देश का विभाजन और सावरकर, अध्याय -16 ख ‘वदतोव्याघात’ का उदाहरण-

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“मुसलमानों का पराभव करने का अत्यंत अनुकूल अवसर प्राप्त होने पर भी प्रारंभ से ही हिंदुओं को ऐसा भय लगता रहा कि भ्रष्ट किए गए हिंदुओं को अथवा जन्मजात मुसलमानों को शुद्ध कर आज हमने यदि पुनः हिंदू बना लिया, तो उसके परिणामस्वरूप आस- पास के मुसलिम राज्य और लोग कल हम पर अधिक शक्ति से सशस्त्र आक्रमण करेंगे अथवा सीमा पार के प्रदेशों से कोई नया मुसलिम समूह टिड्डी दल की तरह हम पर टूट पड़ेगा और हम हिंदुओं पर दस गुणा अधिक भयंकर अत्याचार करेगा। मुसलिम उत्पीड़न के इस सतत भय से ही हिंदुओं ने यह कठोर जाति-नियम बनाया था। भ्रष्ट किए गए हिंदुओं को पुनः शुद्ध कर स्वजाति में न लौटाया जाए। भंगी से लेकर ब्राह्मण तक भी जातियों ने स्वेच्छा से ‘शुद्धि-बंदी’ की यह जो धार्मिक बेड़ी अपने पाँवों में डाली थी, उसका कारण मुसलमानों के बारंबार होनेवाले सशस्त्र आक्रमणों और अत्याचारों का भय ही था।”
इस प्रकार के ओजस्वी लेखन के माध्यम से सावरकर जी ने हिंदू मानसिकता का और साथ ही साथ मुस्लिम सांप्रदायिकता का बहुत ही वास्तविक चित्रण किया। उनके इस प्रकार के लेखन से हर वह व्यक्ति सहमत हो सकता है जो किसी प्रकार की दलीय राजनीति नहीं करता है या दलीय मानसिकता नहीं रखता है और जिसे इतिहास का थोड़ा सा भी ज्ञान है। सावरकर जी ने हिंदू मानसिकता को जहां लताड़ा है वही मुस्लिम सांप्रदायिकता को नंगा करके रखने का प्रयास किया है। उन्होंने इस प्रकार के लेखन के माध्यम से हिंदुओं को झकझोरते हुए आने वाले भविष्य के प्रति सचेत किया और बताया कि मुस्लिम सांप्रदायिकता आज भी अपने उसी भयानक स्वरूप में जीवित है जिसमें वह अतीत में रही है। हिंदुओं को अब इस प्रकार का भय निकाल भगाना चाहिए कि यदि हम अपने लोगों के हितों की बात करेंगे तो मुसलमान हम को खा जाएंगे? इस प्रकार की कायरता पूर्ण सोच को दूर कर उन्हें सोचना चाहिए कि जिस प्रकार मुसलमान संख्या बल के आधार पर आज देश तोड़ने की बात कर रहा है, उस संख्या को अतीत में हमने ही बढ़ने दिया है। साथ ही यह भी कि यदि यह संख्या आज थोड़ी सी अधिक होती तो क्या होता? निश्चय ही तब संपूर्ण हिंदू समाज का नाश कर तलवार के बल पर सारे हिंदुस्तान पर मुसलमान कब्जा कर लेता। सावरकर जी भविष्य के लिए आने वाली पीढ़ियों को भी यह संकेत दे रहे थे कि सावधानी हटते ही दुर्घटना हो जाती है। इसलिए आगे भी सावधान रहने की आवश्यकता है।
उन्होंने आगे लिखा है “यह धारणा कितनी भ्रामक, नासमझ, अपूर्ण और अयथार्थ है-यह दिखाने के लिए और इस ग्रंथ में सर्वत्र हिंदू-मुसलमानों के इस महायुद्ध की आलोचना करते हुए हमने जो विधान किए हैं, उन्हें कितना विपुल ऐतिहासिक आधार उपलब्ध है, यह दिग्दर्शित करने के लिए वर्तमान प्रकरण में टीपू के साथ हुए युद्ध के कालखंड में घटित मराठों के इतिहास का कुछ वृत्तांत परिच्छेद ५२१ से ५४९ में उदाहरणस्वरूप विस्तार से दिया गया है।
