22 जनवरी : हम श्रद्धा के दीप जलाएंगे…. और कांग्रेस …?

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देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का निमंत्रण ठुकरा दिया है। सोनिया गांधी की कांग्रेस अपने हिंदू विरोध के सही स्वरूप में सामने आ गई है। यह सच है कि सोनिया गांधी को भारतीयता से कोई प्रेम नहीं है। यही कारण था कि वह अपने शासनकाल में ( वास्तव में मनमोहन सिंह के 10 वर्ष का शासन काल उन्हीं का शासन काल था, जिसमें उन्हें ‘सुपर पी0एम0’ कहा जाता था) देश में सांप्रदायिक हिंसा निषेध अधिनियम के माध्यम से हिंदुओं के दमन चक्र की तैयारी कर चुकी थीं। पड़ोसी देश नेपाल का हिंदू स्वरूप मिटाने में भी सोनिया गांधी का विशेष योगदान रहा । इन्हीं के चलते कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में यह शपथ पत्र दिया कि श्रीराम काल्पनिक थे। राम रावण का कोई युद्ध नहीं हुआ । इसलिए रामसेतु नाम का कोई पुल भी नहीं बना। आज जब कि सारा देश ही नहीं अपितु संसार भर के अनेक देश श्री राम जी के भव्य मंदिर के साथ प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से किसी न किसी प्रकार जुड़ चुके हैं और सारा भूमंडल राममय हो चुका है, तब 22 जनवरी को होने वाले प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में सम्मिलित न होने का निर्णय लेकर कांग्रेस ने समझो अपने दुर्भाग्य को न्यौता दे दिया है।
वास्तव में कांग्रेस ने राम मंदिर आंदोलन के इतिहास को मिटाकर देश के साथ बहुत बड़ा पाप किया है। यदि इतिहास की सच्चाई को लोगों को बताया जाता तो आज की युवा पीढ़ी को यह पता चलता कि भारतवर्ष का आजादी का आंदोलन शताब्दियों तक राम मंदिर को केंद्र में रखकर लड़ा जाता रहा है। कांग्रेस ने लोगों को सच्चाई का पता नहीं चलने दिया। कांग्रेस के द्वारा ऐसा आचरण केवल एक वर्ग को प्रसन्न करने के लिए किया गया। उस वर्ग को ही प्रसन्न रखने के लिए देश में धर्मनिरपेक्षता का प्रपंच रचा गया। कम्युनिस्ट लोगों ने इस प्रपंच को रचने में और नये मिथकों को गढने में कांग्रेस से भी आगे बढ़कर भूमिका निभाई।
कांग्रेस की छल प्रपंच भरी राष्ट्र विरोधी मानसिकता को समझने के लिए हमें थोड़ा सा इतिहास की सैर करनी पड़ेगी। जिसके चलते यह बताना आवश्यक है कि राम मंदिर को सबसे पहले विदेशी आक्रमणकारी राजा मिनांडर ने तोड़ने का प्रयास किया था। उस विधर्मी के द्वारा तोड़े गए मंदिर को साढे तीन माह पश्चात ही शुंग वंश के शासकों द्वारा पुनर्निमित कर लिया गया था। इस प्रकार विदेशी और विधर्मियों द्वारा राम मंदिर को तोड़ने और हमारे पराक्रमी पूर्वजों के द्वारा फिर से इसका उद्धार करने का प्रारंभ यहीं से होता है। पुष्यमित्र शुंग जैसे वैदिक धर्मी शासक के द्वारा उस समय कई महान और पवित्र कार्य किए गए।
कांग्रेस ने इस सत्य को इतिहास से निकाल दिया। यद्यपि इस प्रकार के सत्य का वर्णन करने से हमें श्री राम के राष्ट्र संबंधी विचारों को समझने और उनके चरित्र का अनुकरण करने की शिक्षा मिलती। इसके पश्चात प्रतापी शासक विक्रमादित्य के द्वारा इस मंदिर का पुनः जीर्णोद्धार कराया गया। उन्होंने इस मंदिर को इसका प्राचीन गौरव लौटाने का हर संभव प्रयास किया। बात कुछ आगे बढ़ी तो इतिहास का वह दौर भी आया जब महमूद गजनवी ने भारत पर कई आक्रमण किये। उसके