर्मा के साथ बना यह दूरभाषी संवाद मेरे लिए अविस्मरणीय होकर रह गया। मैं परमपिता परमेश्वर को हृदय से नमन करता हूं जिन्होंने श्री शर्मा जी जैसी दिव्य विभूतियों को संसार की व्यवस्था को सुव्यवस्थित ढंग से चलाये रखने के लिए हमारे बीच संजोया हुआ है।
श्री शर्मा जी ने अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन मॉरीशस के लिए भी खुलकर सहयोग किया। उन्होंने हवन कुंड, सामग्री, घृत ,पुस्तक आदि को प्रचुर मात्रा में कार्यक्रम स्थल पर विभिन्न माध्यमों से भेजा और इस पवित्र कार्य में अपनी पवित्र कमाई से अपना महत्वपूर्ण सहयोग दिया । मेरे प्रवास काल में भी वह निरंतर मुझसे जुड़े रहे । वे इस बात पर बल देते रहे कि मैं दूसरी सिम लेकर अपने संपर्क के लोगों के साथ जुड़ जाऊं । यहां तक कि एक सिम की व्यवस्था भी उन्होंने कर दी, यद्यपि मैंने उसे अपने लिए अनुपयोगी मानते हुए विनम्रता से लेने से इनकार कर दिया, परंतु उनकी मानवता ने इस रूप में भी मुझे प्रभावित किया।
सचमुच श्री शर्मा जी के इस आत्मीय और उदार भाव से मैं उनके प्रति और भी अधिक श्रद्धा के साथ जुड़ गया।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( लेखक 75 पुस्तकों के लेखक, सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है।)

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