इस उदाहरण को क्षण भर के लिए छोड़ दें, तब भी हमें स्वयं से एक साधारण प्रश्न पूछना पर्याप्त होगा कि सारा हिंदू समाज मुसलमानों के और भी भड़क उठने के सतत भय से यदि सचमुच इतना भयग्रस्त रहता था, तो क्या वह मुसलमानों पर धार्मिक प्रत्याक्रमण की बात न करें, तब भी राजनीतिक स्वातंत्र्य के लिए ही कभी प्रत्याक्रमण भी करता था ? प्रत्याक्रमण तो दूर, वह प्रतिकार भी नहीं करता था। कारण, मुसलमान सशस्त्र आक्रमण कर जिन प्रदेशों को जीत लेते थे, वहाँ के हिंदुओं पर धार्मिक अत्याचार कर सकते थे। अतः हिंदुओं को भय ही होता तो सर्वप्रथम मुसलमानों के राजनीतिक आक्रमणों का भय होता, परंतु उस इतिहास के समग्र अवलोकन से यही विदित होता है कि महमूद गजनवी और मोहम्मद गोरी के आक्रमणों से हिंदुओं ने स्वराज्य और स्वधर्म के संरक्षण के लिए एक के बाद एक विकट युद्ध किए। राज्य यदि जाते थे, तो उन्हें हिंदू पुनः प्राप्त करते थे। आज हार तो कल जीत; आज जीत तो कल हार-यही निरंतर चलता रहा; परंतु सतत छह सौ सात सौ वर्षों तक जो हिंदू मुसलमानों से सशस्त्र होकर पूरे हिंदुस्थान में एक-एक इंच भूमि को स्वतंत्र कराने के लिए लड़ते रहे और जिन्होंने अंत में मुसलिम सत्ता को परास्त कर नष्ट किया, वह हिंदू मुसलमानी क्रोध से भयभीत था- ऐसा कहना ‘वदतो व्याघात’ का ही एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
मुसलमानों को हिंदू नहीं बनाना अथवा इसलामी धार्मिक शासन पर किसी भी प्रकार का प्रत्याक्रमण न करना, उन्हें धार्मिक प्रश्न पर किसी भी प्रकार नहीं छेड़ना आदि प्रवृत्तियों को देखते हुए मुसलमानों को इसलामी धर्मसत्ता के संरक्षण के लिए किसी भी प्रकार की चिंता करने का कोई कारण नहीं बचा था। उनको केवल एक ही चिंता बची थी और वह थी धार्मिक आक्रमणों को तीव्र करते हुए, यद्यपि हिंदुओं द्वारा उनकी राजसत्ता छीन ली गई थी, तथापि कम- से-कम उनकी इसलामी धर्मसत्ता की कक्षाएँ पूरे हिंदुस्थान में फैल जाएँ, इसके लिए यथाशक्ति पूरे प्रयास करना। मुसलमानों की इस धर्मसत्ता से हिंदू जगत् की कितनी प्रचंड हानि हुई थी, इसकी चर्चा हमने इस ग्रंथ में कई स्थानों पर की है। उसका सिंहावलोकन कर निष्कर्ष के रूप में हम मुसलिम धर्मसत्ता के फलस्वरूप जो अल्प हानिकर परिणाम हुए विषयों को छोड़, यहाँ हम उन दो विषयों की चर्चा करेंगे, जिनके कारण हिंदू समाज को गंभीर हानि हुई ।
संख्याबल की हानि—पहला विषय है, हिंदुओं के संख्याबल में हुई राष्ट्रव्यापी प्रचंड हानि। उन एक सहस्र वर्षों में साधारणतः दो से तीन करोड़ हिंदुओं को मुसलमानों ने भ्रष्ट कर मुसलिम बनाया।
हिंदुओं के संख्याबल का जो रक्तशोषण चल रहा था, उसका आकलन तत्कालीन हिंदू समाज को भी हो रहा था; परंतु उस रक्तक्षय के रोग पर ‘शुद्धिबंदी’ के बुद्धिभ्रंश के कारण दूसरा कोई भी उपाय, उपचार उनकी समझ में नहीं आ रहा था। किसी असाध्य रोग से ग्रस्त रोगी जिस प्रकार उस रोग की प्राणांतक व्यथा निरुपाय होकर सहन करता है, उसी प्रकार तत्कालीन
हिंदू जगत् भी केवल निरुपाय होकर इस रक्तक्षय की प्राणांतक व्यथा सहन करता रहा।
