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देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार बहुत बड़ी समस्या है। राजनीति में बैठे लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वह देश के जनसाधारण के लिए आदर्श प्रस्तुत करें। अपनी कार्य नीति ,कार्य शैली और कार्य व्यवहार से लोगों पर इस प्रकार की छाप छोड़ें कि वह हर प्रकार से उनके आदर्श हैं और उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि है, परंतु स्वाधीनता के पश्चात पहले दिन से ही देश के राजनीतिक लोगों ने भ्रष्टाचार के एक से बढ़कर एक कीर्तिमान स्थापित करने आरंभ कर दिए । नेहरू के जमाने में ही हुए जीप घोटाले से लेकर वर्तमान समय तक ( कांग्रेस के शासनकाल में तो विशेष रूप से ) भ्रष्टाचार के कई कीर्तिमान स्थापित हुए। कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ने का संकल्प लेकर आम आदमी पार्टी ने दिल्ली पर कब्जा कर उस समय लोगों के सामने कट्टर ईमानदार की छवि प्रस्तुत की। पर कुछ समय पश्चात ही लोगों को यह आभास हो गया कि ‘आप’ के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। अब तो लोगों को यह भी पता चल गया है कि ‘आप’ के हाथों में भी उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है । केजरीवाल जैसे नौटंकीबाज नेता जो अपने आपको कट्टर ईमानदार कहते थे, आज कट्टर बेईमान सिद्ध होते जा रहे हैं।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल रंग बदलने में गिरगिट को भी मात दे देते हैं। वह कब किस बात से कैसे ‘यू टर्न ले जाएंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता । लोगों के बीच जाकर वह कब अपने ऊपर टमाटर फेंकवा लेंगे और कब अपने गाल पर अपने आप ही चांटा लगवा लेंगे, यह सब उनकी राजनीति के ऐसे खेल हैं जिनसे वह लोगों के बीच लोकप्रिय बनने की तरकीबें लगाते रहते हैं।
सत्ता को जिस प्रकार केजरीवाल और उनके साथियों ने भोगा है, उससे पता चलता है कि वह अपने आप को किसी मुगल बादशाह से कम नहीं मानते । उन्होंने दिल्ली के सभी आर्थिक संसाधनों पर अपना अधिकार मान लिया और सोच लिया कि कुछ रेवड़ियां बांटकर यदि वह जनता को मूर्ख बना सकते हैं तो अब वह कुछ भी कर सकते हैं। ऐसी सोच बनाते समय वह भूल गए कि इस समय केंद्र में किसकी सरकार है ?
अभी बीते 2 नवंबर को दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल की कथित शराब नीति घोटाले मामले में प्रवर्तन निदेशालय के सामने पेशी थी, पर उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय के सामने जाने से इंकार कर दिया है। सारा देश जानता है कि ईडी ने केजरीवाल को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पूछताछ के लिए तलब किया था। यदि केजरीवाल अपने आप को दूध का धुला मानते थे तो उन्हें सौ काम छोड़कर प्रवर्तन निदेशालय के सामने उपस्थित होना चाहिए था। उन्हें प्रवर्तन निदेशालय के माध्यम से सारे देश को यह बताना चाहिए था कि वह किस प्रकार निर्दोष है और भाजपा उनकी राजनीति को खत्म करने के लिए किस सीमा तक जा सकती है ? पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। जिससे उन पर शंकाओं के बादल और भी अधिक मंडरा गए हैं। इससे पहले वह अपनी पार्टी के बड़े नेताओं को बड़े बोल-बोलकर जेल पहुंचवा जा चुके हैं। लगता है अब उन्हें अपनी बारी आते देखकर कुछ समझ आ गई है।
हम सभी भली प्रकार जानते हैं कि इस मनी लांड्रिंग के केस में 6 महीने पहले सीबीआई ने भी केजरीवाल से 9 घंटे तक पूछताछ की थी। तब केजरीवाल से प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों ने प्रश्नों की झड़ी लगाकर उनसे कुल 56 प्रश्न पूछे थे। केजरीवाल ने प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों की आंखों में धूल झोंकते हुए और देश की जनता का भी मूर्ख बनाने का प्रयास करते हुए बाहर आकर बड़ी शान से कहा था कि भाजपा उनकी पार्टी को समाप्त करना चाहती है। उसकी सोच है कि केजरीवाल का राजनीतिक कैरियर समाप्त हो जाए तो उन्हें चैन की सांस लेने को मिल सकती है।