भांजे सालार मसूद ने 11 लाख की सेना लेकर 1033- 34 में राम मंदिर को तोड़ने का संकल्प लिया। जिसे बहराइच के राजा सुहेलदेव ने राजा भोज और ऐसे ही राष्ट्रभक्त 17 राजाओं के सहयोग से बनी राष्ट्रीय सेना के माध्यम से पराजित किया और मसूद की 11 लाख की सेना को काटकर समाप्त कर दिया। भारत के राष्ट्रभक्त राजाओं ने अपनी राष्ट्रीय सेना के माध्यम से संपूर्ण संसार को यह दिखा दिया कि यदि राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान बन चुके राम मंदिर को तोड़ने के लिए किसी ने भी कुदृष्टि डाली तो उसका परिणाम यही होगा जो सालार मसूद की सेना का हुआ है।
जब 1528 में बाबर ने इस मंदिर को तोड़ा तो उस समय भी लाखों भारतीयों ने अपना बलिदान राम मंदिर की रक्षा के लिए दिया था । महाराणा संग्राम सिंह ने अपनी सेना के 30000 वीर सैनिकों का और अंत में अपना भी बलिदान 30 जनवरी 1528 को इसी मंदिर की रक्षा के लिए दिया था। इस समय भीटी रियासत के राजा मेहताब सिंह की बड़ी सेना का बलिदान भी इस मंदिर की रक्षा के लिए हुआ । इसके साथ देवीदीन पांडे की 70000 की सेना हंसावर की राजकुमारी जय राजकुंवरि,उनके पति रणविजय सिंह, स्वामी महेशानंद और उनकी सेना के हजारों वीर सैनिकों का बलिदान भी इसी मंदिर के लिए हुआ था।
मंदिर पर शेरशाह सूरी, हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां, औरंगज़ेब आदि के शासनकाल में भी अनेक बार आक्रमण किए गए। हर बार हिंदू योद्धाओं ने अपने अप्रतिम बलिदान देकर मन्दिर की अस्मिता को बचाने का प्रयास किया। जिस समय औरंगजेब इस देश पर शासन कर रहा था उस समय गुरु गोविंद सिंह पंजाब में भारतीय अस्मिता की रक्षा का संकल्प लेकर लड़ाई लड़ रहे थे। समर्थ गुरु रामदास उस समय हरियाणा, पंजाब ,पश्चिम उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर जैसे स्थानों पर रुक-रुक कर लोगों का आवाहन कर रहे थे और उन्हें औरंगजेब के विरुद्ध क्रांति के लिए आंदोलित कर रहे थे । उनकी प्रेरणा से ऊर्जा प्राप्त कर मथुरा के गोकुल देव जाट ने मथुरा में पहुंचकर क्रांति का बिगुल फूंक दिया । 1857 की क्रांति से भी पहले भारत की यह एक ऐसी बड़ी क्रांति थी जिसे कांग्रेसी मानसिकता के इतिहासकारों ने इतिहास से मिटा कर रख दिया है। क्योंकि गुरु गोविंद सिंह, समर्थ गुरु रामदास, गोकुल देव जाट और इन्हीं से प्रेरणा लेकर बुंदेलखंड में काम कर रहे छत्रसाल बुंदेला ,आगे दक्षिण में छत्रपति शिवाजी आदि ये सब ऐसे ही आंदोलन की राह पर नहीं चल पड़े थे , प्रत्युत्त इन सबका कोई लक्ष्य था। उनके भीतर कोई टीस थी , कोई दर्द था और वह दर्द भारतीय जनता की अस्मिता की पहचान बन चुके राम मंदिर को लेकर था।
मंदिर आंदोलन को भारतवासियों ने अपनी स्वाधीनता के आंदोलन का केंद्र बनाकर लड़ा। यदि निष्पक्षता से भारतीय इतिहास का लेखन किया जाता तो इस बात को सिद्ध करने में अधिक देर नहीं लगती कि अपनी राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक राम मंदिर के लिए भारत के लोगों ने लाखों बलिदान दिए। लोगों ने यह मान लिया कि यदि मंदिर से केसरिया ध्वज उतर गया तो समझो सारा भारत गुलाम हो गया। यही कारण रहा कि प्राणों की बाजी लगाकर मंदिर की रक्षा करने के लिए हर हिंदुस्तानी आगे रहना चाहता था। मुगल काल में लोगों ने लाखों बलिदान दिए। अंग्रेजी समय में जब 1857 की क्रांति हुई तो उससे पहले 1847 के लगभग भी लोगों ने कई लड़ाइयां मंदिर की रक्षा के लिए लड़ी। अंग्रेजों ने जानबूझकर इस पर राजनीति करनी आरंभ की। 1857 की क्रांति के तुरंत पश्चात यहां पर दंगे हुए। 1884 के लगभग राम जन्मभूमि को लेकर पहला मुकदमा अंग्रेजी न्यायालय में तैयार किया गया।
उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत का सारा स्वाधीनता आंदोलन राम मंदिर के लिए लड़ा गया आंदोलन कहा जा सकता है कांग्रेस की स्थापना अंग्रेजों के द्वारा की गई थी। यही कारण था कि इस पार्टी ने प्रारंभ से ही हिंदू समाज और हिंदू वैदिक संस्कृति से दूरी बनाकर दिखाना अच्छा माना। इसीलिए कांग्रेस ने इतिहास में यह सत्य स्थापित नहीं होने दिया कि भारत के हिंदुओं के भीतर इतनी गहरी धार्मिक आस्था है कि वह राम मंदिर के लिए हजारों वर्ष तक लड़ाई लड़ने का माद्दा रखता है।
कांग्रेस की मूर्खता के कारण संसार में यह मिथक अपने आप स्थापित हो गया कि इजरायल के यहूदी लोग अपने अस्तित्व के लिए लड़ना जानते हैं क्योंकि वह पिछले हजारों वर्ष से जेरूसलम को लेने के लिए ईसाई और मुसलमान समाज से लड़ते आ रहे हैं यदि भारत के राम मंदिर आंदोलन को सही स्थान दिया जाता तो संसार के इतिहास का यह मिथक टूटा और जो सम्मान आज अपने देश व संस्कृति के लिए लड़ने के संबंध में इजरायल के लोगों को दिया जाता है वह सम्मान भारत के लोगों को मिलता इसका परिणाम यह होता कि भारत की युवा पीढ़ी के भीतर सम्मान का भाव पैदा होता और वह अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने के प्रति संकल्पित होती अपने पूर्वजों के बलिदानों का सम्मान करना जानती और संसार में सीना तानकर खड़ी होकर आगे बढ़ती।
जिस कांग्रेस ने देश के साथ इतना बड़ा छल किया हो कि युवा पीढ़ी को ही आत्मसम्मान से जीने की प्रेरणा न दी हो, वह कांग्रेस आज राम मंदिर के उक्त कार्यक्रम में किस मुंह से जा सकती है ? सोनिया गांधी की कांग्रेस को आज उसकी गैरत ने ललकारा है। उसी के कारण उसने राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के उक्त कार्यक्रम में न जाने का निर्णय लिया है । इस प्राण प्रतिष्ठा के पौराणिक जगत में चाहे जो अर्थ हों, पर हम इसका अर्थ यही लेते हैं कि आज संपूर्ण राष्ट्र में नवचेतना का संचार हो रहा है, और राम जी के नाम से यदि सारे राष्ट्र में एक नया पराक्रमी विमर्श बन रहा हो, राष्ट्र नई चेतना, नई ऊर्जा, नए उत्साह से भर रहा हो तो ऐसी प्राण प्रतिष्ठा का सम्मान होना ही चाहिए। 22 जनवरी को हम नई चेतना के, नई ऊर्जा के दीप जलाएंगे। हम इन दीपों के माध्यम से अपने बलिदानी पूर्वजों के बलिदान को स्मरण करेंगे। उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करेंगे। उनके बलिदानों को नमन करेंगे, और एक दीप इस बात के लिए भी जलाएंगे कि भविष्य में फिर कोई ऐसा बाबर न आ जाए जो हमारे इस पर पराक्रमी इतिहास पर कालिमा फेरने का दुस्साहस कर सके।
हम श्रद्धांजलि के दीप जलाएंगे…. हम विनम्रता के दीप जलाएंगे….. हम कृतज्ञता के दीप जलाएंगे….. हम सजगता के दीप जलाएंगे…… हम भविष्य के प्रति सावधान रहने के दीप जलाएंगे ……। …. और कांग्रेस अपने अंतिम काल के दीप जलाएगी ।

डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है।)

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