भू-क्षेत्र की हानि – परंतु संख्याबल की हानि से भी भयंकर हिंदू राष्ट्र की एक दूसरी हानि भी हो रही थी। वह थी कि मुसलमानों की यह इसलामी धार्मिक सत्ता हिंदुस्थान की विशाल भूमि को हिंदुओं से, उनके अनजाने में ही छीनती चली जा रही थी।”
सावरकर जी ने अपनी व्यावहारिक बुद्धि का परिचय देते हुए इस यथार्थ को तत्कालीन हिंदू समाज के सामने प्रस्तुत किया। इससे कांग्रेस के नेताओं की सोच पर कुठाराघात हुआ। गांधी जी और नेहरू जी जिस प्रकार काल्पनिक लोक में रहते हुए हिंदू मुस्लिम एकता की बात कर रहे थे सावरकर जी ने उस काल्पनिक लोक की धज्जियां उड़ा कर रख दी। नेहरू गांधी अव्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए हिंदू और मुसलमान को एक साथ एक पलड़े में तोलने का अतार्किक परिश्रम कर रहे थे। यद्यपि इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि देश में सांप्रदायिक एकता बनाए रखने के लिए हिंदू मुस्लिम की एकता अनिवार्य है, पर इसके लिए केवल हिंदू समाज को ही नैतिकता का उपदेश देना और मुस्लिम की अनैतिकता को भी पोषित करना यह कांग्रेसी संस्कृति रही है । जिसे सावरकर जी प्रारंभ से ही देश हित में अनुचित मानते थे।
अब बात यह भी आ सकती है कि क्या खरी- खरी सुनाने से किसी संप्रदाय की सांप्रदायिकता को सीधा किया जा सकता है? इस संबंध में हम यह कहना चाहेंगे कि खरी- खरी कहने से कोई भी व्यक्ति समुदाय या संप्रदाय इतना अवश्य सोचता है कि उसकी कपट नीति को अगला जानता है। अतः वह या तो अपनी कपट नीति को छोड़ेगा या फिर दूसरा समाज जागकर सावधान रहते हुए दूरी बनाकर खेलेगा। यह दोनों बातें ही राष्ट्रहित में उचित होंगी। चुपचाप दूसरे की कपट नीति को झेलना और अपना कलेजा खिलाते रहना या कितनी भूमि और कितनी आबादी दूसरा पक्ष कपट नीति के माध्यम से एक पक्ष से छीनकर ले गया ? इसका हिसाब किताब न रखना, घाटे का सौदा होता है। जिसे तुष्टीकरण और छद्म धर्मनिरपेक्षता की मनबहलाव की बातें होने देती हैं। सावरकर जी इस प्रकार की ‘कलेजा खिलाओ’ नीति के विरोधी थे। इसके विपरीत वह इस बात के समर्थक थे कि प्यार का हाथ बढ़ाओगे तो गले लगाएंगे, गले काटोगे तो गले काटेंगे और कलेजा खाओगे तो कलेजा खाएंगे। अपने अस्तित्व को बचाए बनाए रखने के लिए यही नीति उचित होती है। नैतिकता के उपदेश तभी अच्छे लगते हैं जब अपना अस्तित्व सुरक्षित रखकर सावधानी से खेल खेला जाए।
सावरकर जी की इस प्रकार की नीति से मुस्लिम प्रारंभ से ही असहमत रहे। उन्हें पता था कि उनकी वास्तविकता को सावरकर जी किस प्रकार ओजस्विता के साथ हिंदू मानस में अंकित करने में सफल होते जा रहे थे ? यही कारण था कि तत्कालीन मुस्लिम नेतृत्व सावरकर जी को सांप्रदायिक कहता था और उनके मुकाबले मुस्लिम हितों के पैरोकार के रूप में गांधीजी और नेहरू जी को कहीं अधिक अंक देता था। गांधीजी और नेहरू जी दोनों को ही सावरकर जी को बदनाम करने में अपना राजनीतिक लाभ सधता हुआ दिखाई देता था, यही कारण था कि वह मुस्लिम तुष्टिकरण और धर्मनिरपेक्षता की नीति को अपनाकर मुस्लिमों को गले लगाते चले गए। अपने इस कार्य में वह यह भी भूल गए कि इससे हिंदुओं का कितना अहित हो रहा है ?