जहां तक भाजपा द्वारा केजरीवाल और उनकी पार्टी के राजनीतिक कैरियर को या अस्तित्व को समाप्त करने की बात है तो इस देश में आम आदमी पार्टी से अलग भी राजनीतिक दल हैं जिनकी सरकारें देश के विभिन्न प्रांतो में काम कर रही हैं । ऐसा भी नहीं है कि वे सारी सरकारें भाजपा का साथ दे रही हों, उनमें से कई ऐसी सरकारें हैं जो केंद्र की मोदी सरकार की धुर विरोधी नीतियों पर काम कर रही हैं। यदि केंद्र की मोदी सरकार अपनी विरोधी राजनीतिक पार्टियों के अस्तित्व को समाप्त करने पर ही काम कर रही है तो फिर प्रांतों की इन गैर भाजपाई सरकारों को भी समाप्त करने का प्रयास राजनीतिक दुर्भाव के वशीभूत होकर किया जाना चाहिए। पर ऐसा हो नहीं रहा है तो इसका अभिप्राय यही है कि इन गैर भाजपाई सरकारों के मंत्रियों या मुख्यमंत्री की ओर से कोई ऐसा अवसर नहीं दिया जा रहा है जैसा देश की राजधानी दिल्ली की केजरीवाल सरकार देती रही है।
भाजपा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए बहुत संभव है कि आम आदमी पार्टी के अस्तित्व को समाप्त करने का प्रयास कर रही हो, पर यदि देश के न्यायालयों की ओर से भी आम आदमी पार्टी के बड़े नेताओं के प्रति कठोर दृष्टिकोण दिखाया जा रहा है तो बात साफ है कि कहीं ना कहीं गड़बड़झाला अवश्य है। केजरीवाल की आम आदमी पार्टी जिस तेजी से भारत के राजनीतिक गगनमंडल में उठी यदि उसी तेजी से उसका अवसान हो गया तो इसके लिए जिम्मेदार इसके बड़े नेता ही होंगे। इसमें दो मत नहीं हैं कि केजरीवाल की आम आदमी पार्टी इस समय अपने राजनीतिक जीवन के 12 साल के सबसे बुरे दिनों से गुजर रही है। इस समय जांच एजेंसियों ने केजरीवाल को तलब करने से पहले उनके विरुद्ध जाने वाले सभी सबूत एकत्र कर लिए हैं। जिनकी जानकारी केजरीवाल को भी लग चुकी है। वह जान चुके हैं कि अब सत्ता में बने रहने के उनके दिन अधिक नहीं रह गए हैं । उन्हें किसी भी समय गिरफ्तार किया सकता है और उनका हाल वही हो सकता है जो उनकी पार्टी के बड़े नेता मनीष सिसोदिया और संजय सिंह का हो चुका है।
हमने ऊपर जिस जीप घोटाले का संकेत किया है, वह स्वतंत्र भारत का पहला घोटाला है । जिसमें सरकार में काम कर रहे एक अधिकारी ने अहम भूमिका निभाई थी। उस समय इंग्लैंड में भारत के उच्चायुक्त के रूप में काम कर रहे वी के कृष्ण मेनन नेहरू के बहुत निकट थे । उन्होंने अपनी निकटता का लाभ उठाते हुए इस घोटाले को अंजाम दिया था। नेहरू ने भी अपने मित्र मेनन का पूरा साथ दिया और इस घोटाले को दबाने का सफल प्रयास किया। सत्ता में बैठे लोगों ने जब इस घोटाले को दबाने में सफलता प्राप्त कर ली तो इसने देश में आगे चलकर होने वाले अन्य घोटालों की नींव रख दी। कांग्रेस की भ्रष्टाचार पूर्ण कार्य शैली की आलोचना करके सत्ता में पहुंचने वाले नौटंकीबाज केजरीवाल जब अपने मित्र मनीष सिसोदिया की तरफदारी कर रहे थे और उनके गलत कार्यों पर पर्दा डालने का काम कर रहे थे, तब वह यह भूल गए थे कि वह भी अपने आपको नेहरू की भूमिका में रख रहे हैं, जिन्होंने अपने मित्र मेनन का साथ दिया था। कांग्रेस की आलोचना से सत्ता में पहुंचे केजरीवाल को कांग्रेस की आलोचना के साथ-साथ यह भी दिखाना चाहिए था कि वह कांग्रेस की कार्यशैली और संस्कृति में विश्वास नहीं रखते।
पर वह ऐसा नहीं कर पाए।

डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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