सावरकर जी मुसलमानों की भारत के प्रति सोच और हिंदुओं की सद्गुण विकृति का खुलासा करते हुए यह भी बताते हैं कि “हिंदुओं से युद्ध कर पूरे भारत की जितनी भूमि मुसलमान जीत सके, उससे कहीं अधिक भूमि उन्होंने हिंदुओं को भ्रष्ट करके जीत ली। कारण, जो लाखों मुसलमान बाहर से भारत में आए और हिंदुओं को भ्रष्ट कर जो दो या तीन करोड़ मुसलमान बनाए गए, वे सभी भारत में ही स्थायी रूप से निवास करने लगे। इन करोड़ों मुसलमानों की बस्तियों और उपनिवेशों ने भारत के गाँवों, नगरों, प्रदेशों की जितनी भूमि प्राप्त की, उतनी भूमि वस्तुतः मुसलिम सत्ता के ही अधीन हो गई। उस विस्तीर्ण भूमि पर मुसलिम धर्मसत्ता का ही प्रभुत्व था । उसका ‘हरा चाँद’ (हरा ध्वज) हिंदुओं के देश के उस विशाल भूभाग पर अबाधित रूप से फहरा रहा था। हिंदू-मुसलमानों के इस महायुद्ध के अंत में पूरे भारत में हिंदुओं ने, विशेषतः मराठों ने मुसलमानों से उनकी राजसत्ता छीन ली। फिर भी उनकी वैयक्तिक और सामुदायिक धर्मसत्ता अबाधित थी। मुसलिम नागरिकों की सारी संपत्ति भी सुरक्षित और अक्षुण्ण थी ।
मुसलमानों की जनसंख्या में भी उनके प्रच्छन्न धर्म प्रचार के तथा बहुपत्नीत्व की प्रथा के कारण निरंतर वृद्धि हो रही थी और उसी मात्रा में भारत की अधिकाधिक भूमि भी उनके द्वारा व्याप्त होकर मुसलिम धर्मसत्ता के अधीन होती जा रही थी। इस वस्तुस्थिति की यथार्थ कल्पना आने के लिए केवल इतना ही बताना पर्याप्त होगा कि हिंदुओं की, विशेषतः मराठों की राजसत्ता प्रस्थापित होने के पश्चात् भी भारत के प्रत्येक छोटे-बड़े गाँव और नगर में ‘मुसलिम टोला’ या ‘मुसलिम मोहल्ला’ कहलाने वाली एक अलग बस्ती अवश्य होती थी। साधारण गाँवों-नगरों की तो बात ही छोड़ दें, प्रत्यक्ष पुणे, सतारा, कोल्हापुर, नागपुर, बड़ौदा, देवास, धार, इंदौर, ग्वालियर, जोधपुर, उदयपुर, अमृतसर, लाहौर, श्रीनगर आदि हिंदुओं की राजधानियों के स्वतंत्र विशाल नगरों में भी ‘मुसलिम पुरा’ या ‘मुसलिम मोहल्ला’ कहलानेवाली कई बस्तियाँ होती थीं, जिनमें हजारों-लाखों मुसलमान सुख से रहते थे।”
वास्तव में यह सारे तथ्य ऐसे हैं जिनकी ओर केवल सावरकर जी का ही ध्यान जा सकता था। उनसे अलग किसी कांग्रेसी से तो विशेष रूप से यह अपेक्षा या आशा नहीं की जा सकती थी कि वे इस प्रकार के तथ्यों के साथ इतिहास का लेखन करेंगे।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( यह लेख मेरी नवीन पुस्तक “देश का विभाजन और सावरकर” से लिया गया है। मेरी यह पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स दिल्ली से प्रकाशित हुई है जिसका मूल्य ₹200 और पृष्ठ संख्या 152 है।)

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